राष्ट्रीय आन्दोलन
452. संविधान सभा
1946
1946 के आरम्भ में मजदूर-सरकार ने ब्रिटिश संसद
सदस्यों का एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल भारत भेजा। इसका उद्देश्य भारतीय नेताओं
से मिल कर उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना था कि सरकार संवैधानिक मामले पर शीघ्र
ही समझौता करने को उत्सुक है। लेकिन ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनैतिक नेताओं के
बीच निर्णायक चरण मार्च, 1946 में आया, जब मंत्रिमण्डल
के तीन सदस्य लार्ड पैथिक लारेंस, सर स्टैफर्ड
क्रिप्स और श्री ए.वी. अलेकजाण्डर कैबिनेट मिशन के रूप में भारत आए। कांग्रेस की
ओर से बातचीत अबुल कलाम आजाद ने की। इस काम में नेहरू और पटेल ने उनकी सहायता की।
गांधीजी से ये लोग सलाह लेते रहते थे। लेकिन इस मूल प्रश्न पर बातचीत में गतिरोध
पैदा हो गया कि भारत की एकता बनी रहेगी अथवा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को
पूरा करने के लिए देश का विभाजन होगा। कांग्रेस विभाजन का विरोध कर रही थी और
विभिन्न प्रांतों को जितनी भी अधिक-से-अधिक आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय स्वायत्तता दे सकना
संभव था, देने को तैयार थी।
शिमला में
आयोजित एक सम्मेलन में कांग्रेस और लीग के मतभेद दूर नहीं हो सके। तब कैबिनेट मिशन
ने 16 मई, 1946 को अपनी समझौता योजना एक वक्तव्य में पेश की।
उन्होंने भारत के लिए तीन स्तरीय संवैधानिक ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की। संविधान
संघ के ढंग का होगा, जिसमें रियासतें
भी सम्मिलित होंगी। संघ सरकार पर केवल विदेशी मामले, सुरक्षा और यातायात संभालने का भार होगा। नीचे
के स्तर पर प्रांत और रियासतें होंगी और सारे अवशिष्ट अधिकार इनको मिलेंगे। बीच के
स्तर पर प्रांतों द्वारा स्वेच्छा से बनाये ऐसे समूह होंगे जो समान विषयों पर
विचार करेंगे। मुस्लिम लीग ने ऊपर से तो इस योजना को स्वीकार कर लिया लेकिन यह
स्वीकृति वास्तविक न होकर दिखावा मात्र थी। 5 जून,
1946 को, जिन्ना ने
मुस्लिम लीग कौंसिल में भाषण देते हुए कहा था : “मैं आपको बता देना चाहता हूं कि जब तक हम अपने
सारे क्षेत्र को मिला कर पूर्ण और प्रभुसत्तासंप़न्न पाकिस्तान की स्थापना नहीं कर
लेंगे तब तक हम संतुष्ट होकर नहीं बैठेंगे।” लीग की इस
विसंगति के कारण ही गांधीजी और कांग्रेस में उनके साथी, “प्रांतों के वर्ग बंधन” की योजना के विषय में अशांत और आशंकित हो गए।
लीग इस योजना को अनिवार्य करके इसे पाकिस्तान की स्थापना का साधन बनाना चाहती थी।
इस बात पर मतभेद से कैबिनेट मिशन-योजना विफल हो गई।
तीन स्तरीय संविधान योजना बड़ी सूक्ष्म
व्यवस्था थी, जिसमें रोकथाम और संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत
सारे उपाय किए गए थे। बड़े-बड़े दलों के बीच पूर्ण सहयोग के बिना संविधान बनाना
असंभव था, उसे कार्यरूप देना तो दूर की बात थी। ऐसे सहयोग
का अभाव था। कैबिनेट मिशन-योजना में समझौते का प्रयास था, लेकिन यह कांग्रेस और लीग को एकमत नहीं कर सकी।
इसका परिणाम यह हुआ कि जिन मामलों को यह समझा जाता था कि इस योजना से तय हो चुके
हैं, वे ही मिशन के तीनों सदस्यों के इंग्लैंड लौटने
पर तुरंत फिर उठाए गए। किन प्रांतों के ‘वर्ग’ बनाये जाएं और अंतरिम सरकार में किस दल के
कितने लोग होंगे – इन दो
महत्वपूर्ण प्रश्नों पर वाद-विवाद की उत्तेजना चरम सीमा पर पहुंच गई।
जब तनाव बढ़ रहा
था तो केंद्र में स्थिर और दृढ़ सरकार का होना बहुत जरूरी था। कैबिनेट मिशन अंतरिम
राष्ट्रीय सरकार बनाने में असफल रहा। जुलाई, 1946 में लॉर्ड वेवेल ने पुनः इस दिशा में प्रयत्न
आरंभ किया और जवाहरलाल नेहरू को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। नेहरू ने
जिन्ना को अंतरिम सरकार में सम्मिलित करना चाहा लेकिन उन्होंने न केवल सहयोग देने
से इनकार कर दिया, बल्कि बड़ी ही
कटु आलोचना की और यह भी घोषणा की कि मुस्लिम लीग 16 अगस्त को “सीधी कार्रवाई दिवस” मनाएगी। उस दिन कलकत्ता में ऐसा भीषण दंगा, खून-खराबा और मारकाट हुई जिसकी मिसाल नहीं मिल
सकती। “कलकत्ता के भयंकर नरमेध” की प्रतिक्रिया हुई और पूर्व बंगाल, बिहार और पंजाब में सांप्रदायिक ज्वाला की
लपटें उठने लगी।
देशव्यापी अराजकता से बुरी तरह घबरा कर, लॉर्ड वेवेल ने लीग को भी अंतरिम सरकार में
सम्मिलित कर लिया। लेकिन इस संयुक्त मंत्रिमंडल से राजनीतिक वाद विवाद समाप्त होने
के बजाय तेजी से बढ़ा। 9 दिसम्बर, 1946 से संविधान सभा की बैठक होने वाली थी। मुस्लिम
लीग ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। वैधानिक संकट इतना गहरा हो गया कि नवम्बर, 1946 के अंतिम सप्ताह में ब्रिटिश सरकार ने दोनों
दलों में समझौता कराने के लिए वायसराय, नेहरू, जिन्ना, लियाकत अली खां और सरकार बलदेव सिंह को बातचीत
के लिए लंदन बुलाया। वहां की बातचीत भी निष्फल रही लेकिन सरकार ने विवादास्पद
बातों पर अपने दृष्टिकोण या स्पष्टीकरण करते हुए एक वक्तव्य निकाला। इससे लीग की
बहुत सी आपत्तियों का निराकरण हो गया, लेकिन फिर भी वह
संविधान सभा में भाग लेने को राजी न हुई।
कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार स्वतंत्र भारत के संविधान की
रचना के लिए 1946 में संविधान
सभा का
गठन किया गया। भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली के कंस्टिट्यूशन हॉल, जिसे अब
संसद भवन के केंद्रीय कक्ष के रूप में जाना जाता है, में हुई, जिसमें भारतीय नेताओं के साथ कैबिनेट मिशन ने
भाग लिया। इसकी अध्यक्षता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी। 11 दिसंबर
1946 की
बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष और डॉ. एच.सी.
मुखर्जी को उपाध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा के अन्य प्रमुख सदस्य थे डॉ. बी.आर.
आंबेदकर, टी.टी.
कृष्णमाचारी और डॉ. एस. राधाकृष्णन। डॉ. बी.आर. आंबेदकर ड्राफ़्टिंग कमेटी के
चेयरमैन थे। पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरिम सरकार के
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में इसमें शामिल हुए। सभा के सदस्यों का चयन 1946 के
प्रांतीय चुनावों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से किया गया था। संविधान सभा में
कुल 389 सदस्य
थे (292 प्रांतों
से, 93 रियासतों
से और 4 मुख्य
आयुक्त प्रांतों से)। विभाजन के बाद यह 299 रह गए। जिनमें कुल महिला सदस्यों की संख्या 15 , अनुसूचित
जाति के 26, अनुसूचित
जनजाति के 33 सदस्य
थे। मुस्लिम
लीग द्वारा अलग देश की मांग के कारण पहली बैठक का बहिष्कार किया गया था, जिसके
परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के लिए दो अलग-अलग संविधान सभाएं बनीं। 9 दिसंबर, 1946 को जब संविधान सभा की पहली बैठक हुई तो मुस्लिम
लीग से कोई भी उस बैठक में शामिल नहीं हुआ। स्वतन्त्र होने के बाद संविधान सभा
के सदस्य ही प्रथम संसद के सदस्य बने।
मसौदा समिति के अध्यक्ष बाबासाहेब आंबेडकर थे। कैबिनेट मिशन की सिफारिशों
पर संविधान सभा की 385 सीटों के लिए जुलाई-अगस्त 1946 में चुनाव हो गए थे। उस चुनाव में अंबेडकर
भी एक उम्मीदवार, जो बंबई से शेड्यूल कास्ट फेडरेशन
के उम्मीदवार थे, लेकिन वो चुनाव हार गए। महात्मा गांधी से लेकर कांग्रेस और यहां तक कि मुस्लिम
लीग के लोग भी चाहते थे कि अंबेडकर को तो संविधान सभा का सदस्य होना ही चाहिए। तब बंगाल से बी.आर. अबेडकर को उम्मीदवार
बनाया गया। मुस्लिम लीग के वोटों के जरिए अंबेडकर चुनाव जीत गए और संविधान सभा के सदस्य बन गए। 24 मार्च 1947 को नए गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन भारत आ गए थे और चंद दिनों
में ही तय कर दिया था कि
भारत का बंटवारा होगा। भारत और पाकिस्तान दो देश होंगे। इस वजह से संविधान सभा में फिर बदलाव होना था। जिस सीट, जयसुरकुलना
से अबेडकर संविधान सभा के सदस्य चुने गए थे, वह सीट पाकिस्तान के
हिस्से में चली गई। इस तरह अंबेडकर एक बार फिर से संविधान सभा से बाहर हो
गए। लेकिन तब तक संविधान सभा के लोगों ने ये तय कर लिया था कि अंबेडकर का संविधान सभा में रहना ज़रूरी है। तब बंबई प्रेसिडेंसी के
प्रधानमंत्री हुआ करते थे बी.जी. खेर। उन्होंने संविधान सभा के एक और सदस्य कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता एम.आर. जयकर
को इस्तीफा देने के लिए राजी किया। एम.आर. जयकर ने इस्तीफा दिया और उनकी जगह पर अंबेडकर फिर से संविधान सभा में शामिल हो गए। 29 अगस्त1947 को संविधान सभा ने प्रारूप समिति
के अध्यक्ष के तौर पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का सर्वसम्मति से पास
कर दिया। प्रारूप समिति में और 6 सदस्य थे।
केन्द्रीय ऊर्जा
समिति और केन्द्रीय घटना समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। प्रान्तीय घटना समिति, मुलभूत
अधिकार, अल्पसंख्यक, आदिवासी और अपवर्जित क्षेत्रों की सलाहकार समिति के अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल थे।
डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद प्रक्रिया संबंधी
नियम समिति, संचालन समिति, और
वित्त और कर्मचारी समिति
के अध्यक्ष थे। अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यारी क्रेडेंशियल
समिति के, बी पट्टाभि सीतारामय्या हाउस कमेटी के, के.एम. मुंशी व्यापार समिति का आदेश के,
राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय ध्वज पर तदर्थ समिति के, और जी.वी. मावलंकर संविधान सभा के कार्यों
पर समिति के अध्यक्ष थे।
संविधान सभा की बैठक के पाँचवें दिन 13 दिसंबर को जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा
में लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पेश किया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता पुरुषोत्तम दास टंडन ने इसका
अनुमोदन किया। भारत
को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएं, सिफ़ारिशें और वाद-विवाद किया गया। कई बार
संशोधन के बाद भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया। भारत का संविधान तैयार करने
में इस सभा को तीन वर्ष (दो वर्ष, ग्यारह माह और सत्रह दिन) लगे। इसकी बैठकें 11 सत्रों में 165 दिन हुईं। इनमें से 114 दिन संविधान के प्रारूप पर विचार करने में
व्यतीत हुए। 21 फरवरी, 1948 को
संविधान का प्रारूप तैयार हुआ और अध्यक्ष की हैसियत से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवम्बर
1949 को
इस पर हस्ताक्षर किए। 26 जनवरी, 1950 से यह संविधान लागू किया गया। इसके अनुसार
भारत एक ‘सर्वप्रभुत्वसंपन्न
लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बन गया। संविधान के अनुसार नए चुनाव 1952 में
हुए। इसके पहले अंतरिम सरकार ही कार्यरत रही। आज भी हम गर्व से कहते हैं कि हमारा
संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान, जिसको बनाने में डॉक्टर अंबेडकर का वो योगदान अहम है, जिसकी वजह से उन्हें भारत के संविधान निर्माता की उपाधि मिली हुई है।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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