गुरुवार, 10 मई 2012

आँच- 108 - रविकर की रसीली जलेबियाँ - रक्त-कोष की जिम्मेदारी नर-पिशाच के जिम्मे आई


आँच- 108 - रविकर की रसीली जलेबियाँ -   
रक्त-कोष की जिम्मेदारी नर-पिशाच के जिम्मे आई
-    हरीश प्रकाश गुप्त
आँच से अवकाश का एक लम्बा अन्तराल बीत गया। लगभग चार माह से कुछ अधिक का। विचार किया था कि कुछ दिन विश्राम कर लूँ। जल्दी-जलदी स्वास्थ्यगत परेशानी हो रही थी। जनवरी में कुछ लम्बी खिंच गई लगभग एक माह। जिम्मेदारियों की अधिकता ने भार कुछ अधिक बढ़ा दिया। सो आँच की लगभग दो वर्ष की निरंतरता में मेरी तरफ से अवरोध आया। हालॉकि नेट से सम्पर्क पूरी तरह टूटा नहीं। एक-दो दिनों के अन्तर पर मैं नेट पर आया भी और ब्लागों पर विजिट भी किया लेकिन कमेन्ट नहीं कर सका। यद्यपि बीच-बीच में आचार्य राय जी व आदरणीय मनोज जी मुझे पुनः प्रेरित करने का भरसक प्रयास करते रहे लेकिन जब एक बार यह क्रम टूटा तो अन्तराल बढ़ता ही गया। सलिल भाई ने तो यहाँ तक कह डाला कि मुझे ब्लाग पर आए सदियों हो गए। मुझे भी लग रहा था कि यह अन्तराल कुछ अधिक हो रहा है, इसे टूटना चाहिए।
सच कहूँ तो आँच के प्रति पाठकों का जो स्नेह रहा है उससे मैं सदा अभिभूत रहा हूँ। अभी बीच में मनोज जी के आँच के एक अँक में एक सम्मानित पाठक अपनी टिप्पणी में मेरा नाम लेकर मुझे प्रोत्साहित भी कर गए थे। तब लगा कि मैं पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा हूँ। उस दिन गूगल ने मेरी टिप्पणी स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और मेरी टिप्पणी वैसी ही टाइप रखी रह गई। आँच के लम्बे शून्य को श्री राय जी व श्री मनोज जी ने तोड़ा भी। यह उनकी प्रतिबद्धता थी। मुझे महूसस हुआ कि कहीं न कहीं मेरी प्रतिबद्धता में कमी अवश्य है, सो मेरे अन्दर अपराध-बोध का भाव भी पनपने लगा और आपका सामना करने में संकोच होने लगा था। आज थोड़ा साहस बटोरकर आपके समक्ष इस अनुरोध के साथ उपस्थित होने का प्रयास कर रहा हूँ कि आप मुझे क्षमा करेंगे।
बहुत दिनों से रविकर फैजाबादी को ब्लाग पर आते देख रहा था और उनकी टिप्पणियों को भी पढ़ रहा था जो प्रभावित कर रहीं थीं। एक दिन मनोज जी का सन्देश मिला कि रविकर जी का ब्लाग देखूँ, वह सार्थक लेखन में निमग्न हैं। सो उनके ब्लाग से साक्षात्कार हुआ। साहित्यिक संस्कारों की आभा से बिल्कुल विपरीत ब्लाग के नाम “रविकरकी रसीली जलेबियाँ” -  ने पहले-पहल जो छवि निर्मित की वह गम्भीरता के बजाय हास्य व्यंग्य की दिशा में ले जा रही थी। लेकिन उनकी रचनाओं ने इस भ्रम को दूर कर दिया। उनकी रचनाएँ वर्तमान सामाजिक परिदृश्य के सच और उसके विद्रूप चेहरे को दो टूक हमारे समक्ष प्रस्तुत करतीं हैं। उनकी एक रचना ‘तो रक्त कोष की जिम्मेदारी नर-पिशाच के जिम्मेआई’ इसी 12 अप्रैल को उनके ब्लाग पर प्रकाशित हुई थी। यह छोटी सी रचना आज की आँच की चर्चा की विषयवस्तु है।
रविकर की प्रस्तुत कविता में छह पद हैं जिनमें उन्होंने विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से व्यवस्था की वर्तमान स्थिति का चित्रण किया है कि लोभ, लोलुपता और स्वार्थपरता ने सम्पूर्ण परिदृश्य को इस कदर आच्छादित कर लिया है कि चारो ओर झूठ, छल, फरेब और लोभ का बोलबाला दिखाई देता है। नैतिकता और मर्यादा क्षीण हो गई है। विडम्बना यह है कि जिसे जिस उत्तरदायित्व से नैसर्गिक खतरा विद्यमान है, उससे विनाशक क्षति होनी है या जिसकी कुत्सित दृष्टि जिस लाभ पर पड़ी है वही उस अधिकार पर कपटसन्धि द्वारा काबिज गया है। ऐसी स्थिति में उससे आशा भी क्या की जा सकती है। ये सभी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए कितने भी निम्न स्तर का अमर्यादित आचरण कर सकते हैं, छल कर सकते हैं, धोखाधड़ी और ठगी कर सकते हैं। सम्पत्ति हड़पने के लिए किसी पर भी लांछन लगा सकते हैं। और तो और, वे अपनी हितसिद्धि के लिए किसी की जान का सौदा भी कर सकते हैं। यही उनकी योग्यता का एकमात्र मापदण्ड है। जिधर भी दृष्टि डालिए यवस्था का वही विद्रूप चेहरा नजर आता है।
रविकर फैजाबादी ने मात्र इस संदेश को ही अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया है। चाहे चिड़ियों की रखवाली के लिए बाज को अधिकार होने की बात हो या मछलियों की देखभाल के लिए मगरमच्छ हों, नाना प्रकार के घोटालों में बन्द घोटालेबाजों को बन्दीगृह का उत्तरदायित्व हो या फिर जिन्हें सुरक्षा का दायित्व दिया गया है वे लूटने वालों की ही सुरक्षा का कार्य सम्पादन कर रहे हों या स्वयं उसकी जान का ही सौदा कर रहे हों। चूहे खाद्यान्न् की बोरी की, तिलचट्टे तेल की, रक्त पिपासु पिशाच रूप रक्त कोश की रक्षा का दायित्व सभांल रहे हों तो परिणाम की कल्पना सहज ही की जा सकती है। दुर्भाग्य है कि ऐसे ही लोगों के हाथ में आज व्यवस्था की कमान पहुँच गई है।
छह पदों की यह रचना दोहा शैली में लिखी गई है, परन्तु एक पद को छोड़कर सभी में मात्राएँ समान (32-32) हैं। एक समान भावभूमि पर रचित समस्त पद बहुत ही स्वाभाविक और सार्थक हैं। सहज सम्प्रेषणीयता इनकी विशिष्टता है। रविकर फैजाबादी ने सरल शब्दों में उपयुक्त प्रतीकों का प्रयोग कर कठोर सत्य को सबके सामने प्रस्तुत किया है जिससे ये प्रतीक प्रभावी बन गए हैं। यह इन पदों की शैलीगत विशेषता है कि से कहीं पुनरुक्ति की प्रतीति नहीं कराते हैं, बल्कि पद-दर-पद आकर्षण पैदा करते हैं। कुछेक स्थानों को छोड़ दें तो आरोह-अवरोह प्रवाहमय है। ह्रस्व – अकारान्त होने के कारण केवल पाँचवें पद का नाद अन्य पदों से असमान हो गया है। इस पद में एक-एक मात्रा भी कम है। अन्तिम पद की दूसरी अर्धाली ‘तो रक्त कोष की जिम्मेदारी नर-पिशाच के जिम्मे आई’ – रचना का शीर्षक भी है, इसमें दो मात्राएं अधिक हैं। वैसे भी इसमें तो निर्र्थक सा है और नाहक ही मात्राएँ बढ़ा रहा है। यदि इस तो को निकाल दें यह अर्धाली उपयुक्त बन जाती है। इसी प्रकार पहले पद की दूसरी पंक्ति आज बाज को काज मिला जो करता चिड़ियों की रखवाली में संस्कृतनिष्ठ काज शेष पंक्ति की शब्द योजना के उपयुक्त प्रतीत नहीं होता वहीं जो अकारण तर्कसंगति उपस्थित करता है। तीसरे पद में प्रयुक्त महाघुटाले सही वर्त्तनी नहीं है।
प्रस्तुत रचना का शीर्षक असामान्य रूप से लम्बा है। यह आखिरी पद की पूरी की पूरी दूसरी अर्धाली ‘तो रक्त कोष की जिम्मेदारी नर-पिशाच के जिम्मे आई’ है, अर्थात, अन्तिम पंक्ति को ज्यों का त्यों ले लिया गया है इसीलिए यह न तो उतनी सहज है और शीर्षक के रूप में न ही प्रभाव उत्पन्न करने में समर्थ सिद्ध हुई है। साथ ही इसमें प्रयुक्त कोष सामान्यतया मुद्रा के लिए प्रयोग होता है। यहाँ कोश प्रयोग किया जाना चाहिए था।
                                                      

19 टिप्‍पणियां:

  1. रविकर जी कि टिप्पणियाँ बहुत ही रोचक और अलग होती हैं.हमेशा ही आकर्षित करती हैं. उनके ब्लॉग को आंच पर देख कर अच्छा लगा.और आप की वापसी भी आनंद कारी है.आपका पुन: स्वागत है. आंच की आंच यूँ ही बनी रहे.

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  2. रविकर जी की टिप्पणी सटीक और प्रवाहमयी होतीं हैं ..!आंच पर रचना की सुघड़ समीक्षा पढ़ कर अच्छा लगा |हरीश जी आपको स्वास्थ लाभ के लिए अनेक शुभकामनायें ..!
    आभार .

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  3. रविकर जी से बहुत प्रभावित हूँ,आशु-टिप्पणीकार हैं वे !

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  4. बहुत बहुत आभार है, रविकर हर्ष अपार ।

    करता सादर वन्दना, चिन्हित बिंदु सुधार ।।

    जीवन में मेरी पहली रचना

    सचमुच --

    प्रकाशित हुई ।।

    आप शीघ्र स्वस्थ हों -

    मंगल-कामनाएं ।।

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    1. बारम्बार प्रणाम ।

      चालबाज, ठग, धूर्तराज सब, पकडे बैठे डाली - डाली |
      आज बाज को काम मिला वह करता चिड़ियों की रखवाली |


      गौशाला मे धामिन ने जब, सब गायों पर छान्द लगाया |
      मगरमच्छ ने अपनी हद में, मछली-घर मंजूर कराया ||


      घोटाले-बाजों ने ले ली, जब तिहाड़ की जिम्मेदारी |
      जल्लादों ने झपटी झट से, मठ-मंदिर की कुल मुख्तारी ||


      अंग-रक्षकों ने मालिक की ले ली जब से मौत-सुपारी |
      लुटती राहें, करता रहबर उस रहजन की ताबेदारी ||


      शीत - घरों के बोरों की रखवाली चूहों ने हथियाई |
      भले - राम की नैया खेवें, टुंडे - मुंडे अंधे भाई ||


      तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
      रक्त-कोश की पहरेदारी, नर-पिशाच के जिम्मे आई |

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  5. रविकर जी का अलग अंदाज ही उनकी पहचान है जो आकर्षित करती है..

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  6. हरीश जी इधर कुछ दिनों से मैं भी नेट की उलझनों से दूर ही रहा हूं। कुछ अन्य व्यस्तताएं हैं। लेकिन आज जब सुबह इस ब्लॉग के दर्शन हुए और आपका चेहरा दिखा तो मन प्रसन्नता से झूम उठा।

    पिछले दिनों मन में शंका होने लगी थी कि हमारी टीम टूट-बिखर तो नहीं रही है। ... और हम ब्लॉग जगत के साहित्यिक योगदान में शिथिल तो नहीं पड़ रहे हैं। पर इस आंच के साथ जो आपके मन की आंच भी आई, तो सारी शंकाएं निर्मूल साबित हुईं।

    रविकर जी को मैं तो शुरू से ही फॉलो कर रहा हूं। वे अथक परिश्रमी कलाकार हैं। वे लिखते नहीं, रचनाएं गढ़ते हैं। इसीलिए कई बार मैंने उन्हें रचनाकार नहीं कविता लिखने की मशीन ही कह डाला। पर इस मशीन से रचनाएं यंत्रवत नहीं, भावों की चासनी में सनी मन और प्राण को मथने वाली निकलती हैं।

    आज जब कविताओं में प्रयोग के नाम पर बौद्धिक सन्निपात से ग्रस्त कविताएं आ रही हैं, रविकर जी ने छन्द, लय, ताल और गीति में ऐसी-ऐसी रचनाएं दी हैं जिसे कलजयी कहने में मुझे आपत्ति नहीं है।

    आपने अपनी इस दूसरी पारी में, एक अन्तराल के बाद जिसे शुरू किया है, रविकर भाई की रचना से जो शुरुआत की है वह बेमिसाल है और उम्मीद है कि अब इस ब्लॉग के पाठकों को हरीश गुप्त की कमी महसूस नहीं होगी।
    आभ्हर सहित, कवि एवं समीक्षक दोनों को।

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  7. निसंदेह रविकर जी,के कहने का लिखने का एक अपना अलग अंदाज,तभी तो तुरंत सीधी सरल लेखनी से रचनाएँ गढ़ देते है,....यही उनके आकर्षण और महानता का आभास कराती है,...

    MY RECENT POST.....काव्यान्जलि ...: आज मुझे गाने दो,...

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  8. बहुत बढ़िया प्रस्तुति। रविकर जी की अनूठी शैली से हम सब वाकिफ़ हैं.. आपने बहुत अच्छा विश्‍लेषण किया है।

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. आपका स्वागत है हरीश भाई ..
    आंच पढ़ चढ़कर, निश्चित ही जलेबियाँ और करारी होंगी !
    बधाई रविकर भाई को !

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  11. रविकर जी की लेखनी का अन्दाज़ तो है ही निराला

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  12. जीवनधाई स्वीकार करें .
    सटीक समीक्षा बधाई .
    शरीर की कैद में छटपटाता मनो -भौतिक शरीर

    http://veerubhai1947.blogspot.in/2012/05/blog-post_09.html#comments

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  13. रविकर जी की अनूठी शैली सच में लाजवाब है,उनका निराला अंदाज़ है.. अच्छा विश्‍लेषण किया है आप ने आभार....

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  14. हरीश जी का ब्लॉग पर पुनरागमन हर्ष का विषय है। आशा करता हूँ कि यह लय बनी रहे। बहुत ही रोचक विश्लषण है। कविता के हर पहलुओं पर चर्चा की गयी है। पुनरागमन के लिए हार्दिक आभार।

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  15. सुन्दर विश्‍लेषण किया है आप ने आभार....

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  16. रविकर जी की टिप्पणी , होती सदा सटीक
    शब्द चयन हैं गजब के, भाव बहुत बारीक.1.

    पढ़कर पूरी पोस्ट को , करें टिप्पणी खूब
    चट्टानों के द्वार भी, उग आती है दूब.2.

    गुप्त गुप्त के नयन से, होकर गुजरे आज
    तुरत समझ में आ गया,काम उचित या काज.3.


    महा घुटाले में हुआ, कैसा वर्त्तनी दोष
    हमको भी समझा गये, कहाँ कोश कहँ कोष.4.

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