सोमवार, 19 जनवरी 2026

432. बुनियादी शिक्षा या नई तालीम

गांधी और गांधीवाद

432. बुनियादी शिक्षा या नई तालीम

1944

गांधीजी के अहिंसा के हथियारों में सबसे ज़रूरी था बेसिक शिक्षा या शिक्षा की नई प्रणाली। बुनियादी शिक्षा या नई तालीम गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण क़दम था। यह अपने कॉन्सेप्ट में जितनी क्रांतिकारी थी, अपने दायरे में उतनी ही महत्वाकांक्षी भी थी। इसकी गतिविधियों को पूरा करने के लिए उन्होंने हिंदुस्तानी तालीमी संघ की स्थापना की थी। इसे कुछ विद्वानों ने विचार करने वाला हाथ कहा, जो मनुष्य और समाज के आर्थिक विकास को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक होता है। मनुष्य की सम्पूर्ण शिक्षा किसी एक बुनियादी हस्त-उद्योग द्वारा दी जा सकती है। इसका लक्ष्य एक ऐसी अहिंसक, अशोषक समाज-व्यवस्था का निर्माण करना है, जिसमें स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा के आदर्श पूरी तरह सिद्ध किए जा सकें। गांधीजी ने उसे अपने सारे रचनात्मक कार्यक्रम का सारी प्रवृत्तियों का सार ("all-in complex") बताया था।

यह एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली थी जो अपना ख़र्च ख़ुद निकाल सके। इसमें शिक्षार्थी अपने ही प्रयत्नों से स्वस्थ, सभ्य और सुसंस्कृत जीवन के साधन जुटा पाते। जिससे विद्यार्थियों की बुद्धि का ही नहीं बल्कि उसकी शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों का भी विकास हो सकता। गांधीजी का कहना था कि मनुष्य जीवित रहने के लिए जो कुछ अपने हाथों से करता है, उसका असर उसके विचार और व्यवहार पर तथा सारे दृष्टिकोण पर मौखिक शिक्षा की अपेक्षा अधिक पड़ता है। किसी समाजोपयोगी हस्त-उद्योग शिक्षण और अभ्यास का उसके कार्य-कारण के साथ अनुबन्ध साधकर बालक की बौद्धिक ही नहीं परन्तु शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों का भी पूरा विकास किया जा सकता है।

वे चाहते थे कि बुनियादी शिक्षा एक प्रयोगशाला हो, जहां बच्चों को उनके और उनके गांवों के सामने आनेवाली व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन की समस्याओं का अहिंसक और लोकतांत्रिक ढंग से हल निकालना सिखाया जाए। फलस्वरूप जब वे जीवन में प्रवेश करें तो वे न केवल ज़रूरी ज्ञान के साथ, बल्कि पहल करने, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की भावना के साथ पूरी तरह तैयार हों, जो उन्हें करके सीखने के अनुभव से मिली हो। गांधीजी चाहते थे कि कताई-बुनाई और उससे जुड़ी प्रक्रियाएं बुनियादी शिक्षा का माध्यम बनें। एक युवा अंग्रेज, जिसने बर्मा मोर्चे पर रॉयल एअर फोर्स की इंटेलिजेंस ब्रांच में काम किया था, सेवाग्राम में हिंदुस्तानी तालीमी संघ की एक बैठक में शामिल होने के बाद टिप्पणी की: "मैंने दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं देखा है। वे एकमात्र ऐसे लोग हैं जो अपना लक्ष्य और उसे हासिल करने के व्यावहारिक तरीके जानते हैं।"

गांधीजी को कताई, बुनाई और उनसे जुड़ी प्रक्रियाओं से खास लगाव था, क्योंकि वे बुनियादी शिक्षा का माध्यम थीं। इसका कारण उनकी सार्वभौमिकता, इंसान की एक ज़रूरी ज़रूरत से उनका संबंध और कम खर्च था। उन्होंने कहा कि अगर यह प्रयोग कुशलता से किया जाता है, तो स्कूल का काम - शिक्षक और बच्चे मिलकर - कुल मिलाकर स्कूल के मौजूदा खर्च को पूरा कर लेगा, यानी शिक्षकों के भरण-पोषण और स्कूल के आकस्मिक खर्चों का इंतज़ाम हो जाएगा। आत्मनिर्भरता को एक शर्त के रूप में नहीं, बल्कि प्रयोग की दक्षता की कसौटी के रूप में रखा गया था।

1936 में बुनियादी शिक्षा के प्रचार के लिए हिन्दुस्तानी तालीमी संघ की स्थापना की गई थी। 1944 में जेल से आने के बाद गांधीजी ने बुनियादी शिक्षा के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए। गांधीजी ने बेसिक शिक्षकों को संबोधित करते हुए चेतावनी दी, "हमें अपनी मौजूदा उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए: हमें बच्चों के घरों तक पहुँचना होगा। हमें उनके माता-पिता को शिक्षित करना होगा। शिक्षा का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। इसमें जीवन के हर पड़ाव पर हर किसी के लिए शिक्षा शामिल होनी चाहिए। एक बेसिक स्कूल शिक्षक को खुद को एक सार्वभौमिक शिक्षक समझना चाहिए। जैसे ही वह किसी के संपर्क में आता है, चाहे वह पुरुष हो या महिला, जवान हो या बूढ़ा, उसे खुद से कहना चाहिए, "अब मैं इस व्यक्ति को क्या दे सकता हूँ?"

मान लीजिए कि मुझे कोई बूढ़ा आदमी मिलता है जो गंदा और अनपढ़ है... यह मेरा काम होगा कि मैं उसे सफ़ाई सिखाऊँ, उसकी अज्ञानता दूर करूँ और उसकी सोच का दायरा बढ़ाऊँ। मुझे उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि मैं उसका टीचर हूँ। मैं उसके साथ एक ज़िंदा रिश्ता बनाने की कोशिश करूँगा और उसका भरोसा जीतूँगा। हो सकता है कि वह मेरी कोशिशों को ठुकरा दे। मैं हार नहीं मानूँगा बल्कि तब तक कोशिश करता रहूँगा जब तक मैं उससे दोस्ती करने में कामयाब नहीं हो जाता। एक बार जब यह हो जाएगा, तो बाकी सब अपने आप हो जाएगा।

मुझे बच्चों पर उनके जन्म से ही नज़र रखनी होगी। मैं एक कदम और आगे बढ़कर कहूंगा कि शिक्षाविद का काम तो उससे भी पहले शुरू हो जाता है। महिला बेसिक टीचर गर्भवती माँ के पास जाएगी और उससे कहेगी, "मैं भी माँ हूँ, जैसे तुम बनने वाली हो। मैं अपने अनुभव से तुम्हें बता सकती हूँ कि तुम्हें अपने अजन्मे बच्चे और अपनी सेहत के लिए क्या करना चाहिए।" वह पति को बताएगी कि पत्नी के प्रति उसका क्या कर्तव्य है और होने वाले बच्चे की देखभाल में उसका क्या हिस्सा है। इस तरह बेसिक स्कूल टीचर जीवन के पूरे दायरे को कवर करेगा। स्वाभाविक रूप से उसकी गतिविधि में वयस्क शिक्षा भी शामिल होगी।

मेरी सोच के हिसाब से एडल्ट एजुकेशन को पुरुषों और महिलाओं को हर तरह से बेहतर नागरिक बनाना चाहिए... बेसिक स्कीम के तहत एडल्ट एजुकेशन में खेती एक अहम भूमिका निभाएगी। लिखने-पढ़ने की शिक्षा ज़रूर होनी चाहिए। बहुत सारी जानकारी मौखिक रूप से दी जाएगी। किताबें होंगी - सिखाने वालों के लिए ज़्यादा और सीखने वालों के लिए कम। हमें ज़्यादातर लोगों को सिखाना होगा कि वे अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करें और इसका उल्टा भी। सही तरह की एडल्ट एजुकेशन को छुआछूत और सांप्रदायिकता की जड़ पर ही चोट करनी चाहिए।

हिन्दुस्तानी तालीमी संघ का संविधान इस तरह बदल दिया गया कि उसके क्षेत्र में पूर्व-बुनियादी, उत्तर-बुनियादी या विश्वविद्यालय की शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा का समावेश हो जाए। चरखा संघ, ग्रामोद्योग संघ और हिन्दुस्तानी तालीमी संघ के समन्वय के लिए एक सम्मिलित मंडल की स्थापना की गई। कार्यकर्ताओं को तालीम देने की व्यवस्था की गई। प्रत्येक केन्द्र में एक केन्द्र में एक कार्यकर्ता सिद्धांत को सुनिश्चित किया गया ताकि मौलिकता और उत्तरदायित्व की भावना को पूरा अवसर मिले।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

 

 

रविवार, 18 जनवरी 2026

431. अखिल भारतीय चरखा संघ

गांधी और गांधीवाद

431. अखिल भारतीय चरखा संघ



1944

जेल में रहने के दौरान गांधीजी को यह एहसास था कि हिंसा में विश्वास रखने वालों ने, अपने तरीके से, संघर्ष के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन चिंता की बात यह थी कि अहिंसा को अपना सिद्धांत मानने वालों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता था। सालों पहले, आम लोगों में अहिंसक शक्ति पैदा करने के लिए, गांधीजी ने कई रचनात्मक गतिविधियाँ शुरू की थीं। इनमें मुख्य था हाथ से सूत कातना और बुनाई करना। इस गतिविधि को पूरा करने के लिए, उन्होंने अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना की थी।

अखिल भारतीय चरखा संघ का उद्देश्य था भारत के बुनियादी उद्योग हाथ कताई और हाथ बुनाई को पुनर्जीवन प्रदान करना और उनका विकास करना। ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप यह पारंपरिक उद्योग नष्ट हो गया था। इसका पुनरुत्थान ज़रूरी था, क्योंकि चरखा भारत के स्वतंत्रता संग्राम का साधन और प्रतीक बन गया था। अखिल भारतीय चरखा संघ विश्व की सबसे बड़ी स्वेच्छामूलक सहकारी समिति थी। इसकी पूंजी लगभग 10,00,000 रुपए की थी। इसके द्वारा 1,20,02,430 रुपए का खादी उत्पादन होता था। इसके तहत 30,24,391 कातने वाले, और 3,54,257 अन्य कारीगर काम करते थे। पूरा उद्योग 15,010 गांवों में फैला हुआ था। पिछले 18 वर्षों में इस संस्था ने 4,60,30,081 रुपए मज़दूरी के एवज में काम करने वालों को प्रदान किए थे। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार आन्दोलन को सफल बनाने में इस संघ का महत्वपूर्ण योगदान था। अल्पतम निर्वाह वेतन का सिद्धान्त अपनाने में भी इसने बहुत ही उल्लेखनीय योगदान दिया था। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय समस्त रचनात्मक संगठनों पर भयानक प्रहार हुआ था। खादी भी इससे अछूता नहीं रहा।

अखिल भारतीय चरखा संघ कई दौर से गुज़रा था। पहले दौर में, लोगों में जागरूकता लाने और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार पर ज़ोर दिया गया था। दूसरे दौर में, ज़ोर सामाजिक न्याय के आदर्श को हासिल करने पर चला गया। इसके लिए न्यूनतम गुज़ारे लायक मज़दूरी शुरू की गई। यह प्रयोग पहले दौर में बहुत सफल रहा और आखिरी दौर में सीमित सफलता मिली। "भारत छोड़ो" आंदोलन के दौरान, दमन का सबसे ज़्यादा असर सभी रचनात्मक संस्थानों पर पड़ा था।

गांधीजी जब जेल से निकले तो इस संस्था के घावों पर मरहम लगाने का काम शुरू किया। उन्हें आशा थी कि यह संस्था अहिंसा का उदाहरण प्रस्तुत करके लोगों के उत्साह को सही दिशा में मोड़ेगी और सरकारी दमन का विष उतार सकेगी। अगर वे सफल हो जातीं, तो निराशा और पराजय की भावना के स्थान पर प्रत्येक भारतीय के हृदय में नवीन श्रद्धा और आशा का संचार होता। लेकिन हुआ यह कि वे खुद दमन का शिकार हो गईं। सितंबर, 1944 के पहले हफ़्ते में अखिल भारतीय चरखा संघ के ट्रस्टी सेवाग्राम में मिले। गांधीजी ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, यह जानकर मुझे दुःख हुआ कि सरकार चाहे तो चरखा संघ तोड़ सकती है, लेकिन मैं सरकार की दया पर जीना नहीं चाहता। उन्हें भगवान के अलावा किसी की दया नहीं चाहिए थी। गांधीजी की दृष्टि में खादी और रचनात्मक कार्य अहिंसा के प्रतीक और सामूहिक अहिंसात्मक अनुशासन के विकास के साधन थे। उनके रचनात्मक कार्यों का केन्द्र बिन्दु खादी या चरखा था। इसके बिना भारत के गांवों में असाधारण जागृति होना संभव नहीं था। गांधीजी यह भी मानते थे कि बिना इसके स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती है।

ऐसे में, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि गांधीजी खुद ही चरखा संघ को तोड़ दें और चरखा संघ की संपत्ति गांवों के लोगों में बांट दें? चरखा संघ अपने उद्देश्य में असफल रहा। इसने एक बहुत ज़्यादा केन्द्रीय संस्था के रूप में काम किया। गांधीजी को आशा थी कि संघ प्रत्येक घर में चरखा पहुंचाने का काम करेगा। इस तरह वह दुनिया को दिखा पाते कि चरखे के आधार पर एक अहिंसक समाज कैसे बनाया जा सकता है। लेकिन प्रत्येक घर क्या यह तो प्रत्येक गांव में भी नहीं पहुंच पाया है। यदि चरखा सात लाख गांवों में प्रवेश कर जाता तो दुनिया की कोई शक्ति उसे कुचल नहीं सकती थी। अगर चालीस करोड़ में से एक करोड़ को भी गोली मार दी जाती, तो भी यह उनके लक्ष्य को पाने में देरी नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत, इसे पाने में तेज़ी लाता।

चरखा संघ ने खादी को ज़्यादातर आर्थिक प्रवृत्ति ही समझा। परन्तु गांधीजी ने उसकी कल्पना अहिंसा के प्रतीक के रूप में की थी। संघ खादी के काम के बारे में बहुत ज़्यादा मात्रा पर ध्यान देने वाले या यूँ कहें कि कमर्शियल सोच वाले हो गए थे। नतीजा यह हुआ कि आर्थिक कष्ट-निवारक के रूप में अपने लक्ष्य को तो उसने प्राप्त कर लिया लेकिन अहिंसा के प्रतीक के रूप में उसका महत्व पीछे रह गया। मिशन की भावना जगाने में संघ नाक़ामयाब रहा।

गलती खादी में नहीं थी, बल्कि उन लोगों में थी जो इसे चलाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने खादी के ऊँचे मिशन के बारे में काफ़ी जागरूकता विकसित नहीं की थी। उन्हें खादी की सफलता को प्रोडक्शन और बिक्री के आँकड़ों के आधार पर नहीं, और न ही खादी पहनने वाले लोगों की संख्या के आधार पर मापना चाहिए था, बल्कि उन पुरुषों और महिलाओं की संख्या के आधार पर मापना चाहिए जिन्हें अहिंसा और आत्म-निर्भरता के आदर्शों की स्पष्ट चेतना के साथ अपने प्रयासों से खुद को कपड़े पहनाना सिखाया जा सके।

गांधीजी खादी कार्य को अलग आर्थिक प्रवृत्ति के रूप में न चला कर ग्रामीण जीवन की समग्र जर्जरित अर्थ-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए एक साधन के रूप में चलाना चाहते थे। इसके लिए उच्च शक्ति वाले नए कार्यकर्ताओं की तलाश उन्होंने शुरू की। ऐसा कार्यकर्ता जिसमें न सिर्फ़ श्रद्धा हो बल्कि ज्ञान भी हो। जो अहिंसा की शक्ति और क्षमता को समझ सकें। अहिंसा की भावना अपनाने वाले व्यक्ति के लिए निष्क्रिय रहना असंभव है। गांधीजी का मानना था कि अगर हम अहिंसा की ताकत और असर को समझ पाएं और उसमें गहरा और पक्का विश्वास पैदा कर पाएं, तो हम पूरी दुनिया को यह साबित कर पाएंगे कि यह सबसे बड़ी जीवित शक्ति है। इसके प्रभाव में कोई भी निष्क्रिय या सुस्त नहीं रह सकता। इसलिए, अगर चरखा संघ को उम्मीदों पर खरा उतरना है, तो उसमें हर कार्यकर्ता को अहिंसा का जीता-जागता उदाहरण बनना होगा।

ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में, चरखा कारीगरों के शोषण और गुलामी, और शासकों के घमंड का प्रतीक बन गया था। गांधीजी ने चरखे को अहिंसा और इसके ज़रिए जनता की मुक्ति के प्रतीक के रूप में अपनाया था। वही चाकू जो कसाई के हाथों में जान ले लेता है, सर्जन के हाथों में जान बचाने का ज़रिया बन सकता है।

गांधीजी ने माना कि चरखे पर अहिंसा के प्रतीक के रूप में जितना उन्हें जोर देना चाहिए था उतना उन्होंने नहीं दिया था। चरखा संघ खादी के उत्पादन और वितरण का काम बंद कर दे। वह केवल उन मूल्यों के रक्षक के रूप में काम करे जिनका खादी प्रतिनिधित्व करती है और केन्द्रीय अनुसंधान का काम करे। खादी की प्रवृत्ति के लिए गांव को एक घटक बनना चाहिए और स्वावलम्बन के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भरता के लिए कातना चाहिए। अपने हाथ से काते हुए सूत का कुछ हिस्सा क़ीमत के रूप में देने के बदले में ही खादी बेची जाए। चूल्हे की ही भांति चरखे को भी हर घर में स्थान मिलना चाहिए।

गांधीजी ने संघ के सदस्यों से कई बार कहा था कि उन्हें राजनीति भूल जानी चाहिए और चरखे पर उसके सभी पहलुओं के साथ ध्यान देना चाहिए। वह और केवल वही सच्ची राजनीति, सात्विक राजनीति मानते थे। हर गाँव जो चरखे का संदेश अपनाएगा, वह आज़ादी की चमक महसूस करने लगेगा। अगर चरखा संघ को उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना था, तो उसके सदस्य अहिंसा के जीते-जागते उदाहरण होने चाहिए। उनका पूरा जीवन अहिंसा का प्रदर्शन होना चाहिए और उनके शरीर और मन स्वस्थ होने चाहिए। अगर वे वैसे होते जैसे उन्हें होना चाहिए था, तो गांव वाले चरखे को बहुत उत्साह से अपनाते। सांप्रदायिक वैमनस्य और छुआछूत आदि की समस्याएं सुबह के सूरज के सामने ओस की तरह गायब हो जातीं। अगर भारत के सात लाख गाँवों में सच्ची जागृति लाई जा सके, तो इसका मतलब पूरे भारत के लिए आज़ादी होगी। खादी गतिविधि की इकाई गाँव होना चाहिए और हर किसी को आत्मनिर्भरता के लिए खुद की मदद से चरखा चलाना चाहिए।

इसी तरह अब लोग खादी पहन सकते हैं और भारत में स्वराज्य ला सकते हैं। यदि खादी का क्षेत्र ग़रीबों के कष्ट-निवारण तक ही सीमित रखा गया, तो वह अहिंसा के द्वारा स्वराज्य लेने में सहायता नहीं देगी। परन्तु हाथ सूत लेकर खादी बेचने का नियम लागू करने के परिणामस्वरूप ऐसा हो सकता है। यदि स्वराज्य लाने वाली खादी के सामने ग़रीबों का कष्ट-निवारण करनेवाली खादी मिट जाती है, तो इससे ग़रीब घाटे में नहीं रहेंगे। किसी और धंधे से  ग़रीबों की रोटी का प्रबंध किया जा सकता है। खादी का गौरव इसी में है कि वह स्वराज्य के आदर्शों में भी सहायक हो और ग़रीबों को मदद भी पहुंचाए। इस तरह खादी उत्पादन और बिक्री संस्थान के रूप में चरखा संघ को बंद कर दिया गया। आगे से अपने काते हुए सूत के रूप में आंशिक क़ीमत चुकाने पर ही बेचने की नीति चरखा संघ की नीति बन गई।

उन्होंने सुझाव दिया कि चरखा संघ के पास जो पैसा है, उसे काबिल कार्यकर्ताओं में बांट दिया जाए, जो चरखे के प्रचार-प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित करने के दृढ़ संकल्प के साथ गांवों में जाएं। जो चरखा संघ एक बहुत ज़्यादा केंद्रीकृत संस्था है, वह पूरी तरह से विकेंद्रीकृत हो जाए। गांवों में जाने वाले सभी कार्यकर्ता अपने स्वतंत्र केंद्र चलाएंगे। सेंट्रल ऑफिस उनके काम का इंस्पेक्शन करेगा और उन्हें ज़रूरी गाइडेंस देगा, ताकि जिन सिद्धांतों के लिए चरखा संघ खड़ा था, उनकी अनदेखी न हो। अहिंसा के पूरे विकास के लिए खुद को मिलकर ज़िम्मेदार समझना चाहिए। इसका पूरा विकास मतलब पूरी आज़ादी होगी। वह आज़ादी जो सबसे गरीब और पिछड़े लोगों को राहत और खुशी दे सके, वह सिर्फ़ अहिंसा से ही आ सकती है, यानी चरखे से। इसलिए, अगर वे चरखा संघ को उस मकसद के लिए इस्तेमाल कर सकें, तो उन्हें उनका पूरा सहयोग मिलेगा। अगर नहीं, तो वे सिर्फ़ एक परोपकारी संगठन के तौर पर काम कर सकते हैं, लेकिन यह उनके लिए काफ़ी नहीं होगा। उस स्थिति में, उन्हें अपना अकेला रास्ता खुद तय करने देना होगा।

गांधीजी का कहना था, हमें आज़ादी ज़रूर मिलेगी। मुझे महसूस हो रहा है कि यह आ रही है। लेकिन सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी से हमें संतुष्ट नहीं होना चाहिए। दुनिया भी संतुष्ट नहीं होगी, क्योंकि दुनिया भारत से बड़ी उम्मीदें रखती है। मेरे सपनों की आज़ादी का मतलब है हमारे अंदर भगवान का राज और हमारे ज़रिए धरती पर उसकी स्थापना। और इस मकसद के लिए मैं काम करते हुए मरना पसंद करूँगा, भले ही मैं इसे पूरा होते हुए कभी न देख पाऊँ।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

 

430. गांधीजी पर दूसरा जानलेवा हमला

गांधी और गांधीवाद

430. गांधीजी पर दूसरा जानलेवा हमला

73. गांधीजी पर जानलेवा हमला (पहला)

1944

देशवासियों की बुराई जो दुनिया में फैलाई गई थी उसका निराकरण करने के लिए गांधीजी विदेशी पत्रकारों से मुलाक़ात करने लगे और उनके प्रश्नों का उत्तर देने लगे। एक महीने जुहू में रहने के बाद गांधीजी को स्वास्थ्य लाभ के लिए पूना के पास एक पहाड़ी स्थान पंचगनी ले जा गया। 2 जुलाई, 1944 को वह पंचगनी नाम के हिल-स्टेशन पर पहुँचे। वहां वे दिलख़ुश बंगला में ठहरे थे। उस समय कांग्रेस के अधिकांश प्रमुख नेता जेल में बंद थे।

उसी दिन, टाइम्स ऑफ इंडिया ने वह इंटरव्यू छापा जो कहा जाता है कि गांधीजी ने न्यूज़ क्रॉनिकल के एक रिपोर्टर मिस्टर स्टीवर्ट गेल्डर को दिया था। जब गांधीजी ने इसे पढ़ा तो उन्हें लगा कि इस इंटरव्यू के तथ्यों और सही टेक्स्ट को लोगों के सामने लाना ज़रूरी है। गांधीजी ने कहा, मिस्टर गेल्डर को दिए इंटरव्यू का समय से पहले पब्लिश होने से कांग्रेसियों के मन में कुछ कन्फ्यूजन पैदा हो गया है। मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि मेरे अधिकार खत्म होने का कांग्रेस की सामान्य गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस के नाम पर कोई भी जो काम नहीं कर सकता, वह है बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन, मैं इस समय अपनी पर्सनल कैपेसिटी में भी इसे शुरू नहीं कर सकता।

जिन्ना और गांधीजी में 9 जून, 1944 से तीन सप्ताह तक सतत भेंट वार्ता, चर्चा और पत्र-व्यवहार चलते रहे। ब्रिटिश सत्ता को छोड़कर हर कोई राजनीतिक गतिरोध से थक चुका था। जिन्ना पर लीग के अंदर और बाहर दोनों तरफ से कांग्रेस के साथ समझौता करने का दबाव बढ़ रहा था ताकि आज़ादी का रास्ता साफ हो सके। देश में बड़े पैमाने पर उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं कि इन बातचीत से कुछ ठोस नतीजा निकलेगा।

17 जुलाई का को गांधीजी ने जिन्ना को लिखा, "भाई जिन्ना—एक समय था जब मैं आपको मातृभाषा में बोलने के लिए मना लेता था। आज, मैं हिम्मत करके आपको मातृभाषा में लिख रहा हूँ। मैंने जेल से भेजे गए अपने न्योते में आपके और मेरे बीच मुलाकात का सुझाव पहले ही दिया था। जेल से रिहा होने के बाद मैंने अभी तक आपको नहीं लिखा है। आज, मुझे ऐसा करने की प्रेरणा मिली है। जब भी आप चाहें, हम मिलें। मुझे इस्लाम या भारतीय मुसलमानों का दुश्मन न समझें। मैं हमेशा आपका और इंसानियत का सेवक और दोस्त रहा हूँ। मुझे निराश न करें।" 24 जुलाई को एक असाधारण बयान में जिन्ना ने गांधीजी को "महात्मा" कहा और राजनीतिक शांति की अवधि के लिए अपील की। ​​"यह सबकी इच्छा थी कि हम मिलें। अब जब हम मिलने जा रहे हैं, तो हमारी मदद करें। हम आमने-सामने आ रहे हैं। अतीत को भूल जाओ।"

गांधीजी की जिन्ना के साथ भारत के बंटवारे पर चर्चा करने की तैयारी की कड़ी आलोचना हुई। यहां तक ​​कि अहमदनगर किले में कैद वर्किंग कमेटी के कुछ सदस्य भी गांधीजी के इस नए कदम से नाराज़ थे। आलोचकों ने कहा कि गांधीजी ने अब जिन्ना को बचा लिया था और उनकी स्थिति को और मज़बूत कर दिया था। पंचगनी में गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में हिंदू महासभा से जुड़े युवाओं ने कांग्रेस विरोधी और पाकिस्तान विरोधी नारे लगाकर नाराज़गी जताई।

गांधीजी ने 30 जुलाई को पंचगनी में कहा, "फॉर्मूले का प्रकाशन सांप्रदायिक समझौते के लिए बातचीत के सिलसिले में किया गया है। यह कोई बेकार की कोशिश नहीं है। इसे पूरी ईमानदारी से सोचा गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस पर जो आलोचना की जा रही है, जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, वह पूर्वाग्रह या फॉर्मूले के लापरवाह अध्ययन के कारण की गई है। न ही यह किसी पार्टी की ओर से कोई प्रस्ताव है। यह देश के दो जीवन भर के सेवकों का सांप्रदायिक उलझन को सुलझाने की दिशा में एक योगदान है, जिसे अब तक सुलझाया नहीं जा सका है। राजाजी फॉर्मूला देश प्रेमियों की मदद के लिए है। यह सबसे अच्छा है जो हम सोच सकते थे, लेकिन इसमें संशोधन किया जा सकता है, जैसे इसे अस्वीकार या स्वीकार किया जा सकता है।"

गांधी-जिन्ना की भेंट वार्ता की घोषणा से हिंदुओं का एक तबका नाराज़ हो गया, खासकर हिंदू महासभा के सदस्य। कट्टरपंथी नौजवानों के एक ग्रुप ने मीटिंग को होने से रोकने का फैसला किया। गांधीजी को जिन्ना के पास जाने से रोकने के लिए वे बल प्रयोग तक पर उतारू थे। उस ग्रुप के लीडर ने अचानक कह दिया था कि यह सिर्फ पहला कदम है और, अगर ज़रूरत पड़ी, तो बापू को जिन्ना से मिलने जाने से रोकने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा। गांधीजी को झोपड़ी से बाहर जाने से शारीरिक रूप से रोकने की तैयारी थी, और झोपड़ी से बाहर निकलने वाले तीनों रास्तों पर पिकेट लगा दिए। पुलिस को सूचना थी कि वे कोई बड़ी गड़बड़ करने वाले हैं, और इसलिए पुलिस कार्रवाई के लिए तैयार थी।

जुलाई 1944 में 18-20 लोगों का एक दल बस से पूना से पंचगनी आया और वे दिन भर के लिए धरने पर बैठ गए। जब गांधीजी को इस धरने की बात मालूम हुई, तो उन्होंने ग्रुप के नेता को चर्चा के लिए बुलाया, लेकिन उन्होंने गांधीजी से मिलने से मना कर दिया। अपने प्रदर्शन के दौरान उन्होंने घोषणा की कि वे गांधीजी को जिन्ना से मिलने नहीं जाने देंगे। वे बल पूर्वक उनको रोकेंगे। शाम की प्रार्थना सभा में धरना कर रहे लोगों में से दो कार्यकर्ता काफी उग्र और उत्तेजित थे। उनमें से एक छुरा लेकर गांधीजी की तरफ़ दौड़ा था। दूसरा गांधीजी के ख़िलाफ़ नारे लगा रहा था। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। पुलिस अधिकारी ने मज़ाक़ में कहा, गांधीजी का विरोध कर पकड़े गए हो, तो तुम लोग भी देशप्रेमी और शहीद कहलाए जाओगे। उस युवक ने जवाब दिया, नहीं, अभी नहीं। गांधी की हत्या कर देंगे, तब शहीद बन जाएंगे। पुलिस ने फिर मज़ाक़ में कहा, यह सब अपने नेताओं पर क्यों नहीं छोड़ देते? तुम्हारे नेता सावरकर हैं, वे इस काम को कर डालें। उस युवक ने जवाब दिया, इतने बड़े सम्मान के लायक़ गांधी नहीं हैं। उनको समाप्त करने के लिए हमारा यह जमादार ही काफ़ी है। जिस साथी को वह जमादार कह रहा था, छूरा रखने वाला वह शख्स नाथूराम विनायक गोडसे था और वह ख़ुद नारायण आप्टे था। साढ़े तीन साल बाद उसकी यह बात सच हो गई। गांधीजी ने गोडसे से कहा, हमारे साथ सात-आठ दिन बिताओ, ताकि हम तुम्हारे विचार को ठीक से समझ सकें। गोडसे ने गांधीजी के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। गांधीजी ने उन्हें स्वतंत्र हो कर चले जाने दिया। पूना से पंचगनी के लिए चलते समय गोडसे ने अपने एक पत्रकार मित्र जोगलेकर (अग्रणी का संवाददाता) को यह बात कही थी कि जल्द ही तुम्हें पंचगनी से गांधीजी से संबंधित एक अच्छी ख़बर सुनने को मिलेगी। सतारा के भिल्लारे गुरुजी, जिन्होंने नाथूराम को पकड़ा था, का कहना था कि जो ग्रुप पूना से आया था उसमें विष्णु करकरे, थत्ते, बाडगे और गोपाल गोडसे भी थे।

वहां पर गांधीजी ने न्यूज़ क्रॉनिकल के पत्रकार स्टुअर्ट गेल्डर को साक्षात्कार दिया। उन्होंने अंग्रेज़ों के मन में उत्पन्न हर अविश्वास का खुले मन से जवाब दिया। उन्होंने कहा, मैं सदा अंग्रेज़ों का मित्र रहा हूं और आज भी हूं। इसलिए जब तक कि कोई बहुत गंभीर कारण न हो, तब तक मैं युद्ध काल में सविनय आज्ञा भंग के शस्त्र का कभी भी उपयोग नहीं कर सकता। कार्यसमिति से बिना बात किए भी और बिना कांग्रेस के दिए अधिकार के भी मैं चाहूं, तो आम लोगों पर जो मेरा प्रभाव बना है, उसके बल पर किसी भी दिन सविनय आज्ञा भंग आरंभ कर सकता हूं। परन्तु यदि मैं ऐसा करूं तो उसका नतीजा ब्रिटिश सरकार को परेशान करना होगा। यह कभी मेरा ध्येय नहीं हो सकता। ... यदि राष्ट्रीय सरकार बनी, तो कांग्रेस उसमें शरीक़ होगी और युद्ध प्रयत्नों में मदद देगी। ऐसी स्थिति में चूंकि मैं शांति प्रेमी हूं, स्वाधीनता का आश्वासन मिल जाने के बाद मैं कांग्रेस के सलाहकार का काम बंद कर दूंगा। मैं राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध नहीं करूंगा। बात परस्पर विश्वास की है। यदि परस्पर विश्वास हो तो कोई कठिनाई नहीं होगी। अगर कोई कठिनाई सामने आई भी तो उसे आसानी से दूर कर लिया जाएगा। विश्वास न हो तो काम नहीं हो सकता। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि वायसराय की राजनीतिक क्षेत्र में कोई सत्ता महीं है। चर्चिल समझौता नहीं चाहते। वे तो मुझे कुचल देना चाहते हैं। इसमें मेरे लिए ख़ुशी की और उनके लिए अफसोस की बात यही है कि सत्याग्रही को कोई कुचल नहीं सकता। कारण वह अपने शरीर का सहर्ष बलिदान देता है और इस प्रकार अपनी आत्मा को मुक्त करता है।

गांधीजी अच्छी तरह से जानते थे कि भारत और ब्रिटेन के संबंधों को बिगाड़ने वाली सबसे बड़ी चीज़ अविश्वास है। उन्होंने अविश्वास को मिटाने के लिए तमाम साधनों का उपयोग करना शुरू कर दिया। अख़बारों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात कर स्थिति स्पष्ट करते। मैं एक सत्याग्रही हूं। भारत को प्रेम करता हूं। हमने ख़ुद स्वतंत्रता के लिए करो या मरो की प्रतिज्ञा ली है और राष्ट्र की जनता से लिवाई है। भारत की यह स्वतंत्रता लोकतंत्र की विश्व-व्यापी लड़ाई का ही एक अंग है, जिसकी रक्षा के लिए यह युद्ध लड़ने का दावा किया जाता है। अतः भात छोड़ो का सूत्र मित्र राष्ट्रों के युद्ध-प्रयत्न में बाधक हो ही नहीं सकता। ऐसी स्थिति में मैं समझ नहीं पाता कि भारत के राजनीतिक प्रश्न के हल की पूर्व शर्त के रूप  में भारत छोड़ो का वापस खींचने का आग्रह किसलिए किया जाता है।

हर गोरा पत्रकार उनसे मिलने के बाद उनका भक्त हो जाता। उनकी मांग के औचित्य को अपने अख़बार में रेखांकित करता। इस तरह गांधीजी ने उन परिस्थितियों में जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी के नेतागण अहमदनगर के क़िले में नज़रबंद थे, दूषित वातावरण को सुधार कर समाधान और सद्भावनाओं की आवोहवा तैयार की। यह अत्यंत नाज़ुक और महत्त्वपूर्ण काम था। संसार के लब्धप्रतिष्ठित पत्रकारों के सामने प्रजातंत्र की मांग को तर्क पूर्वक स्पष्ट करना और अन्य देशों की गलतफ़हमी दूर करना। उन देशों ने भी चर्चिल सरकार पर भारत के पक्ष में प्रभाव डालना शुरू कर दिया।

देश की मनःस्थिति को भी सबल करने की ज़रूरत थी। उन्होंने देशवासियों को प्रोत्साहन और आत्मबल देने का काम भी किया। सत्याग्रही जेल से छूटकर आते और सीधे बापू से मिलते। समस्याओं पर चर्चा होती। उन्हें रचनात्मक कार्य के लिए प्रोत्साहित किया जाता।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

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