मंगलवार, 6 जनवरी 2026

419. सेठ जमनालाल बजाज की मृत्यु

गांधी और गांधीवाद

419. सेठ जमनालाल बजाज की मृत्यु


1942

सेठ जमनालाल बजाज (जन्म- 4 नवम्बर, 1889, राजस्थान; मृत्यु- 11 फ़रवरी1942वर्धा) गांधीजी के नवरत्नों में से एक थे। गांधीजी की जमनालाल बजाज से भेंट बड़े ही नाटकीय अंदाज में हुई थी। 1920 में तीस साल का एक नवयुवक गांधीजी के पास आकर खड़ा हो गया और उनसे बोला, आपके पास मेरी एक मांग है। गांधीजी ने कहा, मांगो-मांगो, मुझसे वह मांग पूरी हो सकती हो तो ज़रूर पूरी करूंगा। युवक ने कहा, आप मुझे अपने देवदास की जगह पर समझें। गांधीजी ने कहा, अच्छा, मान लिया। लेकिन इसमें आपने क्या मांगा? वास्तव में इसमें आपने दिया और मैंने प्राप्त किया, ऐसा हुआ है। वह युवक जमनालाल बजाज था। वह नवयुवक गांधीजी के पुत्र की तरह उनके साथ रहा।

जयपुरराजस्थान के एक छोटे से गांव काशी का वास में गरीब कनीराम किसान के यहाँ जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवम्बर, 1889 को हुआ था।  वे वर्धा के एक बड़े सेठ बच्छराज बजाज के यहां पांच वर्ष की आयु में गोद लिये गये थे। विलासिता और ऐश्वर्य का वातावरण इस बालक को दूषित नहीं कर पाया, क्योंकि उनका झुकाव तो बचपन से अध्यात्म की ओर था। बच्छराज बजाज के संरक्षण में जमनालाल जी ने व्यवसाय के गुर सीखे और अपनी मेहनत से अत्यंत सफल व्यापारी बने। परंतु उन्होंने व्यापार को केवल धनार्जन का साधन नहीं, बल्कि देश सेवा का माध्यम माना। जमनालाल बजाज ने खादी और स्वदेशी अपनाया और अपने बेशकीमती वस्त्रों की होली जलार्इ। जमनालाल जी ने अपने बच्चों को किसी पब्लिक स्कूल में नहीं भेजा, बल्कि उन्हें स्वेच्छापूर्वक वर्धा में आरम्भ किये गये विनोबा के सत्याग्रह आश्रम में भेजा। उन्होंने बजाज समूह (Bajaj Group) की स्थापना की, जो आज भी उनके आदर्शों पर आधारित है।

उन्होंने वर्धा में ‘सत्याग्रह आश्रम’ की स्थापना की थी। इसके अलावा गौ सेवा संघ, गांधी सेवा संघ, सस्ता साहित्य मण्डल आदि संस्थाओं की स्थापना भी उनके द्वारा की गई। 1935 में गांधीजी ने 'अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ' की स्थापना की। इस नये संघ के लिए जमनालाल बजाज ने बडी खुशी से अपना विशाल बगीचा सौंप दिया, जिसका नाम गांधीजी ने स्वर्गीय मगनलाल गांधी के नाम पर 'मगनाडी' रखा।  1936 में 'अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन', नागपुर के बाद तुरंत ही जमनालाल जी ने वर्धा में देश के पश्चिम और पूर्व के प्रांतों में हिंदी प्रचार के लिए, 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' की स्थापना की तथा उसके लिए राशि इकट्ठा की। वे देश के प्रथम नेता थे, जिन्होंने वर्धा में अपने पूर्वजों के 'लक्ष्मीनारायण मंदिर' के द्वार 1928 में ही अछूतों के लिए खोल दिये थे। 

जमनालाल जी गांधीजी से मिलने आने वालों अतिथियों का बड़े प्रेम पूर्वक स्वागत-सत्कार किया करते थे। कार्यकर्ताओं में शामिल जवान लड़के-लड़कियों की शादियां तय कराने में उनका कोई मेल नहीं था। इसी कारण गांधीजी उन्हें स्नेह से "शादी काका" भी कहते थे। वह वर्धा और उसके आसपास के दर्जनों संस्थाओं के संस्थापक और पोषक थे। आदमी की सही पहचान करने में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। विनोबा जैसे व्यक्ति की पहचान कर उन्होंने ही गांधीजी को कहा था कि वे विनोबा जी को अपने राजनीतिक मामलों में सलाहकार बना लें। दादा धर्माधिकारी का गांधीजी के निजी मंत्री के रूप में चुनाव उन्होंने ही किया था। गांधीजी को व्यावहारिक सलाह देने के लिए उन्होंने श्रीकृष्णदास जी का चुनाव किया था। किशोर मशरूवाला को भी उन्होंने गांधीजी के सहयोगी के रूप में चयन किया था। गांधीजी के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने अपनी सारी संपत्ति राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य थे और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के खजांची थे। मृत्यु के कुछ दिनों पहले उन्होंने गांधीजी के सामने राजनीति से मुक्त होकर रचनात्मक काम में लग जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। गांधीजी ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उनके लिए गोसेवा का काम चुना था। 11 फरवरी, 1942 को दोपहर 2 बजे गांधीजी को फोन पर खबर मिली कि जमनालाल बीमार पड़ गए हैं, उनका ब्लड प्रेशर 250/115 हो गया है और वे बेहोश हैं। जमनालाल बजाज की बीमारी की ख़बर सुनते ही गांधीजी सेवाग्राम से वर्धा तुरंत कार से वर्धा में उनके पैतृक निवास आने के लिए निकल पड़े। गांधीजी रक्तचाप की अपनी सर्पगंधा नामक दवा भी साथ लाए थे। लेकिन गांधीजी के पहुंचने के पहले ही महान परोपकारी जमनालाल जी के प्राण पखेड़ू उड़ गए थे। उनका सिर अपनी गोद में लेकर गांधीजी कहने लगे, भाई, तू मेरा पांचवां बेटा बना था, तो मुझसे पहले जाना तो तेरा धर्म नहीं था।

शोक संदेश में गांधीजी ने लिखा: "जमनालाल बजाज के रूप में मौत ने एक महान इंसान को हमसे छीन लिया है। जब भी मैंने अमीर लोगों के बारे में लिखा कि वे आम भलाई के लिए अपनी दौलत के ट्रस्टी बनें, तो मेरे मन में हमेशा मुख्य रूप से यही व्यापारी राजकुमार थे। अगर उनकी ट्रस्टीशिप आदर्श तक नहीं पहुंची, तो इसमें उनकी गलती नहीं थी। मैंने जानबूझकर उन्हें रोका था। मैं नहीं चाहता था कि वे अपने जोश में कोई ऐसा कदम उठाएं जिसका उन्हें बाद में पछतावा हो। उनकी सादगी उनकी अपनी थी। उन्होंने अपने लिए जो भी घर बनाया, वह धर्मशाला बन गया। एक सत्याग्रही के तौर पर उनका योगदान सबसे ऊंचे दर्जे का था। राजनीतिक चर्चाओं में वे अपनी बात पर कायम रहते थे। उनके फैसले सही होते थे। त्याग के काम में, उनका आखिरी काम सबसे बढ़कर था। वे एक ऐसा रचनात्मक काम करना चाहते थे जिसमें वे अपनी बाकी ज़िंदगी लगा सकें और जिसमें वे अपनी सभी क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकें। यह भारत की पशु धन की रक्षा करना था, जो गाय में दिखता है। उन्होंने पूरी लगन और जोश के साथ इस काम में खुद को झोंक दिया, ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उनकी उदारता में जाति, धर्म या रंग का कोई भेदभाव नहीं था। देश ने अपने सबसे बहादुर सेवकों में से एक को खो दिया है। मैंने पहले कभी इतना अकेला महसूस नहीं किया, सिवाय तब जब चौदह साल पहले मगनलाल को मुझसे छीन लिया गया था। मेरा शायद ही कोई ऐसा काम हो जिसमें मुझे उनका पूरा सहयोग न मिला हो और जो सबसे ज़्यादा कीमती साबित न हुआ हो।"

उनका दाह संस्कार वर्धा से दो मील दूर गोपुरी में ‘शांति-कुटीर’ नाम के उनके तत्कालीन निवासस्थान के सामने के मैदान में किया गया। इन दिनों वे बजाजवाड़ी का अपना बंगला छोड़कर शांति-कुटीर में रहने लगे थे।

उनकी पत्नी जानकीदेवी बजाज को कोई समझा नहीं पा रहा था और एक पल के लिए उन पर सती होने का विचार हावी हो गया, जिसमें वह अपने पति के शरीर के साथ खुद को जला लेतीं। गांधीजी को उन्हें ऐसा करने से रोकने में बहुत मुश्किल हुई। गांधीजी ने उनको सलाह दी कि जमनालाल गोसेवा का जो काम अधूरा छोड़ गए हैं उसे वे पूरा करें। जानकीदेवी मान गईं। उन्होंने न सिर्फ अपने अकाउंट में जमा सारा पैसा — लगभग 2 ½ लाख रुपये — दे दिया, बल्कि उन्होंने जमनालाल बजाज के पहले प्यार, गोसेवा संघ के काम के लिए अपना सारा समय और ऊर्जा समर्पित करने का प्रण भी लिया। उनके उदाहरण का पालन करते हुए और गांधीजी के कहने पर, उनके बेटों ने भी, जिनके पास उनके पिता द्वारा सार्वजनिक कामों पर खर्च करने के लिए दिए गए लगभग 6 लाख रुपये थे, वह पूरी रकम गांधीजी को सौंप दी। इसके अलावा, उन्होंने जमनालाल द्वारा शुरू की गई प्रथा को जारी रखने का वादा किया, जिसके तहत हर साल कांग्रेसियों और राष्ट्रीय कार्य में लगे अन्य कार्यकर्ताओं की मेहमाननवाजी पर लगभग 2,000 रुपये खर्च किए जाते थे।

14 फरवरी को गांधीजी ने जमनालाल के लगभग 190 दोस्तों और सहकर्मियों को एक सर्कुलर लेटर भेजा, जिसमें उन्हें 20 फरवरी को एक मीटिंग के लिए बुलाया गया ताकि यह तय किया जा सके कि जमनालाल का काम कौन संभालेगा और कैसे। गांधीजी ने फिर उन कामों की क्रम के हिसाब से एक लिस्ट दी, जिनमें जमनालाल की खास दिलचस्पी थी। ये थे: (1) गोसेवा, (2) नई तालीम, (3) ग्राम उद्योग, (4) महिलाओं की सेवा, (5) हरिजन सेवा, (6) गांधी सेवा संघ, (7) खादी, (8) रियासतों की जनता का सम्मेलन, (9) हिंदुस्तानी का प्रचार, (10) सत्याग्रह आश्रम और गांवों की सेवा, और (11) मारवाड़ी एजुकेशन सोसाइटी, जिसकी स्थापना 1910 में हुई थी; और नवभारत विद्यालय और कॉलेज।

उनकी स्मृति में सामाजिक क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने के लिये 'जमनालाल बजाज पुरस्कार' की स्थापना की गयी है। जमनालाल बजाज को साधु-संतों का भी सान्निध्य प्राप्त था। रमण महर्षि के आश्रम में उनको काफी शांति मिलती थी। माता आनन्दमयी के साथ उनका हार्दिक संबंध था। जमनालाल जी के स्वर्गवास के बाद वह वर्धा आश्रम आयीं थीं। वहां से वह गांधीजी से मिलने सेवाग्राम गईं। अपनी बातचीत में वह सहज रूप से कह गईं, छह माह के भीतर और एक महापुरुष का निर्वाण होने वाला है। ठीक छह महीने बाद महादेव भाई स्वर्ग सिधारे थे!

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

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