शनिवार, 24 जनवरी 2026

434. कांग्रेस, साम्यवादी और गांधी

राष्ट्रीय आन्दोलन

434. कांग्रेस, साम्यवादी और गांधी

1944

हालांकि "भारत छोड़ो" प्रस्ताव के प्रति साम्यवादियों का रवैया पूरी तरह से दुश्मनी वाला था, फिरभी जब से गांधीजी जेल से छूटकर आए थे, साम्यवादी उनका स्वागत करने में किसी से पीछे नहीं रहे।  1941 में नाज़ियों द्वारा रूस पर आक्रमण के बाद उनका युद्ध के प्रति रवैया बदल गया था। वे इसे जनता का युद्ध कहने लगे थे और उनकी ब्रिटिश के साथ संधि भी हो गई थी। उन पर लगा बैन हटा लिया गया और उनके और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच समझौता हो गया। वे भारत छोड़ो को विफल करने के सारे प्रयत्न करते हुए दिखे। परिणामस्वरूप आम जनता और खासकर कांग्रेसियों के बीच उनकी छवि खराब हो गई।

गांधीजी की रिहाई के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी (महामंत्री) पी.सी. जोशी ने गांधीजी से मुलाक़ात की और अपने दल का पक्ष रखा। बहुत सी बातें तो गांधीजी पचा गए लेकिन जनता का युद्ध वाली बात वे पचा नहीं पाए। गांधीजी का कहना था, मित्र-राष्ट्रों के साथ रूस के गठबंधन से पहले नाज़ी युद्ध, जो एक साम्राज्यवादी युद्ध था, वह कितनी भी खींचतान करें तो भी जनता के युद्ध में नहीं बदल सकता। इस युद्ध ने दुनिया को दो छावनियों में बांट दिया है। दोनों में से किसी भी दिशा में हम जाएं, नाव तो डूबने ही वाली है। इसलिए मुझे मंझधार में ही रहना है।

गांधीजी का मत था कि जब से साम्यवादी कांग्रेस में एक गुट बनाकर काम कर रहे थे. तब से वे उसे भीतर से तोड़-फोड़ करने में लगे हुए थे। कम्युनिस्टों को इस बात पर आपत्ति थी कि वे कांग्रेस संगठन को अंदर से तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर जोशी ने कहा, हमारे लिए कांग्रेस में पांव फैलाने की नीति अपनाने का कोई प्रश्न ही नहीं है। जब से दल के रूप में हमारा जन्म हुआ है, हम कांग्रेस में ही रहे हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि वे कांग्रेस में थे, फिर भी कांग्रेस को अंदर से तोड़ना उनकी नीति का एक लगातार हिस्सा रहा था, जैसा कि उनकी अलग-अलग "थीसिस" में बताया गया था, जिन्हें वे समय-समय पर अपनी पार्टी के सदस्यों के बीच चुपके से बांटते थे। इन सदस्यों को सलाह दी गई थी कि वे कांग्रेस के अंदर एक गुट के तौर पर काम करें और सभी मुमकिन तरीकों से कांग्रेस की नीतियों को गुपचुप तरीके से नुकसान पहुंचाएं।

गांधीजी ने कहा हमारे पास प्रमाण हैं। जोशी ने आरोप लगा कि आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। आप साम्यवाद को ग़लत समझ रहे हैं। आप समझते हैं कि साम्यवाद का अर्थ है : उद्देश्य अच्छा होना चाहिए, साधन कैसे भी हों, क्योंकि ‘लक्ष्य साधनों को सही ठहराता है’। लेकिन ऐसा है नहीं। क्या आपने कभी कांग्रेस महासमिति के अगस्त अधिवेशन में साम्यवादी प्रतिनिधियों द्वारा कहे गए शब्दों को याद रखने की परवाह की है? उन्होंने आपसे याचना की थी कि प्रस्ताव का क्रियात्मक भाग निकाल कर उसके स्थान में आत्म-निर्णय के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाए और लीग के साथ तुरन्त संधि वार्ता की जाए। वस्तुतः अब आपने वही बात की है, जिन्ना से वार्ता की है।

गांधीजी ने कहा, "अगर मैं पूर्वाग्रहों से मुक्त होता, तो आपके जवाब मानने में मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं होती। लेकिन मेरी मुश्किल असली है... जब मैं यह मानता हूँ कि मुझमें पूर्वाग्रह हैं, तो यह आपसे एक अपील है कि आप मेरे साथ धैर्य रखें और जिस भी सबसे अच्छे तरीके से हो सके, मेरे पूर्वाग्रहों को खत्म करें। ... मैं आपको यह भरोसा दिलाता हूँ कि मैंने अपने पूर्वाग्रहों पर काम नहीं किया है, और न ही तब तक करूँगा जब तक कि ये पूर्वाग्रह पक्के विश्वास में न बदल जाएं।"

साम्यवादियों के लिए राष्ट्रीय स्वाधीनता विश्व पर साम्यवाद की सर्वोपरि सत्ता स्थापित करने के संग्राम में एक मंजिल मात्र थी। वे सिर्फ़ यह चाहते थे कि रूस के शत्रुओं की पराजय के लिए भारत के सारे साधन तुरन्त उपयोग में लाए जाएं। इसीलिए वे चाहते थे कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग किसी भी क़ीमत पर मिल जाएं। बेशक, वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को कमज़ोर करना चाहते थे और इसलिए भारत को ब्रिटिश नियंत्रण से आज़ाद कराना चाहते थे। गांधीजी सिर्फ़ नैतिक समर्थन की बात करते थे जबकि वे चाहते थे कि मित्र-राष्ट्रों के युद्ध-प्रयत्नों में बिना किसी शर्त के सहायता दी जाए।

साम्यवादियों ने सुझाया कि उनके विरुद्ध जो भी आरोप हैं, उनकी जांच एक पंच द्वारा करा ली जाए। इसके लिए उन्होंने नाम भी दिए। गांधीजी ने उनके द्वारा दिए गए नामों में से भूलाभाई देसाई को चुना और उनके पास सारे प्रमाण भेज दिए। भूलाभाई एक प्रसिद्ध धारा शास्त्री भी थे। उन्होंने निर्णय दिया, यह निश्चित रूप से मालूम होता है कि 9 अगस्त के बाद साम्यवादी दल के विचार और उसका रवैया कांग्रेस के विचारों और उसकी नीति के विरुद्ध प्रचार करने का रहा है। सारे प्रमाणों के देख लेने के बाद समिति ने अपना यह निर्णय दिया है कि कांग्रेस में साम्यवादी दल के सदस्यों के विरुद्ध प्रबल प्राथमिक अभियोग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं।

दक्षिण भारत के एक कांग्रेसी नेता के सवाल के जवाब में गांधीजी ने लिखा: "कम्युनिस्टों को कांग्रेस की मेंबरशिप से बाहर नहीं किया जा सकता। जो लोग मकसद को मानते हैं और मेंबरशिप फीस देते हैं, वे मेंबर बन सकते हैं। संविधान में ऐसा ही लिखा है... जहां तक ​​चुनावी निकायों की बात है... अगर लोग उन्हें चाहेंगे तो वे चुने जाएंगे। कम्युनिस्टों के साथ इस तरह से कोई डील नहीं की जा सकती और न ही उनके खिलाफ इस तरह से कोई कार्रवाई की जा सकती है। जिन लोगों ने कांग्रेस के अनुशासन के खिलाफ काम किया है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।"

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की रिहाई पर, जून 1945 में पंडित नेहरू, सरदार पटेल और गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व में एक समिति गठित की गई जिसका काम था साम्यवादी दल के कांग्रेसी सदस्यों के विरुद्ध लगाए गए अनुशासनहीनता के अभियोग की जांच करना। इस कमेटी ने भूलाभाई की फाइंडिंग पर ध्यान दिया: "ऐसा लगता है कि 9 अगस्त (1942) के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के विचार और रवैया कांग्रेस के विचारों और नीति के खिलाफ प्रचार करने का रहा है।" सभी सबूतों को देखने के बाद, कमेटी ने अपना फैसला सुनाया कि कांग्रेस में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के खिलाफ एक मजबूत प्रथम दृष्टया मामला बनाने के लिए पर्याप्त सबूत थे। समिति ने कहा, ऐसे समय में जब कि देश आतंक-राज्य की अग्नि-परीक्षा से गुज़र रहा है और कांग्रेस जीवन-मरण के संग्राम में लगी है, कोई भी संगठन अनुशासन के साधारण नियमों का हनन किए बिना ऐसी विरोधी प्रवृत्तियों में भाग नहीं ले सकता। इसने कम्युनिस्टों से अपनी स्थिति स्पष्ट करने और यह बताने को कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए। अपनी आदत के अनुसार, कम्युनिस्टों ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने और अपनी बेगुनाही साबित करने के बजाय, जवाबी आरोप लगाए। नतीजतन, कांग्रेस को उनके खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

गांधीजी कम्युनिस्टों को उनकी गलत सोच से दूर करने की कोशिश करते हुए भी, उनसे व्यक्तिगत रूप से संबंध बनाए रखते थे। उन्होंने उड़ीसा के एक कांग्रेस नेता से कहा, "अगर मुझे कोई ईमानदार कम्युनिस्ट मिलता है, और वह मेरे साथ सहयोग करता है, तो मैं उसे स्वीकार कर लूंगा।" यह कोशिश कामयाब नहीं हुई, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। और न ही कम्युनिस्ट उनसे दूर भाग पाए।

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।