गांधी और गांधीवाद
430.
गांधीजी पर दूसरा जानलेवा हमला
73. गांधीजी पर जानलेवा हमला (पहला)
1944
देशवासियों की बुराई
जो दुनिया में फैलाई गई थी उसका निराकरण करने के लिए गांधीजी विदेशी पत्रकारों से
मुलाक़ात करने लगे और उनके प्रश्नों का उत्तर देने लगे। एक महीने जुहू में रहने के
बाद गांधीजी को स्वास्थ्य लाभ के लिए पूना के पास एक पहाड़ी स्थान पंचगनी ले जा गया।
2 जुलाई, 1944 को वह पंचगनी नाम के
हिल-स्टेशन पर पहुँचे। वहां वे दिलख़ुश बंगला में ठहरे थे। उस समय कांग्रेस के
अधिकांश प्रमुख नेता जेल में बंद थे।
उसी दिन, टाइम्स ऑफ इंडिया ने वह इंटरव्यू छापा जो कहा जाता है कि
गांधीजी ने न्यूज़ क्रॉनिकल के एक रिपोर्टर मिस्टर स्टीवर्ट गेल्डर को दिया था। जब
गांधीजी ने इसे पढ़ा तो उन्हें लगा कि इस इंटरव्यू के तथ्यों और
सही टेक्स्ट को लोगों के सामने लाना ज़रूरी है। गांधीजी ने कहा, “मिस्टर गेल्डर को दिए इंटरव्यू
का समय से पहले पब्लिश होने से कांग्रेसियों के मन में कुछ कन्फ्यूजन पैदा हो गया
है। मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि मेरे अधिकार खत्म होने का कांग्रेस की
सामान्य गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस के नाम पर कोई भी जो काम
नहीं कर सकता, वह है बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन, मैं इस समय अपनी
पर्सनल कैपेसिटी में भी इसे शुरू नहीं कर सकता।”
जिन्ना और गांधीजी में 9 जून, 1944 से तीन सप्ताह तक सतत भेंट वार्ता,
चर्चा और पत्र-व्यवहार चलते रहे। ब्रिटिश सत्ता को छोड़कर हर कोई राजनीतिक गतिरोध
से थक चुका था। जिन्ना पर लीग के अंदर और बाहर दोनों तरफ से कांग्रेस के साथ
समझौता करने का दबाव बढ़ रहा था ताकि आज़ादी का रास्ता साफ हो सके। देश में बड़े
पैमाने पर उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं कि इन बातचीत से कुछ ठोस नतीजा निकलेगा।
17 जुलाई का को गांधीजी ने जिन्ना
को लिखा, "भाई जिन्ना—एक समय था जब
मैं आपको मातृभाषा में बोलने के लिए मना लेता था। आज, मैं हिम्मत करके आपको मातृभाषा में लिख रहा हूँ। मैंने
जेल से भेजे गए अपने न्योते में आपके और मेरे बीच मुलाकात का सुझाव पहले ही दिया
था। जेल से रिहा होने के बाद मैंने अभी तक आपको नहीं लिखा है। आज, मुझे ऐसा करने की प्रेरणा मिली है। जब भी आप चाहें, हम मिलें। मुझे इस्लाम या भारतीय मुसलमानों का दुश्मन
न समझें। मैं हमेशा आपका और इंसानियत का सेवक और दोस्त रहा हूँ। मुझे निराश न
करें।" 24 जुलाई को एक असाधारण बयान में जिन्ना ने गांधीजी को "महात्मा"
कहा और राजनीतिक शांति की अवधि के लिए अपील की। "यह सबकी इच्छा थी कि हम
मिलें। अब जब हम मिलने जा रहे हैं, तो हमारी मदद करें। हम आमने-सामने आ रहे हैं। अतीत को
भूल जाओ।"
गांधीजी की जिन्ना के साथ भारत के
बंटवारे पर चर्चा करने की तैयारी की कड़ी आलोचना हुई। यहां तक कि अहमदनगर किले
में कैद वर्किंग कमेटी के कुछ सदस्य भी गांधीजी के इस नए कदम से नाराज़ थे। आलोचकों
ने कहा कि गांधीजी ने अब जिन्ना को बचा लिया था और उनकी स्थिति को और मज़बूत कर
दिया था। पंचगनी में गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में हिंदू महासभा से जुड़े युवाओं
ने कांग्रेस विरोधी और पाकिस्तान विरोधी नारे लगाकर नाराज़गी जताई।
गांधीजी ने 30 जुलाई को पंचगनी में
कहा, "फॉर्मूले का प्रकाशन सांप्रदायिक
समझौते के लिए बातचीत के सिलसिले में किया गया है। यह कोई बेकार की कोशिश नहीं है।
इसे पूरी ईमानदारी से सोचा गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस पर जो आलोचना की जा
रही है, जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, वह पूर्वाग्रह या फॉर्मूले के लापरवाह अध्ययन के कारण
की गई है। न ही यह किसी पार्टी की ओर से कोई प्रस्ताव है। यह देश के दो जीवन भर के
सेवकों का सांप्रदायिक उलझन को सुलझाने की दिशा में एक योगदान है, जिसे अब तक सुलझाया नहीं जा सका है। राजाजी फॉर्मूला
देश प्रेमियों की मदद के लिए है। यह सबसे अच्छा है जो हम सोच सकते थे, लेकिन इसमें संशोधन किया जा सकता है, जैसे इसे अस्वीकार या स्वीकार किया जा सकता है।"
गांधी-जिन्ना की भेंट वार्ता की
घोषणा से हिंदुओं का एक तबका नाराज़ हो गया, खासकर हिंदू महासभा के सदस्य। कट्टरपंथी नौजवानों के
एक ग्रुप ने मीटिंग को होने से रोकने का फैसला किया। गांधीजी को जिन्ना के पास
जाने से रोकने के लिए वे बल प्रयोग तक पर उतारू थे। उस ग्रुप के लीडर ने अचानक कह
दिया था कि यह सिर्फ पहला कदम है और, अगर ज़रूरत पड़ी, तो बापू को जिन्ना से मिलने जाने से रोकने के लिए
ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा। गांधीजी को झोपड़ी से बाहर जाने से शारीरिक रूप से रोकने
की तैयारी थी, और झोपड़ी से बाहर निकलने वाले
तीनों रास्तों पर पिकेट लगा दिए। पुलिस को सूचना थी कि वे कोई बड़ी गड़बड़ करने
वाले हैं, और इसलिए पुलिस कार्रवाई के लिए
तैयार थी।
जुलाई 1944 में 18-20 लोगों का एक दल बस से पूना से
पंचगनी आया और वे दिन भर के लिए धरने पर बैठ गए। जब गांधीजी को इस धरने की बात
मालूम हुई, तो उन्होंने ग्रुप के नेता को चर्चा के लिए बुलाया, लेकिन उन्होंने
गांधीजी से मिलने से मना कर दिया। अपने प्रदर्शन के दौरान उन्होंने घोषणा की कि वे
गांधीजी को जिन्ना से मिलने नहीं जाने देंगे। वे बल पूर्वक उनको रोकेंगे। शाम की
प्रार्थना सभा में धरना कर रहे लोगों में से दो कार्यकर्ता काफी उग्र और उत्तेजित
थे। उनमें से एक छुरा लेकर गांधीजी की तरफ़ दौड़ा था। दूसरा गांधीजी के ख़िलाफ़ नारे
लगा रहा था। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। पुलिस अधिकारी ने मज़ाक़ में कहा, “गांधीजी का विरोध कर पकड़े गए हो,
तो तुम लोग भी देशप्रेमी और शहीद कहलाए जाओगे।” उस युवक ने जवाब दिया, “नहीं, अभी नहीं। गांधी की हत्या कर
देंगे, तब शहीद बन जाएंगे।” पुलिस ने फिर मज़ाक़ में कहा, “यह सब अपने नेताओं पर क्यों नहीं
छोड़ देते? तुम्हारे नेता सावरकर हैं, वे इस काम को कर डालें।” उस युवक ने जवाब दिया, “इतने बड़े सम्मान के लायक़ गांधी
नहीं हैं। उनको समाप्त करने के लिए हमारा यह जमादार ही काफ़ी है।” जिस साथी को वह जमादार कह रहा था,
छूरा रखने वाला वह शख्स नाथूराम विनायक गोडसे था और वह ख़ुद नारायण आप्टे था। साढ़े
तीन साल बाद उसकी यह बात सच हो गई। गांधीजी ने गोडसे से कहा, हमारे साथ सात-आठ दिन
बिताओ, ताकि हम तुम्हारे विचार को ठीक से समझ सकें। गोडसे ने गांधीजी के निमंत्रण
को अस्वीकार कर दिया। गांधीजी ने उन्हें स्वतंत्र हो कर चले जाने दिया। पूना से
पंचगनी के लिए चलते समय गोडसे ने अपने एक पत्रकार मित्र जोगलेकर (अग्रणी का
संवाददाता) को यह बात कही थी कि जल्द ही तुम्हें पंचगनी से गांधीजी से संबंधित एक
अच्छी ख़बर सुनने को मिलेगी। सतारा के भिल्लारे गुरुजी, जिन्होंने नाथूराम को पकड़ा
था, का कहना था कि जो ग्रुप पूना से आया था उसमें विष्णु करकरे, थत्ते, बाडगे और
गोपाल गोडसे भी थे।
वहां पर गांधीजी ने ‘न्यूज़ क्रॉनिकल’ के पत्रकार स्टुअर्ट
गेल्डर को साक्षात्कार दिया। उन्होंने अंग्रेज़ों के मन में उत्पन्न हर अविश्वास का
खुले मन से जवाब दिया। उन्होंने कहा, “मैं सदा अंग्रेज़ों का
मित्र रहा हूं और आज भी हूं। इसलिए जब तक कि कोई बहुत गंभीर कारण न हो, तब तक मैं
युद्ध काल में सविनय आज्ञा भंग के शस्त्र का कभी भी उपयोग नहीं कर सकता।
कार्यसमिति से बिना बात किए भी और बिना कांग्रेस के दिए अधिकार के भी मैं चाहूं,
तो आम लोगों पर जो मेरा प्रभाव बना है, उसके बल पर किसी भी दिन सविनय आज्ञा भंग
आरंभ कर सकता हूं। परन्तु यदि मैं ऐसा करूं तो उसका नतीजा ब्रिटिश सरकार को परेशान
करना होगा। यह कभी मेरा ध्येय नहीं हो सकता। ... यदि राष्ट्रीय सरकार बनी, तो
कांग्रेस उसमें शरीक़ होगी और युद्ध प्रयत्नों में मदद देगी। ऐसी स्थिति में चूंकि
मैं शांति प्रेमी हूं, स्वाधीनता का आश्वासन मिल जाने के बाद मैं कांग्रेस के
सलाहकार का काम बंद कर दूंगा। मैं राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध नहीं करूंगा। बात
परस्पर विश्वास की है। यदि परस्पर विश्वास हो तो कोई कठिनाई नहीं होगी। अगर कोई
कठिनाई सामने आई भी तो उसे आसानी से दूर कर लिया जाएगा। विश्वास न हो तो काम नहीं
हो सकता। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि वायसराय की राजनीतिक क्षेत्र में कोई
सत्ता महीं है। चर्चिल समझौता नहीं चाहते। वे तो मुझे कुचल देना चाहते हैं। इसमें
मेरे लिए ख़ुशी की और उनके लिए अफसोस की बात यही है कि सत्याग्रही को कोई कुचल नहीं
सकता। कारण वह अपने शरीर का सहर्ष बलिदान देता है और इस प्रकार अपनी आत्मा को
मुक्त करता है।”
गांधीजी अच्छी तरह से
जानते थे कि भारत और ब्रिटेन के संबंधों को बिगाड़ने वाली सबसे बड़ी चीज़ अविश्वास
है। उन्होंने अविश्वास को मिटाने के लिए तमाम साधनों का उपयोग करना शुरू कर दिया।
अख़बारों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात कर स्थिति स्पष्ट करते। “मैं एक सत्याग्रही
हूं। भारत को प्रेम करता हूं। हमने ख़ुद स्वतंत्रता के लिए ‘करो या मरो’ की प्रतिज्ञा ली है
और राष्ट्र की जनता से लिवाई है। भारत की यह स्वतंत्रता लोकतंत्र की विश्व-व्यापी
लड़ाई का ही एक अंग है, जिसकी रक्षा के लिए यह युद्ध लड़ने का दावा किया जाता है।
अतः ‘भात छोड़ो’ का सूत्र मित्र राष्ट्रों
के युद्ध-प्रयत्न में बाधक हो ही नहीं सकता। ऐसी स्थिति में मैं समझ नहीं पाता कि
भारत के राजनीतिक प्रश्न के हल की पूर्व शर्त के रूप में ‘भारत छोड़ो’ का वापस खींचने का
आग्रह किसलिए किया जाता है।”
हर गोरा पत्रकार उनसे
मिलने के बाद उनका भक्त हो जाता। उनकी मांग के औचित्य को अपने अख़बार में रेखांकित
करता। इस तरह गांधीजी ने उन परिस्थितियों में जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी के नेतागण
अहमदनगर के क़िले में नज़रबंद थे, दूषित वातावरण को सुधार कर समाधान और सद्भावनाओं
की आवोहवा तैयार की। यह अत्यंत नाज़ुक और महत्त्वपूर्ण काम था। संसार के
लब्धप्रतिष्ठित पत्रकारों के सामने प्रजातंत्र की मांग को तर्क पूर्वक स्पष्ट करना
और अन्य देशों की गलतफ़हमी दूर करना। उन देशों ने भी चर्चिल सरकार पर भारत के पक्ष
में प्रभाव डालना शुरू कर दिया।
देश की मनःस्थिति को भी सबल करने की ज़रूरत थी। उन्होंने
देशवासियों को प्रोत्साहन और आत्मबल देने का काम भी किया। सत्याग्रही जेल से छूटकर
आते और सीधे बापू से मिलते। समस्याओं पर चर्चा होती। उन्हें रचनात्मक कार्य के लिए
प्रोत्साहित किया जाता।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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