शनिवार, 17 जनवरी 2026

429. गांधीजी की जेल से रिहाई

गांधी और गांधीवाद

429. गांधीजी की जेल से रिहाई



1944

ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी कि विश्व युद्ध की लंबी लड़ाई खत्म होने से पहले गांधीजी को रिहा कर दिया जाएगा। कुछ समय के लिए यह चिंता भी थी कि हिरासत की लंबी अवधि के दौरान उनकी मौत हो सकती है। कस्तूरबा की मौत से कुछ ही हफ़्तों में गांधीजी का स्वास्थ्य फिर से बिगड़ने लगा। मलेरिया तो हुआ ही था, पेट में हुकवर्म भी हो गया था। वह दिन-ब-दिन कमज़ोर पड़ने लगे और एकदम अशक्त हो गए। आगा खान पैलेस में बहुत ज़्यादा मलेरिया का प्रकोप था। कस्तूरबा की मौत के छह हफ़्ते बाद गांधीजी को मलेरिया का ज़बरदस्त अटैक हुआ। 16 अप्रैल, 1944 को एक बयान में कहा गया: "श्री गांधी पिछले तीन दिनों से मलेरिया से पीड़ित हैं। उन्हें कमजोरी महसूस हो रही है, लेकिन उनकी सामान्य स्थिति उतनी ही संतोषजनक है जितनी उम्मीद की जा सकती है।" उनका टेम्परेचर खतरनाक तरीके से बढ़ गया, ब्लड प्रेशर गिर गया, और डॉक्टर उनकी कमज़ोरी देखकर परेशान हो गए। एक तरफ अंग्रेजों की द्वितीय विश्व युद्ध में लगातार हालत पतली हो रही थी दूसरी तरफ उन पर गांधीजी को रिहा करने के लिए चौतरफा दबाव पड रहा था। बयान में लगातार कहा जा रहा था कि गांधीजी की हालत में सुधार हो रहा है। 30 अप्रैल को घोषणा की गई कि "जब तक ज़रूरी न हो, कोई और बुलेटिन जारी नहीं किया जाएगा"

बिना शर्त रिहाई

कस्तूरबा के निधन के छह हफ़्ते बाद, गांधीजी को बिनाइन टर्टियन मलेरिया का गंभीर दौरा पड़ा, जिसके दौरान वह बेहोश हो गए थे। तापमान 105 तक पहुँच गया था। डॉक्टरी जांच से खून में परजीवी कीटाणुओं और आँतों में एमीबियोसिस के होने का पता चला। जब उनकी हालत और बिगड़ी तो उनकी रिहाई के लिए जन-आन्दोलन तेज हो गया और पूरे देश में उसकी लहर दौड़ गई। बीमारी बनी रही, और 3 मई को डॉक्टरों ने एक ऐसा बुलेटिन जारी किया जो पहले से काफी कम आशावादी था: श्री गांधी की एनीमिया की हालत और खराब हो गई है और उनका ब्लड प्रेशर और गिर गया है। उनकी सामान्य हालत फिर से चिंता का कारण बन रही है।

सरकार नहीं चाहती थी कि बापू की मृत्यु जेल में हो जाए। देश में जो माहौल था उसमें कांग्रेस के लिए अब आजादी से कम किसी बात पर समझौता करना संभव नहीं रहा और अंग्रेजों के लिए भी भारत की जनता के आक्रोश को देखते हुए दमन की नीति से राज चलाना असंभव हो गया था, इसलिए गतिरोध समाप्त करने के लिए अंततः 6 मई 1944 को बीमारी के आधार पर गांधीजी को रिहा कर दिया गया। 5 मई को शाम करीब छह बजे बंबई के जेलों के इंस्पेक्टर जनरल कर्नल भंडारी ने गांधीजी से कहा, आपको और आपकी मंडली के लोगों को कल सुबह आठ बजे बिना किसी शर्त के छोड़ दिया जाएगा।

"क्या आप मज़ाक कर रहे हैं?" गांधीजी ने पूछा। कर्नल भंडारी ने जवाब दिया, नहीं, मैं सीरियस हूँ,” अगर आप अपने काम को ठीक करने के लिए कुछ दिन और महल में रुकना चाहते हैं तो सरकार को कोई एतराज़ नहीं होगा। भगवान के लिए, मुझ पर दया करें और दोबारा वापस मत आना। देखो, चिंता से मेरे बाल सफ़ेद हो गए हैं।" गांधीजी मुसकुराए और अच्छे मूड में पूछा, "अगर मैं कुछ समय पूना में रहूँ तो मेरे रेलवे किराए का क्या होगा?" "जब भी आप पूना छोड़ेंगे, आपको मिल जाएगा," उन्होंने जवाब में कहा। गांधीजी ने उन्हें गुड नाइट कहते हुए कहा, "ठीक है, तो मैं दो या तीन दिन पूना में रहूँगा।"

गांधीजी का महल में ज़रूरत से ज़्यादा एक पल भी रुकने का कोई इरादा नहीं था। 6 मई 1944 को सुबह आठ बजे स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें जेल से रिहा किया गया। बाईस महीने की कारावास समाप्त हुई। यह गांधीजी का जेल में आखिरी समय था। कुल मिलाकर, उन्होंने भारतीय जेलों में 2089 दिन और दक्षिण अफ्रीकी जेलों में 249 दिन बिताए। सुबह 5:00 बजे महल में आखिरी बार प्रार्थना की गई, और जेल से निकलने से पहले बापू कस्तूरबा और महादेव देसाई की समाधि पर गए। चिर निद्रा में लीन इन पुण्य आत्माओं से विदाई ली। धीमे स्वर में बोले, बा ने और महादेव ने स्वतंत्रता की वेदी पर अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। दोनों अमर हो गए। कुछ मिनट बाद उन्होंने सरकार को लिखा, और उनसे अपने सबसे करीबी साथियों की मौत से पवित्र हुई उस छोटी सी जगह को उनके लिए सुरक्षित करने का अनुरोध किया। जब उनकी कार जेल के कम्पाउंड से बाहर निकल रही थी, उनकी नज़र मैदान के कोने में पड़े चंदन की लकड़ियों की ढ़ेर पर गई। सरकार के आदेश से अंग्रेज़ी जेलर ने उनकी अंतिम क्रिया के लिए पर्याप्त लकड़ियां इकट्ठी कर रखी थी।

देश का कप्तान वापस आ गया

ठीक आठ बजे, आई.जी.पी. कर्नल भंडारी ने गांधीजी को अपनी कार में बिठाया, बाकी लोग दूसरी कार में पीछे-पीछे आए, और उस नज़रबंदी वाली जगह पर एक साल और नौ महीने बिताने के बाद गांधीजी कंटीले तारों से बाहर निकल गए। जैसे ही कार कांटेदार तार की बाड़ से बाहर निकली, एक पुलिसवाले ने उसे रोका और एक नोटिस दिया, जिस पर लिखा था: "आपको आगा खान पैलेस में जो कुछ भी हुआ, उसके बारे में बात करने की मनाही है।" महात्मा हल्के से हँसे। उन्होंने टिप्पणी की: "यह आदेश इतनी व्यापक शर्तों में लिखा गया है कि वे किसी से भी इसके पालन की उम्मीद नहीं कर सकते!"

गाड़ी सीधे लेडी थैकरसे के घर पर्णकुटी गई। जैसे ही कार पर्णकुटी—लेडी थैकरसे के बंगले—पहुँची, जहाँ गांधीजी को पूना में रुकना था, वे उदास हो गए। वह कस्तूरबा के बारे में सोच रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा। "बा और महादेव दोनों ने आज़ादी की देवी की वेदी पर अपनी जान दे दी। और वे अमर हो गए हैं। अगर वे जेल के बाहर मरे होते तो क्या उन्हें यह गौरव मिलता?" उन्होंने पूना में तीन दिन आराम किया। 9 मई को वह महादेव और कस्तूरबा की याद में श्रद्धांजलि देने के लिए आगा खान पैलेस गए।

उस समय गांधीजी को सबसे ज़्यादा आराम की ज़रूरत थी, और वह उन्हें मिल नहीं पा रहा था। वहाँ मिलने वालों, रिश्तेदारों, करीबी साथियों और सहकर्मियों की भीड़ लगी रहती थी। उन्हें गांधीजी से अपने मन की बात कहने का हक था, और गांधीजी ऐसे नहीं थे कि अपनी जान जोखिम में डालकर भी उन्हें दिलासा देने से मना कर दें। नतीजा यह हुआ कि पूना में गांधीजी जेल से निकलने के समय से भी ज़्यादा कमज़ोर महसूस कर रहे थे। "शांति के दिन खत्म हो गए हैं," उन्होंने कहा। "जेल में पूरी शांति थी।" बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें बंबई के पास एक शांत समुद्री रिसॉर्ट, जुहू में शिफ्ट करने का फैसला किया गया, जहाँ वे 1924 में अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बाद यरवदा सेंट्रल जेल से रिहा होने के बाद ठीक होने के लिए भी गए थे।

गांधीजी के रिहा होते ही सुप्त हुए आंदोलन में नया जोश आ गया। जेल से वापस आने के बाद देशवासियों को लगा कि देश का कप्तान वापस आ गया। बाहर स्थिति बहुत विकट थी। कांग्रेस आदि सारी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगा था। सरकार का अनवरत जुल्म चल रहा था। हज़ारों लोग जेल में ठूंस दिए गए थे। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी के सदस्य अहमदनगर के क़िले में बंद थे। अख़बारों के मुंह बंद थे। नए-नए अध्यादेशों द्वारा अदालतों के निर्णय बेकार कर दिए गए थे। सारा देश ब्रिटिश अत्याचारों के तले कराह रहा था। अंधेरा ही अंधेरा था। ऐसी परिस्थिति में अत्याचार और दासता के अंधकार में अब मार्गदर्शक आ चुका था। ‘करेंगे या मरेंगे’ का शंखनाद अभी ख़त्म नहीं हुआ था।

वे कमजोर हों या मज़बूत हों, वे खामोश होकर बैठकर देश की हालत को लगातार बिगड़ते नहीं देख सकते थे। पूना में कांग्रेसियों की एक सभा में उन्होंने कहा था, सत्याग्रही का बीमार होना शर्म की बात है ... मेरी आकस्मिक रिहाई ने भारी आशाएं जगाई हैं। मैं इस विश्वास का पात्र हूं, इसमें मुझे संदेह है। लेकिन इतना मैं ज़रूर जानता हूं कि मुझमें चाहे जितनी भी शक्ति हो, वह पूरी तरह इस तथ्य के कारण है कि मैं अहिंसा का पुजारी हूं।। लोगों को लगा कि कप्तान ने आकर फिर से जहाज की पतवार संभाल ली है। लोगों को विश्वास था कि वह जहाज को तूफानी समुद्र से सुरक्षित पार लगाएगा।

स्वास्थ्य लाभ

जगह-जगह से बधाई, शुभकामनाओं और शीघ्र स्वस्थ होने के तार आ रहे थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए गांधीजी ने जुहू जाने का निश्चय किया। जेलों के इंस्पेक्टर जनरल कर्नल भंडारी की पत्नी उन्हें विदा करने आईं। उन्होंने विनती की: "महात्माजी, अगर आप कभी फिर से जेल जाने की सोचें, तो कृपया हमें पहले से बता दीजिएगा ताकि मेरे पति छुट्टी ले सकें!"

11 मई को गांधीजी जुहू में रहने के लिए बॉम्बे पहुंचे। सरकार ने उनके और उनके साथियों के लिए एक सेकंड-क्लास का डिब्बा बुक किया था। एक कैदी के तौर पर उन्होंने फर्स्ट-क्लास में यात्रा की थी। लेकिन एक आज़ाद आदमी के तौर पर वे आम लोगों में से थे और आम लोगों के लिए थे। जब तक वे उनकी तरह - थर्ड-क्लास में यात्रा नहीं करते, उन्हें शांति नहीं मिल सकती थी! रेल के तीसरे दर्ज़े में पूना से बंबई की यात्रा सम्पन्न हुई। गांधीग्राम जुहू में उनका ठिकाना लगा। यह शांति कुमार मोराजी का घर था। उनके पिता पोरबंदर के थे। उसी समय मिसेज नायडू और मिसेज पंडित, जो जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं, भी वहीं थीं। आने-जाने वालों का तांता लगा हुआ था। इससे स्वास्थ्य लाभ के बदले और भी उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था।

14 मई को बिना किसी रुकावट के आराम करने के लिए उन्होंने दो हफ़्ते के लिए मौन व्रत धारण कर लिया। शाम की प्रार्थना और समुद्र किनारे टहलने के अलावा वह खुद को अपनी कुटिया तक ही सीमित रखते थे। समुद्र की हवा और रेत पर लंबी सैर धीरे-धीरे उन्हें सेहतमंद बना रही थी। दोस्त घर पर रहने आए, और वह खासकर कवयित्री सरोजिनी नायडू की कंपनी पाकर वह बहुत खुश थे। सरोजिनी नायडू खुद बीमार थीं, फिर भी वह अपने प्यार और अच्छे मूड से कमरे में रौनक भर देती थीं। सरोजिनी नायडू ने लोगों के झुंड से बचाने के लिए द्वारपाल का काम संभाल लिया। गांधीजी उन्हें स्नेह से अम्माजान कहते थे। इस तरह अम्माजान ने उनकी देखभाल की और स्वास्थ्य लाभ कराया।

श्रीमती मोरारजी ने सुझाव दिया कि महात्मा गांधी एक चल-चित्र देखें। कुछ कहने के बाद, वह मान गए। पास के एक उपनगर में 'मिशन टू मॉस्को' दिखाई जा रही थी। मैकेनिकल उपकरण और फिल्म मोरारजी के घर लाए गए और लगभग सौ अन्य लोगों के साथ गांधीजी ने 'मिशन टू मॉस्को' देखी। 'आपको यह कैसा लगा?' मिसेज़ मोरारजी ने पूछा। 'मुझे यह पसंद नहीं आया,' उन्होंने कहा। उन्हें बॉल रूम डांसिंग और कम कपड़ों वाली औरतें पसंद नहीं आईं; उन्हें यह ठीक नहीं लगा। दोस्तों ने शिकायत की कि उन्होंने कोई विदेशी फिल्म देखी है, जो भारत में नहीं बनी थी। इसलिए उन्होंने ‘राम राज्य’ देखी, जो एक आदर्श नैतिक राजा की पुरानी कहानी पर आधारित थी। उन्हें आराम देने के लिए, किसी ने गांधीजी को पर्ल एस. बक की लिखी एक मज़ेदार, बच्चों की किताब पढ़कर सुनाई, जिसका नाम था ‘द चाइनीज चिल्ड्रन नेक्स्ट डोर

अंग्रेजी दवा नहीं लेना चाहते थे

गांधीजी की देखभाल करने में अनेक गण्यमान्य चिकित्सक रहे हैं, जैसे डॉ. विधानचंद्र राय, डॉ. गिल्डर, डॉ. गज्जर और डॉ. जीवाराज मेहता। हमेशा की तरह, उन्होंने अपने डॉक्टरों से बहस की, और ज़ोर दिया कि सबसे अच्छा इलाज लिक्विड डाइट और लंबे समय तक उपवास है। डॉक्‍टर बिधान चंद रॉय महात्‍मा गांधी के दोस्‍त और उनके निजी डॉक्‍टर थे। गांधीजी अंग्रेजी दवा नहीं लेना चाहते थे। उन्‍होंने कहा, "मैं आपकी दवा क्‍यों लूं? क्‍या आप मेरे 40 करोड़ देशवासियों का मुफ्त में इलाज करते हैं?" इसपर डॉ रॉय ने जवाब दिया, "लेकिन महात्‍माजी, आपको क्‍या लगता है कि मैं किसे ठीक करने आया हूं। मैं यहां मोहनदास करमचंद गांधी को ठीक करने नहीं, बल्कि उस इंसान को ठीक करने आया हूं जो मेरे लिए 40 करोड़ लोगों का नुमाइंदा है। क्‍योंकि मुझे लगता है कि अगर वो मर गया तो 40 करोड़ लोग मर जाएंगे और अगर वो जीता है जो 40 करोड़ लोग जिएंगे।" गांधीजी के पास डॉक्‍टर साहब की बात मानने के अलावा दूसरा रास्‍ता नहीं बचा था। थोड़ी देर के बाद गांधीजी ने कहा, "ठीक है डॉ बिधान, आप जीते; तो मुझे खुद को आपकी दया के भरोसे छोड़ना होगा। जो दवा आपको ठीक लगे, दे दीजिए; मैं ले लूंगा। लेकिन मैं सोचता हूं कि आपने मेडिसिन के बजाय लॉ क्‍यों नहीं पढ़ा। आपमें बारीकियां पकड़ने का जबर्दस्‍त हुनर है।" डॉ रॉय ने जवाब दिया, "ईश्‍वर ने मुझे डॉक्‍टर बनाया क्‍योंकि उसे पता था कि एक दिन मुझे उसके सबसे प्‍यारे बेटे, हमारे महात्‍मा गांधी का इलाज करना का सौभाग्‍य मिलेगा।" गांधीजी ने जवाब दिया, "तुम बातें एकदम वकीलों की तरह कर रहे हो।"

डॉक्टरी जांच से खून में परजीवी कीटाणुओं और आँतों में एमीबियोसिस के होने का पता चला था। बड़ी मुश्किल से डॉक्टर उन्हें समझा पाए कि कुनैन मलेरिया के लिए एक अचूक दवा है। उन्होंने दो दिनों में बत्तीस ग्रेन कुनैन ली; उन्हें अच्छी नींद आई, उनका बुखार कम हो गया, और जल्द ही उनके खून में मलेरिया का कोई निशान नहीं बचा। डॉक्टर गांधीजी का इलाज कर रहे थे और वह खुद भी खामोशी से अपना इलाज कर रहे थे, जिसे वह 'मेडिकल साइलेंस' कहते थे। 29 मई को गांधीजी ने अपनी पूरी "मेडिकल चुप्पी" तोड़ी और दिन में बीस घंटे चुप रहने का फैसला किया, वे सिर्फ शाम चार से आठ बजे के बीच ही बोलते थे, जो प्रार्थना सभा का समय होता था। सख्त अनुशासन और सेहत की अच्छी देखभाल की वजह से वे 15 जून को पूना जा पाए।

वायसराय का भारत छोड़ो प्रस्ताव वापस लेने का दबाव

सरकार चाहती थी कि चूंकि गांधीजी को जेल से छोड़ दिया गया है, तो वे ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव वापस ले लें। गांधीजी की मांग थी कि पहले सरकार को कांग्रेस के सभी गिरफ्तार नेताओं को रिहा करना चाहिए तभी अच्छे माहौल में आगे की बात हो पाएगी। गांधीजी ने अपने जेल से छूटने के छह सप्ताह के भीतर और पूरी तरह स्वास्थ्य लाभ किए बिना ही समझौते के लिए वायसराय को मनाने के प्रयास शुरू कर दिए। 17 जून को गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड वेवल को पत्र लिखा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी जेल में थी, उनसे परामर्श किए बिना कांग्रेस पार्टी के प्रस्ताव को ख़ारिज़ नहीं कर सकता। इसलिए कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों से उन्हें भेंट करने दी जाए। वायसराय ने इस निवेदन को ठुकरा दिया। उत्तर दिया, इसमें कोई फायदा नहीं दिखता। साथ ही उसने कह दिया, मैं भी आपसे मिलना नहीं चाहूंगा। हमारे दृष्टिकोण में जो बुनियादी अंतर है उसे देखते हुए हम दोनों के मिलने का कोई अर्थ नहीं होगा और उससे केवल ऐसी आशाएं ही पैदा होंगी जो पूरी नहीं होंगी। गांधीजी ने जिस दरवाज़े को खटखटाया था उसे बन्द कर दिया गया और उसपर मज़बूत ताला भी लगा दिया गया। वेवेल ने पहले भी अपनी नीति स्पष्ट कर दी थी, किसी भी नेता को जो नज़रबंदी में हैं, वह यह निश्चय करने में कि वह भारत छोडो प्रस्ताव वापस ले या नहीं अपनी अन्तरात्मा के सिवा और किसी से सलाह लेने की ज़रूरत नहीं है। गांधीजी ने इसके जवाब में कहा था, जो प्रस्ताव साथ मिलकर, लंबी चर्चा के बाद पास किया गया हो, उसे सम्मिलित विचार के बाद ही वापस लिया जा सकता है। वायसराय ने उन्हें यह भी कहा कि यदि वह अहमदनगर क़िले का ताला खुलवाना चाहते हैं, जहां कांग्रेस कार्यकारिणी के लगभग सदस्य बंदी थे, तो आंदोलन के नेता के रूप  में तो वे भारत छोड़ो प्रस्ताव वापस ले सकते हैं।

उन्हें शक था कि अंग्रेजों से भारत के हित में कोई समझौता हो सकता है, क्योंकि चर्चिल का अभी भी ब्रिटिश सरकार पर नियंत्रण था और इसलिए भारत के भाग्य पर भी उसका ही नियंत्रण था। गांधीजी ने घोषणा की, "मिस्टर चर्चिल समझौता नहीं चाहते हैं। वह मुझे कुचलना चाहते हैं।"

पहले भी उन्होंने अंतरात्मा की आवाज़ पर सविनय अवज्ञा वापस लिया था। लेकिन गांधीजी लाखों लोगों की श्रद्धा के विरुद्ध जाने को तैयार नहीं थे, जिन्होंने उनकी प्रेरणा से उनके नेतृत्व में करो या मरो की प्रतिज्ञा ली थी। दूसरी बात यह थी कि पहले के आन्दोलनों में, उनके नेता के रूप में गांधीजी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने का अधिकार दिया गया था। भारत छोड़ो प्रस्ताव में इसकी गुंजाइश नहीं रखी गई थी। नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद प्रत्येक स्त्री या पुरुष अपना नेता ख़ुद बनकर अपनी समझ के अनुसार करो या मरो की प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया गया था।

तीसरा विकल्प

एक तीसरा विकल्प यह था कि मुस्लिम लीग से समझौता करके ब्रिटिश सरकार के सामने एक संयुक्त राष्ट्रीय मांग पेश की जाए। गांधीजी हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। लेकिन वह मुस्लिम नेताओं को अपनी ओर लाने के जितने प्रयास करते उनकी मांगें उतनी ही बढ़ती जातीं। विरोधाभास तो यह था कि मुस्लिमों के दिल जीतने के अपने प्रयासों में उन्होंने बहुत से अपने हिंदू भाइयों को भी बेगाना बना लिया था। गांधीजी को पता था कि ब्रिटिश सरकार हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग रखने और इस अलगाव का फ़ायदा उठाकर भारत में अपना शासन बनाए रखने के लिए मुस्लिम मांगों को हवा दे रही थी।

सरकार पूर्ण समर्पण चाहती थी

चर्चिल सरकार पूर्ण समर्पण चाहती थी। गांधीजी के लिए तो यह सवाल उठता ही नहीं था। उद्योगपतियों की एक मंडली को गांधीजी ने बताया था, सरकार हमें नीचा दिखाना चाहती है। लेकिन मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सरकार के साथ उसकी शर्तों पर किसी बात में कोई सहयोग नहीं होगा।

चर्चिल ने संसद में बयान दिया, मैं हिंद के इस नंगे फ़क़ीर को कुचल डालूंगा। गांधीजी को जब यह बात मालूम हुई, तो उन्होंने चर्चिल को 17 जुलाई, 1944 को पत्र लिखा, आपने मुझ नंगे फ़क़ीर को कुचलना चाहा है, ऐसा सुनने में आया है। लंबे अरसे से मैं फ़क़ीर बनना चाह रहा हूं। नंगा बनना तो और भी दुष्कर है। चाहे आपने ऐसा चाहा न हो, तो भी आपके शब्द मेरे लिए स्तुतितुल्य हैं। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि एक फ़क़ीर पर श्रद्धा रखकर आपके और मेरे लोगों के माध्यम से संसार के लोगों के भले के लिए मेरा उपयोग कीजिए। इस पत्र का कोई उत्तर नहीं आया।

इस निराशाजनक स्थिति में गांधीजी ने दो काम किए। एक लोगों में नैतिक हिम्मत का संचार करना। दूसरे देशवासियों की बुराई जो दुनिया में फैलाई गई थी उसका निराकरण करना। हालाकि अवरोध बहुत था और मज़बूत दीवार खड़ी थी जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था, फिर भी गांधीजी ने लोगों की हिम्मत बंधाए रखी और कहा, सत्याग्रह में असफलता कभी नहीं होती। बुराई का विरोध करने का हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। मैं किसी असत्यपूर्ण या हिंसात्मक वस्तु का समर्थन नहीं कर सकता। अनुभव ने मेरे इस विश्वास को अटल बना दिया है कि हम सत्य और अहिंसा पर जितने दृढ़ रहे हैं, उतनी ही हमें सफलता मिली है। मुझमें जो भी शक्ति है वह सिर्फ़ इस कारण से है कि मैं सत्य और अहिंसा का पुजारी हूं। हम में से हर एक को इस समय क्या करना चाहिए, यह अत्यंत महत्त्व की बात है। अभी सविनय प्रतिरोध करने के लिए उपयुक्त मौक़ा है, तो भी मैं कांग्रेस के नाम पर ऐसा नहीं कर सकता। लेकिन याद रखिए कि अगस्त प्रस्ताव में यह कहा गया था कि मुख्य कांग्रेसियों के गिरफ़्तार होने पर प्रत्येक कांग्रेसी अपना नेता आप हो जाएगा। इसलिए मेरी समझ में नहीं आता कि निराशा के लिए क्या कारण हो सकता है। क्या इसीलिए कि हमने जितने समय में अपना ध्येय सिद्ध करने की आशा रखी थी उसके भीतर हम अपने ध्येय तक नहीं पहुंच सके? भारी से भारी कठिनाइयों के बीच प्रयत्न करते रहना मनुष्य का काम है। सफलता ईश्वर के हाथ की बात है। सत्याग्रह के शब्दकोश में निराशा जैसा शब्द ही नहीं है। ठीक है कि बुराई की ताक़त हमें चारों ओर से घेरे हुए है। परन्तु हताशा या निराशा के लिए यह कोई कारण नहीं है। हमारे पास बुराई के साथ अहिंसक असहयोग करने की सुनहरी कार्य-पद्धति मौज़ूद है। हमें दीर्घ प्रयत्न करना पड सकता है। परन्तु मैं अनुभव से यह कह सकता हूं कि वह हमारी शक्ति से बाहर कभी नहीं होता। जिसने ध्येय के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया हो, उसके लिए कौन-सा बोझ अत्यंत भारी हो सकता है। निराशा का मूल हमारी अपनी ही कमज़ोरियों और अश्रद्धा में होता है। अहिंसा एक शक्तिशाली शस्त्र है। अमल में वह सविनय आज्ञा भंग और असहयोग का रूप ग्रहण करता है। सविनय अवज्ञा भंग बहुत ही सबल शस्त्र है। अहिंसात्मक असहयोग तो प्रत्येक मानव कर सकता है। जब नहीं कहना धर्म हो जाए तो हमें दृढ़ता से नहीं कहना चाहिए।

कांग्रेस ने अपने रचनात्मक कार्यक्रम को जोर शोर से आगे बढाना शुरू कर दिया। सरकार ने कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम में बाधा तो नहीं डाली लेकिन वह गाांधी द्वारा चलाए जा रहे रचनात्मक कार्यक्रम को भी शक की नजर से देखते हुए इसकी जासूसी करती थी कि कहीं यह किसी और बड़े आंदोलन की तैयारी तो नहीं है।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

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