रविवार, 18 जनवरी 2026

431. अखिल भारतीय चरखा संघ

गांधी और गांधीवाद

431. अखिल भारतीय चरखा संघ



1944

जेल में रहने के दौरान गांधीजी को यह एहसास था कि हिंसा में विश्वास रखने वालों ने, अपने तरीके से, संघर्ष के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन चिंता की बात यह थी कि अहिंसा को अपना सिद्धांत मानने वालों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता था। सालों पहले, आम लोगों में अहिंसक शक्ति पैदा करने के लिए, गांधीजी ने कई रचनात्मक गतिविधियाँ शुरू की थीं। इनमें मुख्य था हाथ से सूत कातना और बुनाई करना। इस गतिविधि को पूरा करने के लिए, उन्होंने अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना की थी।

अखिल भारतीय चरखा संघ का उद्देश्य था भारत के बुनियादी उद्योग हाथ कताई और हाथ बुनाई को पुनर्जीवन प्रदान करना और उनका विकास करना। ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप यह पारंपरिक उद्योग नष्ट हो गया था। इसका पुनरुत्थान ज़रूरी था, क्योंकि चरखा भारत के स्वतंत्रता संग्राम का साधन और प्रतीक बन गया था। अखिल भारतीय चरखा संघ विश्व की सबसे बड़ी स्वेच्छामूलक सहकारी समिति थी। इसकी पूंजी लगभग 10,00,000 रुपए की थी। इसके द्वारा 1,20,02,430 रुपए का खादी उत्पादन होता था। इसके तहत 30,24,391 कातने वाले, और 3,54,257 अन्य कारीगर काम करते थे। पूरा उद्योग 15,010 गांवों में फैला हुआ था। पिछले 18 वर्षों में इस संस्था ने 4,60,30,081 रुपए मज़दूरी के एवज में काम करने वालों को प्रदान किए थे। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार आन्दोलन को सफल बनाने में इस संघ का महत्वपूर्ण योगदान था। अल्पतम निर्वाह वेतन का सिद्धान्त अपनाने में भी इसने बहुत ही उल्लेखनीय योगदान दिया था। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय समस्त रचनात्मक संगठनों पर भयानक प्रहार हुआ था। खादी भी इससे अछूता नहीं रहा।

अखिल भारतीय चरखा संघ कई दौर से गुज़रा था। पहले दौर में, लोगों में जागरूकता लाने और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार पर ज़ोर दिया गया था। दूसरे दौर में, ज़ोर सामाजिक न्याय के आदर्श को हासिल करने पर चला गया। इसके लिए न्यूनतम गुज़ारे लायक मज़दूरी शुरू की गई। यह प्रयोग पहले दौर में बहुत सफल रहा और आखिरी दौर में सीमित सफलता मिली। "भारत छोड़ो" आंदोलन के दौरान, दमन का सबसे ज़्यादा असर सभी रचनात्मक संस्थानों पर पड़ा था।

गांधीजी जब जेल से निकले तो इस संस्था के घावों पर मरहम लगाने का काम शुरू किया। उन्हें आशा थी कि यह संस्था अहिंसा का उदाहरण प्रस्तुत करके लोगों के उत्साह को सही दिशा में मोड़ेगी और सरकारी दमन का विष उतार सकेगी। अगर वे सफल हो जातीं, तो निराशा और पराजय की भावना के स्थान पर प्रत्येक भारतीय के हृदय में नवीन श्रद्धा और आशा का संचार होता। लेकिन हुआ यह कि वे खुद दमन का शिकार हो गईं। सितंबर, 1944 के पहले हफ़्ते में अखिल भारतीय चरखा संघ के ट्रस्टी सेवाग्राम में मिले। गांधीजी ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, यह जानकर मुझे दुःख हुआ कि सरकार चाहे तो चरखा संघ तोड़ सकती है, लेकिन मैं सरकार की दया पर जीना नहीं चाहता। उन्हें भगवान के अलावा किसी की दया नहीं चाहिए थी। गांधीजी की दृष्टि में खादी और रचनात्मक कार्य अहिंसा के प्रतीक और सामूहिक अहिंसात्मक अनुशासन के विकास के साधन थे। उनके रचनात्मक कार्यों का केन्द्र बिन्दु खादी या चरखा था। इसके बिना भारत के गांवों में असाधारण जागृति होना संभव नहीं था। गांधीजी यह भी मानते थे कि बिना इसके स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती है।

ऐसे में, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि गांधीजी खुद ही चरखा संघ को तोड़ दें और चरखा संघ की संपत्ति गांवों के लोगों में बांट दें? चरखा संघ अपने उद्देश्य में असफल रहा। इसने एक बहुत ज़्यादा केन्द्रीय संस्था के रूप में काम किया। गांधीजी को आशा थी कि संघ प्रत्येक घर में चरखा पहुंचाने का काम करेगा। इस तरह वह दुनिया को दिखा पाते कि चरखे के आधार पर एक अहिंसक समाज कैसे बनाया जा सकता है। लेकिन प्रत्येक घर क्या यह तो प्रत्येक गांव में भी नहीं पहुंच पाया है। यदि चरखा सात लाख गांवों में प्रवेश कर जाता तो दुनिया की कोई शक्ति उसे कुचल नहीं सकती थी। अगर चालीस करोड़ में से एक करोड़ को भी गोली मार दी जाती, तो भी यह उनके लक्ष्य को पाने में देरी नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत, इसे पाने में तेज़ी लाता।

चरखा संघ ने खादी को ज़्यादातर आर्थिक प्रवृत्ति ही समझा। परन्तु गांधीजी ने उसकी कल्पना अहिंसा के प्रतीक के रूप में की थी। संघ खादी के काम के बारे में बहुत ज़्यादा मात्रा पर ध्यान देने वाले या यूँ कहें कि कमर्शियल सोच वाले हो गए थे। नतीजा यह हुआ कि आर्थिक कष्ट-निवारक के रूप में अपने लक्ष्य को तो उसने प्राप्त कर लिया लेकिन अहिंसा के प्रतीक के रूप में उसका महत्व पीछे रह गया। मिशन की भावना जगाने में संघ नाक़ामयाब रहा।

गलती खादी में नहीं थी, बल्कि उन लोगों में थी जो इसे चलाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने खादी के ऊँचे मिशन के बारे में काफ़ी जागरूकता विकसित नहीं की थी। उन्हें खादी की सफलता को प्रोडक्शन और बिक्री के आँकड़ों के आधार पर नहीं, और न ही खादी पहनने वाले लोगों की संख्या के आधार पर मापना चाहिए था, बल्कि उन पुरुषों और महिलाओं की संख्या के आधार पर मापना चाहिए जिन्हें अहिंसा और आत्म-निर्भरता के आदर्शों की स्पष्ट चेतना के साथ अपने प्रयासों से खुद को कपड़े पहनाना सिखाया जा सके।

गांधीजी खादी कार्य को अलग आर्थिक प्रवृत्ति के रूप में न चला कर ग्रामीण जीवन की समग्र जर्जरित अर्थ-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए एक साधन के रूप में चलाना चाहते थे। इसके लिए उच्च शक्ति वाले नए कार्यकर्ताओं की तलाश उन्होंने शुरू की। ऐसा कार्यकर्ता जिसमें न सिर्फ़ श्रद्धा हो बल्कि ज्ञान भी हो। जो अहिंसा की शक्ति और क्षमता को समझ सकें। अहिंसा की भावना अपनाने वाले व्यक्ति के लिए निष्क्रिय रहना असंभव है। गांधीजी का मानना था कि अगर हम अहिंसा की ताकत और असर को समझ पाएं और उसमें गहरा और पक्का विश्वास पैदा कर पाएं, तो हम पूरी दुनिया को यह साबित कर पाएंगे कि यह सबसे बड़ी जीवित शक्ति है। इसके प्रभाव में कोई भी निष्क्रिय या सुस्त नहीं रह सकता। इसलिए, अगर चरखा संघ को उम्मीदों पर खरा उतरना है, तो उसमें हर कार्यकर्ता को अहिंसा का जीता-जागता उदाहरण बनना होगा।

ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में, चरखा कारीगरों के शोषण और गुलामी, और शासकों के घमंड का प्रतीक बन गया था। गांधीजी ने चरखे को अहिंसा और इसके ज़रिए जनता की मुक्ति के प्रतीक के रूप में अपनाया था। वही चाकू जो कसाई के हाथों में जान ले लेता है, सर्जन के हाथों में जान बचाने का ज़रिया बन सकता है।

गांधीजी ने माना कि चरखे पर अहिंसा के प्रतीक के रूप में जितना उन्हें जोर देना चाहिए था उतना उन्होंने नहीं दिया था। चरखा संघ खादी के उत्पादन और वितरण का काम बंद कर दे। वह केवल उन मूल्यों के रक्षक के रूप में काम करे जिनका खादी प्रतिनिधित्व करती है और केन्द्रीय अनुसंधान का काम करे। खादी की प्रवृत्ति के लिए गांव को एक घटक बनना चाहिए और स्वावलम्बन के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भरता के लिए कातना चाहिए। अपने हाथ से काते हुए सूत का कुछ हिस्सा क़ीमत के रूप में देने के बदले में ही खादी बेची जाए। चूल्हे की ही भांति चरखे को भी हर घर में स्थान मिलना चाहिए।

गांधीजी ने संघ के सदस्यों से कई बार कहा था कि उन्हें राजनीति भूल जानी चाहिए और चरखे पर उसके सभी पहलुओं के साथ ध्यान देना चाहिए। वह और केवल वही सच्ची राजनीति, सात्विक राजनीति मानते थे। हर गाँव जो चरखे का संदेश अपनाएगा, वह आज़ादी की चमक महसूस करने लगेगा। अगर चरखा संघ को उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना था, तो उसके सदस्य अहिंसा के जीते-जागते उदाहरण होने चाहिए। उनका पूरा जीवन अहिंसा का प्रदर्शन होना चाहिए और उनके शरीर और मन स्वस्थ होने चाहिए। अगर वे वैसे होते जैसे उन्हें होना चाहिए था, तो गांव वाले चरखे को बहुत उत्साह से अपनाते। सांप्रदायिक वैमनस्य और छुआछूत आदि की समस्याएं सुबह के सूरज के सामने ओस की तरह गायब हो जातीं। अगर भारत के सात लाख गाँवों में सच्ची जागृति लाई जा सके, तो इसका मतलब पूरे भारत के लिए आज़ादी होगी। खादी गतिविधि की इकाई गाँव होना चाहिए और हर किसी को आत्मनिर्भरता के लिए खुद की मदद से चरखा चलाना चाहिए।

इसी तरह अब लोग खादी पहन सकते हैं और भारत में स्वराज्य ला सकते हैं। यदि खादी का क्षेत्र ग़रीबों के कष्ट-निवारण तक ही सीमित रखा गया, तो वह अहिंसा के द्वारा स्वराज्य लेने में सहायता नहीं देगी। परन्तु हाथ सूत लेकर खादी बेचने का नियम लागू करने के परिणामस्वरूप ऐसा हो सकता है। यदि स्वराज्य लाने वाली खादी के सामने ग़रीबों का कष्ट-निवारण करनेवाली खादी मिट जाती है, तो इससे ग़रीब घाटे में नहीं रहेंगे। किसी और धंधे से  ग़रीबों की रोटी का प्रबंध किया जा सकता है। खादी का गौरव इसी में है कि वह स्वराज्य के आदर्शों में भी सहायक हो और ग़रीबों को मदद भी पहुंचाए। इस तरह खादी उत्पादन और बिक्री संस्थान के रूप में चरखा संघ को बंद कर दिया गया। आगे से अपने काते हुए सूत के रूप में आंशिक क़ीमत चुकाने पर ही बेचने की नीति चरखा संघ की नीति बन गई।

उन्होंने सुझाव दिया कि चरखा संघ के पास जो पैसा है, उसे काबिल कार्यकर्ताओं में बांट दिया जाए, जो चरखे के प्रचार-प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित करने के दृढ़ संकल्प के साथ गांवों में जाएं। जो चरखा संघ एक बहुत ज़्यादा केंद्रीकृत संस्था है, वह पूरी तरह से विकेंद्रीकृत हो जाए। गांवों में जाने वाले सभी कार्यकर्ता अपने स्वतंत्र केंद्र चलाएंगे। सेंट्रल ऑफिस उनके काम का इंस्पेक्शन करेगा और उन्हें ज़रूरी गाइडेंस देगा, ताकि जिन सिद्धांतों के लिए चरखा संघ खड़ा था, उनकी अनदेखी न हो। अहिंसा के पूरे विकास के लिए खुद को मिलकर ज़िम्मेदार समझना चाहिए। इसका पूरा विकास मतलब पूरी आज़ादी होगी। वह आज़ादी जो सबसे गरीब और पिछड़े लोगों को राहत और खुशी दे सके, वह सिर्फ़ अहिंसा से ही आ सकती है, यानी चरखे से। इसलिए, अगर वे चरखा संघ को उस मकसद के लिए इस्तेमाल कर सकें, तो उन्हें उनका पूरा सहयोग मिलेगा। अगर नहीं, तो वे सिर्फ़ एक परोपकारी संगठन के तौर पर काम कर सकते हैं, लेकिन यह उनके लिए काफ़ी नहीं होगा। उस स्थिति में, उन्हें अपना अकेला रास्ता खुद तय करने देना होगा।

गांधीजी का कहना था, हमें आज़ादी ज़रूर मिलेगी। मुझे महसूस हो रहा है कि यह आ रही है। लेकिन सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी से हमें संतुष्ट नहीं होना चाहिए। दुनिया भी संतुष्ट नहीं होगी, क्योंकि दुनिया भारत से बड़ी उम्मीदें रखती है। मेरे सपनों की आज़ादी का मतलब है हमारे अंदर भगवान का राज और हमारे ज़रिए धरती पर उसकी स्थापना। और इस मकसद के लिए मैं काम करते हुए मरना पसंद करूँगा, भले ही मैं इसे पूरा होते हुए कभी न देख पाऊँ।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

 

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