सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
22. सूफ़ी सिलसिला- भारत में सूफ़ीवाद-2
22.1 सूफ़ी सिलसिला
भारत में
इतिहासकारों के अनुसार, भारत में इस्लाम का प्रसार किसी एक घटना या तरीके से नहीं,
बल्कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग रूपों में हुआ। भारत
में तीन तरीक़ों से इस्लाम आया। पहला, व्यापार के ज़रिए,
जिसकी
शुरुआत दक्षिण भारत
से हुई। इस्लाम का भारत में सबसे पहला
प्रवेश 7वीं शताब्दी
में अरब व्यापारियों के माध्यम से हुआ। इस्लाम के उदय से पहले भी अरब व्यापारियों
के दक्षिण भारत (विशेषकर केरल के मालाबार तट) के साथ पुराने व्यापारिक संबंध थे। जब अरब के लोगों ने इस्लाम अपनाया, तो वे व्यापार के साथ-साथ अपनी नई आस्था भी भारत लाए।
स्थानीय राजाओं (जैसे चेरा साम्राज्य के राजाओं) ने उनका स्वागत किया,
क्योंकि वे व्यापार के लिए महत्वपूर्ण थे। इसी दौर में केरल में चेरामन जुमा मस्जिद का निर्माण हुआ, जिसे भारत की पहली मस्जिद माना जाता है। यह प्रसार पूरी तरह
शांतिपूर्ण और सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर आधारित था।
दूसरा, सैनिक अभियानों के ज़रिए (उत्तर-पश्चिम भारत), जो महमूद ग़ज़नवी और मोहम्मद ग़ौरी जैसे आक्रमणकारियों की शक्ल
में सामने आया। सैन्य अभियानों की शुरुआत 8वीं शताब्दी (712 ईसवी) में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा
सिंध पर आक्रमण से हुई थी। इसके सदियों बाद, 11वीं और 12वीं शताब्दी में उत्तर-पश्चिम (वर्तमान
अफगानिस्तान/मध्य एशिया) के रास्ते महमूद ग़ज़नवी और मोहम्मद ग़ौरी जैसे शासकों के
आक्रमण हुए। ग़ज़नवी का मुख्य उद्देश्य लूटपाट था, लेकिन मोहम्मद ग़ौरी के अभियानों ने
भारत में मुस्लिम सत्ता (दिल्ली सल्तनत) की नींव रखी। इस माध्यम से इस्लाम शासक
वर्ग के धर्म के रूप में स्थापित हुआ और प्रशासनिक व राजनीतिक प्रभाव के कारण इसका
प्रसार बढ़ा।
तीसरा, सूफ़ियों और वली अल्लाह
(सूफ़ी संतों) के ज़रिए। भारत में आम
जनता के बीच इस्लाम के गहरे सामाजिक और आध्यात्मिक प्रसार का सबसे बड़ा श्रेय
सूफ़ी संतों को जाता है। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली), और बाबा फ़रीद जैसे सूफ़ी संतों ने
ईश्वर के प्रति प्रेम, संगीत (कव्वाली), और जाति-पांत से परे मानवीय समानता का संदेश दिया। सूफ़ियों के
विचार भारतीय दर्शन (जैसे भक्ति आंदोलन) से काफी मिलते-जुलते थे, जिससे समाज के गरीब, वंचित और निचली जातियों के लोग इनकी
ओर अत्यधिक आकर्षित हुए और उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम अपनाया।
इस
प्रकार, जहाँ व्यापार ने इस्लाम की नींव रखी, वहीं
सैन्य अभियानों ने उसे राजनीतिक शक्ति दी, और
सूफ़ी संतों ने इसे भारतीय समाज के ताने-बाने में आत्मसात कराया।
12वीं शताब्दी
में अनेक सूफ़ी सन्त भारत आये। सूफ़ियों का भारत में आगमन ईरान,
इराक़
और मध्य एशिया से हुआ। भारत में बा-शरअ सिलसिला
अधिक प्रभावशाली था। सूफ़ीमत
का भारत में आगमन कब हुआ, इस प्रश्न
को लेकर विद्वानों में मतैक्य नहीं दिखाई पड़ता। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के सैंकड़ों
वर्ष पहले से ही सूफ़ीमत भारत में प्रवेश कर चुका था। कुछ विद्वानों का मनाना है कि ईरान
के इमाम ग़जाली के ज़रिये
सूफ़ीवाद, तुर्की होते हुये भारत पहुंचा। बाद
में सूफ़ियों का आगमन इराक़ तथा मध्य एशिया से भी हुआ। अन्य विद्वानों
का मत है कि 1000 ई. के
बाद ही सूफ़ीमत भारत में आया। भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से,
सूफ़ीवाद
तुर्की से होकर भारत नहीं आया, बल्कि
मध्य एशिया (वर्तमान उज़्बेकिस्तान, अफ़गानिस्तान,
ताजिकिस्तान) और ईरान से
होकर सीधे भारत पहुँचा था। यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि भारत पर आक्रमण
करने वाले या दिल्ली सल्तनत की स्थापना करने वाले शासक (जैसे ग़ोरी,
ग़ुलाम
वंश, ख़िलजी आदि) नस्ल से तुर्क या
अफ़गान थे। वे अपने साथ मध्य एशिया के सूफ़ियों और विद्वानों को भारत लाए। लेकिन
वे आज के 'तुर्की देश'
(Anatolia) से नहीं आए थे, बल्कि
मध्य एशिया के तुर्क क्षेत्रों से आए थे। इमाम ग़ज़ाली
(1058–1111 ईस्वी) वर्तमान ईरान (ख़ोरासान
प्रांत के तूस शहर) के रहने वाले थे। वे कभी तुर्की या भारत नहीं आए और न
ही उनके ज़रिए सीधे सूफ़ीवाद इन देशों में "यात्रा" करके पहुँचा। इमाम
ग़ज़ाली ने सूफ़ीवाद को जो दार्शनिक मज़बूती दी, उसी
की रोशनी में आगे चलकर चिश्ती, सुहरावर्दी
और नक़्शबंदी संतों ने मध्य एशिया से भारत आकर इस्लाम के आध्यात्मिक संदेश को
फैलाया।
कुछ का कहना है कि भारत में इस्लाम का प्रवेश मुहम्मद-बिन-क़ासिम के
साथ हुआ। यह पूरी तरह सही नहीं है कि भारत में इस्लाम का प्रवेश मुहम्मद-बिन-क़ासिम
के साथ हुआ था। मुहम्मद-बिन-क़ासिम के आक्रमण से काफी पहले ही इस्लाम भारत में
दस्तक दे चुका था। उसके सिंध पहुँचने से लगभग 83 वर्ष
पहले ही भारत में इस्लाम का शांतिपूर्ण प्रवेश हो चुका था
और मुस्लिम समुदाय यहाँ बसना शुरू हो गया था। मुहम्मद-बिन-क़ासिम का अभियान भारत
में इस्लाम के प्रवेश का नहीं, बल्कि
भारत में मुस्लिम शासन (राजनीतिक सत्ता) की शुरुआत का प्रतीक है। भारत में इस्लाम 'एक
धर्म और संस्कृति' के रूप में सबसे पहले अरब
व्यापारियों के ज़रिए शांतिपूर्वक आया, जबकि
मुहम्मद-बिन-क़ासिम के ज़रिए वह पहली बार एक राजनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में
स्थापित हुआ।
उस समय उमय्यद ख़िलाफ़त (जिसका केंद्र दमिश्क,
सीरिया
था) अपनी सीमाओं को तेज़ी से फैला रही थी। वे उत्तर अफ्रीका और यूरोप (स्पेन) से
लेकर मध्य एशिया तक अपना नियंत्रण स्थापित कर चुके थे। भारत के उत्तर-पश्चिमी
हिस्से (सिंध) पर नियंत्रण करना उनके साम्राज्य विस्तार के एजेंडे का एक स्वाभाविक
हिस्सा था ताकि पूर्व की ओर बढ़ने का रास्ता साफ हो सके। मुहम्मद-बिन-क़ासिम से
पहले भी अरबों ने मकरान तट और सिंध पर नियंत्रण पाने के लिए उबैदुल्लाह और बुदैल
के नेतृत्व में दो सैन्य अभियान भेजे थे, लेकिन
राजा दाहिर की सेना ने उन्हें हरा दिया था। अरब साम्राज्य अपनी इस सैन्य हार का
बदला लेकर अपनी प्रतिष्ठा बहाल करना चाहता था।
मुहम्मद-बिन-क़ासिम अरब मूल का आक्रमणकारी था। आठवीं
सदी के शुरू में (712 ई. के लगभग) उसने सिंध पर चढ़ाई कर
सिंध और मुल्तान के क्षेत्रों को जीत कर
वहां के ब्राह्मण राजा को पराजित कर दिया। उसका राज-पाट सिंध और मुल्तान के बीच
था। अरबों के लिए भारत एक बिल्कुल नया धार्मिक अनुभव था, क्योंकि
यहाँ के लोग मुख्य रूप से सनातन धर्म (हिंदू) और बौद्ध धर्म को मानते थे। उन दिनों
पूरा अफ़ग़ानिस्तान हिंदू राज्य था, प्रजा
हिंदू और बौद्ध धर्म की अनुयायी थी। मुहम्मद
बिन क़ासिम एक उदार शासक था और अपनी हिंदू और
मुसलमान प्रजा के साथ एक समान निष्पक्ष व्यवहार करता था। आक्रमण के शुरुआती दौर
में (विशेषकर देबल और मुल्तान के घेराव के दौरान) बड़े पैमाने पर मंदिरों को तोड़ा
गया और मूर्तियाँ नष्ट की गईं। लेकिन सत्ता स्थापित होने के बाद,
क़ासिम
ने व्यावहारिक नीति अपनाई। उसने गैर-मुस्लिमों को अपने मंदिरों में पूजा करने और
नए मंदिर बनाने की अनुमति दी, बशर्ते
वे नियमानुसार कर (Tax) चुकाते रहें। पूजा-पाठ की अनुमति
के बदले हिन्दुओं को जज़िया
देना पड़ता था। क़ासिम ने सिंध के हिंदुओं और बौद्धों को 'जिम्मी'
(इस्लामी
कानून के तहत सुरक्षा प्राप्त गैर-मुस्लिम) का दर्जा दिया। इसके बदले उन पर पहली
बार 'जिज़िया'
कर लगाया गया।
सिंध में पहली बार आधिकारिक तौर पर इस्लाम ने पैर जमाए।
कई स्थानीय लोगों ने (विशेषकर जाति व्यवस्था से पीड़ित तबकों और कुछ बौद्ध
भिक्षुओं ने, जो तत्कालीन ब्राह्मण शासक दाहिर
की नीतियों से असंतुष्ट थे) स्वेच्छा से या राजनीतिक-आर्थिक दबाव (जिज़िया से बचने
के लिए) के कारण इस्लाम अपनाया। सिंध वासियों के दिल में इस्लामी पैग़म्बर के
अह्लबैत के प्रति भक्ति-भाव एवं श्रद्धा
बनी रही। मुहम्मद-बिन-क़ासिम की
ऐतिहासिक उपलब्धि ने दक्षिण एशिया को मुस्लिम साम्राज्य से जोड़ा।
भारत को भूमध्यसागरीय दुनिया और यहां तक कि दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाला
यह व्यापार मार्ग 900 ईस्वी तक
शांतिपूर्वक चला। इस अवधि के दौरान, अब्बासिद ख़लीफ़ा (750
- 1258) बगदाद में बैठा था। यह शहर हज़रत अली इब्न अबू तालिब,
हज़रत
हसन अल बसरी और हज़रत राबिया जैसे उल्लेखनीय सूफ़ी संतों के नाम के साथ जुड़े होने के
अलावा सूफ़ीवाद का जन्मस्थान भी है।
इस्लाम की रहस्यवादी परंपरा तसव्वुफ़ ने बगदाद (इराक) से
फारस में फैलते हुए महत्वपूर्ण भूमि प्राप्त की, जिसे
आज ईरान और अफगानिस्तान के रूप में जाना जाता है। 977 में,
एक
तुर्क सैनिक नेता, सबुकतिगिन ने गज़नह शहर में अफगान साम्राज्य की स्थापना
की और 997 ईसवी तक शासन किया। मुहम्मद-बिन-क़ासिम की
ऐतिहासिक उपलब्धि के दो सौ वर्षों के बाद सबुकतिगिन
के बेटे महमूद ग़ज़नवी ने
सन 1000 ई. और
1026
ई. के बीच भारत पर सत्रह बार आक्रमण किया। महमूद ग़ज़नवी (998–1030
ईस्वी) ने अपने पिता सबुकतिगिन से मिले
एक छोटे से राज्य को मध्य एशिया, ईरान
और भारतीय उपमहाद्वीप के मुहाने तक फैले एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य में
बदल दिया। इतिहास में वह पहला ऐसा शासक था जिसने औपचारिक रूप से 'सुल्तान'
की
उपाधि धारण की। उसके साम्राज्य में पूरा अफ़गानिस्तान,
ईरान
(फ़ारस
का एक बड़ा हिस्सा), तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान के कुछ हिस्से
(ख़्वारिज़्म का क्षेत्र) और ट्रांसऑक्सियाना तक उसकी सीमाएँ लगती थीं, इसके अलावा
आधुनिक पाकिस्तान (सिंध,
पंजाब,
उत्तर-पश्चिम
सीमांत प्रांत) और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों (कश्मीर
की सीमा और पंजाब) पर उसका सीधा नियंत्रण या प्रभाव था। इस साम्राज्य की राजधानी ग़ज़नी
(वर्तमान
अफ़गानिस्तान में) थी, जिसे महमूद ने भारत से लूटी गई
अपार दौलत से दुनिया के सबसे भव्य, सुंदर
और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहरों में से एक बना दिया था।
वह सिंध बलुचिस्तान की सीमाओं को लांघते हुए भारत के
भीतरी हिस्सों में घुस आया। भारत में उसके अभियानों का मुख्य उद्देश्य स्थायी
साम्राज्य स्थापित करना नहीं, बल्कि
यहाँ के समृद्ध मंदिरों (जैसे सोमनाथ, मथुरा,
कन्नौज,
थानेसर)
को लूटकर अपने मध्य एशियाई साम्राज्य को आर्थिक रूप से मज़बूत करना था। प्रसिद्ध
सोमनाथ के मंदिर का विध्वंस (1025 ई.)
उसने ही किया था। इन दिनों सोमनाथ
का मंदिर अपनी अपार संपत्ति के लिए प्रसिद्ध था। 1030 ई.
में उसकी मृत्यु हो गई। किंतु उसके आक्रमणों के कारण भावी आक्रमणकारियों, विशेषकर
मुहम्मद गोरी का कार्य सुगम हो गया। उसने सीमावर्ती हिंदू शाही राजवंश (राजा जयपाल
और उनके पुत्र आनंदपाल) को पूरी तरह समाप्त कर दिया और पंजाब (लाहौर को केंद्र
बनाकर) को सीधे अपने ग़ज़नवी साम्राज्य में मिला लिया। इस विलय के कारण
ग़ज़नवी साम्राज्य की सीमाएँ सीधे आधुनिक भारत के मैदानों तक पहुँच गईं,
जिसने
भविष्य के आक्रमणकारियों (जैसे मोहम्मद ग़ौरी) के लिए दिल्ली और गंगा के मैदानों
का रास्ता खोल दिया।
महमूद ग़ज़नवी की मृत्यु (1030
ईस्वी)
के समय उसका साम्राज्य कैस्पियन सागर से लेकर यमुना नदी के तट तक और अरल
सागर से लेकर अरब सागर तक फैला हुआ था। हालांकि, यह
विशाल साम्राज्य केवल महमूद के व्यक्तिगत सैन्य कौशल और दृढ़ता पर टिका था। उसकी
मृत्यु के बाद, उसके उत्तराधिकारी इतने बड़े
साम्राज्य को संभाल नहीं पाए और धीरे-धीरे सेलजुक तुर्कों और बाद में ग़ौरी राजवंश
के उदय के कारण ग़ज़नवी साम्राज्य का पतन हो गया। महान खगोलशास्त्री,
गणितज्ञ,
दार्शनिक
और भाषाविद् अल-बिरूनी
उसके साथ भारत आया था और प्रसिद्ध पुस्तक 'किताब-उल-हिंद'
लिखी
थी। इस पुस्तक में उसने भारत के समाज, धर्म
और विज्ञान का जो विवरण दिया, वह
आज भी प्राचीन और मध्यकालीन भारत को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। अल-बिरूनी
की भारत यात्रा तलवार के साये में शुरू हुई थी, लेकिन
इसका अंत ज्ञान के एक विशाल पुल के रूप में हुआ। उसकी पुस्तक 'किताब-उल-हिंद'
को
ग्यारहवीं शताब्दी के भारत का "दर्पण" कहा
जाता है। वह दुनिया का पहला ऐसा विद्वान था जिसने तुलनात्मक धर्मशास्त्र और भारतीय
विद्या की वैज्ञानिक नींव रखी।
इस
काल में धार्मिक मामलों में भी बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा था। इस समय तक भारत के एक
बहुत बड़े हिस्से में बौद्ध धर्म का पतन हो गया था। महमूद ग़ज़नवी के अभियानों के
समय उत्तर-पश्चिम भारत (आज का पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान की सीमा) और पंजाब में बौद्ध धर्म लगभग गायब हो चुका
था। वहाँ मुख्य रूप से हिंदू धर्म ही प्रभावी था। महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के
कारण पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बचे-खुचे बौद्ध मठों को भारी क्षति पहुँची,
जिसके
कारण बौद्ध भिक्षु अपनी जान बचाने के लिए तिब्बत और हिमालय के अन्य सुरक्षित
क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए। अब जो बौद्ध धर्म प्रचलित हुआ था, वह बौद्ध और शाक्त
धर्मों का सम्मिश्रण था और केवल देश के एक कोने में बंगाल और बिहार तक सीमित रहा। यहाँ
पाल राजवंश का शासन था, जो
बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे। इस समय नालंदा, विक्रमशिला
और ओदंतपुरी जैसे विशाल बौद्ध विश्वविद्यालय पूरी तरह सक्रिय थे,
जहाँ
हज़ारों बौद्ध भिक्षु और छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इसी युग में बहुत से
धार्मिक सुधारकों का उदय हुआ, जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य।
अद्वैतवाद की पुनःस्थापना, जो एकेश्वरवाद के दर्शन के प्रचार प्रसार, के साथ समाज
सुधार इनका लक्ष्य था।
महमूद
के आक्रमण के सौ बरस बाद बारहवीं शताब्दी के मध्य में ग़ोरी वंश का उदय हुआ। इनका
आधार उत्तर-पश्चिम अफ़गानिस्तान था। शहाबुद्दीन
मुहम्मद ग़ोरी के
समय में शंसबानी वंश महत्त्वशाली हो गया और उसने इस वंश को ग़ज़नी में प्रतिष्ठित
किया। ग़ज़नी को अपना मुख्य स्थान बनाकर लगभग तीस वर्षों (1175-1205 ई.)
में भारत पर उसने कई हमले किए और मुस्लिम सल्तनत की नींव डाली। इतिहास से पता
चलता है कि एक बार भारतवर्ष की सीमाओं के भीतर प्रवेश करते ही इस्लाम भी भारत के
असंख्य संप्रदायों में से एक गिना जाने लगा। इसके बाद दिल्ली सल्तनत की स्थापना
हुई। भारत में सूफीमत (सूफीवाद) के प्रसार में दिल्ली सल्तनत (13वीं
से 16वीं शताब्दी) का योगदान बहुत गहरा,
प्रत्यक्ष
और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में था। जहाँ एक तरफ सुल्तानों के राजनीतिक संरक्षण ने
सूफियों को स्थिरता दी, वहीं
दूसरी तरफ दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक विस्तार के साथ-साथ सूफी सिलसिले भी देश के
कोने-कोने तक पहुँचे। 13वीं
शताब्दी में मध्य एशिया और फारस (ईरान) पर मंगोलों के भीषण आक्रमणों ने
इस्लामी दुनिया के महान सांस्कृतिक केंद्रों को नष्ट कर दिया था। ऐसे समय में
दिल्ली सल्तनत (विशेषकर इल्तुतमिश और बलबन के काल में) एकमात्र शक्तिशाली और
सुरक्षित मुस्लिम साम्राज्य था, जहाँ
मंगोल नहीं पहुँच पाए। जान बचाने के लिए सैकड़ों की संख्या में सूफी संत,
विद्वान
और दार्शनिक भारत (दिल्ली और मुल्तान) की ओर भागे। सल्तनत ने इन्हें सुरक्षा और
बसने की जगह दी, जिससे भारत सूफी मत का नया वैश्विक
केंद्र बन गया।
मुस्लिम
शासकों ने दिल्ली में राजधानी स्थापित की। जब एक बार दिल्ली में राजधानी स्थापित
हो गई तो कई कला-कौशल के पारंगत, प्रख्यात साहित्यकार, कवि, विद्वान, बुद्धिजीवी
और सूफ़ीजन दिल्ली की ओर आने लगे। कई विद्वानों ने इस बात की तरफ़ इशारा किया है कि
भारतीय जनमानस में पैग़म्बर के अह्लेबैत के प्रति विशेष श्रद्धा भाव पैदा करने में
ज़ैदियों और इस्माइलियों को कोई खास सफलता नहीं मिली। यदि हम व्यापक भारतीय जनमानस
(यानी बहुसंख्यक आबादी और मुख्यधारा के मुस्लिम समाज) की बात करें,
तो
ज़ैदियों और इस्माइलियों के संगठित धार्मिक आंदोलनों को उस स्तर पर सफलता नहीं
मिली, जितनी बड़ी सफलता सूफ़ी संतों
और उनके सिलसिलों (जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी,
क़ादिरी) को मिली। इसका प्रमुख कारण
यह था कि उनके धार्मिक प्रचार-प्रसार का आधार अन्य इस्लामी सम्प्रदायों के
विश्वासों के खण्डन पर टिका था और दूसरे वे ग़ैर-मुस्लिम से अधिक इस्लामी
सम्प्रदायों के बीच प्रचार-प्रसार करते थे। इस वातावरण में भारतीय जनता को इस्लाम
धर्म की आत्मा से परिचित कराने का दायित्व सूफ़ी संतों ने निबाहा। भारतीय जनमानस ने
सूफ़ियों का स्वागत खुले मन से किया, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में। लगभग सभी
प्रमुख सूफ़ी सिलसिले (ग़ौस-ए-आज़म शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी से लेकर ख़्वाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती तक) आध्यात्मिक रूप से अपना संबंध इमाम अली और अह्ले-बैत से
जोड़ते हैं। सूफ़ियों ने बिना किसी राजनीतिक एजेंडे के अह्ले-बैत की रूहानियत और
उनके त्याग को आम जनता के सामने रखा। अमीर ख़ुसरो और अन्य सूफ़ी कवियों ने 'मन
कुंतो मौला फ़ हाज़ा अली मौला' जैसी
कव्वालियों और कविताओं के ज़रिए इमाम अली और अह्ले-बैत के प्रति प्रेम को भारतीय
लोक-संगीत और संस्कृति का हिस्सा बना दिया। इसे सुनने और अपनाने वालों में केवल
मुसलमान ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में हिंदू भी
शामिल थे। इमाम हुसैन और करबला के शहीदों (जो अह्ले-बैत का हिस्सा हैं) के प्रति
जो विशेष श्रद्धा भारत के जनमानस में दिखती है, उसे
जन-जन तक पहुँचाने में सूफ़ियों और स्थानीय कवियों के मर्सियों (शोक गीतों)
और ताज़ियादारी की परंपरा का बड़ा हाथ रहा। यही कारण है कि भारत में सदियों
से हिंदू (जैसे हुसैनी ब्राह्मण) और सुन्नी समुदाय के लोग भी मुहर्रम में
बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते आए हैं। सूफ़ी संतों के उदार, सर्व-समावेशी
और प्रेम-आधारित दृष्टिकोण ने अह्ले-बैत की श्रद्धा को संप्रदायों की दीवारों से
आज़ाद करके भारतीय संस्कृति के ताने-बाने में हमेशा के लिए अमर कर दिया।
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मनोज कुमार
