गांधी और गांधीवाद
432. बुनियादी
शिक्षा या नई तालीम
1944
गांधीजी के अहिंसा के
हथियारों में सबसे ज़रूरी था बेसिक शिक्षा या शिक्षा की नई प्रणाली। बुनियादी
शिक्षा या नई तालीम गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए एक
महत्वपूर्ण क़दम था। यह अपने कॉन्सेप्ट में जितनी क्रांतिकारी थी, अपने दायरे में उतनी
ही महत्वाकांक्षी भी थी। इसकी गतिविधियों को पूरा करने के लिए उन्होंने हिंदुस्तानी
तालीमी संघ की स्थापना की थी। इसे कुछ विद्वानों ने ‘विचार करने वाला हाथ’ कहा, जो मनुष्य और
समाज के आर्थिक विकास को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक होता है। मनुष्य की
सम्पूर्ण शिक्षा किसी एक बुनियादी हस्त-उद्योग द्वारा दी जा सकती है। इसका लक्ष्य
एक ऐसी अहिंसक, अशोषक समाज-व्यवस्था का निर्माण करना है, जिसमें स्वतंत्रता,
समानता और भाईचारा के आदर्श पूरी तरह सिद्ध किए जा सकें। गांधीजी ने उसे अपने सारे
रचनात्मक कार्यक्रम का सारी प्रवृत्तियों का सार ("all-in
complex") बताया था।
यह एक ऐसी
शिक्षा-प्रणाली थी जो अपना ख़र्च ख़ुद निकाल सके। इसमें शिक्षार्थी अपने ही
प्रयत्नों से स्वस्थ, सभ्य और सुसंस्कृत जीवन के साधन जुटा पाते। जिससे
विद्यार्थियों की बुद्धि का ही नहीं बल्कि उसकी शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों का
भी विकास हो सकता। गांधीजी का कहना था कि मनुष्य जीवित रहने के लिए जो कुछ
अपने हाथों से करता है, उसका असर उसके विचार और व्यवहार पर तथा सारे दृष्टिकोण पर
मौखिक शिक्षा की अपेक्षा अधिक पड़ता है। किसी समाजोपयोगी हस्त-उद्योग शिक्षण और
अभ्यास का उसके कार्य-कारण के साथ अनुबन्ध साधकर बालक की बौद्धिक ही नहीं परन्तु
शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों का भी पूरा विकास किया जा सकता है।
वे चाहते थे कि
बुनियादी शिक्षा एक प्रयोगशाला हो, जहां बच्चों को उनके और उनके गांवों के सामने
आनेवाली व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन की समस्याओं का अहिंसक और लोकतांत्रिक ढंग से
हल निकालना सिखाया जाए। फलस्वरूप जब वे जीवन में प्रवेश करें तो वे न केवल ज़रूरी
ज्ञान के साथ, बल्कि पहल करने, आत्मनिर्भरता और
आत्मविश्वास की भावना के साथ पूरी तरह तैयार हों, जो उन्हें करके सीखने के अनुभव से
मिली हो। गांधीजी चाहते थे कि कताई-बुनाई और उससे जुड़ी प्रक्रियाएं बुनियादी
शिक्षा का माध्यम बनें। एक युवा अंग्रेज, जिसने बर्मा मोर्चे पर रॉयल एअर फोर्स
की इंटेलिजेंस ब्रांच में काम किया था, सेवाग्राम में हिंदुस्तानी तालीमी
संघ की एक बैठक में शामिल होने के बाद टिप्पणी की: "मैंने दुनिया में कहीं भी
ऐसा नहीं देखा है। वे एकमात्र ऐसे लोग हैं जो अपना लक्ष्य और उसे हासिल करने के
व्यावहारिक तरीके जानते हैं।"
गांधीजी को कताई, बुनाई और उनसे जुड़ी
प्रक्रियाओं से खास लगाव था, क्योंकि वे बुनियादी शिक्षा का
माध्यम थीं। इसका कारण उनकी सार्वभौमिकता, इंसान की एक ज़रूरी ज़रूरत से उनका
संबंध और कम खर्च था। उन्होंने कहा कि अगर यह प्रयोग कुशलता से किया जाता है, तो स्कूल का काम -
शिक्षक और बच्चे मिलकर - कुल मिलाकर स्कूल के मौजूदा खर्च को पूरा कर लेगा, यानी शिक्षकों के
भरण-पोषण और स्कूल के आकस्मिक खर्चों का इंतज़ाम हो जाएगा। आत्मनिर्भरता को एक
शर्त के रूप में नहीं, बल्कि प्रयोग की
दक्षता की कसौटी के रूप में रखा गया था।
1936 में बुनियादी शिक्षा
के प्रचार के लिए ‘हिन्दुस्तानी तालीमी संघ’ की स्थापना की गई थी।
1944 में जेल से आने के बाद गांधीजी ने बुनियादी शिक्षा के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने
के लिए प्रयास शुरू कर दिए। गांधीजी ने बेसिक शिक्षकों को संबोधित करते हुए
चेतावनी दी, "हमें अपनी मौजूदा
उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए: हमें बच्चों के घरों तक पहुँचना होगा।
हमें उनके माता-पिता को शिक्षित करना होगा। शिक्षा का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए।
इसमें जीवन के हर पड़ाव पर हर किसी के लिए शिक्षा शामिल होनी चाहिए। एक बेसिक
स्कूल शिक्षक को खुद को एक सार्वभौमिक शिक्षक समझना चाहिए। जैसे ही वह किसी के
संपर्क में आता है, चाहे वह पुरुष हो या
महिला, जवान हो या बूढ़ा, उसे खुद से कहना चाहिए, "अब मैं इस व्यक्ति को
क्या दे सकता हूँ?"
मान लीजिए कि मुझे कोई
बूढ़ा आदमी मिलता है जो गंदा और अनपढ़ है... यह मेरा काम होगा कि मैं उसे सफ़ाई
सिखाऊँ, उसकी अज्ञानता दूर
करूँ और उसकी सोच का दायरा बढ़ाऊँ। मुझे उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि मैं
उसका टीचर हूँ। मैं उसके साथ एक ज़िंदा रिश्ता बनाने की कोशिश करूँगा और उसका
भरोसा जीतूँगा। हो सकता है कि वह मेरी कोशिशों को ठुकरा दे। मैं हार नहीं मानूँगा
बल्कि तब तक कोशिश करता रहूँगा जब तक मैं उससे दोस्ती करने में कामयाब नहीं हो
जाता। एक बार जब यह हो जाएगा, तो बाकी सब अपने आप हो जाएगा।
मुझे बच्चों पर उनके
जन्म से ही नज़र रखनी होगी। मैं एक कदम और आगे बढ़कर कहूंगा कि शिक्षाविद का काम
तो उससे भी पहले शुरू हो जाता है। महिला बेसिक टीचर गर्भवती माँ के पास जाएगी और
उससे कहेगी, "मैं भी माँ हूँ, जैसे तुम बनने वाली
हो। मैं अपने अनुभव से तुम्हें बता सकती हूँ कि तुम्हें अपने अजन्मे बच्चे और अपनी
सेहत के लिए क्या करना चाहिए।" वह पति को बताएगी कि पत्नी के प्रति उसका क्या
कर्तव्य है और होने वाले बच्चे की देखभाल में उसका क्या हिस्सा है। इस तरह बेसिक
स्कूल टीचर जीवन के पूरे दायरे को कवर करेगा। स्वाभाविक रूप से उसकी गतिविधि में
वयस्क शिक्षा भी शामिल होगी।
मेरी सोच के हिसाब से
एडल्ट एजुकेशन को पुरुषों और महिलाओं को हर तरह से बेहतर नागरिक बनाना चाहिए...
बेसिक स्कीम के तहत एडल्ट एजुकेशन में खेती एक अहम भूमिका निभाएगी। लिखने-पढ़ने की
शिक्षा ज़रूर होनी चाहिए। बहुत सारी जानकारी मौखिक रूप से दी जाएगी। किताबें होंगी
- सिखाने वालों के लिए ज़्यादा और सीखने वालों के लिए कम। हमें ज़्यादातर लोगों को
सिखाना होगा कि वे अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करें और इसका उल्टा भी। सही
तरह की एडल्ट एजुकेशन को छुआछूत और सांप्रदायिकता की जड़ पर ही चोट करनी चाहिए।
हिन्दुस्तानी तालीमी
संघ का संविधान इस तरह बदल दिया गया कि उसके क्षेत्र में पूर्व-बुनियादी,
उत्तर-बुनियादी या विश्वविद्यालय की शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा का समावेश हो जाए।
चरखा संघ, ग्रामोद्योग संघ और हिन्दुस्तानी तालीमी संघ के समन्वय के लिए एक
सम्मिलित मंडल की स्थापना की गई। कार्यकर्ताओं को तालीम देने की व्यवस्था की गई।
प्रत्येक केन्द्र में ‘एक केन्द्र में एक कार्यकर्ता’ सिद्धांत को
सुनिश्चित किया गया ताकि मौलिकता और उत्तरदायित्व की भावना को पूरा अवसर मिले।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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