राष्ट्रीय आन्दोलन
436.
आज़ाद हिंद फ़ौज
1945
नेताजी सुभाष चन्द्र
बोस की गिरफ़्तारी
विदेश में ब्रिटेन के विरुद्ध कड़ा संघर्ष ज़ारी रखने की
प्रेरणा मुख्यतः सुभाषचंद्र बोस के साहसिक अभियानों से मिली। द्वितीय युद्ध के
शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को जुलाई, 1940
में भारत सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया। उन्हें प्रेसीडेंसी जेल में रखा
गया। जेल में नेताजी ने अनशन आरंभ कर दिया। उनकी स्थिति बिगड़ने लगी। उनके ख़राब
स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें जेल से निकालकर एल्गिन रोड वाले मकान में नज़रबंद कर
दिया गया। 17 जनवरी, 1941 को नेताजी पुलिस की नज़रबंदी से भाग निकलने में क़ामयाब
हो गए।
नेताजी जर्मनी में
भारत छोड़कर वे अफ़गानिस्तान और रूस होते हुए बर्लिन (जर्मनी)
पहुंचे। वह धुरी-राष्ट्रों के सहयोग से भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त कर
भारत की आज़ादी का स्वप्न देख रहे थे। बर्लिन सरकार के सहयोग से उन्होंने बर्लिन
रेडियो से अंग्रेज़ विरोधी प्रचार आरंभ किया। उन्होंने जर्मनी में भारतीय
युद्धबंदियों के सहयोग से आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन का सुझाव रखा। इस प्रस्ताव को
जर्मन सरकार ने स्वीकार कर लिया।
इंडियन लीग की
स्थापना
1941 में उन्होंने बर्लिन में इंडियन लीग की स्थापना
की। जर्मनी में बोस को ‘नेताजी’ की उपाधि मिली। नेताजी ने जर्मनी की सहायता से रूस होकर
भारत पर आक्रमण की योजना बनाई। भारतीय सैनिकों के दो दस्ते का गठन किया। रोम और
पेरिस में उन्होंने स्वतंत्र भारत केंद्र स्थापित किए। परन्तु उन्हें
पर्याप्त जर्मन सहायता नहीं मिल पाई। जर्मनों ने ‘इंडियन लीग’ को रूस के विरुद्ध
प्रयुक्त करने का प्रयास किया। यह नेताजी को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने
दक्षिण-पूर्व एशिया जाने का निश्चय किया।
आज़ाद हिंद फ़ौज का
गठन
इस बीच जापान की युद्ध में तेज़ी से विजय मिलने लगी।
सिंगापुर, मलाया और बर्मा अंग्रेज़ों के हाथ से निकल गए। भारत भी अब
जापानियों के लक्ष्य में था। आज़ाद हिंद फौज का ख़्याल सबसे पहले मोहन सिंह के मन
में मलाया में आया। वे ब्रिटेन की भारतीय सेना के अफ़सर थे। ब्रिटिश सेना पीछे हट
रही थी। मोहन सिंह ने पीछे हट रही ब्रिटिश सेना में शामिल न होने का फैसला किया और
इसके बजाय मदद के लिए जापानियों के पास गए। जैसे ही सिंगापुर पर जापानियों का
क़ब्ज़ा हुआ, जापानियों ने भारतीय युद्ध-बंदियों को मोहन सिंह के
सुपुर्द कर दिया। उन्होंने फिर उन्हें इंडियन नेशनल आर्मी में भर्ती करने की कोशिश
की। हथियार डालने वाले 60 हज़ार भारतीय सैनिकों में से 40 हज़ार सैनिक कैप्टन मोहन
सिंह के नेतृत्व में फ़ारेर पार्क में जमा हुए और उन्होंने आईएनए में शामिल होकर
ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ लड़ने का फ़ैसला किया। आईएनए में शामिल होने के पीछे
ब्रिटिश सरकार से लड़ने की इच्छा तो थी ही, इसका एक और कारण जापानी जेलों की बहुत बुरी दशा भी थी। उस
ज़माने में जापान की जेलों में युद्धबंदियों की मृत्यु दर 27 फ़ीसदी थी जबकि ब्रिटेन और फ्रांस की जेलों में बंद जर्मन
और इतालवी युद्धबंदियों की मृत्यु दर सिर्फ़ 4 फ़ीसदी थी।
उन्होंने इसी समय रासबिहारी बोस के साथ टोक्यो में भारतीय
युद्ध बंदियों की सहायता से आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन का निर्णय किया। लगभग 40
हज़ार लोग आज़ाद हिंद फौज में शामिल होने की इच्छा जता चुके थे। मोहन सिंह ने फ़ौज का
विधिवत गठन किया। इसके प्रधान सेनापति बने। यह बड़े ही सुखद आश्चर्य की बात है कि
युद्धकाल में भारतीय सेना के जिन सैनिकों ने जापान के आगे हथियार डल दिए थे, उन्हीं
के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय सेना – आज़ाद हिंद फ़ौज - इंडियन इंडिपेंडेंस लीग
की स्थापना की गई। 1 सितंबर 1942 को आज़ाद हिन्द फौज की पहली डिविजन का गठन 16,300
सैनिकों को लेकर किया गया। जापानी तब तक भारत पर हमला करने के बारे में सोचने लगे
थे। दिसंबर 1942 तक आज़ाद हिंद फौज की भूमिका के बारे में जापानी और भारतीय
अधिकारियों में गहरे मतभेद हो गए। मोहन सिंह और निरंजन सिंह गिल को गिरफ़्तार कर
लिया गया। जापानी चाहते थे कि भारतीय फौज 2,500 सैनिकों की प्रतीकात्मक हो, जबकि
मोहन सिंह का लक्ष्य 20,000 सिपाहियों का था।
आज़ाद हिंद फौज का
दूसरा चरण
बैंकॉक में जून, 1942 में आज़ाद हिंद फौज का सम्मेलन हुआ। इसमें नेताजी को
जापान आने का निमंत्रण मिला। इसमें सुभाष जी ने भारतीय सैनिकों की सहायता से
अंग्रेज़ों से युद्ध करने का सुनहरा मौका देखा। वे 2 जुलाई 1943 को जर्मन और जापानी
पनडुब्बी द्वारा जर्मनी से जापानी नियंत्रण वाले सिंगापुर पहुंचे। वहां से वे
टोक्यो गए। उनके टोक्यो पहुंचने के बाद जापान के प्रधानमंत्री तोजो ने घोषणा की कि
जापान भारत पर क़ब्ज़ा करना नहीं चाहता।
बोस सिंगापुर लौट आए। छह जुलाई, 1943 को नेताजी
सुभाष चंद्र बोस ने जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के साथ सिंगापुर में आईएनए
के सैनिकों का निरीक्षण किया। अब बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज का दूसरा चरण
शुरू हुआ। वहां उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ का विख्यात नारा दिया। जापानी सरकार से उन्हें सहयोग मिला।
उन्होंने इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिंद फ़ौज की बागडोर संभाल ली। नेताजी ने आईएनए
के सैनिकों की दशा सुधारने के लिए जी-जान लगा दी। सेना का नए ढंग से
पुनर्गठन किया। बोस ने आईएनए के सैनिकों की तनख़्वाह बढ़वाई, राशन बेहतर करवाया। वो बिना पूर्व सूचना दिए
सैनिकों के साथ भोजन करने चले जाते। गांधी,
आज़ाद और नेहरू ब्रिगेड सेना में बनाई गई। प्रवासी भारतीय युवती लक्ष्मी
सहगल की सहायता से झांसी की रानी महिला रेजिमेंट भी बनी। बोस के आने
के बाद आईएनए के सैनिकों की संख्या बढ़कर 45 हज़ार हो गई थी लेकिन इसमें
से 18 हज़ार सैनिकों को दक्षिण एशिया के भारतीय समुदाय के लोगों से सीधी
भर्ती के तौर पर लिया गया था।
जब नेताजी की मुलाक़ात जापान की दक्षिणी सेना के कमांडर फ़ील्ड
मार्शल हिसाएची तेरावची से हुई तो उन्होंने बताया कि जापानी सेना भारत पर
हमला करने की योजना बना रही है। जल्द ही भारत को ब्रिटेन की ग़ुलामी
से मुक्त करा लिया जाएगा और भारतीय लोगों को देश की सत्ता
सौंप दी जाएगी। बोस ने तेरावची से साफ़ कहा कि भारत पर हमले के समय आईएनए ही
अभियान का नेतृत्व करेगी क्योंकि भारत की आज़ादी में भारतीय सैनिकों की भूमिका होना
ज़रूरी है। भारत की आज़ादी के लिए बहने वाला पहला
ख़ून आईएनए के सैनिक का होना चाहिए।
21 अक्तूबर, 1943 को उन्होंने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी
सरकार ‘आज़ाद हिंद सरकार’ और ‘भारतीय राष्ट्रीय सेना’ (आज़ाद
हिन्द फ़ौज़) का गठन किया। उस सरकार को जापान, जर्मनी, क्रोएशिया, इटली, फ़िलीपींस, थाईलैंड और
बर्मा ने मान्यता दे दी। बोस इस सरकार के प्रमुख थे, उनके पास युद्ध और विदेश संबंध का प्रभार भी था। आयरलैंड
के राष्ट्रपति इयामोन डे वलेरा ने सुभाष बोस को बधाई का संदेश भेजा और दक्षिण
पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने आगे बढ़कर पैसों और ज़ेवरों
से इस नई सरकार की मदद की।
आज़ाद हिन्द सरकार में रासबिहारी बोस को एक सम्मानित स्थान
प्रदान किया गया। रासबिहारी बोस 1915 से जापान में आत्म-निर्वासन भोग रहे थे। अपना
अभियान शुरू करने के पहले सुभाष बोस ने गांधीजी का आशीर्वाद प्राप्त किया। गांधीजी
से विरोध होने के बावजूद जब वो सिंगापुर से अपना पहला भाषण दे रहे थे, तो
गांधीजी को 'राष्ट्रपिता' कह कर
संबोधित किया और उनसे आशीर्वाद देने के लिए कहा। 6 जुलाई 1944 को, सुभाष
बोस ने आज़ाद हिंद रेडियो पर गांधीजी को संबोधित करते हुए एक प्रसारण में कहा: 'भारत का
स्वतंत्रता का अंतिम युद्ध शुरू हो गया है... हमारे राष्ट्रपिता! भारत की मुक्ति
के इस पवित्र युद्ध में, हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ चाहते हैं।' सुभाष जी की सरकार
को जापान, जर्मनी और इटली की मान्यता मिल गई। अस्थाई सरकार ने ‘हिन्दुस्तानी’ को
राष्ट्रभाषा के रूप में, ‘जय हिन्द’ को अभिवादन के रूप में,
कांग्रेस के तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय झंडा और
रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता ‘जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत
भाग्य विधाता’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया।
टोक्यो में हुए पूर्व एशिया सम्मेलन में ऐलान किया गया कि ब्रिटेन
से छीने गए अंडमान-निकोबार के टापुओं को आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार
के नियंत्रण में दिया जा रहा है। आईएनए ने कांग्रेस के तिरंगे झंडे को
अपना झंडा चुना लेकिन उसने बीच में चरखे की जगह कुलांच
भरते हुए चीते को चुना। इसकी प्रेरणा उन्हें 18वीं सदी के
मैसूर के राजा और अंग्रेज़ों के सबसे बड़े दुश्मन टीपू सुल्तान से मिली। आईएनए का
ध्येय वाक्य था--'एतमाद, इत्तफ़ाक़, क़ुर्बानी,' जिसका अर्थ था विश्वास, एकता और बलिदान।
‘तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी
दूंगा’
4 जुलाई, 1944 को उन्होंने लोकप्रिय नारा दिया, ‘तुम
मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’। उनका
उद्देश्य भारत की भूमि से अंग्रेज़ों और उनके मित्रों को निकालने के लिए आजीवन
संघर्ष करना था। उन्होंने ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
बोस ने आज़ाद हिंद फौज के मुख्यालय रंगून और सिंगापुर में बनाए। मई और जून 1944 के
बीच आज़ाद हिंद फ़ौज भारतीय भूमि पर सक्रिय रहे। जापान से उन्हें आंडमान और निकोबार
टापू प्राप्त हो गए। इनका नाम बदल कर ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ कर दिया गया। वहां का शासन अस्थायी सरकार ने अपने हाथ में
ले लिया।
दुर्भाग्य से सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में भी आजाद
हिन्द फौज को जर्मनी और जापान ने वैसा समर्थन और सहयोग नहीं दिया था जिसकी उम्मीद
सुभाष चंद्र बोस ने की थी। फिर भी इस फौज ने कई मोर्चों पर बहादुरी से लड़ाई की थी।
राजनीतिक रूप से बोस की आईएनए का सबसे अच्छा इस्तेमाल तब होता
अगर वो सेना सीधे बंगाल में घुसती जहाँ के लोग उसके स्वागत में सड़कों पर उतर आते
लेकिन तब तक जापान की नौसेना कमज़ोर पड़ चुकी थी और बर्मा पर जापान का हवाई नियंत्रण
भी ढीला पड़ने लगा था। सुभाष बोस ने उत्तरी बर्मा में जापानी कमांडर जनरल रेन्या
मुतागुची को फ़रवरी, 1944 में बताया था, अगर
जापानी सेना इम्फ़ाल हमले में सफल हो जाती है और आईएनए के सैनिक
असम के मैदानी इलाके में घुस जाते हैं तो भारतीय लोगों और अंग्रेज़ों की भारतीय फ़ौज
में सैनिकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी। जब जनवरी 1944 में जापानी
जनरल तदाशी काकाकुरा ने कलकत्ता पर बमबारी करने की योजना बनाई तो नेताजी सुभाष
बोस ने उसका घोर विरोध किया।
सन 1944 में अप्रैल का मध्य आते-आते लड़ाई का रुख़ बदलने लगा था। आईएनए और
जापानी सैनिकों के बीच संबंध ख़राब होने लगे थे। दोनों पक्ष
एक-दूसरे पर दंभी होने का आरोप लगाने लगे थे। जापानी
नहीं चाहते थे कि आईएनए की बड़ी टुकड़ी आगे-आगे जाए। वो उनको
मुश्किल लक्ष्य देने लगे। उनकी पूरी कोशिश थी कि आईएनए के सैनिकों
के मनोबल को गिरा दिया जाए। आईएनए की छापामार इकाई अपनी रसद के लिए पूरी तरह जापानियों पर
निर्भर थी। रसद की आपूर्ति न होने पर वो नागा कबीलों
के चावल को जंगल की घास के साथ मिलाकर खाने पर मजबूर हुए।
शाहनवाज ख़ान के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज की एक टुकड़ी
भारत-बर्मा सीमा पर इंफाल के हमले में मित्र राष्ट्रों से युद्ध करने के लिए भेजी
गई। इसने कॉक्स बाज़ार के निकट एक भारतीय चौकी पर अधिकार कर लिया। तिरंगा झंडा
लहराया और राष्ट्र गीत गाया। कोहिमा भी फ़ौज के नियंत्रण में आ गया। लेकिन वहां
भारतीय सैनिकों के साथ बहुत दुर्व्यवहार हुआ। उन्हें रसद और हथियार से वंचित रखा
गया। जापानी सैनिकों के लिए उन्हें निम्न श्रेणी के काम करने के लिए कहा जाता था।
इससे उनका मनोबल टूटने लगा। मई, 1944 से जापान की युद्ध में पराजय होने लगी। जापान को बर्मा
से पीछे हटना पड़ा। अंग्रेज़ों ने जापानियों के साथ-साथ आज़ाद हिंद फ़ौज के जवानों पर
भी काफ़ी अत्याचार किया।
22 जून, 1944 को जापानियों
ने आईएनए के शाहनवाज़ ख़ान को वापस लौटने का आदेश दिया। कोहिमा से इस तरह की वापसी
किसी भी सेना के लिए बहुत ही मुश्किल काम था। भारी
बारिश की वजह से सारे रास्ते मिट चुके थे। आईएनए के
सैनिकों ने नए रास्ते बनाए जो घुटने तक कीचड़ से भरे हुए थे जिसमें बहुत से सैनिक
फंस गए। क़रीब-क़रीब हर सैनिक दस्त और मलेरिया से पीड़ित था। शाहनवाज़ ख़ान ने
अपनी किताब 'माई मेमोरीज़ ऑफ़ आईएनए एंड इट्स नेताजी' में लिखा, "लौटते समय मैंने देखा कि हमारे सैनिक उन घोड़ों का माँस खा रहे थे जो चार दिन पहले मर चुके थे। सड़क के
दोनों तरफ़ जापानी और भारतीय सैनिकों की सैकड़ों लाशें पड़ी हुई थीं। ये वो लोग थे जो थकान, भुखमरी
या बीमारी की वजह से मारे गए थे। कुछ लोग जो इस अग्निपरीक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। वो ये किसी कीमत पर नहीं चाहते थे कि वो
ब्रिटिश सैनिकों के हत्थे चढ़ें।” कितने ही मारे गए और गिरफ़्तार किए गए। आज़ाद हिंद फ़ौज के
सैनिक बंदी बना लिए गए। 13 मई की रात शाहनवाज़ ख़ान, जीएस ढिल्लों और आईएनए के 50 सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। आज़ाद हिंद फ़ौज के 20,000
क़ैदियों पर सार्वजनिक मुक़दमे चलाने का निर्णय लिया गया। साथ ही 7,000 को
नौकरी से निकालने और बिना मुक़दमा चलाए हिरासत में रखने की कार्रवाई भी की गई।
लालक़िले में मुक़दमा
आईएनए के सैनिकों को दिल्ली के लाल क़िले में रखा गया और उन पर
देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया। जब इनसे पूछताछ पूरी हो गई तो इन
सबको नज़दीक के सलीमगढ़ क़िले में भेज दिया गया। 27 अगस्त, 1945 की अंग्रेज़
सरकार ने एक प्रेस रिलीज़ जारी की जिसमें कहा गया आईएनए के नेताओं और गंभीर
अपराध करने वाले लोगों का कोर्ट मार्शल किया जाएगा ताकि पूरे भारत को उनके 'कारनामों' के बारे में पता चल सके। दूसरे विश्व युद्ध में जापान की
हार के बाद हुई कैबिनेट की बैठक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री
क्लेमेंट एटली ने बताया, "ब्रिटिश लोगों के लिए ये बहुत बुरा होगा कि लोगों के बीच ये संदेश
जाए कि विद्रोह करना आसान चीज़ थी और इसके गंभीर नतीजे नहीं होंगे, इसलिए सरकार आईएनए के सैनिकों को माफ़ी देने के पक्ष में नहीं है।"
दूसरे विश्व युद्ध के बाद सेंसरशिप हटा दिया गया। इसका नतीजा
ये हुआ कि भारतीय लोगों से आईएनए के प्रयासों को छिपाया नहीं जा सका। जैसे ही
लोगों को इसके बारे में पता चला लोगों के बीच आईएनए की लोकप्रियता बढ़ती चली गई। अक्तूबर 1945 के बाद जवाहरलाल
नेहरू अपनी हर सभा में लोगों से 'जय हिंद' और 'दिल्ली
चलो' का नारा लगवाने लगे। उन्होंने अपने मित्र कृष्णा
मेनन को लिखा कि आईएनए के लोग बहादुर और योग्य हैं जिनकी राजनीतिक
सोच है।
पहला मुक़दमा नवंबर 1945 में लालक़िले में किया गया। इसमें एक
हिंदू (पी.के. सहगल), एक मुसलमान (शाहनवाज) और एक सिख (गुरबख्श सिंह ढिल्लों) को
एक साथ कठघरे में खड़ा किया गया। आज़ाद हिन्द फौज के क़ैदियों को बहुत ही गुप्त तरीक़े
से भारत लाया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल को पता चला कि आज़ाद हिंद फ़ौज के कई
अधिकारियों को बड़ी गोपनीयता से दिल्ली लाया गया है। उन पर सैन्य द्रोह का अभियोग
लगाया गया है। सरदार ने यह बात गांधीजी को बताई। गांधीजी ने इन अधिकारियों के बारे
में वायसराय लॉर्ड वेवेल को पत्र लिखा। “श्री सुभाष बाबू द्वारा खड़ी की गई सेना के सैनिकों पर चल रहे
मुक़दमे की कार्रवाई को मैं ध्यान से देख रहा हूं। कुछ क़ैदियों को फौजी अदालत में
मुकदमा चला कर गोली मार दी गई है। मैं मुकदमे की प्रगति देख रहा हूँ... हालाँकि
मेरा हथियारों के बल पर बचाव से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन
मैं उन लोगों की बहादुरी और देशभक्ति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता जो अक्सर
हथियारबंद लोगों द्वारा दिखाई जाती है... भारत इन लोगों की पूजा करता है जिन पर
मुकदमा चल रहा है। निःसंदेह सरकार के पास जबर्दस्त शक्ति है। परन्तु यदि
सर्वव्यापी भारतीय विरोध के बावज़ूद उस शक्ति का उपयोग किया गया, तो वह
उस शक्ति का दुरुपयोग होगा। जो कुछ किया जा रहा है, वह उचित
नहीं है।”
मुक़दमा शुरू होने के एक दिन बाद वायसराय के दूसरे निजी सचिव जॉर्ज
एबेल ने गांधीजी के पत्र का जवाब देते हुए लिखा, "आपका पत्र अख़बारों में छपे लेखों पर आधारित है जिसमें तथ्यों को हमेशा सही ढंग से पेश नहीं किया जाता। महामहिम इस विषय पर अपने विचार इसलिए नहीं रख सकते क्योंकि
मामला अदालत के विचाराधीन है।"
आज़ाद हिंद फौज बचाव
समिति
कांग्रेस कार्यसमिति ने राय व्यक्त की कि कांग्रेस आज़ाद
हिन्द फौज के सदस्यों का मुक़दमे में बचाव करे। कांग्रेस ने एक 17 सदस्यीय आज़ाद
हिंद फौज बचाव समिति का गठन किया। भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में तेजबहादूर सप्रू, जवाहरलाल
नेहरू, आसफ़ अली और कैलाशनाथ काटजू ने मुकदमे की पैरवी की। नेहरू ने
25 साल बाद बैरिस्टर का अपना लबादा पहना था। सरकार की तरफ से इस मुक़दमे में बेंच
में सात लोगों को रखा गया था। ये सब सैनिक अधिकारी थे। मेजर
जनरल एलन ब्लेक्सलैंड को इसका प्रमुख बनाया गया था।
गांधीजी सरदार पटेल के साथ इन बंदियों से मिलने दो बार गए, एक बार
क़ाबूल लाइन्स में और दूसरी बार लालक़िले में। इनमें आज़ाद हिन्द फौज के संस्थापक
जनरल मोहन सिंह, मेजर जनरल शाहनवाज ख़ां,
कर्नल हबीबुर्रहमान, मेजर
जनरल लोकनाथ, कैप्टन ढिल्लों और लेफ़्टिनेंट लक्ष्मी सहगल आदि प्रमुख थे।
देशव्यापी विरोध की लहर तेज़ थी। इस लहर में सभी राजनीतिक दलों के साथ मुस्लिम लीग
भी शामिल हो गई। मोहम्मद अली जिन्ना ने इस मामले में पड़ने की कोशिश की। जिन्ना ने
शाहनवाज़ ख़ान को संदेश भिजवाया कि अगर वो अपने आपको दूसरे आरोपियों
से अलग कर लें तो वो उनकी वकालत करने के लिए तैयार हैं। शाहनवाज़
ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा, 'हम लोग आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं। इस लड़ाई में हमारे बहुत से साथियों ने जान दी है। हम या तो साथ खड़े रहेंगे या साथ मरेंगे'।
ये मुक़दमा 5 नवंबर को लाल क़िले की दूसरी मंज़िल के एक बड़े कमरे में
शुरू हुआ। सभी अभियुक्त ख़ाकी कपड़े पहनकर आए लेकिन उन पर कोई रैंक नहीं
लगा था। मुक़दमा शुरू होने से पहले उन्होंने नेहरू को स्मार्ट सैल्यूट किया।
पहले दिन मुक़दमे की कार्रवाई साढ़े पाँच घंटे चली। उस दौरान
अभियोजन पक्ष ने तीन अफ़सरों कैप्टन शाहनवाज़ ख़ान, प्रेम सहगल और लेफ़्टिनेंट ढिल्लों के
ख़िलाफ़ ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ़ युद्ध करने का आरोप लगाया। तीनों
आईएनए अफ़सरों ने आरोपों का ज़ोरदार खंडन किया। ट्रायल में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे
पता चला कि आई.एन.ए. संगठन और जापानी फासीवाद के बीच कोई वैचारिक संबंध नहीं था, और इसका
मुख्य मकसद भारत की आज़ादी हासिल करना था। भूलाभाई देसाई ने तर्क दिया कि यह हर
भारतीय का अधिकार है, अगर वह ऐसा सही समझे, तो ब्रिटिश ताज के प्रति
अपनी वफादारी को त्याग दे और भारत की आज़ादी पाने के लिए मुक्ति सेना में शामिल हो
जाए। उन्होंने तर्क दिया, "जब तक आप अपनी आत्मा नहीं बेच देते, तब तक
आप यह कैसे कह सकते हैं कि जब आप अपने देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ रहे हैं, तो कोई
और वफादारी आपको ऐसा करने से रोक रही है? इसका मतलब है कि अगर ऐसा
होता है, तो स्थायी गुलामी के अलावा कुछ नहीं होगा।"
एक विशेष प्रकार की सहानुभूति पूरे देश में चरम पर थी।
सहानुभूति सांप्रदायिक सीमाओं को पार कर गई थी। पूरे देश में
प्रदर्शनकारी धरने पर बैठ गए। उनके
हाथ में बैनर थे, 'आईएनए
के देशभक्तों को बचाओ।' इन तीनों के
सम्मान में उस साल लाहौर में दीपावली नहीं मनाई
गई। बच्चे सड़कों पर नारा लगाते दिखाई दिए, 'आज़ाद फ़ौज छोड़ दो, लाल क़िला तोड़ दो।' 21
नवंबर, 1945 को कलकत्ता में छात्रों ने आज़ाद हिंद फौज के समर्थन
में विद्रोह कर दिया। छात्रों के जुलूस पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें दो छात्रों
की मृत्यु हो गई। भीड़ ने 15 ब्रिटिश सैनिक वाहनों में आग लगा दी और उन पर नियंत्रण करने के लिए
पुलिस को दो बार गोली चलानी पड़ी। दिल्ली में रातों-रात
इश्तहार लग गए जिनमें लिखा था 'हर आईएनए सैनिक की शहादत का बदला बीस अंग्रेज़ों के ख़ून से लिया जाएगा।' अंग्रेज़ इस बात से घबरा गए थे कि आज़ाद हिंद फ़ौज की भावना
भारतीय सेना में भी फैलती जा रही है। इस मुक़दमे से पूरे देश में अंग्रेज़ों के
ख़िलाफ़ माहौल बन गया। आईएनए के सैनिकों को कांग्रेस के विरोधी तत्वों जैसे
मुस्लिम लीग, भारतीय क्म्युनिस्ट पार्टी, यूनियनिस्ट पार्टी, अकाली
दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा का भी समर्थन
मिला। बिपिन चंद्रा लिखते हैं, "आशा के विपरीत आईएनए के लोगों को भारतीय सेना का भी समर्थन
मिल रहा था। ब्रिटिश सरकार की इनको देशद्रोही दिखाने की कोशिश नाकाम हुई थी।"
31 दिसंबर, 1945 को जजों ने
तीनों अभियुक्तों को ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ़ युद्ध करने का दोषी पाया। सैनिक
अदालत ने इन्हें फांसी की सज़ा सुनाई। लेकिन जनविरोध और लोगों के रोष को देखते हुए
सरकार ने इन अधिकारियों को रिहा कर दिया। 3 जनवरी, 1946 को कमांडर-इन-चीफ़ ऑचेनलेक ने इन सबकी सज़ा माफ़ कर दी। देश ने
I.N.A. के आरोपियों की आज़ादी की मांग की और आखिरकार उसे हासिल कर
लिया। नेहरू ने कहा, "यह भारतीय लोगों की इच्छा और भारत में सत्ता संभालने वालों
की इच्छा के बीच शक्ति का मुकाबला बन गया था और आखिर में लोगों की इच्छा की ही जीत
हुई।"
एक अंग्रेज़ अफ़सर ने ख़ान, सहगल और ढिल्लों को बुलाकर उन्हें सरकार के फ़ैसले की जानकारी दी। वो सभी
ये सुनकर अवाक खड़े रह गए। आईएनए के अफ़सरों ने पूछा, अब हमें क्या करना होगा? अफ़सर ने जवाब दिया, आप सभी जा सकते हैं। सबने पूछा कहाँ? अफ़सर ने कहा, अगर
दिल्ली में आपके रिश्तेदार हैं तो आप वहाँ चले जाइए, वरना हम लाहौर जाने के लिए आपकी ट्रेन की बुकिंग करा देंगे।
उसी शाम तीनों को लाल क़िले की जेल से रिहा कर दिया गया। इन सबको
कांग्रेस नेता आसफ़ अली के घर ले जाया गया। एक दिन बाद इन
तीनों ने अपने सम्मान में आयोजित एक रैली को संबोधित किया। शाहनवाज़ ख़ान ने
कहा, "हम अपनी रिहाई के लिए अपने देशवासियों का शुक्रिया अदा करने आए
हैं। पहली बार ब्रिटिश सरकार की ताक़त ने भारत के लोगों की इच्छा के सामने सिर झुकाया है। हमारी
इस बात को मान्यता मिली है कि देशवासियों को अपनी आज़ादी
की लड़ाई लड़ने का हक़ है।"
अंग्रेज़ों का भारतीय सेना के तीन अधिकारियों का कोर्ट मार्शल करने का
फ़ैसला एक बहुत बड़ी भूल साबित हुआ।
एक मुसलमान, एक हिंदू और एक सिख, एक तरह
से भारत के तीन बड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे
और इनके मुक़दमे ने थोड़े समय के लिए ही सही, लेकिन इन तीनों
समुदायों को जोड़ने का काम किया। आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने
वाले सुभाष चन्द्र बोस और उनके शाहनवाज जैसे सहयोगियों एवं बहुत से बहादुर
सिपाहियों को हालाँकि उम्मीद के अनुसार सफलता नहीं मिली थी लेकिन उनके प्रति
भारतीय जनता के मन में असीम आदर की भावना भर गई थी और सुभाष चंद्र बोस विशेष रूप
से युवाओं के पसंदीदा नायक बन गये थे।
कांग्रेस के सशक्त आंदोलन के साथ-साथ सुभाष चन्द्र बोस के
नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज की सशस्त्र क्रान्ति ने अंग्रेजी सरकार की मजबूत नींव
हिला कर रख दी थी इसलिए जनता भी आजादी की धीमी आहट साफ सुन रही थी। कुछ दिनों बाद ही भारत के लोगों को सत्ता
सौंपने की मुहिम पर चुपचाप काम शुरू हो गया था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट
एटली ने ऐलान किया, "मैं उम्मीद करता हूँ कि भारत के लोग ब्रिटिश राष्ट्रमंडल
में रहना पसंद करेंगे। लेकिन अगर वो आज़ाद रहना चाहेंगे तो उनको ये फ़ैसला लेने का
हक़ है।"
नेताजी की मृत्यु
नेताजी जीवित हैं या नहीं, यह कोई विश्वस्त रूप से
नहीं जानता था। अब तक गांधीजी ने नेताजी की मृत्यु के समाचारों पर अविश्वास किया
था। गांधीजी ने नेताजी के बारे में इन फौजियों से समाचार पूछा। कर्नल
हबीबुर्रहमान अंत तक नेताजी के साथ विमान में थे। उन्होंने दुर्घटना का विवरण
सजीव रूप में गांधीजी के समक्ष किया। उन्होंने बताया, “जब अंग्रेज़ों का अत्याचार बढ़ा
तो सुभाष जी को बर्मा से हटना पड़ा। दुर्भाग्यवश रंगून से टोक्यो जाते समय प्रातः साढ़े
नौ बजे उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें आग लग गई। नेताजी काफी जल गए थे।
नेताजी के हाथ और शरीर के दूसरे हिस्से बहुत ज़्यादा जल गए थे। परन्तु इसकी परवाह न
करके उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरा हाल क्या है?
मैंने उनसे कहा कि मैं बिल्कुल ठीक हूं और मुझे
लगता है कि मैं बच जाऊंगा। उन्होंने कहा कि मेरी बचने की आशा नहीं है। और उन्होंने
मुझे अपना अंतिम संदेश दिया, ‘मैं तो जा रहा हूं, परन्तु
मेरे देश वासियों और तमाम संबंधित लोगों से कह देना कि जब तक लक्ष्य सिद्ध न हो
जाए तब तक भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई ज़ारी रहनी चाहिए।’ तीसरे प्रहर साढ़े तीन बजे अपराह्न में इस देश भक्त और महान
क्रांतिकारी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को हो गई। वे लगभग अन्त तक होश में रहे। अतिशय पीड़ा की
बावज़ूद उनके मुंह से उफ् तक नहीं निकली।” दूसरे दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, “पहले तो मेरी मान्यता दूसरी
थी, परन्तु अब मुझे विश्वास हो गया है कि नेताजी इस दुनिया में
नहीं रहे।”
हमारे देश में यह धारणा बन चुकी है कि गांधीजी को नेताजी
नापसंद थे। किंतु जो भी गांधीजी के व्यक्तित्व से परिचित है, वह
निस्संदेह यह मानेगा कि उनमें ऐसे ओछापन का नितांत अभाव था। नेताजी बोस गांधीजी के
लिए पुत्र समान थे। वे तो नेताजी की योग्यता,
सच्चाई, त्याग, सूझ-बूझ, कर्तव्यपरायणता और देश भक्ति परम प्रशंसक थे। गांधी विचार
की अध्येता सुजाता चौधरी ने "गांधी और सुभाष" कृति में कई ऐतिहासिक
तथ्यों एवं दस्तावेजों के आधार पर यह प्रमाणित किया है कि सुभाष चन्द्र बोस
गांधीजी की बहुत इज्जत करते थे और गांधीजी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति स्नेह भाव
रखते थे। 1932 से ही वह कांग्रेस और उसकी सत्ता से अलग थे। वह तो कांग्रेस के
चवन्निया सदस्य भी नहीं थे। उन्होंने हज़ारों देशवासियों को पुत्रवत माना तो वे
केवल नेताजी से अन्याय करेंगे यह मान लेना तर्कपूर्ण नहीं लगता। हां, यह बात
उन्होंने कभी नहीं छिपाई को वे नेताजी की कार्य-पद्धति से सहमत नहीं हो सके। जहां
तक गांधीजी और सुभाषजी के मध्य मतभेद का प्रश्न है उसका प्रमुख कारण था की गांधीजी
आजादी के आंदोलन में न हिंसक युद्ध (आजाद हिन्द फौज) के समर्थक थे और न जर्मनी और
जापान जैसी फासिस्ट ताकतों का सहयोग चाहते थे जबकि सुभाष चन्द्र बोस अंतिम लक्ष्य
की प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के दुश्मनों का समर्थन लेने और आजाद हिन्द फौज के
द्वारा सशस्त्र संघर्ष के प्रबल पक्षधर थे। गांधीजी के प्रति सुभाष चन्द्र बोस का
आदर इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि उन्होंने आजाद हिन्द फौज की पहली टुकड़ी का
नाम गाँधी ब्रिगेड रखा था और अपने सिपाहियों को कहा था कि देश की आजादी के
बाद हम सब गांधीजी के नेतृत्व में समाज की सेवा करेंगे।
जो भी हो, नेताजी की असमय मृत्यु से देश को असीम हानि हुई। ब्रिटेन के
खिलाफ लगातार संघर्ष जारी रखने की मुख्य प्रेरणा सुभाष बोस के विदेशों में किए गए
कारनामों से मिली। देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ रही एक वास्तविक सेना ने देशभक्तों
के मानस पर बहुत ही गहरा प्रभाव डाला। गांधीजी से मिलने के बाद आज़ाद हिन्द फौज के
सदस्यों ने भी माना कि अब वे अहिंसा के सैनिक बनकर भारत की सेवा करेंगे। उनमें से
कई लोगों ने नोआखाली और बिहार के संकटपूर्ण दिनों में प्रशंसनीय कार्य करके दिखाया
भी।
NOTE : आज़ाद
हिन्द फ़ौज का एंथम था “कदम कदम बढाए जा” । इस गीत के रचयिता थे वंशीधर शुक्ल, और
संगीत दिया था कैप्टन राम सिंह ठाकुरी।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर
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