गुरुवार, 24 मई 2012

विक्की डोनर - एक शुभ संकेत

आंच-110

विक्की डोनर - एक शुभ संकेत

मनोज कुमार

एक फिल्म का संवाद है कि लकडी भले ही जलकर राख हो जाए चूल्हे की गरमी देर तक बनी रहती है। हमारे ब्लॉग पर “आंच” की लकडियाँ (सर्वश्री परशुराम राय, हरीश गुप्त एवं करण समस्तीपुरी) फिलहाल (व्यक्तिगत कारणों से) भले ही ठंडी हो गयी हों “आंच” की गरमी बनी रहनी चाहिए। चूँकि फिल्मी संवाद से अपनी बात आरम्भ की है इसलिए सोचा कि आज यहां क्यों न एक फिल्म की चर्चा की जाए। इसी उद्देश्य से देखी फ़िल्म – विक्की डोनर। यह एक कॉमेडी फ़िल्म है, जो इंटरवल के बाद थोड़ी सीरियस होती है, लेकिन विषयान्तर कहीं नहीं होती है। न तो फ़िल्म कहीं से कमज़ोर है और न ही इसकी गति धीमी है।

इस फ़िल्म का निर्माण अभिनेता जॉन अब्राहम ने किया है। फिल्म का केन्द्रीय विषय स्पर्म डोनेशन (शुक्राणु-दान) है, और यदि फ़िल्म के ही शब्दों में कहें तो इसमें “क्वालिटी स्पर्म” के डोनेशन की बात पर बल दिया गया है। निर्माता ने एक ऐसे विषय पर फ़िल्म बनाने की सोची जो समाज में वर्जित माना जाता रहा है। किन्तु इसे निर्माता-निर्देशक की सूझ ही कहा जाएगा कि जब ऐसे विषय को हास्य के साथ परोसा जाए, तो एक वर्जित विषय को भी सहजता से ग्रहण करने का मानस तैयार होता है। इसी फिल्म से एक उदाहरण देखिए कि जब एक दम्पति आकर कहता है कि मुझे क्रिकेटर वाला सैम्पल चाहिए, तब डॉक्टर साहब अपने पेशे की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि कितनी अच्छी बात है, पहले बच्चे का कैरियर डिसाइड कर लो, बाद में बच्चा पैदा करो।

इस फ़िल्म का मुख्य पात्र एक युवक है, जिसका नाम है विक्की अरोड़ा। इस किरदार को निभाया है आयुष्मान खुराना ने। उनकी पृष्ठभूमि पर दृष्टि डालें तो वे रेडियो जॉकी थे और पिछले साल तक आई.पी.एल. के टीवी होस्ट/संचालक के रूप में उन्होंने काम किया था जो काफ़ी सराहा भी गया था। फिल्म में विक्की बेरोज़गार किंतु बहुत ही मस्तमौला टाइप का लड़का है। नौकरी की खोज में दर-दर भटकता है। उसकी मां पार्लर चलाती है, पिता मर चुके हैं। घर में एक दादी भी है।

शहर में एक डॉक्टर है – बलदेव चड्ढा। इस चरित्र को जिया है अन्नू कपूर ने। शुरू से अंत तक फ़िल्म में अगर किसी कलाकार ने दर्शकों को बोर नहीं होने दिया तो वह हैं अन्नू कपूर, जिनकी अद्भुत अभिनय क्षमता से उभरा है एक सशक्त चरित्र - डॉ. चड्ढा। फिल्म के हर दृश्य में (जहां वे आते हैं) अपने अभिनय कौशल और संवादों की अदायगी से वे हंसाते रहते हैं। डॉ. चड्ढ़ा दिल्ली के दरियागंज में एक फर्टिलिटी क्लीनिक चलाता है। जिन दम्पत्ति को बच्चा नहीं हुआ है उन्हें मां-बाप बनने के न सिर्फ़ सपने दिखाता है, बल्कि उनके सपनों को साकार भी करता है। एक समय उसे एक विशेष डोनर की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में उसकी नज़र विक्की पर पड़ती है, तो उसे लगता है कि स्पर्म-डोनर के तौर पर विक्की बहुत ही आदर्श व्यक्ति है। किंतु उसके सामने समस्या यह होती है कि विक्की को इस काम के लिए राज़ी कैसे किया जाए। विक्की को राज़ी कराने के लिए चड्ढ़ा के प्रयासों से फिल्म में काफ़ी हास्य का सृजन हुआ है। जब वह पहली बार विक्की के सामने अपना प्रस्ताव रखता है, तो विक्की ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए कहता है, “यह भी कोई डोनेट करने की चीज़ है?” लेकिन चड्ढा उसे समझाना बंद नहीं करता। अंत में विक्की इस काम के लिए राज़ी हो जाता है और उसकी आमदनी भी होने लगती है। उसके सपने पूरे होते हैं।

विक्की को अशिमा नाम की एक बंगाली लडकी से प्यार हो जाता है, और परिवार के विरोध के बावज़ूद दोनों शादी कर लेते हैं। अशिमा की भूमिका यामी गौतम ने काफ़ी खूबसूरती से निभाई है। कहानी में ट्विस्ट यहीं से आता है। जब उसे पता चलता है कि विक्की क्या “धन्धा” करता है, तो अशिमा को गहरा सदमा पहुंचता है। विक्की उसे समझाने की कोशिश करता है कि वह जो कर रहा है वह “धन्धा” नहीं, एक समाज-सेवा है। लेकिन अशिमा दुखी मन से विक्की का घर छोड़कर चली जाती है। अशिमा के छोड़कर चले जाने की बात जब फैलती है तो घर, परिवार और समाज से विक्की को इतना गंदा धन्धा, खानदान का नाम बदनाम कर दिया तूने आदि ताने सुनने को मिलते हैं। थोड़ी देर सीरियस रहने के बाद फ़िल्म का सुखद अंत होता है। डॉक्टर चड्ढा को भी अहसास होता है, और वह विक्की से कहता है तेरी फैमिली लाइफ को स्पॉयल कर दिया मैंने। और अंत में वही संकट मोचक भी बनता है। अशिमा को जब विक्की द्वारा किए जा रहे काम का महत्व समझ में आता है, तो फिल्म उसके संक्षिप्त से संवाद सॉरी के साथ समाप्त होती है। फ़िल्म की अवधि एक घंटे और सत्तावन मिनट है।

दिल्ली के पंजाबी लड़के के रोल में आयुष्मान खुराना ने जान डाल दी है। किसी भी लिहाज से नहीं लगता कि यह आयुष्मान खुराना की पहली फ़िल्म है। विक्की की मां का अभिनय डॉली अहलुवालिया ने किया है और दादी की भूमिका निभाई है कमलेश गिल ने। दोनों ने एक पंजाबी घर के वातावरण को सजीव कर दिया है। इस फ़िल्म के निर्देशक हैं शूजित सरकार। उनके सामने चुनौती रही होगी कि दो भिन्न परिवेश और संस्कृति वाले (बंगाली और पंजाबी) परिवार के फिल्मांकन में ताल-मेल बिठा सकें, और यह काम उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से सम्पन्न किया है।

निर्माता-निर्देशक ने कहीं भी फ़िल्म को फॉर्मूला फिल्म नहीं होने दिया, यह इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता है। आज के आइटम सॉंग के दौर में, बिना किसी ताम-झाम के एक हिट फिल्म देना, वह भी एक ऐसे विषय पर जिसपर घरों में लोग बातें करने से भी हिचकते हैं, एक कुशल निर्देशन का ही नतीजा है। ऐसे में एक वर्जित विषय पर फिल्म का निर्माण करके अभिनेता जॉन अब्राहम ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया है|

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता यही कही जा सकती है कि इस फ़िल्म में न कोई नायक है, न नायिका। अगर कोई मुख्य भूमिका निभा रहा है, तो वह है इसकी स्क्रिप्ट! इसलिए बॉलीवुड में आईं, अपेक्षाकृत नई स्क्रिप्ट राइटर जूही चतुर्वेदी का उल्लेख यदि न किया जाए और उन्हें उनका अपेक्षित सम्मान न दिया जाए तो बहुत ही नाइंसाफ़ी होगी। जूही के मस्तिष्क में अवश्य ही रहा होगा कि वो एक गंभीर विषय पर स्क्रिप्ट लिख रही हैं, जो साथ ही “वर्जित” विषय की श्रेणी में आता है, इसलिए उन्होंने बड़ी कुशलता से अपनी बात हास्य के माध्यम से सामने रखी है। जब इन दिनों पान सिंह तोमर, आई एम कलाम, कहानी और विक्की डोनर जैसी फ़िल्में हिट हो रही हैं, तो कहा जा सकता है कि एक बार फिर से सत्तर के दशक के ‘स्टोरी टेलिंग’ वाले स्क्रिप्ट का युग लौट रहा है। ऐसी स्क्रिप्ट पर कम बजट में फ़िल्म बन पाती हैं और किसी बड़े स्टार कास्ट की ज़रूरत नहीं पड़ती। बौलीवुड की यह शीतल बयार लोगों को पसंद आ रही हैं, और यह एक शुभ संकेत है।

“आंच” पर फिल्म समीक्षा को शामिल करने की यह शीतल बयार आपको कैसी लगी?

33 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया .... ऐसी समीक्षा जो फिल्म देखने को प्रेरित करती है ...

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  2. अच्छा लगा आंच पर ये अन्दाज़ भी।

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  3. अच्छी और सच्ची समीक्षा ... संतुलित लेखन जो फिल्म देखने कों प्रेरित करता है ...

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  4. आंच पर यह बदलाव सुखद लगा... आपकी समीक्षा बेहतरीन है... जरुर देखूंगा इस फिल्म को..

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  5. सबको यह फिल्म देखने जैसी है
    बढ़िया समीक्षा .....

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  6. हमें तो अच्छी लगी ....
    आभार आपका !

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  7. पिछले दिनों यह फिल्म बहुत चर्चा में रही.. लेकिन अभी तक देखने का अवसर नहीं मिल पाया.. "आंच" पर यह पहल सचमुच सराहनीय है. बहुत ही सधी हुई समीक्षा है और एक नाज़ुक विषय पर बहुत अच्छी कमेंटरी प्रस्तुत की है आपने..
    सबसे सुखद बात मुझे यह लगी कि इस समीक्षा की भूमिका में आपने फिल्म हलचल के संवाद का उल्लेख किया है जिसे मेरे गुरुदेव के.पी.सक्सेना ने लिखा है. और कमाल यह कि यह फिल्म कल ही देखी मैंने. आभार आपका!!

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  8. कई लोगों से इस फिल्म के बारे में सकारात्मक सिफारिश सुनी है.कुछ दिनों पहले डॉ.अरविन्द मिश्र जी ने भी इसकी समीक्षा की थी और अब आपने भी इसे सराहा है.
    देखो अब हम कब देख पाते हैं ?

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  9. बहुत बढ़िया और सही समीक्शा |फिल्म वाकई अच्छी है ...!!हमने भी देख ली ...!!

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  10. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

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  11. फिल्म के लिए उत्सुकता बढ़ा दे आपकी समीक्षा ने... अब देख ही आता हूँ... सादर आभार।

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  12. बहुत बढ़िया समीक्षा..यह फिल्म वाकई ऐसी है जैसी आपने बताई और जैसा इसे एक वर्जित विषय पर बनाना चाहिए था. ऐसा विषय होते हुए भी न फिल्म अश्लील लगती है न बोझिल और न ही उबाऊ.गज़ब की फिल्म है.मुझे भी लिखने का मन था इसपर .आपने लिख दिया इतना अच्छा. चलो अपना काम कम हुआ :)

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  13. समीक्षा बहुत बढ़िया तरीके से की। बधाई हो।

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  14. समीक्षा बहुत बढ़ियाब किया है.सही कहा आप ने.. ये फिल्म मैने भी देखी है.......्बहुत सुन्दर

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  15. आपकी समीक्षा पढकर फिल्म देखने को इक्छा हो गयी,,,,,लाजबाब समीक्षा,,,,,बधाई

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

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  16. एक अच्छे विषय की अच्छी फिल्म पर अच्छी समीक्षा...इस फिल्म में सबसे बुरा लगा तो यंगर जनरेशन की वल्गर लैंगवेज...बाकी सबकुछ बहुत बढ़िया है...

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  17. एक अच्छे विषय पर एक अच्छी फिल्म की अच्छी समीक्षा...इस फिल्म में कुछ अच्छा नहीं लगा तो वह था यंगर जैनरेशन की वल्गर शब्दावली...बाकी सबकुछ अच्छा रहा...बढ़िया समीक्षा ...

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  18. बढ़िया समीक्षा.. वैसे यह फिल्म नहीं देख पाए हैं अब तक

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  19. बढ़िया समीक्षा है . हम जरा कम देखते है फिल्मे लेकिन इतनी अच्छी समीक्षा के बाद तो देखना तो बनता है . और ये बयार तो एकदम कूल कूल है .

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  20. मनोज जी!!!कृपया स्पैम से मेरी टिप्पणी को निकाल दें।...

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  21. फिल्‍म समीक्षा फिल्‍म के बारे में रुचि जगाती है। आंच को फिल्‍म समीक्षा की बयार भी लगती रहनी चाहिए।

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  22. आपकी समीक्षा पढ कर तो लगता है कि फिल्म बहुत अच्छी होगी । अच्छी फिल्में बनें और चलें तो एक नया और अच्छा ट्रेंड बनेगा ।

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  23. आम विषयों से अलग हटकर बनी फिल्मे ट्रेंड को बदल रही है . अक्सर स्क्रिप्ट राईटर प्रशंसा पाने से चूक जाते हैं , आपने इस पर भी ध्यान दिया . विस्तृत समीक्षा से फिल्म के कई पक्षों की जानकारी प्राप्त हुई !

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  24. आपकी समीक्षा इतनी अच्छी है कि फिल्म देखने की उत्सुकता बढ़ गयी है ! समीक्षा की सफलता का ही यह परिणाम है ! जल्दी ही फिल्म देखने का प्रयास रहेगा ! आभार आपका सुन्दर समीक्षा के लिए !

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  25. मय फिल्म समीक्षक सभी पात्र बधाई के पात्र .दूसरी बार पढ़ी इस विषय पर ब्लॉग समीक्षा विक्की डोनर .दोनों में फिल की श्रेष्ठता को लेकर मतेक्य नजर आया .बधाई मनोज भाई .

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  26. अगर अन्नू कपूर की थोड़ी तारीफ कर दी जाती तो आनंद ही आ जाता

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    1. ये पंक्तियां तो उनके सम्मान में ही लिखी गई हैं --
      शहर में एक डॉक्टर है – बलदेव चड्ढा। इस चरित्र को जिया है अन्नू कपूर ने। शुरू से अंत तक फ़िल्म में अगर किसी कलाकार ने दर्शकों को बोर नहीं होने दिया तो वह हैं अन्नू कपूर, जिनकी अद्भुत अभिनय क्षमता से उभरा है एक सशक्त चरित्र - डॉ. चड्ढा। फिल्म के हर दृश्य में (जहां वे आते हैं) अपने अभिनय कौशल और संवादों की अदायगी से वे हंसाते रहते हैं।

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  27. एक अच्छी समीक्षा के बाद लग रहा है की फिल्म देखूं ,"जान अब्राहम " की फिल्म होने के कारण मैंने ध्यान नहीं दिया था। वैसे भी फिल्मे देखना मेरा शौक नहीं है इसलिए किसी अछे स्तर से समीक्षा प्राप्त होने के बाद ही मै फिल्मे देखना पसंद करता हूँ .

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  28. दीपक तिजोरी ने 2003 में,स्ट्रिप्टीज पर एक फिल्म बनाई थी-ऊप्स। विक्की डोनर उसी श्रृंखला की फिल्म है जो ऐसे विषय को छूती है जिस पर बॉलीवुड तो क्या,अँतरराष्ट्रीय फिल्मकारों ने भी कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया था। इसी विषय पर मधुर श्रीधर तेलुगू में एक फिल्म बनाने जा रहे हैं।

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