शनिवार, 5 मई 2012

फ़ुरसत में ... 101 : कीड़े, कविता और कृपा

फ़ुरसत में ... 101

कीड़े, कविता और कृपा

15012010007_thumbमनोज कुमार

‘द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन कहते हैं,“मनुष्य मूलतः तार्किक प्राणी है। वह पहले संदेह करता है और बाद में विश्वास।” हम भी विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं। अपनी भी आदत रही है – संदेह करो। तर्क करो। तर्क पर खरा उतरता है – तो विश्वास करो, वरना ख़ारिज कर दो। लेकिन कभी-कभी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ हो जाता है कि न संदेह करते बनता है, न तर्क करते और न ही विश्वास।

एक वाकया सुनाता हूं। एक बार एक भाई की ससुराल गए थे। हम तीन जने थे। भाभी और सालियों के साथ खूब हंसी-मज़ाक़ और चुहलबाजियां की। कुछ वृद्ध महिलाओं को वह अच्छा नहीं लगा होगा। अब यह उनका प्रताप था या कीड़े-मकोड़ों का प्रकोप, जब वापस आ रहे थे, तो गले के पास कुछ फोड़े से दिखे। स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते उनका आकार बढ़ गया और जलन होने लगी। स्टेशन पर एक बेंच पर बैठे कुछ अधनंगे साधु दिखे। हममें से एक ने कहा, “चलो साधु बाबा से कहते हैं कुछ ईलाज करने के लिए।” बाबा से हमने कहा, “बाबा ये देखिए फोड़ा हो गया है। कुछ ईलाज कर दीजिए।” बाबा ने ऊपर से नीचे देखा और फिर अपनी कड़क आवाज़ में बोले, “ईलाज चाहिए। नीचे से भभूत उठा।“ उन दिनों प्लेटफॉर्म उतना आधुनिक नहीं हुआ था। फर्श मिट्टी के ही थे। हमने कहा, “भभूत? ये तो मिट्टी है।” बाबा गरजे, “मिट्टी बोलता है। चल उठा।” अबकी बार बिना किसी प्रतिवाद के हमने मिट्टी उठाई। वे बोले, “लगा इसे।” हम लोगों ने उसे फोड़ों के ऊपर लगा लिया। कुछ ही देर में जलन गायब! बाबा ने पूछा, कुछ असर हुआ?” हमने कहा, “बिल्कुल ठीक हो गया।” यह सिर्फ़ हमारे साथ ही नहीं बाक़ी के हमारे दोनों भाइयों के साथ भी बिलकुल वैसा ही हुआ था। बाबा बोले, “किसी ने अगिन बान चला दिया था। बच गए।

अब तो बाबा में हमारी आस्था बढ़ गई थी हममें से एक कुछ ज़्यादा ही उत्साहित होकर उनसे बोला, “बाबा प्रसाद खिलाइए।” बाबा मुस्कुराते हुए बोले – “प्रसाद खाएगा?” हमने ‘हां’ कहा। बाबा बोले, “चल उठा।” फिर से वही आदेश। अब तो कुछ बोलने की हिम्मत हममें से किसी की नहीं हुई। पर कुछ देर तक हमें बिना किसी प्रतिक्रिया के खड़े देखा तो बाबा फिर से गरजे, “चल उठ !!” इस बार फिर से हमने प्लेटफॉर्म की मिट्टी उठाई। हाथ में उसके आते ही हम बोले, “बाबा यह तो ...!” हमारा वाक्य पूरा हो बाबा फिर गरजे चल खा। जितनी तेजी से वे गरजे उतनी ही तेजी से वह मिट्टी हमारे मुंह में थी! मगर आश्चर्य! उसका स्वाद पेड़े जैसा था। हम तो चकित थे। बाबा मुस्कुरा रहे थे। बोले, “कैसा लगा?” हमने बताया – “बिल्कुल पेड़े जैसा।” फिर हम बोले, “बाबा कुछ आशीर्वाद दीजिए।” वे बोले, “जा ऊपर वाले की कृपा बनी रहे।”

ऊपर वाले की कृपा ...! यह बहुत बड़ी बात है। कई बार ऊपर वाले की कृपा हम पर हो जाती है और हम विश्वास करने को तैयार नहीं होते। अकसर मज़ाक़ में उड़ा देते हैं – उसकी कृपा को। भूल जाते हैं कि उसकी कृपा हो जाए तो एक पल में वह आसमां पर बिठा देता है, और कृपा से मुंह मोड़ा तो दूसरे ही पल खाक में भी मिला देता है। उसकी कृपा कमाल की होती है और बनी रहे तो ज़ीरो को हीरो बनते देर नहीं लगती।

हम तो सरकारी-मुलाजिम हैं। हमसे ज़्यादा कौन इस बात की गवाही दे सकता कि सरकार में “ऊपर वाले” की कृपा का कितना महत्व है!! उनकी कृपा रहे तो “च्वायस पोस्टिंग” मिलती है, स्थानान्तरण अपने मन के मुताबिक होता है, मालदार सीट मिलती है। और कमाल यह कि जिनपर ऊपर वाले की कृपा होती है, वे अपने नीचे तो नीचे ऊपर वाले की भी नहीं सुनते। उनपर रौब जमाते हैं, मनमानी करते हैं। और करें भी क्यों नहीं, जब ऊपर वाले से सीधा कनेक्शन बन गया हो तो है!

मूढ़ प्राणी यह नहीं समझ पाता कि यह सब श्रद्धा, विश्वास और आस्था का खेल है। भक्ति में बड़ी शक्ति है। और शक्ति की आराधना तो हमारे देश में युगों-युगों से प्रचलित है। सबसे बड़ी श्रद्धा और भक्ति पूर्ण समर्पण में है। पूर्ण समर्पण का मतलब ऊपरवाले के इच्छा के विरुद्ध कोई तर्क नहीं। अर्थात जो भी घट रहा है उसकी मरजी से, और भविष्य में जो होगा उसकी मरजी से ही होगा। कुछ मूढ़ प्राणी, भक्ति की इस विचारधारा को अवैज्ञानिक सोच कहते हैं। क्योंकि उनकी नज़र में जो तर्क नहीं करते वे अवैज्ञानिक होते हैं, वे विश्वास करते हैं। जिन्हें संदेह या तर्क-वितर्क करना नहीं आता वे अवैज्ञानिक होते हैं। भाग्यवादी होते हैं। वे नया कुछ सोच ही नहीं सकते। वैज्ञानिक सोच ही व्यक्ति को कुछ नया करने को प्रेरित करती है।

किंतु सरकार के दरबार में बड़े साहब (भगवान) से लेकर बाबू (भक्त) तक की कृपा न हो तो मनोरथ सिद्ध नहीं होता। यहां श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से ही काम नहीं चलता। इसके साथ-साथ मंदिर में चढ़ावा भी बहुत महत्वपूर्ण है। जो जितना बड़ा चढ़ावा चढाता है, उसे उतना ही बड़ा आशीष मिलता है। सरकारी बाबू से लेकर संन्यासी बाबा तक इससे अछूते नहीं है। पिछले दिनों एक बाबा भी ने अपनी कृपा के बल पर काफ़ी सुर्खियाँ बटोरी। इस प्रकरण पर काफ़ी बहस हुई। दो स्थितियां हैं – एक मिथ, अंधविश्वास, रूढियों, कर्मकाण्डों की, तो दूसरी बुद्धि, विवेक, तर्क, सोच-विचार और ज्ञान की। एक पक्ष ने कहा कहीं न कहीं आस्था तो टिकनी ही है, जब सब जगह से निराश हो जाएं, तो जहां कहीं से आशा की किरण जीवन में प्रवेश करती है, वहीं शरण ले लेते हैं और यहां आने पर विज्ञान और तर्क बौने पड़ जाते हैं। दूसरा पक्ष यह कहता है कि, यह अवैज्ञानिक सोच है। यह हमे गुलाम बनाती है, कमज़ोर बनाती है। जब हम तर्क नहीं करते, संदेह नहीं करते, जो कहा जाता है वह मान लेते हैं, तो हमारा जीवन कीड़े-मकोड़ों सा हो जाता है।

सब अपनी-अपनी श्रद्धा और विश्वास है। जब हम एम.एस-सी. में पहुंचे तो विशेष विषय (Special Paper) के लिए हमारे पास कोशिका विज्ञान (Cytology), मत्स्य विज्ञान (Ichthyology), अनुवांशिकी (Genetics) आदि के होते हुए भी हमने कीड़ों-मकोड़ों (Entomology) में अपनी आस्था प्रकट की। घर में जब यह समाचार पहुंचा तो परिवार के लोगों के बीच ऐसी-ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि लगा मैंने कोई अवैज्ञानिक काम कर दिया हो। सबके चेहरे से प्रकट था कि इस विषय को चुनकर मैंने उनके अरमानों को कीड़े लगा दिए हों। मगर उन दिनों कीड़े-मकोड़ों के पीछे मेरा जुनून इस कदर था कि मैं देर रात तक बल्ब के नीचे पानी का टब रख देता और उसमें गिरकर फंसने वाले कीटों को जमा करता। जंगल-झाड़ियों में जा-जाकर कीटों को पकड़ लाता और उनकी पहचान कर खुश होता। मुझे ऐसा करते देख सब बेहद निराश होते।

मगर हम भी लगन के सच्चे, धुन के पक्के थे. कीट-प्रेम के साथ-साथ अपनी कविताई का कीड़ा भी कुलबुलाता रहा। कीड़ों के जीवन में एक बड़ा महत्वपूर्ण स्टेज आता है जिसे कैटरपिलर कहते हैं। उस की चाल-ढ़ाल का अध्ययन कर हमने अपने कीट और कविता प्रेम को मिलाकर एक कविता लिख दी। आप ने भी इस ब्लॉग पर वह कविता पढ़ी होगी। मेरे उस प्रेम को साहित्यिक पत्रिका “वागर्थ” ने सम्मानित किया और इस महीने (मई) के अंक में वह प्रकाशित हुई है। मुझे खुशी हुई कि ऊपर वाले की कृपा से मेरा कीड़े-मकोड़ों के प्रति प्रेम और आस्था व्यर्थ नहीं गई।

कविता इस लिंक पर भी है।

***

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40 टिप्‍पणियां:

  1. जितना सुन्दर आपका बिता हुआ पल उससे भी खुबसूरत
    एहसास के साथ लिखी कविता ओ केटरपिलर .
    एक संजीदा व्यक्ति की नर्म अभिव्यक्ति .

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  2. बहुत सुन्दरता से भावो को व्यक्त किया है कविता के लिये बधाई।

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  3. अग्नि बाण का मरहम
    श्रद्धा-भक्ति-समर्पण,
    बाबा की भस्म भभूती
    प्रभु दर्शन मन-दर्पण ।

    तर्क कसौटी कसना
    ऊपर की कृपा बरसना ।
    कैटरपिलर से कविता -
    तन मन में रचना बसना ।।

    मुबारक हो भाई जी ।।

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  4. बढ़िया आलेख ....सुंदर कविता और छपने कि बधाई .....
    आज मनोज जी आपने प्रभु की पूरी कृपा पाई ...!!:)
    शुभकामनायें .

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  5. बहुत सुंदर सार्थक भावपूर्ण अभिव्यक्ति // बेहतरीन आलेख //

    MY RECENT POST .....फुहार....: प्रिया तुम चली आना.....

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  6. हम तो सरकारी-मुलाजिम हैं। हमसे ज़्यादा कौन इस बात की गवाही दे सकता कि सरकार में “ऊपर वाले” की कृपा का कितना महत्व है!!

    जीवन कई वास्तविकताओं से गुजरता है . इसलिए कहीं कृपा की जरुरत होती है और कहीं उस कृपा को वापिस लौटा दिया जाता है . वैसे श्रद्धा और भक्ति का कोई सानी नहीं , लेकिन अंधश्रद्धा अपने आप में एक दोष भी है . वैसे कृपा को किसी तर्क से नहीं मापा जा सकता है . विचारणीय पोस्ट ...!

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  7. तार्किकता तो सजग मनुष्य का गुण है . हा कुतर्क करने से बचना चाहिए . कीट -शास्त्र का अध्ययन और कैटर पिलर कविता , दोनों ही ऊपर वाले की कृपा ही रही. इस कविता को पहले भी पढ़ा था., अनोखे बिम्ब से सजी ये कविता सम्मान के काबिल थी और वागर्थ ने इसे छापकर अपने सम्मान में इजाफा ही किया .

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  8. लेख, कविता दोनों प्रशंसनीय,
    बहुत सुंदर .....

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  9. आज तो एक साथ चार-चार विषय निपटा दिए आप भाई जी! बाबा की किरपा, बाबू की महिमा, कीट-पतंगों से प्रेम (इस मामले में हमरी बिटिया के आदर्श आप ही हैं-आज भी वो आपको इन्सेक्ट्स वाले अंकल के नाम से जानती है)और अंत में कविता.. यह कविता वास्तव में एक अनोखे बिम्ब के सहारे एक असाधारण चित्र प्रस्तुत करती है.. वागर्थ सरीखी पत्रिका में इस कविता को स्थान प्राप्त होना वास्तव में इसका समुचित सम्मान है!!
    बधाई!!

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  10. अपने अध्ययन काल से ही कीड़े-मकोड़ों के प्रति आपका प्रेम एवं उनके बारे में विस्तृत रूप से जानने की जिज्ञासा ने आपकी कविता "कैटरपिलर" को "उन्मेष" से "वागार्थ" तक का सफर करा दिया । मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि इस कविता को अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर वागार्थ के संपादक ने इसे उचित स्थान दिया है।
    मेरी कामना है कि आप निरंतर सृजनशील रहें तथ भविष्य में साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में नए प्रतिमानों को स्पर्श करते रहें । इस खुशी के लिए बस यही कहूँगा कि समय मिले तो -- कुछ मीठा हो जाए । धन्यवाद ।

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  11. हमसे ज़्यादा कौन इस बात की गवाही दे सकता कि सरकार में “ऊपर वाले” की कृपा का कितना महत्व है!! उनकी कृपा रहे तो “च्वायस पोस्टिंग” मिलती है, स्थानान्तरण अपने मन के मुताबिक होता है, मालदार सीट मिलती है।

    आस्था से चलते हुये सरकारी नौकरी वालों को ऊपर वाले की कृपा का सटीक अर्थ समझा दिया ... वागार्थ में कविता छपने की बहुत बहुत बधाई .... कविता का कीड़ा यूं ही कुलबुलाता रहे

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  12. वागर्थ में ओ कैटरपिलर का छपना और अपनी वैज्ञानिक बुद्धि से आस्था का फुरसत में समझाना अच्छा लगा... आप बधाई के पात्र हैं...आगे भी यह शृंखला जारी रहे...यह शुभेच्छा है। पुन: बधाई स्वीकार कीजिए।

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  13. इस प्रसंग को कितनी सहजता से परोस दिया सरजी, यह तो बस आपका ही जादू है। वैसे वागार्थ ने एक बोलती हुई कविता को उसका हक दिया है, बधाई।

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  14. तर्क के बाद उपजा विश्वास गहरा होता है।

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  16. विश्वास अगर तर्क की कसौटी पर खरा उतर जाए तो दीर्घजीवी होता है ,पर कभी-कभी विश्वास कुछ सोचने अथवा समझ पा सकने के पहले भी हो जाता है .....

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  17. आपने कैटरपिलर के बारे में सोचा...ये आपकी तार्किकता का प्रमाण है...विज्ञान और परा-विज्ञान में सूक्ष्म अंतर है...आदमी का खुश रहना जरुरी है...जब इसके लिए फ़िल्म देख सकता है...तो अध्यात्म क्यों नहीं...अपनी-अपनी च्वाइस है...

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  18. कैटरपिलर पहले भी पढ़ चुका हूं.. जब भी मिला हू आपसे.. कीट पतंगों की चर्चा कहीं न कहीं होती थी.. लेकिन आपके पैशन का हिस्सा हैं ये.. नहीं पता था.. बहुत बढ़िया .. मेरा तो मार्गदर्शन होता है आपके पोस्ट से... वे दिन याद आ गए जब रसायन शाश्त्र से बी एससी छोड़ के अंग्रेजी साहित्य में आ गए .. दो दिन तक बाबूजी गुस्सा... बाबूजी गुसा तो माँ भी... फिर बाबूजी चुपके से ऑक्सफोर्ड शब्दकोष ला के लिए थे...उस से पहले भार्गव से काम चलता था... कम ही "स्वयंभू" ब्लोगर हैं जो वागर्थ में स्थान पाने की साहित्य प्रतिभा रखते हैं... बधाई हो !

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  19. बधाई ,उस कविता को एक बार और पढवाइए,टिपण्णी में ही लिख जाइए ,बेहद रोचक और कसावदार पोस्ट .जहां जाके तर्क चुक जाता है वहां से यह पोस्ट शुरु होती है ......कृपया यहाँ भी पधारें -http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/blog-post_7883.html
    स्कूल में चरस और गांजा ,भुगतोगे भाई, खामियाजा

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  20. पढ कर बहुत अच्छा लगा .ऊपरवाले की कृपा बनी रहे !

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  21. यहाँ के 'ऊपरवालों' की किरपा भले ण हम पर रहे पर यह ज़रूर आस लगाते हैं कि उस ऊपरवाले की कृपा अवश्य बनी रहे,और यह काफ़ी-कुछ हमारे ऊपर ही निर्भर होता है.

    'वागर्थ' में स्थान पाने के लिए बहुत बधाई !

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  22. सुमित्रानंदन पन्त की चीटियों की कविता के बाद कैटर पिलर पर आपकी यह कविता आपको अमर कर गयी ..यही है मौलिकता महक और सृजनन की ताजगी ..
    वागर्थ सरीखी धुर साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित होना एक बड़ी बात है-बधाई!

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  23. वास्तव में श्रद्धा और विश्वास के लिए तर्क-वितर्क की सीढ़ी का होना आवश्यक है। पर तर्क की भी एक सीमा है। तर्कशास्त्रियों को इसका भी ध्यान रखना चाहिए। बहुत सुन्दर विचार दिया है आपने। साधुवाद।

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  24. बहुत अच्छा करता है कीड़ा
    जो कुलबुलाता है
    पेट से आपके कविता को
    फिर बुला के लाता है ।

    वाह वाह !!

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  25. सर्व प्रथम बधाइयाँ........
    बाबा की किरपा हुई , अगन हो गई शांत
    साहब सब नाराज भये,जीवन हुआ अशांत
    जीवन हुआ अशांत,नहीं हम खुद को बदले
    बदली की बदली के संग संग भटके पगले
    सत्य बोलने के कीड़े ने हमको चाबा
    मिलती नहीं भभूत,न मिलते हमको बाबा.

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  26. मेंडिबुलर मुखभागों से,
    हरी पत्तियां कुतर-कुतर।
    किसी तरह भर पाना,
    दस भागों का रेल उदर।

    वाह इस कैटरपिलर ने आपकी लेखनी को चलने पर मजबूर कर दिया. बस उपरवाले की कृपा बनी रहे और आपका कीट प्रेम बदस्तूर जारी रहे.

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  27. bahut bahut badhayi aapki rachna ka itni prathishthit patrika me sthan pane ke liye. ab to is fursat ko padh kar vishwas karna padega un sab uparwalo par.

    sarthak post. sarthak kavita jo vicharo ki uthal puthal ka aagaaz karti hai.

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  28. कविता है ही बहुत बढ़िया। आपके ब्लॉग पर पहले भी प्रकाशित है क्या? पढ़ी-पढ़ी सी लगती हैं।
    ...इस उपलब्धि के लिए हमारी बधाई भी स्वीकार करें।

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    1. हां, पहले प्रकाशित है और लिंक भी नीचे दिया हुआ है।
      आभार!

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  29. कविता पहले भी पढ़ी थी, आज फिर पढ़ी। बहुत आकर्षक है। उस पर, विचार-भूमि ने आकर्षण और बढ़ा दिया। वागर्थ में स्थान मिलने पर बधाई।

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  30. आलेख के साथ बहुत प्रशंसनीय कविता ..हिन्दयुग्म में पहले पढ़ी थी....बहुत बढ़िया बिम्ब हैं ...
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...

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  31. क्या बात है ..सबसे पहले तो बधाई .क्या जोड़ा है कैटर पिलर को आस्था से और आस्था को साधू बाबा से और साधू बाबा को पड़े से.
    वाकई सब आस्था का ही खेल है. बनी रहे यूँ ही.
    बहुत बढ़िया पोस्ट

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  32. वाह .. लाजवाब कविता है ...
    आपने कैटर पिल्लर कों कविता में जोड़ के नया दृष्टिकोण दिया है ... नया बिम्ब जो बहुत पसंद आया ...

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  33. ऊपर वाले की कृपा यूं ही बनी रहे...

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  34. विश्वास अगर तर्क की कसौटी पर खरा उतर जाए तो दीर्घजीवी होता है!!
    सरकारी नौकरी में ऊपर वाले की कृपा भी ऊपर वालों पर ही निर्भर करती है !
    रोचक विश्लेषण .
    कविता छपने की बहुत बधाई !

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  35. बधाई! ऊपर वालों की कृपा बनी रहे।

    आपने लिखा-हम तो सरकारी-मुलाजिम हैं। हमसे ज़्यादा कौन इस बात की गवाही दे सकता कि सरकार में “ऊपर वाले” की कृपा का कितना महत्व है!! उनकी कृपा रहे तो “च्वायस पोस्टिंग” मिलती है, स्थानान्तरण अपने मन के मुताबिक होता है, मालदार सीट मिलती है।

    उधर आपकी कविता कैटरपिटर वागर्थ में छपी मतलब उसको च्वाइस पोस्टिंग मिल गयी। :) वैसे भी आपने कविता की शुरुआत में ही लिखा था-
    ओ कैटरपिलर!
    तिलियों पर लिखते हैं सब,
    मैं लिखूंगा तुझ पर,
    ओ कैटरपिलर!

    आपकी कृपा कैटरपिलर पर हुई! उसके दिन फ़िरे।

    लगता है कैसा?
    बौने का हिमालय लांघने के संकल्प जैसा।

    इस बिम्ब पर पुनर्विचार करियेगा। हिमालय लांघने के लिये लम्बाई का क्या स्थान? शायद पंगु गिरि लंघै रहा होगा मन में। कम ऊंचाई वाले लोगों को एतराज हो सकता है आपके इस बिम्ब से। :)

    बाकी चकाचक। :)

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    1. १. @ उधर आपकी कविता कैटरपिटर वागर्थ में छपी मतलब उसको च्वाइस पोस्टिंग मिल गयी।
      -- ना, ना, आज से लगभग १२ साल पहले एक संपादक ने इसे स्वीकृत कर लिया था, बाद में उनकी कृपा-दृष्टि कुछ खास कारणों से हट गई और इसे कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। इस पोस्टिंग के लिए इसे बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ा।
      २. @ आपकी कृपा कैटरपिलर पर हुई! उसके दिन फ़िरे।
      ना-ना, उसमी कृपा मुझ पर हुई सो मैं तो उस पर एक कविता लिख गया, उसके दिन कहां फिरे, वह तो अब भी उसी हालात को जी रहा है।
      ३. @ कम ऊंचाई वाले लोगों को एतराज हो सकता है आपके इस बिम्ब से।
      बौना एक खास तरह की कद-काठी के लोगों के लिए स्वीकृत शब्द है। उसके भी बड़े-बड़े काम करने के संकल्प होते हैं। यहां बिम्ब तो उस संकल्प के लिए है।
      हम भी तो धन के मामले में धनी-मनी आदमी के सामने बौने ही हैं, पर जहां दान देने की बात आती है किसी अच्छे काम के लिए वहां हमारा संकल्प किसी मामले में कम नहीं होता। और कई धनी लोग हमारे इस संकल्प के सामने बौने दिखते हैं।

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