राष्ट्रीय आन्दोलन
425.
फूट डालो और राज करो
1942
मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस के साथ कोई समझौता करने को
तैयार नहीं था। उसके नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने भारत छोडो आंदोलन का घोर विरोध
किया। उन्हें आज़ादी क्यों नापसंद थी, यह रोचक विषय है। अंग्रेज़ शासक तो चाहते ही
थे कि संप्रदायिक प्रश्न की आड़ में भारतवासियों को स्वराज की मांग को ठुकारती रहे।
देश त्रिकोण में फंसा था, कांग्रेस (राष्ट्रीयता), मुस्लिम लीग (सांप्रदायिकता) और
ब्रिटिश शासन (साम्राज्यवाद)।
बारह-तेरह सौ वर्षों से इस देश में
हिन्दु-मुसलमान साथ रहते आए थे। सूफ़ी और हिन्दू संतों ने एक बेहतर सामाजिक
सौहार्द्र की दिशा में महत्त्वपूर्ण काम किया था। इनके बीच के आपसी भाई-चारे के
बीच कटुता और वैमनस्यता का बीज तो अंग्रेज़ों ने बोया था। उनकी कूटनीति का मूल
सिद्धांत ही था, ‘फूट डालो और राज करो’। बंबई के गवर्नर लॉर्ड एल्फिंस्टन
ने 14 मई, 1859 को अपनी डायरी में लिखा था, “फूट फैलाकर राज करो,
हमारा सूत्र होना चाहिए।” ब्रिटिश अधिकारी जॉन
कोक ने कहा था, “विभिन्न धर्मों के बीच
जो अलगाव मौज़ूद है, उसे पूरी तरह से प्रोत्साहन देने का प्रयत्न हमें करना चाहिए।”
ब्रिटिश शासकों के लिए सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण
था भारतीय एलीट-ग्रुप्स के बीच फूट को बढ़ावा देना, जो
मुख्य रूप से धार्मिक आधार पर थी, लेकिन
कभी-कभी जाति और क्षेत्रीय आधार पर भी थी। अंग्रेज़ों ने 1857 की क्रांति का दोष
मुसलमान शासकों पर डाला। उनके प्रति भेदभाव का व्यवहार किया जाने लगा। सरकारी
नौकरियों और सरकार द्वारा मान्य धंधों से उन्हें वंचित रखा जाता। अंग्रेज़ों से
उनका रोष बढ़ा। फलतः उन्होंने अंग्रेज़ी शिक्षा का स्वागत नहीं किया। परिणाम यह हुआ
कि अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त किए हुए हिन्दू सरकारी नौकरियों, उद्योगों और व्यापार
में मुसलमानों से आगे बढ़ गए।
1857 के 15 वर्षों बाद जब
मुसलमानों का अंग्रेज़-विरोध ने भयंकर रूप धारण कर लिया तो ब्रिटिशों को लगा कि
मुसलमानों संबंधी ब्रिटिश सरकार की नीति उचित नहीं है। एक अंग्रेज़ अधिकारी हन्टर
ने कहा था, “मुसलमानों की एक ऐसी क़ौम है, जो ब्रिटिश राज्य में बरबाद हो
गई।” इसने सरकारी हलकों में मुसलमानों को एक सजातीय 'पिछड़ा' समुदाय के रूप में बात
करने और सोचने का चलन तेज़ी से शुरू किया। अंग्रेज़ों की यह भावना 1885 के आसपास राष्ट्रवादी
आंदोलन के उदय होने के बाद अधिक तीव्र हो गई। कारण यह था कि कांग्रेस की उत्पत्ति
के बाद इसमें मुसलमानों का प्रतिनिधित्व साल-दर-साल बढ़ता जा रहा था। बंबई के प्रथम
अधिवेशन में, 1885 में, जहां दो
मुसलमान सदस्य थे, 1886 के कलकत्ता अधिवेशन में 33, और 1890 के कलकत्ता अधिवेशन
में यह संख्या कुल 702 प्रतिनिधियों में से मुसलमानों की संख्या 156 तक पहुंच गई थी। यानी
यह कुल संख्या 702 का 22 प्रतिशत था। यह हिन्दू
मुस्लिम लोगों का तालमेल अँग्रेज़ों को अखरने लगा। उन्होंने न सिर्फ़ मुसलमानों को
अलग-थलग करने की रणनीति बनानी शुरू कर दी बल्कि उन्हें वफ़ादार बनाने की नीति अपना
ली। डफरिन ने 1888 में मुसलमानों को '50 मिलियन का एक
राष्ट्र' बताया, जो कथित तौर पर
धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों में एक समान थे और 'उन दिनों की यादें
साझा करते थे जब दिल्ली में सिंहासन पर बैठकर वे हिमालय से लेकर केप कोमोरिन तक
सर्वोच्च शासन करते थे'। यह एक निर्विवाद
तथ्य है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों ने अनिवार्य रूप से विभाजन की रेखाओं को
कठोर बना दिया, जिससे सामुदायिक
नेताओं को केवल अपने धार्मिक अनुयायियों को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया
गया और मजबूर भी किया गया।
कर्जन का सबसे
अलोकप्रिय कदम—बंगाल का विभाजन — जिसका अंग्रेजों ने मुख्य मकसद प्रशासनिक सुविधा बताया, जबकि समकालीन और बाद
के राष्ट्रवादियों ने 'बांटो और राज करो' की नीति का आरोप
लगाया। 1906 में भारत का वायसराय था लॉर्ड मिंटो। उसने कांग्रेस की
बढ़ती लोकप्रियता कम करने के लिए मुसलमानों को महत्त्व देना शुरू कर दिया। अक्तूबर 1906 में मुसलमानों का एक
प्रतिनिधि मंडल आगाखान के नेतृत्व में वायसराय से शिमला में मिला। उसने कहा, “मुसलमान क़ौम को एक क़ौम
की हैसियत से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। मुसलमानों की स्थिति का अनुमान सिर्फ़ उनके
संख्याबल के आधार पर न लगाया जाए, बल्कि इस क़ौम के राजनीतिक महत्व और उनके द्वारा
की हुई साम्राज्य सेवा का ध्यान रख कर लगाया जाए।” इसके जवाब में मिंटो
ने कहा था, “मैं आपके साथ पूरी तरह से सहमत हूं। आप इस बात का पूरा
विश्वास रखें कि क़ौम के रूप में उसके राजनीतिक अधिकारों और उसके हितों की रक्षा
ऐसे किसी भी प्रशासनिक पुनर्गठन में की जाएगी, जिससे मेरा संबंध होगा। उसके एक
महीने के बाद ही वायसराय की शुभकामना और सहयोग से मुस्लिम लीग का गठन हुआ।
किसी ने लॉर्ड मिंटो की पत्नी को पत्र द्वारा ख़ुशखबरी दी, “हमने एक महत्त्वपूर्ण
काम किया है, जो देश का इतिहास बदल सकने की क्षमता रखता है। हमने छह करोड़
मुसलमानों को राजद्रोही कांग्रेस से बचा लिया है।”
इसके बाद से ब्रिटिश
राज ने मुस्लिम लीग को हमेशा महत्त्वपूर्ण स्थान देना प्रारंभ कर दिया। ब्रिटिश
वायसराय और उसके अफसरों की चालबाज़ी से साम्प्रदायिकता भी बढ़ती गई। ब्रिटिश सत्ता
ने जान-बूझकर एक तरफ़ तो सांप्रदायवाद को हवा दी, वहीं दूसरी तरफ़ उसी ने
राष्ट्रवादियों को इस संप्रदायवाद को धराशायी करने की बात कही। ख़िलाफ़त के ज़माने
में 1920 से 1924 तक, देश में
सांप्रदायिकता को भुला दिया गया था। लेकिन खिलाफ़त आन्दोलन के बन्द हो जाने के बाद
साम्प्रदायवाद को फिर से गति दी जाने लगी। ब्रिटिश सत्ता स्वाधीनता की लड़ाई में
राष्ट्रवादी शक्तियों को विफल करने के लिए ‘फूट फैलाकर राज्य करने’ की कला का प्रयोग
करती रही। रैमसे मैकडोनल्ड की सरकार में भारत मंत्री लॉर्ड ओलिवियर ने स्पष्ट
शब्दों में कहा था, “भारत के ब्रिटिश
सत्ताधारियों का मानस अंशतः गहरी सहानुभूति के कारण, परन्तु अधिकतर हिन्दुओं की
राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध एक सन्तुलन के रूप में मुख्यतः मुस्लिम क़ौम के प्रति
पक्षपाती है।”
शासन का प्रयत्न रहता
था कि दोनों समुदायों में वैमनस्यता बढ़ती रहे। जब साइमन कमीशन भारत आया था, तब
उसका जिन्ना सहित सारे भारत ने बहिष्कार किया। इस पर लॉर्ड बर्कनहेड ने लॉर्ड
इरविन को लिखा था, “विशाल हिन्दू समाज को
इस भय से आतंकित कर दिया जाए कि कमीशन मुसलमानों के हाथ में आ गया है, इसलिए वह
हिन्दूओं की स्थिति के लिए सर्वथा विनाशकारी सिद्ध हो सकती हो ऐसी रिपोर्ट पेश कर
सकता है। इससे हमें मुसलमानों का ठोस समर्थन प्राप्त हो जाएगा।” अंग्रेज़ी हुक़ूमत भारत
में फूट डालने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने का कोई मौक़ा नहीं चूकती।
पदवियां, ऊंचे पद, बड़ी तनख़्वाह वाली नौकरियां, और दूसरी अन्य रियायतें उन लोगों को
देती थी, जो फूट की वकालत करते। जो धार्मिक एकता की बात करते उनकी उपेक्षा की
जाती। ब्रिटिश की 'बांटो और राज करो' की नीति का एक और
उदाहरण अगस्त 1932 में कम्युनल अवार्ड की घोषणा में देखने को मिला। इस अवार्ड में
हर अल्पसंख्यक समुदाय को विधानमंडलों में कुछ सीटें दी गईं, जिनका चुनाव अलग-अलग
इलेक्टोरेट के आधार पर होना था, यानी मुसलमानों को सिर्फ मुसलमान
ही चुनेंगे और सिखों को सिर्फ सिख, वगैरह। इस अवार्ड ने डिप्रेस्ड
क्लास (आज की अनुसूचित जाति) को भी एक अल्पसंख्यक समुदाय घोषित किया, जिसे अलग इलेक्टोरेट
का अधिकार दिया गया और इस तरह उन्हें बाकी हिंदुओं से अलग कर दिया गया।
जिन्ना भी उन दिनों
राजनीतिक उपेक्षा का शिकार था। राजनीतिक चर्चाओं में प्रतिनिधित्व देने के बारे
में केवल साम्प्रदायवादी मुस्लिम वर्ग को ही सरकारी मान्यता मिलती। इसी नीति के
तहत 1931 के गोलमेज सम्मेलन में किसी भी राष्ट्रवादी मुसलमान को
शामिल नहीं किया गया। आगाखान की नामजदगी में समस्त मुस्लिम समाज का समावेश हो गया
था, ऐसा ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था। ब्रिटिश चाहते थे कि आगा खान दलित वर्गों
की सहायता से राजनीतिक सत्ता हस्तांतरित करने की भारतीय मांग का विरोध करे और उसे
एक ओर हटवा दे। इसी नीति के तहत सांप्रदायिक निर्वाचन-मंडलों की तरकीब निकाली गई। हिंदू-मुसलमान
ध्रुवीकरण को रोककर पंडित मोतीलाल नेहरू ने 1932 में दोनों समुदायों
को सर्वदलीय परिषद में एक साथ कर लिया था। सिंध को मुस्लिम प्रांत घोषित करवाने की
मांग के अलावा अन्य सभी मुद्दों पर दोनों समुदायों में सहमति थी। सिंघ प्रांत के
मुद्दे पर भी स्वीकृति हो जाती लेकिन प्रस्ताव पास होने के पहले ही मोतीलाल नेहरू
गिरफ़्तार कर लिए गए। ब्रिटिश सरकार के अधिकारी सैमुएल होर ने बिना किसी
विचार-विमर्श सिंध प्रांत का उपहार मुसलमानों को परोस दिया। इस प्रकार सर्वदलीय
परिषद असफल हो गई। 1935 में जब प्रांतीय सरकार बनने की बारी आई तो ब्रिटिश सरकार
ने पाया कि मुस्लिम लीग में पर्याप्त शक्ति नहीं है कि वह चुनाव जीत सके। उस समय
मुहम्मद अली जिन्ना राजनीति से निराश होकर लंदन में प्रीवी काउंसिल में बैरस्टरी
कर रहे थे। जिन्ना को लंदन से बुलाया गया। उसे लीग का अध्यक्ष बनाया गया।
जिन्ना के बारे में
जिन्ना गुजरात के
काठियावाड़ के बोहरा जमात का था। विदेश में उसने पढ़ाई की। बैरिस्टर बनने के बाद वह 1906 में भारत लौटा। वह एक
अत्यंत सुसंस्कृत और विशाल हृदय व्यक्ति था। उस समय वह धर्मनिरपेक्ष और उदार
राष्ट्रवादी दादाभाई नौरोजी का समर्थक था। भारत आते ही वह कांग्रेस में शामिल हो
गया। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में उसने दादाभाई के सचिव का काम भी
किया था। उन्हीं दिनों मुसलिम लीग का गठन किया जा रहा था, और जिन्ना इसके विरोध
में था। लीग के पहले सचिव आगा ख़ान के कामों का वह विरोध किया करता था। वह कहा करता
था कि पृथक मतदाता मंडल का सिद्धांत राष्ट्र का आंतरिक विभाजन कर रहा है। वह जब भी
सभा करता, तो उसमें राष्ट्रीय एकता पर बल देता। जिन्ना के भाषणों से प्रभावित होकर
सरोजिनी नायडू ने उसे ‘हिंदू-मुसलिम एकता का राजदूत’ की उपाधि दी थी। दक्षिण
अफ़्रीका से जब गांधीजी वापस आए थे, तब 1915 में उसने गांधीजी का
स्वागत किया था। गुजरात समाज के गांधी-अभिनंदन समारोह की उसने अध्यक्षता की थी।
उसकी एनी बेसेंट से मित्रता थी। उसे होमरूल में विश्वास था। हर वर्ष कांग्रेस
अधिवेशन में भाग लेता था।
असहयोग आन्दोलन तक तो
वह कांग्रेस का पूर्ण समर्थक था। सांप्रदायिकता की दिशा में उसका पहला कदम उसकी
इच्छा के बिना उठा था। पृथक मतदाता मंडलों की व्यवस्था के तहत बंबई से उसे
केन्द्रीय विधान परिषद का सदस्य चुना गया था। 1913 में वह मुसलिम लीग में
शामिल हो गया। लेकिन उसने अपना राष्ट्रवादी चरित्र नहीं छोड़ा। वह अब भी कांग्रेस
में था और इस आधार पर पृथक मतदाता मंडल का विरोध करता रहा। लेकिन समय के साथ
जिन्ना अपनी समाज सुधारक और उदार विचारधारा को छोड़कर मुसलिम समाज का प्रवक्ता बनता
गया और अंग्रेज़ी साम्राज्य का पक्ष लेना शुरू कर दिया। उसकी दोहरी भूमिकाएं लखनऊ
में हुए कांग्रेस-लीग समझौते के दौरान उच्चतम शिखर पर पहुंच गई थी। यह समझौता तिलक
और जिन्ना ने मिलकर तैयार की थी। मुसलिम सांप्रदायिकता के प्रवक्ता के तौर पर
जिन्ना ने कांग्रेस से पृथक मतदाता मंडल और सांप्रदायिक आरक्षण का सिद्धांत मनवा
लिया। लेकिन अब भी वह राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का पक्षधर था। जब रॉलेट
बिल पास हुआ तो उसने विधान परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया था। वह अब भी इस बात का खंडन
किया करता था कि भारत में स्वशासन का मतलब होगा हिंदू राष्ट्र। वह अब भी भारत का
असली राजनीतिक मुदा ‘होम रूल’ को मानता था।
जब 1919-20 में कांग्रेस ने
शांतिपूर्ण अवज्ञा पर आधारित आंदोलन को अपनाया, तो जिन्ना इससे सहमत नहीं हुआ और
इस आंदोलन में शामिल नहीं हुआ। उसने कांग्रेस छोड़ दी। वह राजनीतिक निर्वासन का
शिकार नहीं होना चाहता था। उसने यह भी पाया कि उदारवादी राजनीति का कोई भविष्य
नहीं है, इसलिए वह संप्रदायी राजनीति की ओर चला गया। 1924 में उसने लगभग
समाप्तप्राय मुसलिम लीग फिर से जान डाली। मुसलमानों के हितों और अधिकारों की वकालत
करने लगा। वह इस बात पर बल देता कि मुसलमानों को अपना अलग संगठन बनाना चाहिए।
हालांकि अब भी वह लखनऊ समझौते के आधार पर हिन्दू-मुसलिम एकता और ब्रिटिश शासन के
ख़िलाफ़ मिल-जुल लड़ने की बात करता था। केन्द्रीय विधान परिषद में सरकारी नीतियों और
कदमों का विरोध करने में वह स्वराजियों के साथ था। 1925 में उसने एक मुसलमान
नौजवान के यह कहने पर कि वह मुसलमान पहले है उसने समझाया था, “नहीं बेटे, तुम भारतीय
पहले हो मुसलमान बाद में।” 1927-28 में उसने साइमन कमीशन
के बहिष्कार का समर्थन किया था। हां, इसके ख़िलाफ़ आयोजित जुलूस में शामिल होने से
उसने इंकार कर दिया था। लेकिन अब तक वह सांप्रदायिक विचारधाराओं वाले व्यक्ति के
अधिक क़रीब हो गया था। उसने देखा कि यदि वह सांप्रदायिक रास्ते से हट जाता है, तो
उसका राजनीतिक प्रभाव ही सिमट जाएगा। इसलिए वह उन दिनों के अति प्रतिक्रियावादी
सांप्रदायिक नेताओं आगा ख़ां और एम. शफ़ी का साथ हो लिया। लेकिन जब 1930 में कांग्रेस ने अति
सफल नमक सत्याग्रह चलाया सारे देश को इसका समर्थन मिलने लगा और जिन्ना राष्ट्रवाद
की मुख्य धारा से अलग-थलग पड़ने लगा। उन दिनों मुसलिम जनता खास कर युवा पीढ़ी
राष्ट्रवादी राजनीति की ओर खिंचती जा रही थी। जिन्ना की समझ में ही नहीं आ रहा था
कि वह क्या करे? वह इंग्लैंड चला गया।
जिन्ना 1936 में भारत लौटा।
मुसलिम लीग को उसने फिर से जीवित करने का संकल्प लिया। उसने इस वर्ष तो राष्ट्रवाद
और स्वाधीनता पर ही ज़ोर दिया। हिन्दू-मुसलिम सहयोग की बात करता रहा। 1937 का चुनाव सामने था।
वह तो चुनावों में भाग लेने के लिए ही भारत लौटा था। उसका इरादा था कि मुसलिम लीग
की मदद से वह इतनी सीट हासिल कर ले कि कांग्रेस को एक और लखनऊ समझौते के लिए बाध्य
कर सके। लेकिन जिन्ना और लीग ने जिन कार्यक्रमों और आधार पर चुनाव लड़ा था, वह
कांग्रेस से बिलकुल मिलता जुलता था। चुनाव परिणाम उसके हक़ में नहीं आए। इसलिए 1937 के बाद उसने अपनी
राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को उचित परिणाम दिलाने के लिए घृणा और भय पर आधारित
सांप्रदायिक राजनीति को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। उसने ‘इस्लाम खतरे में है’,
’मुल्क़ में हिंदू राज कायम हो जाएगा’ आदि कहना शुरू कर दिया। लोगों के बीच
असुरक्षा की भावना का प्रसार करने के लिए उसने कहना शुरू किया कि कांग्रेस राष्ट्र
की स्वाधीनता नहीं चाहती, बल्कि वह ब्रिटिश सरकार से मिलकर हिंदू राज क़ायम करना
चाहती है। वह मुसलमानों पर हावी होना चाहती है और भारत से इसलाम का नामोनिशान ही
मिटा देना चाहती है।
1938 में जिन्ना मुसलिम
लीग का अध्यक्ष चुना गया। उसने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था, “कांग्रेस का आलाकमान
दूसरे सभी समुदायों तथा संस्कृतियों को नष्ट करने और हिंदू राज क़ायम करने के लिए
पूरी तरह दृढ़प्रतिज्ञ है। गांधीजी का आदर्श है हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करना और
इस देश में हिंदू राज क़ायम करना।” इसके अलावा भी जिन्ना
ने ‘मि. गांधी मुसलमानों को कुचल डालना चाहते हैं’, ‘पाकिस्तान केवल हासिल किया जा
सकता है’, ‘यदि आप इसलाम को पूरी तरह ख़त्म होने से रोकना चाहते हैं, तो एकमात्र
मकसद पाकिस्तान होना चाहिए’, ‘मुसलमानों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जाएगा’,
‘सवर्ण हिन्दुओं की फासीवादी कांग्रेस’ जैसा जुमला बोलने लगा था।
1937 का चुनाव और मुस्लिम लीग
1937 के चुनाव में मुस्लिम
लीग की करारी हार हुई। उसे पांच प्रतिशत मत भी नहीं मिले। अंग्रेज़ सरकार को काफ़ी
निराशा हुई। कांग्रेस को सात प्रांतों में जीत मिली। सरकार को उम्मीद थी कि सत्ता
गवर्नर के हाथों में रहेगी। उसका इरादा था कि गवर्नर चुने हुए नए शासनकारियों को
आपस में लड़ा कर सत्ता अपने हाथ में रखेंगे। लेकिन गांधीजी ने दूरदर्शिता से काम
लिया। उनके सुझाव पर कांग्रेस के प्रथम पंक्ति के नेतागण सत्ता से बाहर रहे।
द्वितीय श्रेणी के नेताओं को मंत्रीमंडल में जगह दिया गया और प्रथम श्रेणी के
नेतागण संसदीय बोर्ड मे रहकर शासन नीति का संचालन करने लगे। इससे कांग्रेस में
दलबंदी या गुटबंदी नहीं उभरी। इसका फ़ायदा यह हुआ कि किसी भी प्रश्न पर कांग्रेस के
मंत्री एकमत होकर गवर्नर के पास जाते। मुस्लिम लीग के सदस्य कांग्रेस के कार्यक्रम
में सम्मिलित होने के लिए तत्पर थे। कांग्रेस को उनकी निष्कपटता पर भरोसा नहीं था।
गांधीजी चाहते थे कि लीग पर भरोसा कर उनकी मैत्री और विश्वसनीयता को स्वीकार कर
लेना चाहिए। लेकिन कांग्रेस का हाईकमांड इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इधर कांग्रेस ने
लीग को ठुकरा दिया उधर वायसराय लिनलिथगो ने लीग को अपना लिया। 1939 में दूसरा महायुद्ध
छिड़ जाने के बाद कांग्रेस मंत्रीमंडल ने सिद्धांत के प्रश्न पर त्यागपत्र दे दिया।
सरकार को सत्ता हथियाने का सुअवसर मिल गया। इस शासन में अंग्रेज़ों को अब मुस्लिम
लीग का भी साथ था। बंगाल, पश्चिमोत्तर प्रांत, सिंध, आसाम में सरकार
ने अपने मनोनीत करने की शक्ति का दुरुपयोग करके मुस्लिम लीग की सरकारें बनवा दीं। बंगाल
में फजलुल हक़ एक मिश्र मंत्रिमंडल के नेता थे और उन्हें बहुमत का विश्वास प्राप्त
था। सरकार द्वारा उसे धमकी देकर त्यागपत्र देने पर मज़बूर किया गया। उसके स्थान पर
नाजिमुद्दीन के नेतृत्व में लिगी मंत्रिमंडल स्थापित कर दिया गया। सिंध में
अल्लाहबख़्श के नेतृत्व में शासन था। उसने आज़ादी की भारतीय राष्ट्रीय मांग को
ब्रिटिश द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के विरोध में ‘ख़ान बहादुर’ की पदवी छोड़ दी थी” इससे कुपित हो कर
वहां के गवर्नर ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। उसके स्थान पर गवर्नर ने लीगी नेता
को आमंत्रित कर उसकी मंत्रिमंडल बनवा दी। असम में स्वतंत्र सदस्य रोहिणी कुमार
चौधरी मंत्रिमंडल बनाने की स्थिति में थे। लेकिन उन्हें निमंत्रण न देकर गवर्नर ने
लीगी नेता को मंत्रिमंडल बनाने को कहा। ब्रिटिश के इन प्रयासों से अब मुस्लिम लीग
हर प्रकार से सरकार की सहायता करने लगी। उसी का परिणाम था कि जिन्ना ने ‘भारत
छोड़ो’ आन्दोलन का विरोध किया। यहां तक कहा गया कि मुसलमानों को अंग्रेज़ी सलतनत से
आज़ादी नहीं चाहिए।
टू नेशन थ्योरी
अब सरकार कांग्रेस को
हिंदू संस्था के रूप में देखने लगी। मुस्लिम लीग को मुसलमानों का तारनहार माना
जाने लगा। लॉर्ड एमरी ने कहा, हिन्दू-मुसलमान के प्रश्न को बहुमत-लघुमत के
प्रजातंत्रिक सांचे में देखना ग़लत होगा। बल्कि बीस प्रतिशत मुसलमानों को अस्सी
प्रतिशत हिंदुओं के समकक्ष मानना सही होगा। ये क़ौमे कभी एक नहीं हो सकती।
ब्रिटेन के कट्टरपंथी
वैधानिक पंडितों का मानना था कि चूंकि हिन्दू और मुसलमान असमान तत्व हैं इसलिए बहुमत
द्वारा निर्णय करने का लोकतांत्रिक सिद्धांत भारत पर लागू नहीं होता। इसलिए
मुसलमानों को ‘आत्म निर्णय का अधिकार’ स्वीकार किया जाना
चाहिए। इस प्रकार अंग्रेज़ों ने ‘टू नेशन थ्योरी’ (द्विराष्ट्र सिद्धांत) का
प्रतिपादन कर दिया। चर्चिल और उसके सहयोगियों ने पार्लियामेंट में अपने भाषणों
द्वारा इस पर मुहर भी लगा दिया। एमरी ने अपने भाषण में कहा था, “ब्रिटिश
पार्लियामेंटरी ढंग के प्रान्तीय स्वराज्य के अनुभव ने मुसलमानों को इसकी प्रतीति
करा दी है कि वे भारत की ऐसी किसी भी केन्द्रीय सरकार की अधीनता स्वीकार नहीं कर
सकते, जिसमें कार्यकारिणी प्रत्यक्ष रूप में पार्लियामेंटरी बहुमत पर निर्भर हो।
क्योंकि अगर प्रान्तीय अनुभव कुछ बताता है, तो यही कि वह बहुमत कांग्रेस के वरिष्ठ
नेताओं का आज्ञा पालन करेगा।”
ब्रिटिश सरकार ने
कांग्रेस को ‘हिन्दू’ कहने का फैशन चला
दिया। यह एक धूर्ततापूर्ण झूठ था। कांग्रेस में असंख्य मुसलमान सदस्य थे। कई
मुस्लिम नेता चुनकर इसके अध्यक्ष बने। मुस्लिम नेतागण कांग्रेस के काम और इसके
विचारों के आधार पर इसके सदस्य बने थे। लेकिन लीग में तो चुनाव जैसी कोई
लोकतंत्रीय पद्धति थी ही नहीं। इसके सदस्यों की सूचि कभी प्रकाशित नहीं की गई। देश
के साढ़े छह करोड़ मुसलमानों में कितने उसके सदस्य थे, इसका जवाब न कभी जिन्ना ने और
न ही उसके किसी दूसरे नेता ने दिया। विरोधी प्रमाण के अभाव में ब्रिटिश सरकार ने
व्यवहार में लीग के इस दावे को स्वीकार कार लिया कि वह भारत के तमाम मुसलमानों का
प्रतिनिधित्व करती है।
1940 के आरंभ में जिन्ना
वायसराय लिनलिथगो से मिला। उसके थोड़े समय बाद ही उसने पृथकतावादी नीति अपना ली।
जिन्ना ने मुसलमानों को पृथक क़ौम के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। लिनलिथगो
ने उसे सलाह दी कि मुस्लिम लीग को अब नकारात्मक रवैया छोड़कर अपनी ख़ुद की कुछ ठोस
मांगें प्रस्तुत करनी चाहिए। एक महीने बाद ही 24 मार्च, 1940 को मुस्लिम लीग के
लाहौर अधिवेशन में लीग ने अपने दो राष्ट्रों के सिद्धान्त के आधार पर पाकिस्तान की
ठोस मांग का प्रस्ताव पारित किया गया। मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव में कहा गया
था, “भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के साथ
जुड़े हुए घटकों को अलग कर दिया जाए और उनमें आवश्यक प्रादेशिक परिवर्तन करके उनके
विभाग रचे जाएं, और जिन क्षेत्रों में संख्या की दृष्टि से मुसलमानों का बहुमत है –
जैसे भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में – उन्हें मिलाकर कर ऐसे
स्वाधीन राज्य बना दिया जाए, जिनके अंगभूत घटक स्वायत्त और सार्वभौम हों।” पाकिस्तान प्रस्ताव
अस्पष्ट था, लेकिन इसमें पाकिस्तान की भावी रूपरेखा छिपी थी। ऊपर से ब्रिटिश का
विरोध और अंदर सहारा बनी लीग जानती थी कि बिना सरकारी मदद के उसका अस्तित्व मिट
जाएगा। लीग वादी मुसलमान युद्ध-प्रयत्न का समर्थन करते रहे। इसके कुछ सदस्यों ने
ब्रिटिश युद्ध कोष में काफ़ी धन दिया। इसका उन्हें इनाम भी मिला। युद्ध के ठेके से
उन्होंने ख़ूब धन कमाए। इस नए सम्पन्न वर्ग ने लीग की पाकिस्तान की मांग को और
ज़्यादा प्रोत्साहन और समर्थन दिया। 1942 में जिन्ना ने कहा था, “हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अंतर बहुत गहरे और न समाप्त किए जा सकने वाले हैं। हम अपनी अलग संस्कृति और सभ्यता, भाषा और साहित्य, कला और वास्तु-शिल्प, नाम और नामावली, मूल्य और अनुपात-बोध, क़ानून और नैतिक आचार संहिता, रीति-रिवाजों और पंचांग, इतिहास और परंपरा, नज़रिए और महात्त्वाकांक्षा वाली
कौम हैं।”
गांधीजी ने जिन्ना से
बार-बार पूछा कि उसका पाकिस्तान की व्याख्या क्या है? लेकिन जिन्ना ने इसका कभी
जवाब नहीं दिया। उसने न तो मुसलमानों के सामने और न जिनसे पाकिस्तान मिलता उनके
सामने कभी पाकिस्तान का पूरा चित्र रखने की कोशिश की। इसका कारण स्पष्ट था कि
पाकिस्तान की सीमा रेखाएं किसी भी तरह से क्यों न खींची जाएं, मुसलमान सारे भारत
में इस तरह बंटे हुए थे कि उनका काफ़ी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के बाहर ही रह जाता। और
जो पाकिस्तान बन जाने के लाभ से वंचित रह जाएंगे, उन मुसलमानों का लीग की इस मांग
के प्रति कोई लगाव क्यों रहता? विभाजन के सिद्धांत को स्वीकार किए बिना वह कुछ
कहने-सुनने को तैयार नहीं था। जब राजेन्द्र प्रसाद ने जिन्ना से अनुरोध किया था, “आप निश्चित भाषा में
पाकिस्तान की व्याख्या प्रस्तुत करें, ताकि कांग्रेस उसकी चर्चा कर सके।” जिन्ना ने तिरस्कार
पूर्वक इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और कहा, “पहले कांग्रेस को भारत
के विभाजन का सिद्धांत स्वीकार करना चाहिए।” गांधीजी और कांग्रेस
का तो विभाजन स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं था। सरकार ने घोषणा कर दी कि जबतक
लीग और कांग्रेस एकमत नहीं होंगे, तब तक सरकार स्वराज की मांग स्वीकार नहीं कर
सकती। सरकार जानती थी कि पाकिस्तान की लीग की एकदम बेतुकी मांग पर कांग्रेस कदापि
सहमत नहीं हो सकती। और लीग अपनी हठ पर डंटी रहने वाली थी। सरकार की तो चांदी ही
चांदी थी। उसने कांग्रेस पर अपने लिए ही सत्ता चाहने का आरोप लगा दिया। लीग की
हठधर्मी ब्रिटिश सत्ता के लिए तुरुप आ पत्त बन गई।
उस समय लीग को
अंग्रेज़ों की और अंग्रेज़ों को लीग की ज़रूरत थी। मुस्लिम लीग के नापाक रवैये और
अंग्रेज़ों की उनके साथ साझेदारी ने ही ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन को अनिवार्य बना
दिया था। जिन्ना को अंग्रेज़ों का भारत छोड़ना कैसे पसंद आता। अंग्रेज़ों के रहते ही
तो वह पाकिस्तान की अपनी मांग पर अड़ा रह सकता था। यदि अंग्रेज़ भारत छोड़ जाते तो
मुस्लिम लीग का सारा साहस और सहारा ही समाप्त हो जाता। कांग्रेस के साथ सौदा करने
की उसकी शक्ति ही छिन जाती। ‘भारत
छोड़ो’ प्रस्ताव की घोषणा के ठीक चार दिन पहले, 4 अगस्त, 1942 को गांधीजी ने खुलेआम
कहा था, “यदि मुस्लिम लीग पूर्ण स्वाधीनता
की मांग में कांग्रेस का सहयोग देगी, तो अंग्रेज़ों के जाने के बाद मुस्लिम लीग राज
कर सकती है और कांग्रेस उसको पूर्ण सहयोग देगी।” लेकिन जिन्ना को इस
ईमानदार, सरल सुझाव में भी चालबाज़ी की आशंका थी, इसलिए उसने मुसलमानों के राज करने
के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उसने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने सिर्फ़ अपने हितों
का ख़्याल किया है, मुसलमानों का नहीं।
जब गांधीजी से पूछा गया कि मुस्लिम लीग की
टू नेशन थिअरी (द्वि राष्ट्र सिद्धांत) पर आपका क्या कहना है? तो उनका कहना था कि “ये बिल्कुल ग़लत है। इस देश में टू नेशन
थियरी हो ही नहीं सकती है और अगर हो सकती है तो थ्री, फ़ोर फ़ाईव नेशन थियरी क्यों नहीं है। ईसाई
कहां जाएंगें, जैन का क्या होगा, बौद्धों का क्या करेंगे आप। अगर धर्म ही
आधार है तो इनका क्या होगा, इन धर्मों ने कौन सा गुनाह किया है। तो ये
हो नहीं सकता, ये संभव नहीं है।” वो चाहते थे कि सब लोग साथ रहें, जबतक वो साथ नहीं रहेंगे, जबतक साम्प्रदायिक एकता नहीं होगी, तबतक भारत को आज़ादी नहीं मिल सकती। उस समय
भारत के वायसराय वॉवेल था और जब गांधीजी की उससे तबके कलकत्ता में मुलाक़ात हुई तो
उन्होंने कहा कि “हम जिस हाल में हैं, हमें छोड़ दीजिए। हमें छोड़ कर चले जाइए हम
अपने फ़ैसले, अपनी समस्याएं खुद हल कर लेंगे। क्योंकि आप
रहेंगे तो आग में घी डालने का काम करते रहेंगे।”
साम्प्रदायिक सद्भाव के आजीवन हितैषी
महात्मा गांधी ने वॉवेल से कह दिया कि हमें आपकी ज़रूरत नहीं है क्योंकि आपके रहते
हिंदू मुसलमान एकता हो ही नहीं सकती, वो संभव नहीं है। जो भी हो, जैसा भी हो, द्वि राष्ट्र
सिद्धांत के कारण पाकिस्तान बना। भारत से तमाम लोग पाकिस्तान गए।
इसके बाद जो हिंसा हुई जिसे रोकने के लिए महात्मा गांधी ने सोहरावर्दी के साथ
बैठकें कीं। उनके इन बैठकों के करने और उनके यहां ठहरने पर बाद में भी सवाल उठाया
जाता रहा। लेकिन गांधीजी का कहना था, "हिंदू मुसलमान फसाद की जड़ कितनी गहरी है
उसका थोड़ा अंदाज़ा दक्षिण अफ़्रीका में हुआ था, लेकिन ज़्यादा पता हिंदुस्तान आकर लगा।"
इस संदर्भ में साल 1915 में हरिद्वार के कुंभ मेले का प्रकरण ज़रूरी
है। गांधीजी कुंभ मेले में जा रहे थे। रास्ते में जब ट्रेन सहारनपुर रुकी तो
उन्होंने देखा कि लोग पसीना-पसीना हैं, गला सूख रहा है, पानी नहीं है, लेकिन अगर पानी पिलाने वाला आता था और उन्हें पता चल जाए
कि वो मुसलमान है तो वो पानी नहीं पीते थे। वो हिंदू पानी का इंतज़ार करते थे, मुसलमान पानी नहीं पी सकते थे, जान भले ही चली जाए। बहुत समय तक गांधीजी को
ये बात सालती रही कि अगर डॉक्टर मुसलमान हो और वो आपको दवा दे तो ले लेंगे लेकिन
उसके हाथ का पानी नहीं पिएंगे। इसका मतलब है कि समस्या समाज में है, बाहर है, आपके अंदर है। उससे इसका कोई मतलब नहीं है कि आप हिंदू हैं या मुसलमान
हैं।
अंग्रेजों की फूट ड़ालो राज करो की नीति के
उदाहरण स्वरुप एक और प्रकरण बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। आज़ाद हिंद फ़ौज के तमाम लोग
जब गिरफ़्तार हुए और उनपर मुकदमा चलने वाला था और सारे लोग लाल क़िले में बंद थे, तो गांधीजी उनसे मिलने गए। उन्होंने पाया कि
उन्होंने कलकत्ता में वॉवेल से जो बात कही थी कि आपके रहते एकता नहीं हो सकती, वो कितनी सच थी। आज़ाद हिंद फ़ौज के लोगों
ने गांधीजी को बताया कि यहां सुबह हांक लगती है कि हिंदू चाय तैयार है और मुसलमान
चाय अभी आने वाली है। तो उन्होंने सिपाहियों से पूछा कि आप करते क्या हैं, उनका जवाब था कि 'ये लोग हमको रोज़ सुबह बांटते हैं, जबकि हमारे अंदर कोई भी मंशा नहीं होती, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन सरकार का हुक़्म है कि हिंदू चाय अलग
बने और मुसलमान चाय अलग बने।' तो गांधीजी ने पूछा कि 'आप क्या करते हैं अगर हिंदू चाय और मुसलमान चाय अलग अलग
दी जाती है?' उनका कहना था कि 'हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें
हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं।' महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के काम
करने के ढंग की, हिंसा पर जो उनका भरोसा था उस पर, फ़ौज के गठन और फ़ौज के ज़रिए आज़ादी हासिल
करने की कोशिश की कई बार आलोचना की थी। लेकिन लाल क़िले से लौटने के बाद गांधीजी
ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि 'सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे
बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है
और इसके लिए मैं उन्हें सलाम करता हूं.।'
आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता के बढ़ने के
लिए ब्रिटिश शासन और उसकी 'बांटो और राज करो' की नीति खास तौर पर ज़िम्मेदार थी। सच तो यह
था कि राज्य, अपनी अपार शक्ति के साथ, या तो राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दे सकता था
या सभी तरह की फूट डालने वाली ताकतों को। औपनिवेशिक राज्य ने बाद वाला रास्ता
चुना। उसने बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन और भारतीय लोगों को एक राष्ट्र के रूप में
जोड़ने का मुकाबला करने और उसे कमजोर करने के लिए सांप्रदायिकता का इस्तेमाल किया, औपनिवेशिक शासकों ने सांप्रदायिकता को
अल्पसंख्यकों की रक्षा की समस्या के रूप में पेश किया।
सांप्रदायिकता फूट डालो और राज करो की नीति
का एकमात्र हिस्सा नहीं थी। भारतीय समाज के हर मौजूदा बंटवारे को बढ़ावा दिया गया
ताकि भारतीय लोगों की उभरती एकता को रोका जा सके। क्षेत्र को क्षेत्र के खिलाफ, प्रांत को प्रांत के खिलाफ, जाति को जाति के खिलाफ, भाषा को भाषा के खिलाफ, सुधारकों को रूढ़िवादियों के खिलाफ, नरमपंथियों को उग्रवादियों के खिलाफ, वामपंथियों को दक्षिणपंथियों के खिलाफ, और यहाँ तक कि वर्ग को वर्ग के खिलाफ खड़ा
करने की कोशिश की गई। बेशक, यह सांप्रदायिक बंटवारा ही था जो आखिर तक
बना रहा और सबसे ज़्यादा काम आया। यह उपनिवेशवाद का मुख्य सहारा बना और औपनिवेशिक
अधिकारी ने इस पर अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। 1937 के बाद, सांप्रदायिकता ही औपनिवेशिक अधिकारियों और
उनकी फूट डालो और राज करो की नीति का एकमात्र राजनीतिक सहारा बन गई। ऐसा इसलिए हुआ
क्योंकि इस समय तक, औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा पहले से बढ़ावा
दिए गए और पाले-पोसे गए लगभग सभी दूसरे विभाजन, विरोध और फूट डालने वाले तरीकों को राष्ट्रीय आंदोलन ने
खत्म कर दिया था, और वे औपनिवेशिक नज़रिए से राजनीतिक रूप से
बेकार हो गए थे। 1937 के चुनावों ने दिखाया कि उपनिवेशवाद के लगभग सभी प्रमुख
सामाजिक और राजनीतिक समूह बिखर चुके थे। राष्ट्रीय आंदोलन के खिलाफ खेलने के लिए
केवल सांप्रदायिक कार्ड ही उपलब्ध था और शासकों ने इसका पूरा इस्तेमाल करने का
फैसला किया, इस पर सब कुछ दांव पर लगा दिया।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर
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