गांधी और गांधीवाद
418. माता कस्तूरबा की
जय
1 मार्च 1941 की घटना
गांधीजी के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल गांधी को बचपन से गांधीजी से शिकायत रहती थी
कि गांधीजी ने उनकी शिक्षा का ठीक से प्रबंध नहीं किया। धीरे-धीरे उनका स्वभाव
गांधीजी के साथ बग़ावत का हो गया था। पत्नी गुलाबबहन की मृत्यु के बाद तो वह न
सिर्फ़ और भी अधिक बाग़ी हो गए थे बल्कि रास्ते से भी भटक गए थे। बुरी संगत में आ
जाने के कारण वे कुमार्ग पर भी चले गए थे। बा को इसका बहुत ही दुख रहता था।
उन्होंने घर परिवार का त्याग कर दिया था। बा और बापू से कोई सम्पर्क नहीं रखते थे।
यह भी ख़बर आई कि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। बापू के प्रति जो भी
नफ़रत की भावना उन्होंने दिल में पाल रखा हो, बा के लिए उनके हृदय में कोमल भावना
थी।
बा और बापू इलाहाबाद से वर्धा के लिए ट्रेन से सफ़र कर रहे थे। रात होते ही
जबलपुर एक्सप्रेस ट्रेन कटनी स्टेशन पर रुकी। वह ट्रेन का सामान्य स्टोपेज था। एक
ज़ोरदार आवाज़ सुनाई दी, “माता कस्तूरबा की
जय!”
बा ने ग़ौर किया। यह तो हरिलाल की आवाज़ है। देखा खिड़की पास वही तो है। उनका
शरीर जर्जर हो चुका था। सामने के दांत गिर चुके थे। सिर के बाल सफेद हो गए थे। फटे
कपड़ों की जेब से निकालकर वह बोल रहा था, “बा, यह नारंगी
लो!”
बा ने पूछा, “कहां से ख़रीदा है?”
हरिलाल ने जवाब दिया, “कहीं से नहीं!
मांग कर लाया हूं, तुम्हारे लिए। अपने प्रेम के कारण।”
बा ने फल ले लिया। लेकिन हरिलाल के चेहरे पर अस्वस्त होने के भाव नहीं आए।
उन्होंने पूछ ही लिया, “बा, यह सिर्फ़
तुम्हारे लिए है। अगर तुम न खाओगी तो मुझे वापस दे दो।”
बा ने प्यार से कहा, “ठीक है, हम
बांटकर खाएंगे।,, फिर उन्होंने पूछा तुम कैसे हो? क्या तुमने अपने वंश कुल के बारे
में भी सोचा है? आ जाओ हमारे पास।”
हरिलाल के उत्तर में चतुराई थी, “भूल जाओ यह सब।
मैं अपनी वर्तमान स्थिति से ऊपर नहीं उठ सकता।”
गांधीजी अब तक सब सुन रहे थे। उन्हें पता लग गया था कि वह फल हरिलाल एक फल
विक्रेता से मांगकर लाए थे। उन्होंने कहा, “इस लूट के माल
में पितृअंश भी है तो मुझे भी दे दो।”
हरिलाल ने रुखाई से जवाब दिया, “नहीं, यह सिर्फ़
बा के लिए है। आपसे मुझे इतना ही कहना है कि बा के पुण्य के कारण ही आप इतने बड़े
हुए हैं, इस बात को भूलिएगा मत।”
बा तो मां थी। उनकी आंखों से आंसू छलक गए।
ट्रेन के छूटने का समय हो चुका था। गार्ड ने सीटी दी। गाड़ी चल पड़ी। सहसा बा को
अहसास हुआ कि बदले में उन्होंने अपने दर-दर भटकते हुए बेटे को कुछ भी नहीं दिया।
तब तक तो गाड़ी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। पर तब भी उनको सुनाई दे रहा था – “माता कस्तूरबा की जय!”
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मनोज कुमार
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संदर्भ : यहाँ पर
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