गांधी और गांधीवाद
424. महादेव
देसाई की मृत्यु
1942
आगा खान पैलेस में हिरासत में लिए जाने के एक
हफ़्ते के अंदर, गांधीजी को एक बहुत बड़ा दुख हुआ। एकाएक आगाखां
महल में महादेव देसाई पर हृदय-रोग का आक्रमण हुआ और कुछ ही देर में पिछले पच्चीस
वर्षों से छाया की तरह साथ रहने वाले गंधीजी के मानसपुत्र आधे रास्ते पर उनका साथ
छोड़कर चल बसे। वह शांति से बात कर रहे थे, और
अचानक ज़मीन पर गिर पड़े। उन्हें बिस्तर पर ले जाया गया, उनका
चेहरा लाल था, होंठों से झाग निकल रहा था, उनके हाथ-पैर छटपटा रहे थे। गांधीजी जल्दी से
उनके पास गए। गांधीजी बिस्तर के पास खड़े होकर 'महादेव, महादेव' पुकार
रहे थे। दुख में गांधीजी ने कहा, "अगर वह बस एक बार अपनी आँखें खोलकर मुझे देख ले, तो वह नहीं जाएगा।" महादेव ने कभी आँखें नहीं खोलीं। 'महादेव, देखो, बापू तुम्हें बुला रहे हैं,' कस्तूरबाई ने कहा। जब उन्होंने अपनी अंतिम
सांसे ली, उनका सिर बापू की गोद में था। इस दुखद घटना का सदमा और भी बढ़ गया
क्योंकि जहां तक पता था, महादेव
भाई को पहले कभी दिल का दौरा नहीं पड़ा था और उन्हें हाई ब्लड प्रेशर की भी कोई
बीमारी नहीं थी। उन्हें सिर्फ कभी-कभी चक्कर आते थे। काँपते हाथों से गांधीजी ने
शरीर को धोया और चंदन लगाया और फूलों से सजाते हुए फुसफुसाए, "महादेव, मैंने सोचा था कि तुम यह मेरे लिए करोगे। अब मुझे यह
तुम्हारे लिए करना पड़ रहा है।"
बा इस कठोर आघात को सह नहीं सकीं। बा की आंखों
से झर-झर आंसू बहते रहे। कस्तूरबा, जिन्हें
गांधीजी की गिरफ्तारी के अगले दिन गिरफ्तार किया गया था, रोते
हुए बोलीं: "बापू ने अपना दायां और बायां हाथ खो दिया! बापू ने अपने दोनों
हाथ खो दिए!" उनके मुंह से बार-बार निकल रहा था, “मुझे जाना था; महादेव क्यों चला गया? मैं
दुर्गा को क्या मुंह दिखाऊंगी।” सरकार ने महादेव देसाई की पत्नी दुर्गा देसाई और उनके
पुत्र नारायण देसाई को भी उनके अंतिम दर्शन नहीं करने दिया। वे सेवाग्राम में ही
थे। जो तार गांधीजी ने भेजा था वह भी उन्हें तीन सप्ताह बाद मिला। गांधीजी ने
उसमें लिखा था, “महादेव को एक योगी और देशभक्त की मृत्यु प्राप्त हुई है।”
गांधीजी ने पूछा कि “क्या शव को मृतक के दोस्तों और रिश्तेदारों को
सौंपा जा सकता है।” आई.जी. प्रिज़न्स ने कहा, “ऐसा नहीं किया जा सकता, लेकिन अधिकारी शव को ले सकते हैं और अंतिम
संस्कार की व्यवस्था कर सकते हैं।” अधिकारियों ने पुलिस और ब्राह्मणों के साथ एक लॉरी मंगवाई
थी। वे शव को ले जाकर खुद उसका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। लेकिन गांधीजी इसके
लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया, "कोई भी पिता अपने बेटे का शव अजनबियों को नहीं सौंप सकता। महादेव
मेरे लिए बेटे से भी बढ़कर था। मैं खुद उसके अंतिम संस्कार करना चाहता हूं। लेकिन
अगर सरकार मुझे बाहर नहीं ले जा सकती, तो मैं इसे दोस्तों को सौंपने के लिए तैयार हूं, लेकिन मैं इसे जेल अधिकारियों को नहीं
सौंपूंगा।"
हालांकि सरकार हत्यारों के शव फांसी के बाद उनके रिश्तेदारों और दोस्तों को सौंप
देती है और उन्हें सार्वजनिक अंतिम संस्कार करने देती थी, लेकिन
वे एक विद्रोही के लिए, चाहे
वह कितना भी अहिंसक क्यों न हो, ऐसी
इजाज़त देने को तैयार नहीं थे। माहौल में तनाव था। गांधीजी कुछ देर सोचते रहे। फिर
उन्होंने कहा: "मैं अपने बेटे की मौत को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना
चाहता। अगर सरकार मुझे बाहर जाकर शव का अंतिम संस्कार करने की इजाज़त नहीं देगी और
न ही इसे दोस्तों को सौंपने देगी, तो
मैं यहीं अंतिम संस्कार करूंगा।" जेल अधिकारियों ने टेलीफोन पर नई दिल्ली से संपर्क किया।
आखिरकार सरकार मान गई।
दोपहर में, एक
दुख भरी छोटी सी शव यात्रा महादेव की अर्थी को महल के मैदान के एक कोने में बनी
अस्थायी श्मशान भूमि तक ले गई। गांधी जी एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में आग का
बर्तन लिए शव के पीछे-पीछे चल रहे थे। एक छोटी सी धार्मिक रस्म के बाद उन्होंने आग
जलाई और जल्द ही आग की लपटें उठने लगीं। उन्होंने कहा, "महादेव ने 'करो या मरो' के मंत्र को सच कर दिखाया है। यह बलिदान भारत की आज़ादी के
दिन को ज़रूर करीब लाएगा।" शाम 5 बजे तक अंतिम संस्कार पूरा हो गया था। गांधीजी पूरे
तीन घंटे तक जलती हुई चिता के पास खड़े रहे और वह शारीरिक और भावनात्मक रूप से
बहुत थक गए थे।
तीसरे दिन हड्डियाँ और राख इकट्ठा की गईं। जिस
जगह उनके शरीर का दाह-संस्कार किया गया, वहां गांधीजी ने पत्थर और मिट्टी की एक
समाधि बनवाई। गांधीजी के कहने पर मीरा बहन ने समाधि के ऊपर ‘ॐ’ लिख दिया और
उसके नीचे क्रास बना दिया। उस जगह पर एक चबूतरा बनाया गया और पत्थरों का एक छोटा
सा घेरा बनाया गया। महात्मा गांधी इस मौत से स्तब्ध थे। गांधीजी हर सुबह और शाम
समाधि पर जाते थे। ताज़े फूल चढ़ाए जाते थे और गीता का बारहवाँ अध्याय रोज़ पढ़ा
जाता था। मीरा बहन लिखती हैं, गांधीजी फूल चढाते तो हमेशा क्रॉस के ऊपर। जब मैं बापू को
देखती, मुझे रोम की वह सलीब याद आती जिसने उन्हें इस कदर अभिभूत कर दिया था और
मुझे लगता कि महानतम बलिदान का वह प्रतीक उनके लिए उनके अस्तित्व की सबसे मूलभूत
आकांक्षा का प्रतीक था।
गांधीजी ने कहा, "महादेव का पूरा जीवन भक्ति का एक अटूट गीत था, और यह सही है कि हम उनकी समाधि पर भक्ति योग का
पाठ करें। शिष्य होने से वह मेरे गुरु बन गए हैं। मैं हर दिन उनकी समाधि पर जाता
हूँ ताकि सेवा के प्रति उनके जीवन भर के समर्पण का उदाहरण मेरे मन में ताज़ा रहे।
आइए हम सब भगवान से प्रार्थना करें कि हम उनके नक्शेकदम पर चल सकें।"
जिस जगह महादेव भाई का अंतिम संस्कार किया गया
था, वह घर के चारों ओर लगी कंटीली तार की बाड़ से
थोड़ी दूरी पर थी। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, गांधीजी, दूसरे
कैदियों के साथ, सुबह-शाम वहाँ जाते थे, उस
जगह पर फूल चढ़ाते थे और गीता के बारहवें अध्याय, भक्ति
मार्ग का पाठ करते थे। तीन दिन बाद, जब
राख इकट्ठा करके रख ली गई, तो
सरकार की तरफ से आदेश आया कि वे और दूसरे कैदी अब कंटीली तार की बाड़ से बाहर कदम
नहीं रखेंगे। डिटेंशन कैंप का जेलर कटेली खुद इस मनमानी हुक्म से परेशान था। उसने
गांधीजी की तरफ से समाधि पर फूल चढ़ाने की पेशकश की। उसने उन झाड़ियों को भी साफ
करवाने की पेशकश की जो कंटीली तार के गेट से समाधि का नज़ारा रोक रही थीं। उसने उस
जगह पर एक आयताकार चबूतरे के आकार में पत्थर लगवाए ताकि उस जगह की पहचान हो सके।
चौथे दिन से, सुबह और शाम, गांधीजी
और उनका छोटा सा ग्रुप बंद कंटीली तार के गेट के पास खड़े होकर समाधि को देखते और
प्रार्थना करते थे, जबकि उनकी तरफ से उस पर फूल चढ़ाए जाते थे।
महादेव देसाई का जन्म 1 जनवरी, 1892 में सूरत के पास
अनाविल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे एक गाँव के स्कूल टीचर के बेटे थे, और गरीबी में पले-बढ़े
थे। वे एक ट्रांसलेटर बने, और फिर वकील, लेकिन वकालत में इतनी
कम कमाई हुई कि वे खेती की कोऑपरेटिव सोसाइटी के बैंक इंस्पेक्टर बनकर खुश थे। गांधीजी
ने सितंबर 1917 में उनसे मिलकर महसूस किया कि उन्हें अपना खोया हुआ बेटा मिल गया
है। गांधीजी ने कहा, "मुझे लोगों को समझने
में ज़्यादा समय नहीं लगता। मुझे तुममें वह इंसान मिल गया है जिसे मैं ढूंढ रहा था, वह एक इंसान जिसे मैं
एक दिन अपना काम सौंप सकूंगा। मुझे तुम्हारी ज़रूरत अपने लिए है, आश्रम के लिए या किसी
और काम के लिए नहीं।" गांधीजी अड़तालीस साल के थे; महादेव देसाई पच्चीस
साल के थे। अपनी पच्चीस वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपना समस्त जीवन बापू को
समर्पित कर दिया था। गांधीजी ने भी प्रथम परिचय में ही उनकी तेजस्विता, विद्वता और
उत्तम चरित्र को पहचान लिया था। गुजरात प्रांत राजकीय परिषद का पहला अधिवेशन 1916 में गोधरा में हो रहा
था। जिसके अध्यक्ष गांधीजी थे। वहीं
बंबई विश्वविद्यालय से वकालत पास महादेव देसाई ने पहली बार गांधीजी को देखा था।
उनका भाषण भी सुना। गांधीजी ने महादेव की लिखी हुई सामग्री देखकर कहा था, “तुम्हारा स्थान तो
मेरे पास है।” उस दिन एलिस ब्रिज पर
से वापस आते हुए महादेव ने नरहरिभाई पारिख से कहा था, “सारी ज़िन्दगी किसी के
चरणों के पास बैठकर बिताना चाहूं, तो इस पुरुष के पास बिताऊं, ऐसा लगता है।” तब उन्होंने गांधीजी
का सान्निध्य स्वीकार किया और 1917 से जीवन भर इसे
निभाया। उन्होंने पच्चीस साल तक बिना किसी आराम के उनकी सेवा की थी और उन्होंने "खुद
को शून्य बना लिया था"। 1919 तक वे गांधीजी के
इतने प्रिय हो चुके थे कि गांधीजी ने उन्हें यह कहते हुए, “महादेव मेरा बेटा,
सचिव और मुझपर जान देने वाला है”, अपना मानसपुत्र और
उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उन्हें जो चाहिए था, वह था वफ़ादारी, समझदारी, पक्का समर्पण, और ये सब उन्हें
महादेव देसाई में मिला, जिन पर उन्होंने वह
सारा प्यार बरसाया जो उन्होंने अपने बेटों को नहीं दिया था। हरिलाल को, जो उस समय कलकत्ता में
अपना बिज़नेस शुरू कर रहे थे, उन्होंने लिखा कि उन्हें
"परफेक्ट सेक्रेटरी" मिल गया है और यह दुख की बात है कि हरिलाल ने यह पद
ठुकरा दिया।
गांधीजी का सुझाया हुआ
शायद ही ऐसा कोई रचनात्मक कार्य होगा, जिसे महादेव भाई ने न अपनाया हो। इसे संदर्भ
में सूत कताई एक ऐसा कार्यक्रम था जिसे उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया। चाहे जितना
भी काम हो, काते बगैर एक दिन भी नहीं सोते थे। हर दिन 500 गज सूत कातने का
उन्होंने ने नियम बनाया हुआ था। 15 अगस्त 1942 को मृत्यु हुई थी, 14 अगस्त तक उन्होंने 500 गज सूत कातने का नियम
निभाया। वह गुजराती के कुशल अनुवादक थे, रोज़ डायरी लिखते थे, और उनकी लिखावट बहुत
सुंदर थी।
महात्मा गांधी के निजी
सचिव का काम निरी मुंशीगिरी तो हो
नहीं सकती थी। गांधीजी के प्रति उनकी सेवा-भक्ति अद्वितीय थी। प्रथम
असहयोग आन्दोलन के पहले, जब गांधीजी भारत में इतने प्रख्यात नहीं हुए थे, उनके
देशव्यापी दौरे में महादेव भाई अकेले ही उनकी सुख सुविधाओं का पूरा-पूरा ख्याल
रखते थे। उनके कपड़े धोते, कमोड साफ करते, मालिश करते, दवाई लगाते, फलों का रस
देते। क्या नहीं करते। महादेव का व्यक्तित्व मोहन से बिल्कुल भिन्न था। एक सूर्य
जैसा था, तो दूसरा चन्द्रमा जैसा शीतल। एक अनासक्त कर्मयोगी था, तो दूसरा रसिक
भक्त। भाषा और साहित्य की दृष्टि से गांधीजी यथार्थवादी थे, तो महादेव अलंकार
युक्त रसमय शैली वाले। फिर भी महादेव ने लेखों में गांधीजी की शैली को ठीक आत्मसात
किया था। हरिजन या हरिजन बंधु में लिखे लेखों को पढ़कर पाठक सहज यह अनुमान नहीं लगा
पाते कि यह महादेव (एम.डी.) का लिखा है या मोहन (एम.के.जी.) का। चर्चा में अधिक
समय नष्ट न हो, इस दृष्टि से राजाजी, पटेल, नेहरूजी सरीखे नेता भी महादेव से ही
चर्चा करके काम निपटा लेते थे। गांधीजी के भाषणों की रिपोर्ट भी लिखने का काम उनका
ही था। यह उतना सहज काम नहीं था। गांधीजी की भाषा में तो सहजता होती थी, लेकिन
उनके भाषण में क्रमबद्धता नहीं होती थी। महादेव को रिपोर्ट लिखते समय उसे ठीक करना
होता था। यहां तक कि गांधीजी की गिरफ्तारी के समय राजनीतिक कैदी की हैसियत
से वह जले में भी गांधीजी की संगत में रहते थे यही कारण था कि 1942 के आंदोलन में गांधीजी की गिरफ्तारी के समय महादेव देसाई को भी गिरफ्तार
कर लिया गया था और गांधीजी के साथ आगा खान पैलेस की जेल में
रखा गया था।
जैसे जैसे गांधीजी का सार्वजनिक
काम बढता गया, महादेव भाई के काम का बोझ भी उसी अनुपात में
अधिक होता गया। वे बहुत मेहनती थे। महादेव
देसाई की मेहनतकशी का उदाहरण यह है कि जिन दिनों गांधीजी सेवाग्राम में रहते
थे तब महादेव देसाई वर्धा से प्रतिदिन गांधीजी की डाक लाने ले जाने के लिए 11 मील पैदल चलते थे और किसी किसी दिन
तो उन्हें जरूरी डाक के लिए दो बार 22 मील पैदल चलना पड़ता था। ट्रेन में सफर के समय वे रात में पाखाने में
बैठकर लेख लिखते थे ताकि ट्रेन के डिब्बे की बत्ती जलने से गांधीजी की नींद में खलल न पड़े। गांधीजी की सेवा
के लिए उन्होंने कांग्रेस सरकार में मंत्री पद भी अस्वीकार कर दिया था। हालांकि उन्हें आशुलिपि
नहीं आती थी, फिर भी सुयोग्य सचिव के गुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे। उनके लिखने की
गति असामान्य थी, और वे गांधीजी के मुंह निकला एक शब्द भी नहीं छोड़ते थे। डाक
देखकर विशाल पत्र-व्यवहार को निपटाना, देश-विदेश के आगंतुकों के साथ चर्चा करके
गांधीजी का समय बचाना, मुलाक़ातों की रिपोर्ट लिखना, यंग इंडिया और हरिजन का
संपादन, लेख लिखना, गुजराती लेखों का हिंदी-अंग्रेज़ी अनुवाद करना, गांधीजी के
दिनचर्या का विवरण तैयार करना, प्रवास का विवरण डायरी में लिखना, गांधीजी के साथ
हुए वाद-विवाद को शब्द-बद्ध करना आदि उनके दैनिक काम थे। इसके अलावा गांधीजी के
प्रयोगों में उनकी सहायता करना भी उनकी जिम्मेदारी थी। वे गांधीजी के व्यापक
राजनीतिक संबंधों का निर्वाह भी उतनी ही कुशलतापूर्वक करते। उनका दिमाग बहुत तेज़
और शानदार था, और कभी-कभी वह गांधीजी
की बातों का भी अपनी समझदारी से विरोध कर पाते थे। महादेव देसाई गांधीजी के लिए
कसौटी थे; अगर गांधीजी अपने
सेक्रेटरी को अपने कामों या विचारों की सही होने का यकीन नहीं दिला पाते थे, तो उन्हें पता चल जाता
था कि वे फेल हो गए हैं। इतने सारे काम महादेव कैसे कर लेते थे, यह आश्चर्य का
विषय है। शायद मोहन और महादेव की असाधारण एकात्मकता की वजह से।
एक बार उनकी जेब कटने से
संस्था के 400 रुपये चोरी हो गये थे
उसकी भरपाई उन्होंने कई किताबों का अनुवाद करके पूरी की। महादेव देसाई
साहित्य लेखन के साथ साथ गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी भाषा के विद्वान और अनुवादक
थे। उनकी कई खंड में प्रकाशित डायरी भारत की आजादी के आंदोलन का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक
दस्तावेज है। आख़िर तक महादेव देसाई को गांधीजी की तरफ़ से सत्तर रुपए माहवार मिलते
थे। इतने में बमुश्किल घर का ख़र्च चला पाते थे। लेकिन उन्होंने बापू का साथ कभी
नहीं छोड़ा और गांधीजी के पास आने के बाद पच्चीस वर्षों में महादेव देसाई ने सिर्फ़
दो बार छुट्टी ली थी। पहली बार टायफायड हो जाने पर और दूसरी बार ब्लड प्रेशर बढ़
जाने पर। उनके पिताजी का भी जब देहान्त हुआ था तब भी उनका काम ज़ारी रहा था। इन दो
अपवादों को छोड़कर महादेव भाई ने एक भी रविवार, दीवाली, होली या गरमी की छुट्टी
नहीं ली। इस बार जब वे तीसरी बार बीमार हुए तो, तीव्र हृदय घात के हमले से, डा सुशीला नायर की उपस्थिति
में भी, उन्हें तमाम कोशिशों के बाद भी बचाया नहीं जा सका और वह सदा के लिए छुट्टी मनाने चले गए। मोहन और महादेव
का साथ छूट गया। महादेव देसाई जैसे निष्काम देशभक्त का असामयिक निधन आजादी की लड़ाई लड़ते भारत
के लिए भी बहुत दुखदाई था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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