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गुरुवार, 24 नवंबर 2011

समीक्षा आँच-97- तू उस पार दिव्य आलोकित


समीक्षा

आँच-97- तू उस पार दिव्य आलोकित

हरीश प्रकाश गुप्त

अनीता जी मूलतः हिन्दीभाषी वासी हैं परन्तु वर्तमान में असम में रहती हैं। उनका मन पाए विश्राम जहाँ नामक एक हिन्दी का ब्लाग है जिसमें वह लगभग नियमित रूप से अपनी कविताएं प्रकाशित करती हैं। उनकी अधिकांश रचनाएँ जीवन के यथार्थ को जीती हैं और उसे अभिव्यक्त करते हुए क्रमशः ईश्वर से एकाकार होने की दिशा में आगे बढ़ती हैं। वह जीवन की दिनानुदिन की पीड़ा और वेदना का समाधान भी उसी ईश तत्व के सान्निध्य में ढूँढती हैं। सम्भवतः यह उनका जीवन दर्शन है जो उनकी कविताओं में भासित होता है। वह एक आध्यात्मिक संस्था से भी जुड़ी हैं, शायद इसीलिए उनकी कविताएं प्रायः आध्यात्मिक चेतना से आवृत्त होती हैं। दिनांक 18 नवम्बर, 2011 को उनके ब्लाग पर उनकी एक कविता तू उस पार दिव्य आलोकित प्रकाशित हुई थी। इस कविता का सन्देश उनकी इसी विशिष्टि का परिचायक है और यह उनके द्वारा स्वीकृत जीवन-दर्शन को सम्प्रेषित करती भी है। उनकी यह कविता ही आज की आँच की चर्चा की विषयवस्तु है।

इस भौतिक जगत में व्यक्ति न तो अमर है और न ही व्याधिरहित। उसे जीवन के नियत क्रम को जीना होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे अपने पूर्व जन्म के अर्जित अनेकानेक संस्कारों को संघर्षों और कठिनाइयों के रूप में सामना करना पड़ता है तथा कभी उसे जीवन की कठिनतम और दुष्कर परिस्थितियों से होकर भी गुजरना पड़ता है। तब उसे सासंसारिक जीवन में ऐसा लगता है कि जैसे उसके जीवन में मात्र दुःख ही दुःख हैं, सुख का नामोनिशान तक नहीं। कितना कुछ पीछे भोग आए हैं और कितना और भोगना शेष है, इसका कोई आकलन नहीं है। यह वेदना अन्तहीन सी लगती है। सुप्तावस्था और जाग्रतावस्था, दोनों में एक ही प्रकार के विचार घेरते रहते हैं। निराशा उनकी संवाहक होती है। पहले बीत चुके दुःख और पीड़ाओं की स्मृतियाँ घनीभूत होकर वर्तमान में पीड़ा को और गहराती हैं। कवयित्री का मानना है कि इस संसार में व्यक्ति और ईश्वर के रूप में आत्मा और परमात्मा, दो अमूर्त शिरे हैं। एक दुख का सागर है तो दूसरा सुख का पर्याय। एक कष्ट है तो दूसरा उसका उपचार। इसलिए इन दोनों का एकाकार होना ही सभी प्रकार के दुःखों और कष्टों का समाधान है। लेकिन मनुष्य ने भौतिक जीवन में अपने अज्ञान के कारण अनेक आग्रहों की दीवारें खड़ी कर रखी हैं। यह बाधा मात्र मनुष्य की तरफ से ही है, ईश्वर की तरफ से नहीं। वह तो हमेशा मनुष्य के समीप है, लेकिन मनुष्य उसकी समीपता को अनुभव नहीं कर पाता। यद्यपि दोनों के बीच अप्रत्यक्ष आकर्षण विद्यमान है, तथापि इन अवरोधों के चलते दिव्य प्रकाश रूपी ईश तत्व से उसका मिलन सम्भव नहीं हो पाता है। फिर भी, कवयित्री निराश नहीं है और वह मानती है कि एक न एक दिन समस्त बाधाएं टूटेंगी और दोनों का अलौकिक महामिलन अवश्य होगा। तभी असीम सुखानुभूति होगी और मन कामनाओं से मुक्त होगा।

आज संसार में लगभग प्रत्येक व्यक्ति अपने को दुःख और कष्टों से घिरा पाता है और इनसे उबरने का उसे कोई उपाय नहीं सूझता। इसीलिए यह कविता सभी लोगों के हृदय के स्पर्श करती है और उनकी भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। कह सकते हैं कि अनीता जी की यह कविता व्यक्तिनिष्ठता से साधारणीकरण की दिशा में अग्रसर हुई है। इस कविता में भावों की गहनता है लेकिन व्यंजना अधिक गूढ़ नहीं हैं। यह सीधे और सरल शब्दों में अपने भावों का वाचन करती है। हालाँकि उत्तम काव्य का अभीष्ट व्यंजना ही है, अतः यह कविता का कमजोर पक्ष है। कविता के शिल्प की बात करें, तो अधिकांश स्थानों पर सुन्दर शब्द योजना देखने में आती है। गीत में गीतात्मकता लाने का भी भरपूर प्रयास किया गया है, लेकिन कई पंक्तियों में मात्राओं की असमानता और कहीं-कहीं अनुपयुक्त पदों का चयन प्रांजलता में अवरोधक है तथा रसास्वादन में बाधक बनता है। पूरे गीत में जो श्रेष्ठ पद हैं उनमें पंक्तियाँ 16 मात्राओं के आसपास है। असमान मात्राओं में केवल 4थी, 7वीं 12वीं, 13वीं पंक्तियों में 15 मात्राएं तथा 14वीं, 16वीं 22वीं, और 24वीं पंक्ति में 17 मात्राएँ हैं। इनके अतिरिक्त, प्रवाह की दृष्टि से कुछ पदों तथा पंक्तियों में परिवर्तन की आवश्यकता प्रतीत होती है। जैसे

पहली और दूसरी पंक्तियों में हैका स्थान बदलने से प्रवाह बढ़ता है। चौथी पंक्ति में झरण अनुपयुक्त सा है, इसके साथ-साथ इस पंक्ति में बदलाव करने की भी आवश्यकता है -

जन्म है दुःख, दुःख है मरण

जरा है दुःख, दुःख है क्षरण

जो थोड़ा सा भी सुख मिलता

खो जाता, हो जाता झरण !

में निम्नलिखत परिवर्तन कर देने से कविता में प्रांजलता और मात्राओं में सुधार हो सकता है-

जन्म दुःख है, दुःख मरण है

जरा दुःख है, दुःख क्षरण है

थोड़ा सा भी सुख मिलता जो

खो जाता उस महाशून्य में !

सातवीं पंक्ति में लघु को सूक्ष्ममें बदलने के साथ ही प्रवाह की दृष्टि से पंक्ति में भी परिवर्तन करने की अपेक्षा है

भीतर कोई दर्द है गहरा

एक चुभन सी टीस उठाती,

रह-रह कर लघु लहर कोई

भीतर कोई पीर जगाती !

में निम्नलिखत परिवर्तन कर देने से कविता में प्रांजलता और मात्राओं में सुधार हो सकता है-

भीतर कोई दर्द है गहरा

एक चुभन सी टीस उठाती,

रह-रहकर इक सू्क्ष्म लहर उठ

भीतर कोई पीर जगाती !

12वीं पंक्ति में मात्रा भी कम है और भी प्रवाह नहीं है -

जीवन कितने भेद छिपाए

रोज उघाड़े घाव अदेखे,

जाने कितना बोझ उठाना

जाने क्या लिखा है लेखे !

इसे इस प्रकार कर देने से प्रवाह ठीक हो सकता है

जीवन कितने भेद छिपाए

रोज उघाड़े घाव अदेखे,

जाने कितना बोझ उठाना

है जाने क्या लिखा लेख में !

तेरहवीं पंक्ति में हैको हटाकर और अहम् को अहंकारमें परिवर्तित कर 14वीं पंक्ति में मात्राएँ बराबर करते हुए पंक्ति बदलने के साथ ही प्रवाह की दृष्टि से 16वीं पंक्ति को भी परिवर्तित करने की आवश्यकता प्रतीत होती है

अहम् की दीवार खड़ी है

मेरे-तेरे मध्य, ओ प्रियतम !

बाधा यह इक मात्र बड़ी है

मिलन न होता दूर हैं हम-तुम !

में निम्न प्रकार परिवर्तन कर देने से कविता में प्रांजलता बढ़ती है और मात्राओं में सुधार हो सकता है-

अहंकार की दीवार खड़ी,

हम दोनों में भेद न प्रियतम !

बाधा यह इक मात्र बड़ी है

मिलन कहाँ, है दूर बसे हम।

इसी प्रकार पाँचवें पद की अंतिम पंक्ति में यद्यपि मात्राएँ उपयुक्त हैं तथापि ही” शब्द अनुपयुक्त लगता है, अतः यहाँ पर पहले यह प्रयोग किया जाए तो बेहतर होगा

तू उस पार दिव्य आलोकित

सदा निमंत्रण भेज रहा है,

घन तमिस्र के सूनेपन में

मन ही जिसे सहेज रहा है !


इस प्रकार से -


तू उस पार दिव्य आलोकित

सदा निमंत्रण भेज रहा है,

घन तमिस्र के सूनेपन में

यह मन जिसे सहेज रहा है !

अंतिम पद में दीवारतथा पीड़ाके प्रयोग से एक-एक मात्रा बढ़ रही है -

कैसा सुंदर पल होगा वह

यह दीवार भी ढह जायेगी,

युगों-युगों से जो मन में है

पीड़ा विरह की बह जायेगी !

अतः इनमें बिना अर्थ परिवर्तन किए क्रमशः दिवार तथा पीर कर दिया जाए तो गीत में निखार आ जाता है और मात्राएँ भी समान हो जाती हैं। देखिए -

कैसा सुंदर पल होगा वह

यह दिवार भी ढह जायेगी,

युगों-युगों से जो मन में है

पीर विरह की बह जायेगी !

प्रस्तुत संशोधन यद्यपि अत्यावश्यक हैं तथापि ये मेरे निजी विचार हैं। अतः रचनाकार अथवा किसी अन्य का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

***

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

आँच-95 - जिन्दगी कहाँ कहाँ....


समीक्षा
आँच-95 - जिन्दगी कहाँ कहाँ....
हरीश प्रकाश गुप्त


डॉ. जेन्नी शबनम एक सजग एवं संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी कविताएँ उनके ब्लाग लम्हों का सफर पर नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। उनकी कविताओं का केन्द्र विन्दु प्रायः स्त्री विमर्श होता है। बावजूद इसके उनकी कविताएँ कोरी बौद्धिक उपज न होकर यथार्थ को स्पर्श करती हैं और उनमें स्त्री संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके भीतर पसरी रिक्ति नितांत सहज तरीके से प्रकट होती है जो अवसर आने पर सुखानुभूति से भी मुख नहीं मोड़ती। इस प्रकार वह कविता को एकांगी होने से मुक्त रख पाती हैं। अभिव्यक्ति उनकी अनुभूति प्रतीत होती है और दायित्वबोध उनका सम्बल। इसीलिए वे सीधे पाठक की अनुभूति से हृदय तक पहुँच बनाती हैं। आज उनकी ऐसी ही एक कविता जिन्दगी कहाँ कहाँ.... (http://lamhon-ka-safar.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.htmlयहाँ चर्चा की विषयवस्तु है। यह कविता उनके ब्लाग लम्हों का सफर पर पिछले सप्ताह ही प्रकाशित हुई थी।

हमारी सामाजिक संरचना कुछ इस प्रकृति की है कि स्त्री जीवन को एक ही समय में कई अलग-अलग चरित्रों को एक साथ जीना पड़ता है। उसे हर स्थित में सामंजस्य बिठाना पड़ता है और यह उसके ही नहीं औरों के भी सुख-दुख का आधार बनता है। कभी-कभी तो परिस्थितियाँ बिलकुल विपरीत होती हैं, तब भी उसे संयम रखते हुए तथा संतुलन बनाते हुए निर्वाह ही करना पड़ता है। तमाम दायित्वबोध सम्मुख होते हैं, तब अपनी चाहतें गौण हो जाती हैं। विस्थापन उसकी नियति है जिसमें उसे अपनी जड़ों को त्यागना पड़ता है, अपने अस्तित्व को मिटाना पड़ता है। हालाँकि इसकी कसक और पीड़ा मन के एक कोने में हाथी पाँव की तरह आसन जमाए रहती है। उसकी अपनी पहचान आश्रित हो जाती है। हालाकि यह बहुत कठिन स्थिति होती है, लेकिन, बावजूद इसके, प्रत्येक स्त्री को इसे जीना पड़ता है। वह इसे एक सम्बल के साथ जीती भी है और इसे अपने जीवन का अटूट अंग समझती हुई इसे ही जिन्दगी मानती है। 


अपने प्रिय के सान्निध्य और प्रेम के विश्वास में उसकी वेदना तिरोहित हो जाती है। वियोग की अवस्था में भी वह बहुतों के संतोष के लिए तमाम कृत्रिमताओं के साथ जीते हुए भी वह बिलकुल निजी और एकांत के क्षणों में अपने स्वाभाविक चरित्र को बचाए रखती है और अपने प्रिय के स्मरण के साथ आत्मिक सुख और सुरक्षा अनुभव करती है। अनेक सुखद और पीड़ादायक स्मृतियाँ क्रमशः आती जाती हैं। मन विचारों में खोता है और अपने अस्तित्व व पहचान की तलाश में इन तमाम चरित्रों के बीच भटकता है। अन्तर्मन में पीड़ा गहराती है। उसे लगता है कि उसका अपना व्यक्तित्व दब गया है, उसकी पहचान समाप्त हो गई है। अन्दर छटपटाहट होती है। वह जीना चाहती है असलियत, अपना मूल स्वभाव। अब नहीं जीना चाहती अनेक चेहरे, अलग-अलग आवरणों के साथ। स्त्री का कोमल स्वभाव जहाँ एक गुण है वहीं व्यावहारिक जीवन में एक कमजोरी भी साबित होता है। उसे अपने स्त्री होने का बोध है इसीलिए अपने सम्मान और स्वाभिमान के लिए अपने प्रिय के सम्बल की आस रखती है। इसी भावभूमि पर रची गयी डॉ. जेन्नी शबनम की यह कविता स्त्री स्वाभिमान की मुखर अभिव्यक्ति है। देश की करोड़ों स्त्रियों की नियति कुछ ऐसे ही चरित्र की है और वे अपने सम्मान और पहचान से अबोध बने बस जीवन जीती मात्र हैं। डॉ. जेन्नी की नायिका इस सामाजिक रीति, नियति और ढर्रे से विद्रोह नहीं करती, बल्कि संस्कारों के दायरे में रहकर प्रतिकार करते हुए अपनी पहचान और सम्मान की रक्षा की दिशा में कदम बढ़ाने को तत्पर होती है।

डॉ. जेन्नी शबनम इस कविता के माध्यम से परम्परागत नारी की उस पीड़ा को व्यक्त करती हैं जो उसके अपने वास्तविक व्यक्तित्व के दमित होने और उसके खोने की पीड़ा से उद्भूत है। वह पहचान और सम्मान की रक्षा को आतुर परम्परागत नारी की वेदना को प्रखरता से स्वर प्रदान करती हैं। इसके साथ ही वे स्त्री जीवन के विरोधाभास को भी व्यक्त करना चाहती हैं। यह अर्थपूर्ण कविता भाव सम्प्रेषण में सफल है। 


लेकिन कविता के शिल्प में कवयित्री की शिथिलता स्पष्ट दृष्टिगत होती है। कविता में एकाधिक स्थानों पर अनावश्यक शब्द प्रयोग हुए हैं जो कविता पर बोझ स्वरूप हैं और काव्य की आभा को क्षीण करते हैं। जैसे –
तुम्हारी निशानदेही पर
साबित हुआ
कि ज़िन्दगी कहाँ कहाँ है
और कहाँ कहाँ से उजड़ गई है !
में कि, औरहै नाहक ही प्रयोग हुए हैं। कविता के अर्थग्रहण में इनकी कोई आवश्यकता नहीं है। पंक्ति के विभाजन से इनका अर्थ तो स्वयमेव अन्वित हो ही रहा है।


इसी तरह
या फिर देहात की औरतें
जैसे भोर में गीत गुनगुनाते हुए
रोपनी करती हैं या फिर
धान कूटते हुए
लोक गीत गाती हैं,
मुझमें वैसे हीं उतर गए तुम।

इन पंक्तियों में या फिर की पुनरुक्ति शोभा नहीं बनती और भोर में रोपनी यहाँ सदोष आ गया है क्योंकि खेत में रोपनी का कार्य निश्चय ही भोर में नहीं हुआ करता।
हर दिवस के अनुरूप !
और जब मैं रात्रि में अपने केंचुल में समाती हूँ।
में पहली पंक्ति विशेष अर्थ नहीं रखती और यदि प्रयोग भी हुआ है तो शब्द योजना तो अनुरूप होनी चाहिए। हर के साथ तत्सम दिवस अटपटा प्रयोग है। इसी प्रकार यहाँ रात्रि के स्थान पर रात ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।और का प्रयोग अनावश्यक है। इसी प्रकार का अनावश्यक भार कविता से उतार देने पर यह कविता शिल्प की दृष्टि से कस जाती और आकर्षक भी बन जाती है। 


कविता का विशेष आकर्षण इसमें प्रयुक्त नए बिम्ब हैं। जैसे –
एक लोकोक्ति की तरह / तुम बसे हो मुझमें
और
देहात की औरतें
जैसे भोर में गीत गुनगुनाते हुए
रोपनी करती हैं या फिर
धान कूटते हुए
लोक गीत गाती हैं,
मुझमें वैसे हीं उतर गए तुम।
ये बिम्ब न केवल देशज प्रतीति कराते हैं, बल्कि बड़े आत्मीय से भी लगते हैं। केंचुल भी अपने मूल स्वभाव को दर्शाने वाला बिलकुल सार्थक प्रयोग बन गया है। 


संक्षेप में कहें तो डॉ. जेन्नी शबनम की यह कविता बहुत ही भाव प्रधान है, हृदयस्पर्शी है, लेकिन शिल्प की ईषत् शिथिलता के कारण अपेक्षित उत्कर्ष को प्राप्त नहीं हो सकी है।

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

आँच-94 - प्रभुसत्ता निर्भर है कबाड़ी पर


समीक्षा

आँच-94 - प्रभुसत्ता निर्भर है कबाड़ी पर

हरीश प्रकाश गुप्त

श्री श्याम नारायण जी मिश्र एक समर्थ गीतकार हैं। उनके नवगीत इस ब्लाग पर नियमित प्रकाशित हो रहे हैं। वे सहज शब्दों को इतनी आकर्षक शब्दयोजना में व्यवस्थित कर पाठक के सामने प्रस्तुत करते हैं कि उनके बिम्ब मुखर हो उठते हैं और भाषा में नवीनता एवं लालित्य

उत्पन्न करते हैं। भावों की गहनता और प्रांजलता उनके गीतों की विशिष्टता है। उनके बिम्ब प्रायः

ग्राम्य होते हैं, इसलिए जो पाठक उस परिवेश से या उस शब्दावलि से परिचित नहीं होते उनके लिए वे दुरूह हो जाते हैं। उनका यह नवगीत प्रभुसत्ता निर्भर है कबाड़ी परअभी पिछले सप्ताह ही इसी ब्लाग पर प्रकाशित हुआ था। यह नवगीत भी उनकी इसी विशिष्टि के अनुरूप तथा बहुत सरल शब्दों में वर्तमान

राजनीतिक नेतृत्व की दिशा और दशा पर तीखा व्यंग्य करता है, तथापि इस नवगीत में प्रयुक्त बिम्ब बहुत आसान हैं और परिस्थिति का बहुत ही सजीव और स्पष्ट चित्रण करते हैं।

आज की राजनीति के क्षितिज पर जो शीर्ष जो व्यक्तित्व विराजमान हैं, मिश्र जी की वक्रोक्ति उनमें से अधिकांश पर सर्वथा सत्य प्रतीत होती है। न कोई गरिमा है, न कोई गम्भीरता। बस, दूसरे को नीचा दिखाकर आगे बढ़ने, स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की वृत्ति। सदाचार और मर्यादा, जो कभी भारतीय नेतृत्व का शिष्टाचार हुआ करता था, आज उनसे नाता दूर-दूर तक छूट चुका है। स्वार्थपरता के आगे जैसे सभी प्रतिमान लुप्तप्राय हो गए हैं। योग्यता हो न हो, उन्हें बस सबसे आगे रहना है, सबसे आगे। भले ही इसके लिए उन्हें कैसे भी, कितने भी घिनौने और ओछे कृत्य ही क्यों न करने पड़ें

कीर्ति की पहाड़ी पर

चढ़ने को आतुर हैं बौने।

उन्हें बस अपनी उच्चता साबित करनी है। आदर्शों की कौन कहे, सब एक दूसरे पर ही कीचड़ उछालने में व्यस्त हैं। अपनी खोट का गुणगान और दूसरों की अच्छाइयों में भी दोषान्वेषण ही स्वभाव बन गया है।

अपने मुंह मियां मिट्ठू बने

बात अपने पुण्य की

कहते नहीं थकते।

इसी प्रकार के भावों को राष्ट्रकवि दिनकर जी अन्य सन्दर्भ में अपने ओजपूर्ण शब्दों में कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं - सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे /
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे। हालाकि वह अपनी शैली में दिशा निर्देशन भी करते हैं क्योंकि उनकी प्रकृति मूकदर्शक की नहीं है और वह हार मानने वालों में भी नहीं हैं।

आजकल तो ऐसे लोगों के चेहरों के पीछे का छिपा सच उजागर होने की जैसे प्रतिस्पर्धा सी छिड़ गई है। आए दिन इसी तरह की एक न एक घटना से हमारा साक्षात्कार होता रहता है। तब, जिन्हें हमारा आदर्श बनना चाहिए, जिन्हें हमारी प्रेरणा का श्रोत होना चाहिए और जिनका हमें आदर और सम्मान करना चाहिए उन पर विश्वास करना कठिन हो गया है। कुसंस्कारों से सम्पन्न ऐसे व्यक्तित्वों का यह छिछलापन सर्वत्र जाहिर है। जिनका लक्ष्य लोक के प्रति त्याग, सेवा और समर्पण न होकर सिर्फ आत्मरंजना बन कर रह गया है। इसलिए जहाँ सुख, चैन और शान्ति होनी चाहिए वहाँ अशान्ति और अराजकता का साम्राज्य स्थापित है

गंधमादन घाटियों में

जल रहीं

आयात की

बारूदी उदबत्तियां।

इन लोगों से अधिक अपेक्षा भी नहीं है क्योंकि अनाचार के मद में मग्न

रास-रंग में डूबे

उथले मन वाले लोग -

हैं, इनकी न कोई दिशा है और न ही कोई आदर्श। इन लोगों के जो अपने संस्कार हैं, भावी पीढ़ी को उससे बेहतर संस्कार दे भी नहीं सकते।

दुधमुहों के

मृदुल अधरों पर

आचरण का एक अक्षर

धर नहीं सकते।

समग्र में उनका व्यक्तित्व, कवि के शब्दों में, व्यक्तित्व नहीं कूड़ा-करकट अर्थात ‘कबाड़’। दुर्भाग्य है कि हमारा भविष्य, मान-सम्मान और गरिमा, सभी उन्हीं पर निर्भर है, क्योंकि वे ही आज हमारे नियंता बने बैठे हैं।

पुरखों की थाती

यश-गौरव, प्रभुसत्ता

सब कुछ तो निर्भर है

आजकल कबाड़ी पर।

ऐसा लगता है कि यही हमारी नियति बन गई है। यह वर्तमान समय की सच्चाई है। सामान्य जन इनके भटकाव से आहत है, उसे इसकी पीड़ा है, छटपटाहट है।

मिश्र जी का यह नवगीत कुछ इसी भावभूमि पर रचा गया है। यह नितांत सुगम और सहज बोधगम्य है। जो सच मिश्र जी ने बरसों पहले अनुभव किया था वह आज पूर्णतया प्रत्यक्ष हो उठा है। यह जन-जन की अनुभूति है इसीलिए यह नवगीत पाठकों पर अपना प्रभाव बड़ी आसानी से छोड़ता है। पूरे गीत में नवगीत की लय है और भाव अपने उत्कर्ष पर हैं। मिश्र जी के देशज प्रयोग मन को मोह लेते हैं। वैसे तो गीत के सभी बन्द विशिष्ट हैं, लेकिन ये बन्द बहुत ही आकर्षक हैं तथा अन्तः को स्पर्श करते हैं और प्रभावित करते हैं

दुधमुहों के

मृदुल अधरों पर

आचरण का एक अक्षर

धर नहीं सकते।

और

कीर्ति की पहाड़ी पर

चढ़ने को आतुर हैं बौने

बैठकर प्रपंचों की

पुश्तैनी गाड़ी पर

और आकर्षक बन गए हैं।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

आँच - 91 –पर ‘वेदना’

समीक्षा

आँच-91 – वेदना

[clip_image002%255B4%255D.jpg]हरीश प्रकाश गुप्त,

मेरा फोटोसतीश सक्सेना जी की यह कविता “वेदना” उनके ब्लाग “मेरे गीत” पर विगत 21 सितम्बर, 2011 को प्रकाशित हुई थी। कविता के भाव बहुत मर्मस्पर्शी और स्वाभाविक हैं। सतीश जी ने सरल शब्दों में इसे इस प्रकार वास्तविक-सा प्रस्तुत किया है कि कविता सजीव हो उठी है। यह वर्तमान सामाजिक परिवेश का यथार्थ है, जन-जन की अनुभूति है। निश्चय ही उन्होंने समाज के इस चेहरे को बहुत समीप से व बहुत स्पष्ट रूप में देखा है तथा अनुभव किया है और इसको ही उन्होंने इस गीत के माध्यम से शब्द देने का प्रयास किया है। इसीलिए उनका चित्रण पाठक के बिलकुल करीब पहुँच संवेदना जगाता है।

समाज में जहाँ सीधे सच्चे और भोले लोग हैं, जिनके हदय में प्रेम और समरसता है, संवेदना है, आदर है और सहानुभूति है तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो अपने अहं मात्र के पोषण को ही अपना अभीष्ट समझते हैं और इसके लिए वे सब कुछ कर सकते हैं जो उनके हित में उपयोगी हो सकता है। भले ही इससे किसी की भावनाएं आहत हों या उनकी अपेक्षाओं को कितनी भी ठेस पहुँचे। इस गलाकाट पर्तिस्पर्धा में आगे बढ़ने के क्रम में मची होड़ में व्यक्ति का व्यक्ति में अविश्वास उपजा है तो कुण्ठा, शंका, असहिष्णुता और संयमहीनता आदि ने स्थायीभाव का रूप ग्रहण कर लिया है और लोगों में आपसी द्वेष, बैर, तिरस्कार, घृणा आदि भाव दिखने लगे हैं। वास्तव में व्यक्ति के अन्दर इन अवगुणों का समावेश अनेकानेक कुण्ठाओं, सीमाओं और संकीर्णताओं के कारण होता है तथा वह इन आग्रहों के चलते प्रवेश के द्वार बन्द कर दिए होते हैं। वह इससे इतर न तो कुछ जान पाता है और न ही कुछ समझ पाता है। वह यह भी नहीं समझ पाता कि उसके बर्ताव से किसी को कितना आघात पहुँचा है। उसका अनुमान की सीमा से परे आचरण दूसरों के लिए पीड़ा और कष्ट का कारक बनता है। ऐसे में एक सरल संवेदनशील हृदय बहुत आहत होता है। उसकी वेदना फूट पड़ती है, लेकिन धारा का मुख भीतर की ओर ही रहता है। यद्यपि उसे उनसे ईषत् निराशा है, लेकिन इसके बावजूद, अपने दर्द को उद्घाटित करने या प्रतिक्रिया करने के बजाए वह अपने भीतर आशा की ज्योति दीप्यमान रखता है।

कविता में जब बिम्बों के माध्यम से अभिव्यक्ति होती है तो ही कविता दुरूह बनती है। सतीश जी की यह कविता सीधे शब्दों में बात करती है। न कोई अधिक लाग, न अधिक लपेट, न ही गूढ़ निहितार्थ। यथार्थ का सहज, सुगम और प्रांजल प्रकटीकरण। सतीश जी के विषय सामाजिक धरातल पर प्रमाणित होते हैं। वे उनको शब्दों के जाल में इस प्रकार बुनते हैं कि चित्रण वास्तविक प्रतीति कराते हैं और पाठक के मस्तिष्क में अपने आसपास का ही चित्र उभर आता है। जिस कारण पाठक उनसे सहजता से जुड़ जाता है। सतीश जी भाषा में सरल हैं, परन्तु उनकी कविताएं भाव में गहराई लिए होती हैं। यही उनकी विशेषता है। यह कविता भी इसका अपवाद नहीं है, बल्कि यों कहें कि यह कविता बहुत सुगठित है और इसके भाव आत्यंतिक हैं तो अतिशयोक्ति न होगी और इसीलए यह कविता बहुत आकर्षक बन गई है।

कविता के अंतिम पद की रचना सतीश जी की नहीं है, जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकार किया है। उल्लेखनीय यह भी है कि राकेश खण्डेलवाल जी रचित उक्त पद ने कविता को आत्मसात कर लिया है और सम्पूर्ण कविता में इस कदर रच-बस गया है कि यदि बताया न गया होता कि यह किसी और की रचना है तो पाठक को इसका भेद करना कठिन ही बना रहता। इसकी अंतिम पंक्ति ले जाए नौका दूसरे तट, हम पाल चढ़ाए बैठे हैं में “दूसरे तट में प्रवाह में अवरोध आता है। यदि इसे ले जाए नौका और कहीं, हम पाल चढ़ाए बैठे हैं कर दिया जाए तो प्रांजलता आ जाती है। इसी प्रकार पूर्व पद में अपने जख्मों को दिखलाते, वेदना अन्य की क्या समझें” में अन्य” के स्थान पर किसी कर देने से भाव भी परिवर्तित नहीं होते और प्रवाह दर्शनीय हो जाता है। इसी पद में रिश्ते परिभाषित करती हो में करती स्त्रीवाची प्रयोग हुआ है जो शेष कविता के अर्थ की दिशा को भटकाता है। तीसरे पद में प्रयुक्त पंक्तियों इस बाल हृदय, को क्यों तुमने, इस तीखेपन से भेद दिया में कर्तृ वाच्य प्रयोग हुआ है जबकि शेष कविता कर्म वाच्य में है, अतः इसे अनुरूप बनाए जाने की आवश्यकता है। यह कविता में दोष दर्शन नहीं है, बल्कि मेरे सुझाव मात्र हैं।

***

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

आँच - 86 : परिष्कॄत हिन्दी - सामन्य त्रुटियों पर विचार

आँच-86

परिष्कृत हिन्दीः सामान्य त्रुटियों पर विचार

- हरीश प्रकाश गुप्त

आँच के नियमित अंकों में प्रायः काव्य और गद्य रचनाओं पर चर्चा होती रही है। कुछ प्रंसग शास्त्रीय चर्चा के भी आए हैं। कभी पाठकों की जिज्ञासा के समाधान के लिए तो कभी आलोचना कर्म और पाठक के बीच की प्रच्छन्न रिक्ति की पूर्ति के लिए। बलात अधिरोपण के लिए नहीं बल्कि विषय को सहज, सरल और ग्राह्य बनाने के संकल्प के साथ। आज का अंक भी उसी दिशा में एक चरण मात्र है।

जिस प्रकार मानव जाति की सहज वृत्ति होती है कि जब वह दूसरों के सामने उपस्थित होता है तो वह बन-सँवरकर, ठीक से पहन-ओढ़कर सलीके से सामने आता है, ताकि लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़े और लोग उसे सभ्य, सुसंकृत और शिक्षित समझें। समाज में भिन्न-भिन्न तरह के लोग हैं तो उसी प्रकार उनका बनना-ठनना, सजना-सँवरना भी भिन्न-भिन्न ही है। भाषा की भी स्थिति भी कमोवेश वैसी ही है और वैसी ही अपेक्षा रखती है अर्थात् जैसी रचना हो उसी के अनुपरूप उसकी भाषा, शैली हो, उसका साज-शृंगार और अलंकरण हो। गद्य की भाषा कुछ अलग है तो काव्य की भाषा नितांत अलग है। नाटक की भाषा की प्रकृति उन दोनों से थोड़ी भिन्न। रचना का स्वरूप उसका निर्माता अर्थात रचानाकार, साहित्यकार तय करता है। तो रचना के लिए उपयुक्त भाषा का चयन भी उसी का दायित्व है। अच्छी भाषा के लिए आवश्यक है कि उपयुक्त शब्दों का चयन किया जाए। अनावश्यक शब्द एक भी न आने पाएं, नहीं तो ये नाहक अवरोध उत्पन्न करते हैं । तभी भाषा का परिष्कार है।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं जैसे, स्कूल जाता हूँ तो बीमार पड़ सकता हूँ, नहीं जाता तो जरूरी कक्षा छूटती हैइस वाक्य में में जाता हूँ और नहीं जाता में एक में सहायक क्रिया हूँ का प्रयोग हुआ है और दूसरे में नहीं। यदि दूसरे उपवाक्य में भी नहीं जाता हूँ प्रयोग कर दिया जाता तो व्याकरण की दृष्टि से यह प्रयोग गल नहीं होता, लेकिन इसे उपयुक्त प्रयोग नहीं कहा सकता। यह बाद वाला हूँ बलात् घुसा हुआ लगता है। भाषा किसी भी प्रकार की जबदस्ती स्वीकार नहीं करती। वह तो नदी की धारा की तरह प्रवाहित होती है। जिधर सुगम रास्ता मिलता है, नियमों और सिद्धान्तों की सीमा का न्यूनाधिक त्याग करते हुए उधर ही मुड़ जाती है। वही प्रयोग सुप्रयोग व सम्यक प्रयोग कहा जाता है और यही भाषा कौशल को प्रतिष्ठित करता है।

हिन्दी वाक्य संरचना का अपना व्यवस्थित क्रम है कर्ता, कर्म और क्रिया व सहायक क्रिया। तथापि हिन्दी भाषा में पद का स्थान परिवर्तन करके भी वाक्य रचना की मान्यता है। लेकिन यह केवल विशेष अर्थ की स्थिति में ही है, अन्यथा पद क्रम परिवर्तन हास्यापद के सिवा कुछ नहीं होगा। कभी-कभी वाक्य में किसी शब्द पर अधिक जोर देना होता है। सामान्य समझ है कि जिस शब्द का प्रयोग पहले किया जाता है, बल उसी पर होता है। लेकिन स्थिति भिन्न है। प्रायः जो पद बाद में प्रयुक्त पद ही सूक्ष्म अर्थ का नियमन करता है। जैसे पैसे से काम बनता है। एक साधारण वाक्य है। अब पैसे को थोड़ा आगे ले चलते हैं - काम पैसे से बनता है। पहले वाले वाक्य में काम के लिए पैसे का कोई विशेष प्रभाव नहीं था। इस वाक्य में काम के लिए पैसे का प्रभाव स्पष्ट हो रहा है। अब पैसे को बिलकुल अंत में ले जाते हैं काम तो बनता है भई, पैसे से। अर्थात् काम पैसे के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से नहीं बन सकता। यही अन्तर प्रश्न वाचक वाक्य में भी दिखता है। जैसे क्या मोहन कल आफिस आएगा ? एक साधारण प्रश्न है। अब क्या का स्थान बदलते हैं। मोहन क्या कल आफिस आएगा ? अब इस वाक्य में प्रश्न साधारण नहीं रहा। मतलब, मोहन को कल आफिस आना नही है, परन्तु यह प्रश्न उसके आने की सम्भावना का वाचक है। वहीं क्या को जब बिलकुल अंत में लगाते हैं - मोहन कल आफिस आएगा क्या? तब प्रश्न विस्मय का वाचक होता है। अर्थात मोहन को कल आफिस आना नहीं था और यदि वह कल आफिस आता है तो यह आश्चर्यजनक होगा। यह है पद का स्थान बदलने से अर्थ का सूक्ष्म परिवर्तन। यद्यपि पद का स्थान बदलने से स्थूल अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन बलाघात से यह विशेष अर्थ में परिवर्तित होता है। यह सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि रखने वाले समझ सकते हैं। संक्षेप में कहना होगा कि शब्दों के यथास्थान प्रयोग से ही अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति होती है।

एक और कठिनाई है, अन्विति की। अन्विति अर्थात अनुरूपता। इसे तर्कसंगति भी कह सकते हैं। सरल शब्दों में कहें तो जिस पद की तार्किक रूप से संगति जिस पद के साथ उपयुक्त होती है, प्रयोग क्रम में वही पद आना चाहिए। बोलचाल की सामान्य भाषा में हमसे अन्विति सम्बन्धी चूक अधिकतर होती रहती है, लेकिन बलाघात से अथवा भाव के अनुसार अर्थ ग्रहण कर लिया जाता है। परन्तु, लेखन में वह दोष के रूप में उभर कर सामने आता है। जब हम किन्हीं दो वाक्यों को किसी शर्त के साथ आपस में संयोजित करते हैं तो उनका योजक अव्यय पहले वाले के अनुरूप होना चाहिए। जैसे यदि मैं कल आफिस आया तो यह काम अवश्य करूँगा। जैसे कमला काम करती है, रमा वैसे नहीं कर पाती। चूँकि गंगा में पानी बढ़ गया है, इसलिए किनारे बसे लोग गाँव छोड़कर चले गए हैं। इसी प्रकार जब-तब, जैसे-वैसे, जैसे-जैसे - वैसे-वैसे, यद्यपि-अतएव आदि ऐसे ही योजक अव्यय हैं। हिन्दी में कर्ता के लिंग के अनुसार क्रिया भी परिवर्तित होती है। एक से अधिक संज्ञायें आने पर कभी-कभी लोग चकरा जाते हैं कि क्रिया एकवचन होगी या बहुवचन और यदि संज्ञाएं विभिन्न लिंग वाली हैं तो यह कार्य और मुश्किल हो जाता है। अतः यदि एक समान लिंग वाली संज्ञाएं और, एवं, तथा, व, योजकों से जुड़ी होंगी तो क्रिया लिंगानुसार बहुवचन होती है और यदि संज्ञाएं विभिन्न लिंग वाली हैं तो क्रिया पुल्लिंग बहुवचन। राम, श्याम और लखन स्कूल जाते हैं। सीता, गीता और रमा स्कूल जाती हैं। लेकिन राम, श्याम और रमा स्कूल जाते हैं। यही क्रिया की अन्विति होगी। इसी तरह या, अथवा जैसे विकल्प देने वाले योजक से जुड़ने पर क्रिया का रूप अन्तिम संज्ञा के लिंग और वचन से निर्धारित होगा। विशेषण संज्ञा के यथासम्भव समीप रहना चाहिए और क्रिया-विशेषण क्रिया के, अन्यथा अर्थ ग्रहण करने के लिए अतिरिक्त माथापच्ची करनी पड़ सकती है।

अब शब्द के पर्याय की बात करते हैं। कहने को तो एक शब्द के समानार्थी अनेक शब्द होते हैं। पर्यायवाची हम प्राइमरी कक्षाओं से पढ़ते ही चले आ रहे हैं। एक-एक शब्द के दस-दस बीस-बीस पर्याय। यहाँ पर प्रश्न यह है कि क्या सभी पर्यायवाची समान वजन का अर्थ रखने वाले होते हैं। तो उत्तर है नहीं। स्थूल रूप में वे एक समान दिखते हैं परन्तु सूक्ष्म अर्थ में भिन्न होते हैं। जैसे - जलज, नीरज और पंकज सभी कमल के पर्यायवाची कहे जाते हैं। जब केवल फूल का नाम भर लेना होगा तो कमल पर्याप्त है। लेकिन ये सभी पर्याय विशेष अर्थों के वाचक हैं जो पवित्र जल में जनमे वही जलज है। स्वच्छ पानी में पैदा होने वाला नीरज और पंक अर्थात कीचड़ में उगने वाला ही तो पंकज हो सकता है। साहित्य सृजन में जब तक अर्थ की इस सूक्ष्मता पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक रचना की भाषा उत्कृष्ट नहीं कही जा सकती।

एक प्रयोग देखिए संस्कृत की एक धातु नी से बना है नयन और उसी से नेत्र भी बना है। दोनों का मायने भी एक है आँख। व्युत्पत्ति भी समान है। अर्थात् जो आगे ले चले अथवा रास्ता दिखाए वही नेत्र है और वही नयन भी। नेत्र से ही व्यु्पन्न है नेता। इसका भी मतलब वही है - जो आगे ले चले अथवा रास्ता दिखाए। लेकिन तीनों में बहुत अन्तर है। एक के स्थान पर दूसरे का प्रयोग कदापि नहीं होता है। नेता तो बिलकुल अलग अर्थ में प्रयुक्त होता है। नेत्र में त् और र का संयोग रुक्ष है और कर्कश भी है, साथ ही जिह्वा को अधिक कसरत करनी पड़ती है। जबकि नयन सरल और कोमल सा शब्द है। यह मधुर भी और कर्ण प्रिय भी। अतः जहाँ कोमल भावों को अभिव्यक्त करना होगा वहाँ नयन अधिक मनभावन लगेगा। इसीलिए वीररस को छोड़कर काव्य में नयन ही अधिक प्रयोग होता है। स्त्री की सुन्दरता की उपमा के लिए मृगनयनी प्रयोग किया जाता है। मृगनेत्री कभी प्रयोग नहीं होता। यह न तो कोमल है और न ही सहज। लेकिन इसके विपरीत जब कठोरता और वीरता के भाव भरने होंगे तब नयन उपयुक्त नहीं होगा। वहाँ रुक्ष और कठोर नेत्र ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होगा। उसके नेत्रों में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी अथवा उसके नेत्र क्रोध से जलने लगेन कि ऐसे प्रयोग उपयुक्त लगेंगे - उसके नयनों में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी या फिर उसके नयन क्रोध से जलने लगेऐसे एक-आध उदाहरण नहीं हैं बल्कि अनेकानेक हैं। ये तो प्रसंग मात्र स्पष्ट करने के लिए हैं।

हिन्दी प्रयोगधर्मा भाषा है। वह स्वाभाविक प्रयोगों की दिशा में बढ़ती है और उनके अनुरूप परिवर्तनशील है। यही हिन्दी की विशिष्टता है। हिन्दी की इस विशिष्टि को अपने प्रयोग-कौशल से रचना में ढालना रचनाकार की योग्यता और भाषा सम्बन्धी उसके ज्ञान विस्तार पर निर्भर है। वैसे ही, जैसे एक कुशल योद्धा ही उत्तम शस्त्र का प्रयोग कर विजयश्री प्राप्त करता है, अन्यथा शस्त्र की उत्तमता क्या मायने रखेगी? यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार अत्यधिक सौन्दर्य प्रसाधन के प्रयोग से स्त्री के सौन्दर्य की प्राकृतिक आभा क्षीण हो जाती है, उसी प्रकार अतिरंजना भाषा में विकार उत्पन्न करती है, उसके सौन्दर्य को भ्रष्ट करती है। कृत्रिम सौन्दर्य में सहज आकर्षण न्यून हो जाता है। अतः भाषा-प्रयोग में अतिरंजना से बचते हुए सदैव सजगता बरतनी चाहिए।

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