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गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

भारतीय धूसर धनेश

 

भारतीय धूसर धनेश

मनोज कुमार


अंग्रेज़ी में नाम : इंडियन ग्रे हॉर्नबिल
(Indian Grey Hornbill)

वैज्ञानिक नाम : टोकस बाइरोस्ट्रिस (Tockus/Ocyceros birostris)

स्थानीय नाम : हिन्दी में इसे धनेश, धन्मार, धानेल, लामदार, बांग्ला में पुटियल धनेश, पंजाबी में धनचिड़ी, गुजराती में चिलोत्रो, उड़िया में कोचिलखाई, मराठी में भिनास, तेलुगु में कोम्मु कसिरि, तमिल में इरावक्के, और कन्नड़ में बूडु कोडुकोक्कि कहा जाता है।

 विवरण व पहचान : भूरे सलेटी रंग का धनेश सबसे आम और अधिक पाया जाने वाला पक्षी है। धनेश की पूंछ पंखे के समान लंबी होती है, जिसके छोर पर सफेदी होती है। मादा धनेश के शरीर का रंग पीलापन लिए कत्थई या भूरापन लिए हुए होता है। नर का शरीर धूसरपन लिए सलेटी होता है। नर धनेश का पेट, जांघ और दुम का निचला हिस्सा सफेदी लिए हुए होता है। इसके उड़ने वाले पंखों के सिरे भी सफेद होते हैं। इस चिड़िया की टेढ़ी चोंच काली-उजली, काफ़ी बड़ी, मज़बूत, झुकी हुई और लंबी होती है और यह दूर से दिखने में लकड़ी की बनी हुई प्रतीत होती हैं। चोंच का ऊपरी भाग सींग-सा टेढ़ा होता है। इस खास तरह की संरचना को शिरस्त्राण (कैसक्यू) कहते हैं। इसी आधार पर, यानी चोंच की बनावट सींग की सी होने के कारण ही अंग्रेज़ी में इसे – हॉर्न (सींग) बिल (चोंच) के नाम से पुकारते हैं। मादा पक्षी में यह संरचना कुछ छोटी होती है। इसका आकार चील के बराबर, लगभग 61 से.मी. का होता है। धनेश पक्षी की एक खास विशेषता है जो अन्य पक्षियों में नहीं पाई जाती, वह यह कि उसकी आंखों के ऊपर भौंहें होती हैं। डैनों के नीचे मुलायम पर, जो अन्य पक्षियों में होते हैं, धनेश में नहीं होते।

व्याप्ति : धनेश की 25 जातियां अफ़्रीका में पाई जाती हैं। इसके अलावा भारत, म्यांमार, थाईलैंड,


मलाया, सुन्डा आईलैंड, फिलीपीन्स, न्यूगिनी आदि दक्षिण-पूर्व एशिया के भागों में इसकी 20 जातियां मिलती हैं। भारत में यह जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीस गढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा और राजस्थान के कुछ भागों में पाया जाता है।

अन्य प्रजातियां : विश्व में धनेश की 45 प्रजातियां और भारत में 9/16 प्रजातियां पाई जाती हैं।

1.   भीमकाय धनेश (ग्रेट हॉर्न बिल) (Buceros bicornis) – अरुणाचल प्रदेश और केरल का राज्य पक्षी है।

2.  मालाबार का धूसर धनेश (O. griseus)

3.  भारतीय श्वेत-श्याम धनेश (Anthracoceros albirostris)

4.  मालाबार का श्वेत-श्याम धनेश (A. coronatus)

5.  नारंगी-भूरी गर्दन वाला धनेश (Aceros nipalensis)

6.  गोल झालर वाला धनेश (A. undulates)

7.  Brown Hornbill (Anorrhinus tickelli)

8.  Narcondam Hornbill (Rhyticeros narcondami)

आदत और वास : यह एक सामाजिक पक्षी है। ये खुले मैदानों, हल्के जंगलों, फल बागानों, सड़क के किनारे उगे वृक्षों, बाग-बगीचों आदि जगह जहां काफी संख्या में पीपल, बरगद आदि फाइकस कुल के पेड़ उगे होते हैं, पाए जाते हैं। फलभक्षी होते हैं।  ये समूहों में रात बिताते हैं और सुबह होते ही फलों, सूंडी, कीड़ों और छिपकलियों की खोज में चारो ओर उड़ जाते हैं। पेड़ों पर रहने वाले ये पक्षी दीमकों को खाने के लिए बार-बार ज़मीन पर नीचे भी आते रहते हैं। उड़ान पर जाने के लिए ये एक-एक कर उड़ते हैं। इनकी उड़ान लहरदार और शोरयुक्त होती है। यह बहुत शोर मचाने वाला पक्षी है। ये पक्षी ज़ोर-ज़ोर से ‘चीं-ईन’ और ‘कांई-ईन’ की आवाज़ करते हैं।

भोजन : ये अंजीर की नई पत्तियां, जंगली फल, बीज, बेरियां, सूंडी, कीड़ों और छिपकलियां आदि खाते हैं।


प्रजनन :
इस पक्षी का घोंसला बनाने और अंडा देने का ढंग बड़ा ही निराला है। धनेश घोंसले नहीं बनाते। मार्च से जून के बीच, जब अंडा देने का समय नज़दीक आता  है,  तब नर धनेश मादा को किसी पेड़ के तने के खोखले भाग के छिद्र (कोटर) में बिठा देता है। मादा इसी में अंडा देती है। एक बार मे 2-3 अंडे देने के बाद मादा अंडे सेने बैठ जाती है। नर मादा को उस कोटर में बिठाकर छिद्र का द्वार पेड़ की छाल के गूदे और अपने चिपचिपे थूक से बंद कर देता है, केवल एक छोटा-सा सुराख भर छोड़ता है। इस सुराख से मादा की चोंच निकली रहती है। नर बाहर से मादा के लिए भोजन ला-लाकर उसकी निकली हुई चोंच में भोजन पहुँचाता रहता है। भीतर बैठी मादा आराम से भोजन खाती और अंडे सेती रहती है। खुद को दिए गए इस कारावास के दौरान मादा के पंख झड़ जाते हैं। बाद में फिर से नए पंख निकल भी आते हैं। अंडा फूटने पर जब उसमें से बच्चा बाहर निकलता है। बच्चे तो उसी घर में रह जाते हैं, लेकिन मादा के बाहर निकलने के लिए द्वार तोड़ दिया जाता है। इसके बाद माता-पिता दोनों मिलकर द्वार पर छोड़ी गई दरार से चूजों को भोजन कराते हैं। धनेश के अंडों से चूजे एक साथ नहीं निकलते। बड़ा चूजा छोटे चूजे से 4-5 दिन बड़ा हो सकता है। इस तरह की क्रिया को ‘असिंक्रोनोअस हैचिंग’ कहते हैं। इस प्रकार चूजे उसी सुरक्षित घर में भय रहित रहते हैं। जब उसके पर निकल आते हैं और वह उड़ने लायक हो जाता है, तब वह द्वार पर बनी दरार को बड़ा करके बाहर आ जाता है। एक-दो दिन बाद छोटा चूजा भी बाहर आ जाता है।

विलुप्तता की कगार पर

समय के साथ यह पक्षी कई कठिनाइयों का सामना कर रहा है। लोगों के अंधविश्वास की मानसिकता ने आज इस पक्षी को विलुप्तता की कगार पर पहुँचा दिया है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं तथा गठिया रोग के लिये धनेश का तेल रामबाण औषधि है। ऐसी मान्यता के चलते इस अद्भुत् पक्षी की हत्या दिन ब दिन हो रही है। 

संदर्भ

1.   The Book of Indian Birds – Salim Ali

2.  Popular Handbook of Indian Birds – Hugh Whistler

3.  Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carlos Inskipp, Tim Inskipp

4.  Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande

5.  Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, Biswajit Roychowdhury

6.  भारत का राष्ट्रीय पक्षी और राज्यों के राज्य पक्षी परशुराम शुक्ल

7.  हमारे पक्षी असद आर. रहमानी

8.  एन्साइक्लोपीडिया पक्षी जगत राजेन्द्र कुमार राजीव

9.  Watching Birds – Jamal Ara

10.  Net -

 

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मंगलवार, 12 नवंबर 2019

12 नवम्बर राष्ट्रीय पक्षी दिवस


12 नवम्बर राष्ट्रीय पक्षी दिवस

मनोज कुमार

Image result for सालिम अली का जीवन परिचयप्रत्येक वर्ष 12 नवम्बर को भारत के मशहूर पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी डॉ. सालिम अली के जन्मदिवस के अवसर पर राष्ट्रीय पक्षी दिवसमनाया जाता है।
डॉ. सालीम अली का पूरा नाम डॉ. सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली है। वे एक भारतीय पक्षी विज्ञानी, वन्यजीव संरक्षणवादी और प्रकृतिवादी थे, जिन्हें बर्ड मैन ऑफ़ इंडियाके रूप में भी जाना जाता है। वह भारत और विदेशों में व्यवस्थित पक्षी सर्वेक्षण करने वाले पहले वैज्ञानिकों में से एक थे। डॉ.सलिम अली का जन्म 12 नवम्बर 1896 में बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता के सबसे छोटे और नौंवे बच्चे थे। जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन चल बसे और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता ज़ीनत-उन-निशा की भी मृत्यु हो गई। सालीम और उनके भाई-बहनों की देख-रेख उनके मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और चाची हमिदा द्वारा मुंबई की खेतवाड़ी इलाके में हुआ।
सालीम की प्राथमिक शिक्षा गिरगाम स्थित ज़ेनाना बाइबल और मेडिकल मिशन गर्ल्स हाई स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, बॉम्बे से आगे की शिक्षा ग्रहण की। बचपन मे वे गंभीर सिरदर्द की बीमारी से पीड़ित हुए, जिसके कारण उन्हें उन्हें अक्सर कक्षा छोड़ना पड़ता था। किसी ने सुझाव दिया कि सिंध की शुष्क हवा से शायद उन्हें ठीक होने में मदद मिले इसलिए उन्हें अपने एक चाचा के साथ रहने के लिए सिंध भेज दिया गया। वे लंबे समय के बाद सिंध से वापस लौटे और वर्ष 1913 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के वोलफ्रेम (टंग्सटेन) माइनिंग और इमारती लकड़ियों के व्यवसाय की देख-रेख के लिए टेवोय, बर्मा (टेनासेरिम) चले गए। यह स्थान सालीम की अभिरुचि में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि यहाँ पर घने जंगले थे जहाँ इनका मन तरह-तरह के परिन्दों को देखने में लगता।
लगभग 7 साल बाद सलीम अली मुंबई वापस लौट गए और बंबई से उन्होंने जंतु विज्ञान में पक्षी शास्त्री विषय में प्रशिक्षण का एक कोर्स किया और फिर बंबई के नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटीके म्यूज़ियम में गाइड के पद पर नियुक्त हो गये। गाइड के रूप में वह मरे हुए सुरक्षित पक्षियों को दर्शकों को दिखाते और उनके विषय में बताते। इस कार्य के दौरान उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि पक्षियों के विषय में पूरी जानकारी तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके रहन-सहन को नजदीक से देखा जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह जर्मनी गए और विश्वविख्यात पक्षी विज्ञानी डॉक्टर इर्विन स्ट्रॉसमैन के संपर्क में आएँ। जर्मनी में उन्होंने उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया। सलीम अली ने बर्लिन में कई प्रमुख जर्मन ऑर्निथोलॉजिस्टों से परिचय किया और उनसे साथ बर्ड वेधशाला में कार्य किया।  जब एक साल बाद भारत लौटे तब पता चला कि उनकी गैरहाजिरी में संग्रहालय के गाइड की नौकरी समाप्त हो गई थी। सौभाग्यवश माहिम मे उनकी पत्नी तहमीना अली का एक छोटा-सा मकान था। वह उसी में जाकर रहने लगे।
उनके घर के अहाते में एक पेड़ था, जिस पर बया ने एक घोंसला बनाया था। सारे दिन वे पेड़ के नीचे बैठे रहते और बया के क्रिया-कलापों को एक नोट बुक में लिखते रहते थे। बया के क्रिया-कलापो और व्यवहार को उन्होंने एक शोध निबंध के रूप में प्रकाशित कराया। सन 1930 में छपा यह निबंध पक्षी विज्ञान में उनकी प्रसिद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इसके बाद वे जगह-जगह जाकर पक्षियों के विषय में जानकारी प्राप्त करने लगे। इन जानकारियों के आधार पर उन्होने ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्डसलिखी जो सन 1941 में प्रकाशित हुई।  यह आम आदमी के बीच एक लोकप्रिय पुस्तक के रूप में स्थापित हो गई और इस पुस्तक ने रिकॉर्ड बिक्री की। इस पुस्तक में पक्षियों के विषय में अनेक नई जानकारियां प्रस्तुत की गई थी। इसमें पक्षियों की उपस्थिति, आवास, प्रजनन आदतों, प्रवासन आदि शामिल हैं। इस पुस्तक से उन्हें एक पक्षी शास्त्रीके रूप में पहचाना मिली। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी पुस्तक हैण्डबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एण्ड पाकिस्तानभी लिखी। डॉ सालीम अली ने एक और पुस्तक द फाल ऑफ़ ए स्पैरोभी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का ज़िक्र किया है।
10 साल की उम्र में एक चिड़िया को मार गिराने पर पक्षियों को लेकर सालिम अली के मन में दिलचस्पी जागी और आगे चलकर वे एक पक्षी विज्ञानी बने। उन्होंने पेड़ पर बैठे एक पक्षी को नकली पिस्टॉल से मार गिराया था। वह उस पक्षी को उठाकर अपने चाचा के पास पहुंचे। पक्षी के गले पर पीला धब्बा देखकर वे चौंक पड़े। चाचा अमीरुद्दीन भी पक्षी को पहचान न सके। तो उसे वे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटीके ऑफिस ले गए जहां उनके जानकार डब्ल्यू.एस मिलार्ड थे जो पक्षी विशेषज्ञ थे। मिलार्ड ने बालक को कुछ नहीं बताया और उसे उस कमरे में ले गए जहां मृत पक्षियों का भूसा भर कर रखा गया था। उन्होंने उसे सभी पक्षियों को दिखाया, किंतु उन में उस जैसा एक भी पक्षी नहीं था, फिर मिलार्ड ने वैसा ही एक पक्षी दिखाया जैसा सालिम अली के हाथ में था। यह पक्षी नर बया था जिसके गले पर वर्षा ऋतु मे ही पीला धब्बा बनता है। अली को विभिन्न पक्षी देख कर आश्चर्य भी हुआ और उनके प्रति जिज्ञासा भी। वे उस विभाग पर पक्षियों के बारे में ज्ञान बढ़ाने आने लगे तथा उनकी रक्षा व अन्य जानकारियां के बारे में सोचने लगे।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बी.एन.एच.एस) के सचिव डबल्यू.एस मिलार्ड की देख-रेख में सालिम ने पक्षियों पर गंभीर अध्ययन करना शुरू किया, जिन्होंने असामान्य रंग की गौरैया की पहचान की थी। उन्होंने सालीम को कुछ किताबें भी दी जिसमें कॉमन बर्ड्स ऑफ मुंबईभी शामिल थी। मिल्लार्ड ने सालीम को पक्षियों के छाल निकालने और संरक्षण में प्रशिक्षित करने की पेशकश भी की। उन्होंने ने ही युवा सालीम की मुलाकात नोर्मन बॉयड किनियर से करवाई, जो कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी में प्रथम पेड क्यूरेटर थे। सलीम की प्रारंभिक रूचि शिकार से संबंधित किताबों पर थी जो बाद में स्पोर्ट-शूटिंग की दिशा में आ गई जिसमें उनके पालक-पिता अमिरुद्दीन ने उन्हें काफी प्रोत्साहित भी किया। उनके आस-पड़ोस में अक्सर शूटिंग प्रतियोगिता का आयोजन होता था।
डॉ सालीम अली ने अपना पूरा जीवन पक्षियों के लिए समर्पित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सालीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली परिंदों की ज़ुबान समझते थे। उन्होंने पक्षियों के अध्ययन को आम जनमानस से जोड़ा और कई पक्षी विहारों की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों के बारे में अध्ययन के लिए देश के कई भागों और जंगलों में भ्रमण किया। कुमाऊँ के तराई क्षेत्र से डॉ अली ने बया पक्षी की एक ऐसी प्रजाति ढूंढ़ निकाली जो लुप्त घोषित हो चुकी थी। साइबेरियाई सारसों की एक-एक आदत की उनको अच्छी तरह पहचान थी। उन्होंने ही अपने अध्ययन के माध्यम से बताया था कि साइबेरियन सारस मांसाहारी नहीं होते, बल्कि वे पानी के किनारे पर जमी काई खाते हैं। वे पक्षियों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते थे और उन्हें बिना कष्ट पहुंचाए पकड़ने के 100 से भी ज़्यादा तरीक़े उनके पास थे। पक्षियों को पकड़ने के लिए डॉ सलीम अली ने प्रसिद्ध गोंग एंड फायरडेक्कन विधिकी खोज की जिन्हें आज भी पक्षी विज्ञानियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। भरतपुर पक्षी अभयारण्य’ (केओलदेव राष्ट्रिय उद्यान) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने साइलेंट वैली नेशनल पार्कको बर्बादी से बचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सालिम अली हमारे देश के ही नहीं बल्कि दुनिया भर के पक्षी वैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्ध हुए। पक्षियों के लिए सर्वे करने वाले वो हिंदुस्तान के शुरुआती लोगों में हैं। सालिम अली ने पक्षियों के सर्वेक्षण के लिए 65 वर्ष से भी अधिक समय तक समस्त भारत देश का भ्रमण किया। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 60 वर्ष भारतीय पक्षियों के साथ बिताए। परिंदों के विषय में इनका ज्ञान इतना अधिक था कि लोग उन्हें परिंदों का चलता-फिरता विश्वकोश कहने लगे थे। उन्होंने पक्षियों का अध्ययन ही नहीं किया बल्कि प्रकृति संरक्षण की दिशा में भी बहुत काम किया। उन्हें 5 लाख रुपया का अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होंने मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी को समर्पित कर दिया। उन्हें सन 1958 में पद्म भूषण व 1976 में पद्म विभूषण जैसे महत्वपूर्ण नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया गया था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी। सलीम अली 1967 में ब्रिटिश ऑर्निथोलॉजिस्ट यूनियन के स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले पहले गैर-ब्रिटिश नागरिक थे। उन्हें 1969 में नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ के जॉन सी फिलिप्स स्मारक पदक प्रदान किया था। 1973 में, यू.एस.एस.आर. एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज ने उन्हें पावलोवस्की शताब्दी मेमोरियल पदक प्रदान किया गया।
डॉ. सालिम अली प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। उनका निधन 91 साल की उम्र में 27 जून 1987 को 91 साल की उम्र में हुआ। 1990 में इनके नाम पर बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटीऔर पर्यावरण एवं वन मंत्रालयद्वारा कोयम्बटूर के निकट अनाइकट्टीनामक स्थान पर सलिम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र स्थापित किया गया।

मंगलवार, 6 मई 2014

खंजन - लगातार दुम ऊपर-नीचे हिलाते रहने वाला पक्षी

खंजन - लगातार दुम ऊपर-नीचे हिलाते रहने वाला पक्षी

अंग्रेज़ी में नाम : White Wagtail

वैज्ञानिक नाम : Motacilla alba

{L. motacilla, a wagtail,-cilla, hair, alba : L. albus, white.}

स्थानीय नाम : हिंदी में इसे धोबन भी कहा जाता है। पंजाब में इसे बालकटारा, बांग्ला में खंजन, आसाम में बालीमाटी और तिपोसी और मलयालम में वेल्ला वलकुलुक्की कहते हैं।

विवरण व पहचान : बड़े प्यारे और सुंदर दिखने वाले इस पक्षी का आकार गोरैयों के बराबर, लगभग 8 इंच लंबा और रंग में चितकबरा होता है। ये पतली होती हैं। इन्हें खड़रिच भी कहा जाता है। नर और मादा रूपरंग में प्राय: एक से ही होते हैं। नर के शरीर ऊपरी हिस्सा राख के रंग का और नीचे का सफेद होता है। सिर के ऊपर का हिस्सा काला होता है। इसकी छाती पर एक काला चन्द्राकार चित्ता भी रहता है। डैने काले होते हैं, जिन पर सफेद धारियां बनी होती हैं। किन्तु उनके सिरों पर सफेदी रहती है। यह पक्षी साल में कई बार अपना रंग बदलता है। जाड़ों में इसके नर के सिर के पीछे एक काला चकत्ता रहता है जो गले के चारों ओर फैल जाता है। सिर का ऊपरी भाग और शरीर का निचला हिस्सा सफेद होता है जिसमें थोड़ी कंजई झलक रहती है। ऊपर का हिस्सा हल्का सिलेटी और डैने काले होते हैं। डैने के परों के किनारे सिलेटी और सफेद होते हैं ; दुम काली होती है जिसके दोनों बाहरी पंख सफेद रहते हैं। गरमी आते ही नर का सारा वक्षस्थल चमकीला काला हो जाता है और मादा का धूमिल होती हैं और शरीर पर की चित्तियां चटक नहीं होती। आंख की पुतलियां भूरी और चोंच और पांव काले होते हैं। भौंहें सफेद होती हैं। जाड़े में, जब इनका प्रजनन काल नहीं होता, आगे का वक्ष पर का काला भाग सफेद हो जाता है। ठोड़ी और गला भी नीचे की तरह सफेद हो जाता है।

व्याप्ति : जाड़े में समस्त भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के घास वाले मैदानी इलाक़ों में पाया जाता है। हमने इसकी तस्वीरें राजगीर, नालंदा और गंगासागर में ली थी।

अन्य प्रजातियां : भारत में पाई जाने वाली इसकी प्रमुख क़िस्में निम्नलिखित हैं –

1. Forest Wagtail – Dendronanthus indicus

2. चितकबरी – ख़ूबसूरती के लिए मशहूर – Large Pied Wagtail – M. maderaspatensis इसे ममोला और कालकंठ भी कहते हैं। यह सफेद खंजन से कुछ बड़ा और उससे अधिक चितकबरा होता है। यह भारतवर्ष का बारहमासी पक्षी है और अपना देश छोड़कर कहीं बाहर नहीं जाता।

gray_wagtail3. भूरी – Grey Wagtail – M. cinerea इसे खैरैया भी कहते हैं। यह जाड़ों में उत्तर और पश्चिम की ओर से आता है और हिमालय से लेकर धुर दक्षिण तक फैल जाता है। यह अपनी लंबी दुम, निलछौंह स्लेटी पीठ और पीले पेट के कारण आसानी से पहचाना जा सकता है। गर्मियों में यह पक्षी स्वदेश लौट जाता है।

 

 

yellow wagtail4. पीली – Yellow Wagtail – Motacilla flava इसे पिल्किया भी कहते हैं। यह खंजनों में सबसे सुंदर कहा जाता है। इस जाति का खंजन जाड़ों में अगस्त महीने के आसपास उत्तर और पश्चिम से आते हैं और जाड़ा समाप्त होने पर अप्रैल तक उसी ओर लौट जाते हैं।

citrine wagtail (2)5. नीम्बू के रंग का - Citrine Wagtail – M. citreola

6. Eastern Yellow Wagtail – M. tschutchensis

 

आदत और वास : ये सितम्बर अक्तूबर में आ जाते हैं और मार्च-अप्रैल में वापस चले जाते है। काफ़ी चंचल होते हैं। घने जंगलों में ये शायद ही नज़र आएं। अधिकतर ये दिनभर जलाशयों के किनारे या खेत-खलिहानों, पगडंडियों पर या मानव-आवास के बीच, गोशाला, घर के आंगन में आदि स्थानों पर लगातार अपनी दुम ऊपर-नीचे हिलाते हुए इधर-उधर कीड़ों-मकोड़ों के लिए दौड़ लगाते रहते हैं। यह दौड़कर चलता है, अन्य पक्षियों की भाँति फुदकता नहीं। खतरे का आभास मिलने पर उड़ जाता है किंतु थोड़ी ही दूर के बाद पुन: जमीन पर उतर आता है। इसकी उड़ान लहराती हुई होती है और उड़ते समय ‘चिट् चिट्’ जैसी बोली बोलता रहता है। सामान्यत: यह पक्षी दो चार की ही टोली में देखा जाता है किंतु गरमी आते ही जब वे अपने स्थायी स्थानों पहाड़ों की ओर लौटते हैं तो इनका एक बड़ा समूह बन जाता है। गर्मी और बरसात ये पहाड़ों पर या हिमालय की घाटियों में बिताते हैं। वहीं अंडे देते है और शरद ऋतु में इनका फिर से मैदानों और आबादी वाले क्षेत्रों में आगमन होता है। इस प्रकार ऋतु के अनुसार इतनी इतनी दूरियों का स्थानांतरण प्रकृति का एक आश्चर्यजनक चमत्कार ही कहा जाएगा। इस पक्षी को धोबिन भी कहा जाता है। कपड़े धोती महिलाओं के बीच खुद भी मज़े से टहलता रहता है। यह अत्यंत मधुर तान छेड़ता है।

भोजन : यह छोटे-छोटे कीड़ों, मकोड़ों, मच्छरों और नम भूमि से इकट्ठा किए गए सूंड़ियों को अपना आहार बनाता है। कभी-कभी यह घास चरने वाले जानवरों द्वारा परेशान किए गए उड़ते कीड़े को भी पकड़ता है।

प्रजनन : वसंत के समाप्त होते ही ये पक्षी पहाड़ों की ओर चले जाते हैं। वहीं, हिमालय की गोद में पत्थरों के कोटरों में मई से जुलाई के बीच यह अपना प्यालानुमा घोंसला बनाता है। घोंसला सूखी घास, जड़ें, दूब, और इसी तरह के कर्कटों से बना होता है। प्रजनन काल में नर कई मिनटों तक सुरीले गीत गाता है। इसके अंडों की संख्या साधारणतः 4-6 होती है। अंडे चौड़े-अंडाकार होते हैं। छोटे किनारे की तरफ़ नुकीले होते हैं। नर और मादा दोनों मिलकर अंडों की देखभाल करते हैं। चूजों को प्रायः कीड़े खिलाए जाते हैं। नर और मादा द्वारा संतानों को पाल-पोस कर यह इस लायक कर दिया जाता है कि वे वर्षा के समाप्त होते ही नीचे उतर आएं।

संदर्भ

1. The Book of Indian Birds – Salim Ali

2. Popular Handbook of Indian Birds – Hugh Whistler

3. Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carlos Inskipp, Tim Inskipp

4. Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande

5. Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, Biswajit Roychowdhury

6. हमारे पक्षी – असद आर. रहमानी

7. एन्साइक्लोपीडिया पक्षी जगत – राजेन्द्र कुमार राजीव

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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

महालट - पारिवारिक वार्तालाप करने वाला पक्षी

महालट - पारिवारिक वार्तालाप करने वाला पक्षी

Indian Treepie (4)

अंग्रेज़ी में नाम : Indian Treepie or Rufous Treepie

वैज्ञानिक नाम : डेंड्रोसिट्टा वेगाबंडा (Dendrocitta vagabunda)

Dendron : a tree, kitta : the magpie

Vagabunda : vagabond, wandering

स्थानीय नाम : इस खूबसूरत और आकर्षक पक्षी को हिंदी में महालट और उर्दू में महताब कहा जाता है। पंजाब में लोग इसे लगोजा और बंगाल में टका चोर या हांडी चाचा कहते हैं। आसाम में इसे कोला खोआ (केला खाने वाला) कहते हैं। तेलुगु में इसे कांडा कटि गाडु, तमिल में वाल काकई, गुजराती में खारवडो या खेरकाट्टो, मराठी में टाक्काचोर, उड़िया में हरदा फलिया, कन्नड़ में माता पक्षी कहा जाता है।

Indian Treepie (1)विवरण व पहचान : हालाकि महालट सामान्य मैना के आकार का पक्षी है लेकिन इसकी 30 से.मी. लंबी पूंछ होती है। इस पक्षी की संपूर्ण लंबाई लगभग 50 से.मी. होती है। केसरी आभा लिए भूरे (अखरोट-chestnut) रंग के इस पक्षी का सिर, गर्दन और छाती धूएं-सा काला (Sooty) होता है। बाक़ी के पूरे शरीर का वस्त्र लाल-सा भूरा होता है, जो पीठ पर अधिक गहरा होता है। शीर्ष पर काली पट्टियों वाली लंबी भूरी पूंछ होती है। किशोर पक्षियों का सिर काले रंग के बजाय भूरा होता है। पंख हल्की भूरी और और उसका किनारा सफेद धब्बेदार होता है जो उड़ान के समय स्पष्ट दिखता है।

Indian Treepieइसकी उड़ान लहरदार होती है, फड़फड़ाने की ज़ोरदार आवाज़ के साथ यह पंख और पूंछ फैलाकर थोड़े-थोड़े अंतराल पर विसर्पण/ग्लाइडिंग भी करता है। नर और मादा एक समान होते हैं। आंख की पुतली लाल-भूरी होती है। चोंच और का रंग सिंग की तरह काला होता है जो जिसका रंग आधार पर हलका हो जाता है। पंजे का रंग भी सिंग की तरह काला होता है

व्याप्ति : यह पूरे देश में पाया जाता है। इसके अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यानमार में पाया जाता है। यह श्रीलंका में नहीं पाया जाता।

अन्य प्रजातियां : आकार और रंग के आधार पर इसकी पांच प्रजातियां पाई जाती हैं।

1. श्वेत-उदर महालट – डेंड्रोसिट्टा ल्यूकोगेस्ट्रा – पश्चिमी घाटों में पाया जाता है। इसका सिर और उदर सफेद होता है। लंबी और सलेटी पूंछ तो होती है लेकिन इसका सिरा काला होता है।

2. कॉलर्ड ट्रीपाई – डेंड्रोसिट्टा फ्रंटेलिस - हिमालय में पाया जाता है।

3. अंडमान ट्रीपाई – डेंड्रोसिट्टा बेलेई – अंडमान के जंगलों में पाया जाता है।

4. Green Treepie : D. formosae – हिमालय की तराई और पूर्वी भारत में पाया जाता है।

5. D. v. pallida – उत्तर-पूर्वी भारत में।

आदत और वास : वृक्षवासी। कहा जाता है कि यह ज़मीन पर कभी नहीं आता पर हमने इसे अपने वारांडे में देखा और वारांडे की छत बैठे इस पक्षी की तस्वीर उतारी। ऐसा यह पीले हड्डे को पकड़ने के लिए करता है, जो प्रायः छतों पर अपना छत्ता बनाते हैं। वृक्षों से भरे बागों, फल बागानों, झाड़ियों और हल्के जंगलों में रहता है। पेड़ की छाल में घुसे कीटों को खाने के लिए उसके तने और शाखाओं पर चढ़ कर उसे अपने बड़े पंजों से जकड़ लेता है तथा संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी पूंछ से भी आंशिक मदद लेता है।

Nest Indian Treepie (43)हालाकि यह अवासीय परिसर या बगीचे में घूमता-फिरता रहता है, लेकिन यह काफ़ी शर्मीला पक्षी है और अधिकतर समय वृक्षों पर भी पत्तों के बीच छुपा रहना पसंद करता है। इसकी झलक हम तभी पाते हैं जब यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उड़कर जाता होता है।

इसकी आवाज़ इसकी सुन्दरता की तरह काफ़ी मीठी होती है। कुछ-कुछ ‘कोकिला’ या ‘बौब-ओ-लिंक’ की तरह इसकी आवाज़ होती है। लेकिन इस मीठी आवाज़ के साथ-साथ यह कौवों की तरह कर्कश और तेज़ आवाज़ भी निकालता है। अलग-अलग समय पर यह धातु की तरह वाली अलग-अलग आवाज़ निकालता है। कभी ‘के-के-के-के’, तो कभी ‘को-कि-ला’ या ‘कू-लो-ही’। जोड़े में या 4-5 पक्षियों के समूह में पाया जाता है।

महालट की एक मनमोहक आदत है – इसका पारिवारिक वार्तालाप। गर्मी की दोपहरी में इस पक्षी का जोड़ा किसी छायादार शाखा पर बैठ जाता है और फिर कई मिनटों तक एक-दूसरे से बतियाता रहता है। इस वार्तालाप के दौरान ये बड़े ही मज़ेदार ढंग से सिर हिलाते हैं और एक शाखा से दूसरी शाखा पर फुदकते रहते हैं। कभी-कभी ये एक-दूसरे से सट कर बैठ जाते हैं, फिर एक-दूसरे का प्यार से स्पर्श करते हैं और इस तरह से एक दूसरे की नज़दीकी का भरपूर आनंद उठाते हैं।

हमने इसकी तस्वीरें कोलकाता के अलीपुर स्थित आवासीय परिसर के वृक्षों से उतारी है।

भोजन : यह सर्वभक्षी जीव है। पेड़ों की शाखाओं पत्तियों के बीच कीड़ों, बेखबर छोटी चिड़ियों, छिपकिलियों, मेढकों, छोटे सांप, फलों, पिपली, और दूसरी प्रजातियों के पक्षियों के अंडों का आहार ग्रहण करता है। ज़मीन पर यह ज़ायकेदार टिड्डों, चूहों, और कनखजूरों की तलाश में उतरता है।

Nest Indian Treepie (51)प्रजनन : फरवरी से जुलाई तक इनका प्रजनन काल होता है। जब ये जोड़ा बना लेते हैं तो कंटीली टहनियों की मदद से पेड़ के शीर्ष की तरफ़ दो टहनियों के बीच, बड़ा-सा घोंसला बनाते हैं, जिनपर जड़ों की तह लगा देते हैं। कभी-कभी ऊन या पुआल का मुलायम परत भी लगाते हैं। इनका घोंसला तो कौओं की तरह ही होता है लेकिन कौओं के घोंसले से अधिक गहरा होता है। यह घोंसला पत्तियों के बीच अच्छी तरह से छिपा रहता है। मादा एक बार में 4-5 अंडे देती है। अंडे लम्बे अंडाकार होते हैं, छोटे वाले सिरे पर नुकीले होते हैं। कभी-कभी इस पर हलकी चमक भी होती है। पीले हरे रंग के अंडे पर हलके भूरे रंग की चित्तियां होती हैं। अंडे का आकार 1.17 इंच तक होता है। अंडे सेने और चूजे का पालन-पोषण का काम नर और मादा दोनों मिलकर करते हैं।

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संदर्भ

1. The Book of Indian Birds – Salim Ali

2. Popular Handbook of Indian Birds – Hugh Whistler

3. Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carlos Inskipp, Tim Inskipp

4. Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande

5. Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, Biswajit Roychowdhury

6. हमारे पक्षी – असद आर. रहमानी

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

शौबीग या फटिकजल – रंग बदलने वाला पक्षी

शौबीग या फटिकजल – रंग बदलने वाला पक्षी

अंग्रेज़ी में नाम : Common Iora

वैज्ञानिक नाम : Aegithia tiphia

Aigithos – a mythical bird mentioned by Aristotle

Tiphys – the pilot of the Argonauts.

स्थानीय नाम : हिंदी में शौबीग, तेलुगु में पात्सु-जित्ता, तमिल में पाचापोरा, सिन्ना मामपाला-कुरुवी, असमिया में बरसात-सोराइ और बांग्ला में इस पक्षी को फटिकजल कहा जाता है।

विवरण व पहचान : गोरैया की तरह 14 से.मी. के आकार के इस छोटे-से पक्षी का रंग हरा-पीला होता है। यह अत्यंत लजीला पक्षी है। इसके डैनों पर काला-काला दाग होता है। पूरे पंख पर चौड़ी सफेद धारियां होती हैं। नर की पूंछ काली और मादा की हरी होती है। इस पक्षी के परों का रंग ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ बदलता है। गर्मी में नर पक्षी का उपरी वस्त्र काला, सिर और पीठ पीले रंग का होता है। नीचे का वस्त्र गहरा पीला जो कि छाती के पास हलका पीला-हरा होता है। जाड़े में शरीर के पंखों का कालापन लगभग समाप्त हो जाता है। मादा सभी ऋतुओं में हरे-पीले रंग की होती है। मादा के शरीर के ऊपर का हिस्सा जैतूनी रंग का पीलापन लिए हरा तथा निचला पीला होता है। पीला नीचे की तरफ़ और हरा ऊपर की तरफ़ अधिक होता है। पंख गहरा हरा-भूरा, किनारे पर हरा-सफेद, कंधों पर उजली चौड़ी पट्टी होती है। आंख की पुतली का रंग पीलापन लिए सफेद और चोंच और पैर का रंग स्लेटी-नीला होता है।

व्याप्ति : भारत, बंगलादेश, पाकिस्तान, म्यानमार और श्रीलंका में पाया जाता है। (मैंने इसकी तस्वीरें महाराष्ट्र के भुसावल तहसील स्थित हतनुर जलाशय के पास ली थी।)

अन्य प्रजातियां : रंगों के आधार पर इसकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से चार भारत में मिलती हैं।

1. A. nigrolutea – Marshall’s Iora

2. A. multicolor – रामेश्वरम द्वीप में पाया जाता है। काले रंग का।

3. A. humei – संपूर्ण भारत

4. A. septentrionalis – पंजाब, ऊपर में काला।

iora Hatnur (1)आदत और वास : वानस्पातिक पक्षी जो शहरों में बगीचों में पाया जाता है। यह अधिकतर बड़े-बड़े पेड़ जैसे वट, आम, इमली, पीपल और नीम आदि पेड़ों की औट में रहना पसंद करता है। गांवों के बाहरी इलाके के खुले जंगलों, खेत के मैदानों और झाड़ियों वाले जंगलों में जोड़े में पाया जाता है। यह छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े को खाने के लिए इस फुनगी से उस फुनगी पर फुदकता रहता है। हालांकि ये साधारणतया जोड़े में रहते हैं लेकिन बीच-बीच में यह देखा जाता है कि ये अन्य पक्षियों के साथ मिलकर शिकार अभियान चलाते हैं। यह सुमधुर स्वर में लंबी सुरीली तान ‘वी-इ-इ-इ-टु’ छेड़ता है या छोटी-छोटी ‘चि-चिट्‌-चिट्‌’ की आवाज़ निकालता है।

भोजन : छोटे-छोटे कीटों और उनके अंडों और लार्वों को खाता है।

iora Hatnur (4)प्रजनन : समागम काल में नर अनेक हाव-भावों से, हवा में सीधी उड़ान भरते हुए ऊपर जाता है फिर सर्पिल उड़ान से नीचे बसेरे पर आता है। अपने सारे परों को जिसमें पूंछ के पर भी शामिल हैं इस तरह फैला लेता है कि यह एक गेंद की दिखने लगता है। परों के रंगों और और सीटी की तरह की आवाज़ निकालकर मादा को रिझाता है। अपने बसेरे पर वापस आने के बाद मादा के पास जाकर बंद-पंख रीति से बैठता है, मानों प्रणय-याचना कर रहा हो। फिर उठकर मधुर स्वरों में गाता है। मादा चुपचाप बैठी हुई उसकी प्रणय-परीक्षा लेती रहती है। और अंत में उसकी इन अदाओं और कोशिशों से रीझकर उसे प्रेम-भीख देती है। इन दिनों नर नए वस्त्र भी धारण कर लेता है। उसके परों के रंग में एक विचित्र परिवर्तन आ जाता है। इनका प्रजनन काल मई से सितम्बर का होता है। घोंसला बनाने में यह पक्षी पूरा दक्ष होता है। गृष्म ऋतु में यह पेड़ों की फुनगी की दो शाखाओं के बीच की पतली, कोमल डालों पर घास का साफ-सुथरा प्याले के आकार का घोंसला बनाता है और जिसका भीतरी भाग मकड़े के जाले की मदद से अच्छी तरह पलास्टर किया हुआ रहता है। ये हल्के पीले-उजले रंग के 2-4 अंडे देते हैं। नर और मादा दोनों मिलकर बच्चे का लालन-पालन करते हैं।

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संदर्भ
1. The Book of Indian Birds – Salim Ali
2. Popular Handbook of Indian Birds – Hugh Whistler
3. Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carlos Inskipp, Tim Inskipp
4. Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande
5. Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, Biswajit Roychowdhury
6. भारत का राष्ट्रीय पक्षी और राज्यों के राज्य पक्षी – परशुराम शुक्ल
7. हमारे पक्षी – असद आर. रहमानी
8. एन्साइक्लोपीडिया पक्षी जगत – राजेन्द्र कुमार राजीव
9. Watching Birds – Jamal Ara

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

भुजंगा : एक चौकीदार पक्षी

भुजंगा : एक चौकीदार पक्षी

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अंग्रेज़ी में नाम : Black Drongo

वैज्ञानिक नाम : डिक्रुरस मैक्रोसरकस (Dicrurus macrocercus) {Dikros gr. Forked, orous – tailed = long tailed)

स्थानीय नाम : हिंदी में इसे कोतवाल, कालकलछी, कोलसा कहा जाता है। पंजाबी में जपल कालकलिची और बांग्ला में फिंगा के नाम से जाना जाता है जबकि कच्छ में इसे कांछ और कालकांछ कहते हैं। गुजराती में कोसीता, कालो कोषी तथा मराठी में कोतवाल कहा जाता है। असमिया में यह फैंचु और घेन्घ्यू सोराई तथा उड़िया में काजलपाती के नाम से जाना जाता है। कन्नड़ में कारी भुजंगा, मणिपुरी में चरोई, तेलुगु में पसाला पोलि गुड्डु, तमिल में कारी करूमन, करूवटु वलि और मलयालम में तम्पुरट्टि अनारंछि कहलाता है।

विवरण व पहचान : बुलबुल के आकार के 31 से.मी. की लंबाई वाले इस दुबले-पतले पक्षी का रंग कौए की तरह चमकदार काला, बेहद कुरूप और अनाकर्षक होता है। नर और मादा एक ही तरह के होते हैं। इसकी पूंछ 6 इंच लंबी और दुपंखी होती है। ऊपरी भाग अधिक काला होता है। गरदन का भाग चमकीला नीला-काला होता है। टांगें छोटी होती हैं। आंख के आगे एक काला धब्बा होता है। आंख की पुतली लाल और चोंच और पैर काला होता है।

व्याप्ति : सम्पूर्ण भारत में, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका अफ़गानिस्तान, इंडोनेशिया, और म्यानमार में।

अन्य प्रजातियां : पंख, पूंछ और चोंच के आधार पर अन्य प्रजातियां पाई जाती हैं।

1. भीमराज या भांगराज Greater Racket-tailed Drongo (डिक्रूरस पैराडिसेएसस) – पूंछ के पंख दो तार के समान लंबे होते हैं। ये पंख अंत में चम्मच या रैकेट के समान संरचना बनाते हैं।

2. लेसर रैकेट टेल्ड ड्रोंगो (डिक्रूरस रेमिफर) – हिमालय क्षेत्र में पाया जाता है।

3. ब्रोंज्ड ड्रोंगो (डिक्रूरस एनेयस) – चौड़ी पत्तियों वाले जंगलों में पाया जाता है।

4. Ashy Drongo – D. leucophaeus

5. White-bellied Drongo – D. caerulescens

6. Crow-billed drongo – D. annectans

7. Hair-crested Drongo or Spangled Drongo – D. hottentottus

8. Andaman Drongo – D. andamanensis

9. Ceylon Crested Drongo – D. lophorinus

आदत और वास : खुले देहातों, खेतों, प्रायः घास चरते जानवरों के झुंड का पीछा करते हुए या टेलीफोन के तारों पर बैठा हुआ इसे देखा जा सकता है। यह एक कीटभक्षी पक्षी है। इसका मुख्य आहार छोटे-छोटे कीड़े और पतंगे हैं। किसानों के लिए यह बहुत उपयोगी पक्षी है। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को यह बहुत बड़ी संख्या में खा जाता है। कीड़ों की कोई भी गतिविधि इससे छुपी नहीं रह सकती। खुली जगह से यह कीटों पर नज़र जमाए रहता है। दिखते यह उन पर झपट पड़ता है और पैरों में जकड़ कर ले उड़ता है। फिर उनके टुकड़े कर डालता और निगल जाता है। चरते हुए जानवरों की पीठ पर बैठ कर यह उनके द्वारा घासों में उत्पन्न हलचल से इधर-उधर भागते कीटों को पकड़ कर उनका शिकार करता है। जंगल में आग लगने पर या किसानों द्वारा फसल की बोआई के लिए खेतों में आग लगाए जाने पर बड़ी संख्या में कीटों को पकड़ने में लग जाता है। कीटों के अलावा यह फूलों के मकरंद को भी खाता है। यह बहुत बहादुर, निर्भीक और लड़ाकू पक्षी होता है। यह चील जैसे बड़े-बड़े पक्षियों पर हमला कर देता है। यह चौकीदार पक्षी की श्रेणी में आता है। जब भी दुश्मन को आसपास फटकते देखता है यह ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाने लगता है ताकि अन्य पक्षी भी सावधान हो जाएं। इसके इस गुण के कारण इसे ‘कोतवाल’ नाम से भी जाना जाता है। यह किसी भी पक्षी को अपने घोंसले के पास फटकने नहीं देता। कौओं और चीलों से अपने घोंसले की रक्षा काफ़ी उग्रता से करता है। कभी-कभी तो यह बन्दर की भी खबर ले लेता है यदि वे इनके घोंसले की तरफ़ जाने की चेष्टा करता है तो! चोंच से यह उन पर प्रहार करता है और मार-मार कर उन्हें भागने पर विवश कर देता है। उसके इस गुण का फ़ायदा अन्य पक्षी भी उठाते हैं। फ़ाख्ता जैसे कुछ डरपोक पक्षी अपने नवजात बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसे पेड़ पर अपना घोंसला बनाते हैं, जहां कोतवाल जैसा साहसी पक्षी रहता है। कोतवाल अपने साहस के लिए जाना जाता है। भुजंगा अन्य दुशमन पक्षी को उस पेड़ के आस-पास आने नहीं देता बल्कि उन बड़े पक्षियों पर हमला बोल देता है। इसलिए जिस पेड़ पर कोतवाल रहता है उस पेड़ पर अन्य पक्षियों के पल रहे बच्चे सुरक्षित रहते हैं। ‘टि-टिउ’ और ‘चिक्‌-चिक्‌’ की इसकी आवाज़ बहुत ही कर्कश होती है।

प्रजनन :

इसका प्रजनन काल अप्रैल से अगस्त तक होता है। इसका घोंसला प्याले के आकार का होता है जो किसी वृक्ष की द्विशाखित शाखा पर टंगा होता है। घोंसलों का निर्माण टहनियों और रेशों से होता है जिसमें मकड़ी के जालों से इसके सतह को ढंक दिया जाता है। कभी-कभी यह पत्ते रहित पेड़ पर भी पाया जाता है। यह किसी को भी दिख सकता है। मादा 3-5 अंडे देती है। अंडे का रंग सफेद होता है जिसपर भूरा-लाल धब्बे होते हैं। नर और मादा दोनों मिलकर बच्चे का लालन-पालन करते हैं।

मनोज कुमार

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पर्यावरण संतुलन हेतु वन एवं वन्य जीवों की रक्षा करें।