बुधवार, 21 जनवरी 2026

433. गांधी-जिन्ना वार्ता

राष्ट्रीय आन्दोलन

433. गांधी-जिन्ना वार्ता



1944

देश साम्प्रदायवाद के कुचक्र में फंसा हुआ था। जिन्ना और मुस्लिम लीग का रवैया अड़ियल था। उस समय साम्प्रदायिक परिस्थितियों के तीन प्रमुख किरदार थे, राष्ट्रवाद का प्रतीक कांग्रेस, साम्प्रदायवाद का प्रतीक मुस्लिम लीग और साम्राज्यवाद का प्रतीक ब्रिटिश सत्ता। आर्थिक दृष्टिकोण से भी तीन वर्ग थे। पहला भारतीय ज़मींदार जिनका अपना स्वार्थ था। दूसरा मध्यम वर्ग जो ऊपर वाले प्रभुत्व से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहा था और नीचे वाले तीसरे वर्ग का शोषण कर रहा था। तीसरा वर्ग था आम लोगों का, जो दो सौ वर्षों की विदेशी के ग़ुलामी के शोषण का शिकार था। वे स्वतंत्रता की अभिलाषा लिए यह उम्मीद लगाए थे कि उनकी दशा सुधरेगी। साम्प्रदायिक समस्या भारत के कट्टरपंथियों और मध्यवर्गीय लोगों के साथ मिलकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की उत्पन्न की हुई चीज़ थी। राष्ट्रीय आन्दोलन से उनकी सुरक्षा को खतरा था। उसे छिन्न-भिन्न करने के लिए वे साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते थे।

असंतुष्ट मुस्लिम जनता से वे कहते थे कि तुम लोगों की मुसीबतों और तकलीफ़ों का कारण हिन्दू साहूकार और हिन्दू ज़मींदार हैं। जबकि सत्य यह था कि मुस्लिम लीग के अधिकांश नेता स्वयं सरकारी ख़िताबों वाले ज़मींदार थे, सामंत शाही व्यवस्था के अंग थे। जिन्ना साम्प्रदायवाद का प्रणेता बन गया था। उसने ब्रिटिश भारतीय नौकरशाहों को अपना मित्र बना लिया था। कट्टरपंथी ज़मींदार और सामंत शाह भी उसके क़रीबी में से एक थे। उसने इस्लामी राज्य की वकालत की। स्कॉच पीने वाला और चेन स्मोकर जिन्ना ने इंगलिश कोट का चोला उतारकर शेरवानी पहन कर नमाज में शरीक़ होना शुरू कर दिया था। उसे मालूम था कि अखंड भारत में उसके राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध नहीं हो सकते थे और एक अलग देश पाकिस्तान का उसका सपना अधूरा रह जाता। इसलिए युद्ध के समय में उसने ब्रिटिशों से हाथ मिलाया और राजनीतिक सत्ता के खेल में अंग्रेज़ों के साथ मिलकर साम्प्रदायवाद के विचार को उसने बखूबी इस्तेमाल किया। दस प्रतिशत से भी कम लिखना-पढ़ना जानने वाले देश के नागरिकों के लिए राष्ट्रभाषा की लिपि देवनागरी हो या फारसी, विभाजन के विवाद में उठे इस प्रश्न को उसने बड़ी चालाक़ी से उलझा दिया।

अंग्रेज़ों के आने पहले भी भारत में विदेशी ग़ैर हिन्दू शासक हुए थे। मुस्लिम शासकों के अमुस्लिम सेनापति और सलाहकार होते थे। उनपर उन्हें विश्वास और गर्व होता था। सूफ़ीवाद ने देश में साम्प्रदायिक सौहार्द्र का वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। उर्दू, जो उत्तर भारत के अधिकांश मुसलमानों की भाषा थी, फारसी और संस्कृत से निकली हुई बोलियों के मिश्रण से बनी थी। सत्ता की लड़ाई उस समय भी होती थी। लेकिन इसने अलगाव का रूप कभी धारण नहीं किया।  सामुदायिक विरोध और अलग होने की प्रवृत्ति का आन्दोलन, जिसका प्रणेता जिन्ना बना, ब्रिटिश राज्य में अस्तित्व में आया। फूट और विघटन की वृत्ति न होती, तो ब्रिटिश सत्ता भारत में जम ही नहीं सकती थी। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य उसी विघटक वृत्ति का एक लक्षण था। दोनों समुदायों के बीच सामुदायिक विरोध ब्रिटिश राज्य में शुरू हुआ।

चर्चिल की सरकार भारतीय समस्या का हल चाहती थी, और वह युद्ध के बाद भारत को सीमित आज़ादी देने के पक्ष में थी। गांधीजी ने वायसराय को लिखा कि अगर भारत को तुरंत आज़ादी देने की घोषणा की जाती है, तो वे सरकार के खिलाफ़ सभी रुकावट डालने वाली तरकीबें बंद कर देंगे। वायसराय ने जवाब दिया कि युद्ध खत्म होने से पहले कोई आज़ादी नहीं हो सकती और माइनॉरिटी के अधिकारों की रक्षा करने वाले संविधान पर सहमति होनी चाहिए। इसका मतलब था कि जब तक हिंदू और मुस्लिम कॉन्स्टिट्यूशनल समस्याओं पर आम सहमति पर नहीं पहुँच जाते, तब तक ब्रिटिश सत्ता छोड़ने का कोई इरादा नहीं रखते।

देश में कांग्रेस और लीग के बीच गतिरोध बना हुआ था। स्वाधीनता की चर्चा के लिए अंग्रेज़ ने साफ-साफ कह दिया था कि लीग और कांग्रेस के बीच पहले समझौता होना चाहिए। कांग्रेस और लीग समस्या का कोई हल नहीं दिख रहा था। ब्रिटिश सरकार के सिवा सभी लोग राजनीतिक गतिरोध से ऊब गए थे। गांधीजी हमेशा आशावादी रहे। गहरी निराशा के बीच भी उन्होंने आस्था को नहीं छोड़ा। 1944 की शरद ऋतु तक गांधीजी को एहसास हो गया था कि मुसलमानों के साथ सुलह करने का समय आ गया है। वायसराय के मिलने से इंकार से अविचलित रहकर उन्होंने कांग्रेस और लीग के बीच फ़ासले को पाटने के लिए जिन्ना के साथ बात करने का निश्चय किया। जुलाई 1944 में गांधीजी ने जिन्ना को गुजराती में, जो जिन्ना की भी मातृभाषा थी, भाई जिन्ना संबोधन के साथ पत्र लिखा। अंत में आपका भाई, गांधी लिखकर हस्ताक्षर किया। गांधीजी ने लिखा था, जब आप मिलना चाहें तब हम मिलें। मुझे इस्लाम का या भारतीय मुसलमान का शत्रु न समझिए। मैं हमेशा आपका और मानव जाति का सेवक और हितैषी रहा हूं। मुझे निराश न कीजिए। गांधीजी के भाई जिन्ना का जवाब अंग्रेज़ी में मि. गांधी संबोधन के साथ कश्मीर के श्रीनगर से किसी क्वीन एलिज़ाबेथ नामक शिकारे से आया। अगस्त के मध्य में किसी समय कश्मीर से वापस लौटने पर मैं बंबई के अपने मकान पर हर्ष से आपका स्वागत करूंगा।

आख़िरकार गांधीजी की प्रार्थना पर जिन्ना के घर पर दोनों के बीच मुलाक़ातें हुई। गांधीजी अपने सेक्रेटरी प्यारेलाल के साथ गए थे। 9 सितम्बर, 1944 को गांधीजी की जिन्ना से चर्चा शुरू हुई, जो 18 दिन चली। गांधीजी और जिन्ना के बीच की चर्चा मुम्बई में मालाबार हिल पर माऊँट प्लेस्ड रोड पर स्थित जिन्ना के निवास-स्थान पर शुरू हुई। (अब इस रास्ते का नाम भाऊसाहब हिरे मार्ग है।) जिन्ना के लिए तो यह दोहरी फ़ायदे की बात थी, एक तो वह यह दिखा सका कि महात्माजी उससे मुलाक़ात के लिए इंतज़ार में बैठे रहते थे और उसको प्रसन्न करने के लिए आतुर थे, दूसरे यह जिन्ना के लिए गर्व और रणनीति, दोनों के अनुकूल था। उसने एक वक्तव्य में गांधीजी को महात्मा कहा था। उसने अपील की थी, यह सभी की इच्छा रही है कि हम दोनों मिलें। अब हम मिल रहे हैं, तो आप मदद कीजिए। परिस्थिति पर हमारा क़ाबू हो रहा है। पिछली बातों को भूल जाइए। ब्रिटिश सरकार समझौते की संभावना को देखकर परेशान हो उठी।

मुस्लिमों का एक अर्ध-सैनिक संगठन बंबई में कांग्रेस-लीग समझौते को प्रोत्साहन देने के लिए जुलूस निकाल रहा था। इसी हेतु साम्यवादी लोग विशाल सभा कर रहे थे, ताकि दोनों नेता एक होने के लिए विवश हो जाएं।  इसी बीच इस भय से कि गांधीजी लीग की पाकिस्तान की मांग स्वीकार कर लेंगे, सिख अपनी मिल्कियत के आधार पर रचे जाने वाले अलग सिखिस्तान की मांग लेकर सामने आ गए। जिन्ना ने घोषणा कर दी कि यह मुलाक़ात पत्र-प्रतिनिधियों के लिए खुली नहीं है, वे मेरे मकान पर आने का कष्ट न करें

राजगोपालाचारी योजना

महासभा के कड़े विरोध के बावज़ूद जिन्ना से मिलने गांधीजी बंबई के बिड़ला भवन में ठहरे थे। गांधी-जिन्ना भेंट का आधार राजगोपालाचारी के कुछ सुझाव थे, जो इतिहास में ‘राजाजी फार्मूला’ के नाम से प्रसिद्ध है। हालांकि राजाजी ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पर युद्ध में अंग्रेज़ों का साथ नहीं देने के कांग्रेस के रुख का समर्थन नहीं किया था, फिर भी उनका मानना था कि यदि कांग्रेस और लीग साथ आ जाएं, तो आज़ादी की लड़ाई में जीत जल्दी मिल जाएगी। इसके लिए उन्होंने एक फार्मूला तैयार किया था। यह फार्मूला उतना ही चतुराई से भरा था, जितना उसे तैयार करने वाला। यह देखने में तो मुसलमानों का यह दावा सिद्धांततया स्वीकार करता था कि वे एक अलग राष्ट्र हैं, मगर उनके एक पूरी तरह अलग राज्य की बात को स्वीकार नहीं करता था।

बंबई में सभी जगह रेड अलर्ट ज़ारी कर दिया गया था। सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। घर की रखवाली भारतीय संगीनों से हो रही थी। पत्रकारों के प्रवेश की अनुमति नहीं थी, लेकिन कुछ फ़िल्म कम्पनी और फोटोग्राफर को गांधीजी के आने और जाने वक़्त वहां रहने की छूट दी गई थी। यह उन कुछ दुर्लभ समयों में से एक था जब जिन्ना ने गांधीजी को ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया था। बंबई की मालाबार हिल पर 10, माउंट प्लेज़ेन्ट रोड पर स्थित जिन्ना के मकान में गांधी-जिन्ना वार्ता 9 सितंबर को आरंभ होकर 18 दिनों तक चली और 27 सितंबर को खत्म हुई। बात-चीत के दिनों में ईद का त्योहार भी आया। गांधीजी 9 सितंबर को दोपहर 3.55 बजे जिन्ना के बंबई वाले घर पर पहली मीटिंग के लिए पहुँचे और शाम 7 बजे तक रहे। 9 सितंबर को यानी पहले दिन दोनों जब मिले तो हाथ मिलाया, गले लगे। महात्माजी का स्वागत करने के लिए जिन्ना दरवाज़े के बाहर आया। विदा करने भी बाहर तक आया। साथ खड़े होकर दोनों ने फोटो भी खिंचवाए। बड़े गर्मजोशी से हाथ मिलाया गया। लेकिन शिष्टता से अधिक इन सब मेल-मिलाप में और कुछ नहीं था। शुरू से ही जिन्ना ने गांधीजी के प्रतिनिधित्व पर शंका की थी। असल में जनता राजनैतिक गतिरोध से थक गई थी और वह चाहती थी कि जैसे भी हो कांग्रेस-लीग में समझौता हो जाए। पहली मीटिंग के बाद जब गांधी से पूछा गया कि क्या वे जिन्ना से कुछ लाए हैं, तो गांधी ने कड़वाहट से जवाब दिया: "सिर्फ फूल।"

दोनों में बड़ी चर्चाएं हुईं। गांधीजी ने जिन्ना से राजगोपालाचारी योजना स्वीकार करने को कहा। इसके अनुसार,

1.    मुस्लिम लीग कांग्रेस की भारत की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे और संक्रांति-काल के लिए एक अंतरिम सरकार बनाने में कांग्रेस का सहयोग करे।

2.    युद्ध समाप्त होने के बाद कांग्रेस पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत एवं उत्तर पूर्व भारत के उन क्षेत्रों में जहां मुसलमान बहुल संख्या में थे, एक जनमत द्वारा निश्चित किया जाना था कि वे भारत में रहना चाहते हैं या अलग। एक आयोग की नियुक्ति की जाएगी जो इन इलाक़ों को स्पष्ट करेगा।

3.    इन निर्धारित सीमा वाले प्रदेशों में व्यस्क मताधिकार या इसी तरह की किसी और व्यवस्था के आधार पर सारे निवासियों का जनमत भारत से अलग होने के प्रश्न का निर्णय करेगा। यदि बहुमत भारत से अलग कोई सार्वभौम राज्य स्थापित करने के पक्ष में निर्नय दे, तो उस निर्णय पर अमल किया जाएगा।

4.    बंटवारे की स्थिति में प्रतिरक्षा, संचार, आवागमन और जनसंख्या का आदान-प्रदान के लिए परस्पर समझौता किया जाए।

5.    ये सभी शर्तें सत्ता के हस्तांतरण के बाद ही लागू होनी थी।

गांधीजी ने जिन्ना से कहा, राजाजी की योजना को स्वीकार कर लीजिए। आपको उसमें कुछ दोष नज़र आते हों तो आप बता सकते हैं।

जिन्ना इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं था, बोला मेरा ख़्याल है कि आप एक हिन्दू के रूप में, हिन्दू कांग्रेस के एक प्रतिनिधि के रूप में यहां आए हैं। सबसे पहले तो जिन्ना ने यह जानना चाहा कि महात्माजी किसकी ओर से और किस अधिकार से चर्चा के लिए आए हैं।

गांधीजी ने कहा, नहीं, न तो मैं हिन्दू के नाते आया हूं और न ही कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में। मैं यहां एक व्यक्ति के रूप में आया हूं। आप भी एक व्यक्ति के रूप में या लीग के अध्यक्ष के रूप में राजाजी की योजना पर विचार कीजिए और उसे स्वीकार कीजिए।

जिन्ना ने कहा, मैं लीग का अध्यक्ष हूं। यदि मैं अपने सिवा और किसी का प्रतिनिधि नहीं हूं, तो बातचीत का आधार कहां रह जाता है? सौदा कौन तय करेगा? आप पाकिस्तान स्वीकार कर लें, फिर तो अंत तक मैं आपका साथ दूंगा। हम पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के लिए स्वाधीनता लेंगे। हम आपस में समझौता कर लें। फिर हम सरकार के पास जाकर उससे हमारा समझौता स्वीकार करने के लिए कहें। हमारा हल स्वीकार कर लेने के लिए उसे विवश कर दें।

गांधीजी बोले, मैं कभी इसके लिए अपनी स्वीकृति नहीं दे सकता। मैं अंग्रेज़ों से कभी नहीं कह सकता कि वे भारत पर विभाजन थोप दें 

जिन्ना ने कहा, मुसलमान पाकिस्तान चाहते हैं। लीग मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती है। वह भारत का बंटवारा चाहती है।

गांधीजी ने कहा, मैं यह मानता हूं कि लीग सबसे प्रबल मुस्लिम संगठन है। मैं यह भी मान सकता हूं कि उसके अध्यक्ष के रूप में आप भारत के मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि देश के सब मुसलमान पाकिस्तान चाहते हैं। उस प्रदेश के सब निवासियों का मत लेकर देख लीजिए।

जिन्ना ने कहा, ग़ैर-मुसलमानों से इस बारे में क्यों पूछा जाए?

गांधीजी ने कहा, आप आबादी के एक हिस्से के लोगों को मताधिकार से वंचित नहीं रख सकते। आपको उन्हें साथ रखना होगा। यदि आपको बहुमत है, तो फिर आपको क्यों डरना चाहिए? लेकिन यह मेरे और आपके बीच की व्यवस्था की बात होगी। जब तक अंग्रेज़ यहां है, तब तक यह संभव नहीं हो सकता।

मीटिंग खत्म होने पर, जिन्ना ने दोनों की ओर से यह बयान दिया: "हमारी खुलकर और दोस्ताना बातचीत हुई है और हम सोमवार को शाम 5.30 बजे अपनी बातचीत फिर से शुरू करेंगे। कल 21वां रमज़ान है और इसलिए सभी मुसलमानों को इसे मनाना है। और इसलिए मैंने मिस्टर गांधी से अनुरोध किया है कि वे 21वें रमज़ान के दिन मीटिंग न करके मुझ पर एहसान करें।"

इस पर गांधी ने बीच में टोकते हुए कहा, "कोई एहसान नहीं; मैं सरेंडर करने को तैयार हूं।" 10 सितम्बर को दोनों नहीं मिले।

11 सितम्बर की शाम को 5.30 बजे फिर दो घंटे की मुलाक़ात हुई। शाम का भोजन एक छोटे टिफिन बॉक्स में गांधीजी लेकर गए थे, जिसे वे बात-चीत के दौरान खाते रहे। 12 सितम्बर को तीसरी बार ढाई घंटे के लिए हुई मुलाक़ात में बात आगे बढ़ी।

गांधीजी ने पूछा, पाकिस्तान में दूसरे अल्पमतों अर्थात सिखों, ईसाइयों, दलित वर्गों आदि का क्या स्थान होगा?

जिन्ना ने कहा, वे पाकिस्तान के अंग होंगे। सम्मिलित मताधिकार चाहेंगे तो वह उन्हें मिलेगा, अगर वे पृथक निर्वाचन चाहेंगे, तो वह उन्हें मिल जाएगा।

13 तारीख को दो बार कुल साढ़े तीन घंटे के लिए जब वे मिले तब तक तो आशा जगी रही। गांधीजी के पास उनकी लंबी पतली फ़ाइल थी और जिन्ना के पास हरे कवर वाली एक छोटी पतली किताब थी। जब गांधीजी घर से बाहर निकले, तो उन्होंने प्रेस से कहा, "कल आपने हमारे चेहरों पर कुछ पढ़ा था। हम दोनों यहाँ हैं। मैं चाहूंगा कि आप हमारे चेहरों पर उम्मीद के अलावा और कुछ न पढ़ें।"

लेकिन 14 से 19 सितम्बर तक की बातचीत में निराशा बढ़ती गई। जिन्ना ने ईद के संदेश में एक राष्ट्र के रूप में मुसलमानों की प्रगति का उल्लेख किया। राष्ट्रीय प्रयासों को "मिल्लत के गद्दारों, जो हमारी तरक्की रोक रहे हैं" कहा। जिन्ना का सन्देश था, "आइए, इस शुभ दिन पर हम एक बार फिर यह संकल्प लें कि जब तक हम पूरी आज़ादी हासिल नहीं कर लेते और पाकिस्तान के अपने लक्ष्य तक सफलतापूर्वक नहीं पहुँच जाते, तब तक हम कोई भी कुर्बानी देने को तैयार रहेंगे।"

समझौता का कोई आसार नहीं नज़र आ रहा था। गांधीजी लगातार जिन्ना को समझाते रहे। जिन्ना का नकारात्मक रवैया बना रहा। जिन्ना का इरादा ही नहीं था कि वह किसी बात पर हां बोले। गांधीजी ने कहा, मेरे जीवन का मिशन हिन्दू-मुस्लिम एकता है। इसलिए मुसलमान चाहें, तो मैं लाहौर के प्रस्ताव में रखी गई मुस्लिम लीग की मांग को सार रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। जहां मुसलमानों का बहुमत है, उन प्रदेशों को आत्म-निर्णय का अधिकार दे दिया जाए। परन्तु यह स्पष्ट कर दूं कि स्वतंत्रता के अभाव में आत्म-निर्णय के अधिकार को कार्यरूप नहीं दिया जा सकता। इसलिए पहले लीग को और भारत की दूसरी तमाम पार्टियों और दलों को अपने सम्मिलित प्रयत्न से स्वाधीनता प्राप्ति के लिए एकत्र होने में सहमत होना चाहिए।

जिन्ना ने कहा, यह तो घोड़े के आगे गाड़ी को रख देने जैसी उलटी बात हुई। पहले लीग की पाकिस्तान की मांग को मानी जाए फिर स्वाधीनता प्राप्ति के लिए सम्मिलित प्रयत्न हो।

गांधीजी ने कहा, जब तक हम तीसरे पक्ष को देश से निकाल नहीं देते तब तक हम एक-दूसरे के साथ शान्ति से नहीं रख सकते। इसलिए राजाजी की योजना के आधार पर हमें समझौता कर लेना चाहिए।

जिन्ना ने कहा, राजाजी की योजना में कई खामियां हैं। प्रदेशों की सीमा बांधने के लिए कमीशन कौन नियुक्त करेगा। योजना में जिस लोकमत और मताधिकार का विचार किया गया है, उसका स्वरूप कौन निश्चित करेगा? लोकमत के निर्णय को कार्यान्वित कौन करेगा?

गांधीजी ने कहा, अस्थायी अंतरिम सरकार करेगी।

जिन्ना ने कहा, अस्थाई राष्ट्रीय सरकार किस आधार पर बनेगी?

गांधीजी ने कहा, यह आधार लीग और कांग्रेस को मिल कर निश्चित करना होगा।

जिन्ना बोला, आपके पास यदि कोई निश्चित रूपरेखा है तो बताइए। आखिर यह आपकी योजना है, तो आपने कोई रूपरेखा तो सोच ही रखी होगी।

गांधीजी ने कहा, मैं कोई रूपरेखा लेकर नहीं आया हूं। आपने लाहौर प्रस्ताव के संदर्भ में कोई रूपरेखा बना रखी हो तो उस पर चर्चा की जाए।

लाहौर प्रस्ताव पर चर्चा चली। गांधीजी ने कहा, लाहौर प्रस्ताव अस्पष्ट है। इसमें न तो पाकिस्तान शब्द आया है और न ही दो राष्ट्रों के सिद्धान्त का उल्लेख है।

जिन्ना ने कहा, पाकिस्तान शब्द लाहौर प्रस्ताव में नहीं आया है तो क्या हुआ, अब यह शब्द लाहौर प्रस्ताव का समानार्थक बन गया है। मुसलमान और हिन्दू दो विशाल राष्ट्र हैं। मुसलमानों की संस्कृति, सभ्यता, भाषा, साहित्य, कला, स्थापत्य, नाम, नामाकरण पद्धति, जीवन के मूल्य, क़ानून, नैतिक नियम, रिवाज़, परंपरा, पंचांग और इतिहास हिन्दुओं से अलग हैं। इसलिए उनका यह अधिकार है कि उनके अपने देश में उनका स्वतंत्र सार्वभौम अस्तित्व हो।

गांधीजी ने विरोध किया, यह सही नहीं है। उर्दू भाषा और मुस्लिम स्थापत्य कला दोनों संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम है। पूर्वी बंगाल के मुसलमान केवल बंगला भाषा बोलते समझते हैं। दक्षिण के मुसलमान केवल तमिल, तेलुगू या मलयालम बोलते समझते हैं। आप ख़ुद गुजराती बोलते हैं। बिहार के गांवों में पोशाक के आधार पर हिन्दू-मुस्लिम स्त्री का भेद करना संभव नहीं है। ऐसे अनेक मुसलमान हैं जिनके हिन्दू नाम हैं। केवल ज़ोर देकर किसी बात का कहा जाना कोई प्रमाण नहीं है।

गांधीजी ने अन्य अनेक तरीक़ों से जिन्ना को समझाने की कोशिश की कि देश के टुकड़े होने से किसी का लाभ नहीं होगा। और फिर जिन मुसलमानों ने मुस्लिम लीग की नीति से असहमति प्रकट की है उनका क्या होगा? जिन्ना ने दो टूक शब्दों में कह दिया, मुस्लिम लीग ही भारत के मुसलमानों की एकमात्र अधिकारपूर्ण और प्रतिनिधि संस्था है। देश का बंटवारा और पाकिस्तान का निर्माण ही भारतीय समस्या का एकमात्र हल है और भारत को अपनी स्वाधीनता का यह मूल्य चुकाना ही होगा।

गांधीजी ने कहा, इस तरह की मांग में मुझे बर्बादी के सिवा कुछ नहीं दिखता। मैं किसी का भी प्रतिनिधि नहीं हूं। मेरी आकांक्षा भारत के सारे निवासियों का प्रतिनिधि बनने की है। वे सब समान रूप से मुसीबत और अवनति भोग रहे हैं।

जिन्ना ने गांधीजी के इस कथन का विरोध करते हुए कहा, आप एक महापुरुष हैं और हिन्दू जनता पर आपका जबरदस्त प्रभाव है। आप हिन्दुओं के सिवा अन्य किसी के भी प्रतिनिधि नहीं हैं और जब तक आप अपनी सही स्थिति समझ नहीं लेते, तब तक आपके साथ चर्चा करना मेरे लिए बहुत कठिन है।

4 अगस्त, 1942 को, यानी भारत छोड़ो प्रस्ताव पास करने के चार दिन पहले, गांधीजी ने दोनों पक्षों के एक मुस्लिम मित्र मेकलाई के द्वारा कांग्रेस-लीग समझौते के लिए जिन्ना के पास एक प्रस्ताव भेजा, किसी भी प्रकार की सत्ता अपने हाथ में सुरक्षित रखे बिना भारत को तत्काल स्वतंत्रता देने की कांग्रेस की मांग के साथ मुस्लिम लीग पूरी तरह सहयोग करे और ब्रिटिश सरकार आज जो भी सत्ता अपने हाथ में रखती है, वह सब मुस्लिम लीग को सौंप दे, तो कांग्रेस को कोई आपत्ति नहीं होगी। और भारत की प्रजा की ओर से मुस्लिम लीग जो भी सरकार बनाएगी, उसमें कांग्रेस किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी। इतना ही नहीं, स्वतंत्र राज्य का शासन-तंत्र चलाने के लिए कांग्रेस सरकार में भी सम्मिलित होगी। गांधीजी का सुझाव था, सीमांकन और मत-संग्रह को सैद्धांतिक रूप से भले पहले तय कर लिया जाए, लेकिन यदि बंटवारा होना ही है, तो वह हस्तांतरण के बाद होना चाहिए। यह दो भाइयों के बीच का बंटवारा होगा। देश के व्यस्क लोग मत द्वारा यदि बहुमत से यह चाहें कि बंटवारा होना चाहिए तो बंटवारा हो, लेकिन दोनों देश मिलजुल कर रहें, हमें इस बात का प्रयास करना चाहिए। दोनों देशों की रक्षा, विदेश मामले और आंतरिक संचर आदि एक हों और दोनों देश अपने यहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा वचन दें।

गांधीजी को आशा थी कि अंग्रेज़ों के भारत से चले जाने के बाद स्वतंत्रता के वातावरण में दोनों संप्रदाय मिल-जुलकर रहना सीख लेंगे और बंटवारे की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। जिस बात की गांधीजी को आशा थी, उसी बात से जिन्ना को डर था। वह कोई खतरा नहीं उठाना चाहता था और इसीलिए आज़ादी से पहले बंटवारे की बात पर अड़ा हुआ था, बाक़ी समझौता वह बाद में करने का आग्रह पाले बैठा था। उसने कहा, हम तो एक राष्ट्र के रूप में आत्म-निर्णय के अधिकार का दावा करते हैं। हमारा मामला तो विभाजन का और हिन्दू और मुसलमानों के दो बड़े राष्ट्रों के बीच समझौते के ही आधार पर दो स्वाधीन सार्वभौम राज्यों के निर्माण का है। किसी वर्तमान संघ से अलग होने या कटकर निकलने का नहीं है, क्योंकि ऐसा कोई संघ भारत में विद्यमान नहीं है। फिर उसने साझी सेवाओं को अनावश्यक बताया। उसका विचार था कि जनमत-संग्रह के लिए हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के मत लिए जाने से मुसलमानों के एक अलग राष्ट्र होने के मूल विचार पर ही प्रहार होता है जिसमें उनका आत्मनिर्णय का अधिकार निहित है। 

गांधीजी ने जिन्ना से कहा, मुझे इतिहास में ऐसा कोई उद्धरण नहीं मिला जिसमें धर्मान्तरित इकाइयों और उनके वंशजों ने मूल धर्म से अलग राष्ट्र होने का दावा करते हैं। यदि इस्लाम के आगमन से पहले भारत एक राष्ट्र था, तो उसे अपने बच्चों के एक बहुत बड़ी इकाई के विश्वास के परिवर्तन के बावजूद एक रहना चाहिए। मुझे लगता है कि आपके द्वारा राष्ट्रवाद की एक नई परिभाषा पेश की गई है।

थक कर गांधीजी ने कहा, वे मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी और खुले अधिवेशन में अपनी बात समझाएंगे। जिन्ना ने इस सुझाव को 'सबसे असाधारण और अभूतपूर्व' बताया और इसे खारिज कर दिया। उसे डर था कि मुस्लिम लीग के लोग कहीं गांधीजी की बातों से प्रभावित न हो जाएं। जिन्ना का रुख बड़ा ही अव्यावहारिक था। वह चाहता था कि गांधीजी मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था स्वीकार कर  लें। जिन्ना किसी भी साझेदारी के लिए तैयार नहीं था। वह चाहता था कि पाकिस्तान के सिद्धांत को पहले मान लिया जाए, उसकी भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण और अन्य विवरणों पर बाद में चर्चा होगी। उसका कहना था, दो सार्वभौम सत्ता संपन्न राष्ट्र बनने चाहिए। 30 जुलाई को जिन्ना ने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, पश्चिमोत्तर प्रांत, बंगाल और असम को अलग करके पाकिस्तान बनाने की अपनी मांग दुहराई थी। राजाजी के सूत्र की आलोचना करते हुए उसने कहा था, केवल छाया और छिलके, कटा हुआ, विकलांग और सड़ा-गला पाकिस्तान मुझे दिया जा रहा है। एक अपूर्ण, अंगहीन और दीमक लगा हुआ पाकिस्तान मैं स्वीकार नहीं कर सकता। और विभाजन को स्वतंत्रता मिलने तक रोका नहीं जा सकता। वह पाकिस्तान में सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत, पंजाब, बंगाल, असम और बलूचिस्तान को शामिल करना चाहता था। अगर बाद में सहयोग की आवश्यकता होगी तो सोचा जाएगा। जिन्ना चाहता था कि पहले विभाजन होना चाहिए, फिर सहयोग की संधि लिखी जाएगी। मौलाना आज़ाद, जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे, ने कहा, यह तो शादी से पहले तलाक़ लेने की बात हो गई।

गांधीजी ने पूछा, यदि दोनों के बीच समझौता न हो पाया, या संधि होकर टूट जाए तो क्या होगा?

जिन्ना ने जवाब दिया, जैसे दो अन्य राष्ट्रों के बीच होता है, युद्ध होगा।

गांधीजी तो सत्याग्रही थे। उन्होंने कहा, हम दो भाई हैं। हमें अपने विकास के लिए अलग रहने का हक़ हो सकता है। लेकिन आजीवन शत्रुता मोल लेना तो उचित नहीं होगा ना।

जिन्ना हठ पर अड़ा रहा। उसने कहा, भारत छोड़ो प्रस्ताव लीग के विरोध में बना है।

गांधीजी ने समझाया, यह भारत और अंग्रेज़ों के बीच की बात है। इसमें मुसलमानों का कोई विरोध नहीं है। आप तो इतने बड़े विधिवेत्ता हैं। आप चाहें तो किसी से पुछवा देखिए कि भारत छोड़ो प्रस्ताव में मुस्लिमों का कोई विरोध नहीं है।

जिन्ना का जवाब था, मैं क्यों किसी का अभिप्राय पूछने जाऊं? मुझे मालूम है कि यह लीग के विरुद्ध साजिश है।

ऐसी बातों के बाद चर्चा का कोई लाभ नहीं था। गांधीजी ने 27 सितम्बर को जिन्ना से कहा, मैंने 2 अक्तूबर को सेवाग्राम में रहने का निश्चित किया है। मैं 30 तारीख को रवाना होकर चार-पांच दिनों में लौट आऊंगा।

जिन्ना ने कहा, हम इतनी देर क्यों करें? हम अभी ही इसे बंद कर दें तो ज़्यादा अच्छा होगा।

गांधी-जिन्ना वार्ता टूट गई। जिन्ना ने कहा था, "हमें उम्मीद है कि यह हमारी कोशिश का आखिरी अंत नहीं है।"

गांधीजी ने टिप्पणी की, "यह ब्रेकडाउन सिर्फ कहने के लिए है। यह अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया गया है।"

27 सितंबर को गांधी और जिन्ना के बीच सत्रह दिनों की चर्चा का अंत हुआ। जिन्ना शाह और मात (शतरंज) के खेल का पुराना खिलाड़ी था। अपने दावे और अपनी प्रतिष्ठा को बढाने के लिए यह सैद्धांतिक छूट पा लेने के बाद उसके लिए वार्ता का कोई महत्व नहीं रह गया था और वह टूट गई। महात्माजी या राजाजी की तमाम प्रखर बुद्धि और मानसिक कुशलता के बावजूद जिन्ना उनसे कहीं अधिक घाघ राजनीतिज्ञ निकला।

शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, जिस परिणाम की मैंने आशा रखी थी वह नहीं आया। फिर भी मुझे कोई निराशा या हताशा नहीं है। मैंने सबकी भलाई के लिए जिन्ना साहब के दृष्टिकोण अनुकूल बनाने की पूरी कोशिश की। मुझे सफलता नहीं मिली। परन्तु सत्य और अहिंसा के पुजारी को प्रयत्नों का वांछित परिणाम न निकले तो निराश नहीं होना चाहिए। दूसरे दिन गांधीजी ने प्रेस वक्तव्य ज़ारी करते हुए कहा, सभी पार्टियों को जिन्ना से कहना चाहिए कि वे अपनी राय बदलें। न्यूज़ क्रॉनिकल के गेल्डर से इंटरव्यू में कहा, मेरा विश्वास है कि जिन्ना साहब सच्चे हैं, परन्तु मेरे ख़्याल से उन्हें यह भ्रम हो गया है कि भारत के अस्वाभाविक विभाजन से संबंधित लोगों को सुख या समृद्धि प्राप्त हो सकती है।

जिन्ना चाहता था कि गांधीजी मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था स्वीकार कर लें। वह यह भी चाहता था कि पाकिस्तान के सिद्धांत को पहले मान लिया जाए, उसकी भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण और अन्य विवरणों पर बाद में चर्चा होती रहेगी। गांधीजी का सुझाव था यदि बँटवारा होता ही है तो वह हस्तांतरण के बाद ही होना चाहिए। उनको आशा थी कि अंग्रेज़ों के भारत से चले जाने के बाद स्वतंत्रता के वातावरण में दोनों संप्रदाय मिल-जुलकर रहना सीख लेंगे और बँटवारे की ज़रूरत नहीं पडेगी और जिस बात की गांधीजी को आशा थी, उसी से जिन्ना को डर लगता था। वह कोई खतरा नहीं उठाना चाहता था, इसलिए देश की आज़ादी से पहले बँटवारे की बात पर अड गया। गांधीजी को धर्म के आधार पर दो अलग-अलग राज्यों के निर्माण की संभावना से इसलिए घबराहट होती थी कि उनमें सिवा शत्रुता के और कुछ हो ही नहीं सकता था। गांधीजी के लिए ये चर्चाएं शिक्षात्मक थीं, जिन्ना के लिए उनकी राजनैतिक शक्ति और स्थिति को दृढ करनेवाली। उसे मालूम था कि तीन सौ मिलियन हिंदुओं की तुलना में सौ मिलियन मुसलमानों को राजनीतिक बहुमत मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी, जब तक कि धार्मिक लक्ष्य राजनीति पर हावी रहना बंद न कर दें। पाकिस्तान हासिल करने के लिए जिन्ना मुसलमानों की धार्मिक और राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़का रहा था। नास्तिक जिन्ना एक धार्मिक राज्य बनाना चाहता था। गांधीजी, जो पूरी तरह धार्मिक थे, एक धर्मनिरपेक्ष राज्य चाहते थे। गांधीजी को इंसान पर इतना भरोसा था कि उन्हें लगता था कि सब्र से यह किया जा सकता है। प्रांतवाद की गिरफ्त में समाए भारत को एक बनाने के लिए गांधीजी राष्ट्रवाद के सीमेंट का इस्तेमाल करना चाहते थे; जिन्ना इसे दो बनाने के लिए धर्म के डायनामाइट का इस्तेमाल करना चाहता था। गांधीजी के जीवनीकार लुई फिशर कहते हैं, भारत का बंटवारा किसी सर्जन के स्केलपेल से धीरे से नहीं किया जा सकता था। यह सिर्फ एक मोटे कसाई के चाकू और भारी छुरी से ही किया जा सकता था, और इससे टूटी हड्डियां, कटे-फटे मसल्स, कटी नसें और चोटिल दिमाग बचता, जो सोचने की क्षमता खो देता। यूनाइटेड स्टेट्स या फ्रांस का बंटवारा भी इससे ज़्यादा दर्दनाक नहीं होता। बंटवारे की त्रासदी 1944 में गांधी जी की रिहाई के समय से लेकर 1948 में उनकी मृत्यु के दिन तक उनके सिर पर मंडराती रही।

गतिरोध बनी रही। कुंठा और कटुता बढ़ती गई। गांधीजी के अनुयायी उनके बार-बार वायसराय द्वारा ठुकराए जाने का विरोध करते। हिंदू राष्ट्रवादी उनके द्वारा जिन्ना के गर्व को बढ़ावा देने से चिढ़ते थे। ‘इंडिया विन्स फ्रीडम में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद लिखते हैं, मुझे लगता है कि इस मौके पर गांधीजी का मिस्टर जिन्ना के प्रति रवैया एक बहुत बड़ी राजनीतिक गलती थी। इससे मिस्टर जिन्ना को एक नई और ज़्यादा अहमियत मिली जिसका उन्होंने बाद में पूरा फायदा उठाया। वायसराय और जिन्ना द्वारा बार-बार ठुकराए जाने के बावजूद भी गांधीजी अपमानित महसूस नहीं करते। जो आदमी अपनी अंतरात्मा की गरिमा से अलग कोई सम्मान नहीं चाहता हो और न ही कोई निजी लाभ पाना चाहता हो, इसके लिए कुछ भी अपमानजनक नहीं होता। यह गांधीजी ही थे जिन्होंने सबसे पहले मिस्टर जिन्ना के लिए 'कायद-ए-आज़म' या महान नेता का खिताब इस्तेमाल किया था। वायसराय अपनी सभ्यता का अभाव दिखाकर अपने ऊंचे पद की गरिमा को कम कर रहा था और जिन्ना अपने दंभ और घमंड से ख़ुद को गिरा रहा था। गांधीजी दूसरों के उपहास से अप्रभावित रहते। वह वैसे लोगों के प्रति दुर्भावना से भी मुक्त रहते थे। साथ ही लोगों के हृदय की सर्वोत्तम भावनाओं को जगाने के लिए हमेशा आशावान भी रहते थे। उन्होंने चर्चिल को लिखा था,

प्रिय प्रधानमन्त्री,

रिपोर्ट है कि आप एक सीधे-सादे ‘नंगे फकीर’ को कुचल देने की इच्छा रखते हैं। मैं लंबे अरसे से एक फ़क़ीर बनने की इच्छा रखता आया हूँ। नंगा बनना तो और भी दुष्कर है। इसलिए मैं इस अभिव्यंजना को एक सम्मान समझता हूँ, हालाकि एक अनिच्छित सम्मान। इसलिए मैं इसी रूप में आपसे संपर्क कर रहा हूँ, और आपसे प्रार्थना करता हूं कि एक फ़क़ीर पर श्रद्धा रखकर आपके और मेरे लोगों के माध्यम से संसार के लोगों के भले के लिए मेरा उपयोग कीजिए।

आपका सुहृदय मित्र

एम.के. गांधी 

इस पत्र का कोई उत्तर नहीं आया।

गांधी-जिन्ना वार्ता फेल हो गई, क्योंकि, जैसा कि गांधीजी ने कहा, "एक गुलाम दिमाग आज़ाद दिमाग की तरह काम नहीं कर सकता।" तीन हफ़्तों की बातचीत के अनुभव ने उनके इस विचार को और पक्का कर दिया कि तीसरी पार्टी, यानी अंग्रेज़ों की मौजूदगी, सांप्रदायिक समस्या के समाधान में रुकावट डाल रही है। जैसे ही मुस्लिम लीग के सहयोग से राष्ट्रीय सरकार की मांग पेश करने की उम्मीद खत्म हो गई, यह सवाल फिर से गांधीजी के विचारों में आने लगा: अब आगे क्या?

आगे की बात तो सबको मालूम है, देश-विभाजन की वह करुण गाथा। दोनों देश एक-दूसरे पर पांच बार आक्रमण कर चुके हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पांच महीने में ही बापू की हत्या कर दी गई। उसके सात महीने के बाद जिन्ना भी चल बसे। विरासत में पीछे रह गया दोनों देशों के बीच शत्रुता, कड़वाहट, अविश्वास और आतंकवाद।

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।