रविवार, 12 जून 2011

भारतीय काव्यशास्त्र-70

भारतीय काव्यशास्त्र-70

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में संलक्ष्यक्रम अर्थशक्त्युत्थ कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध पदद्योत्य ध्वनि के चार भेदों- वस्तु से वस्तु ध्वनि, वस्तु से अलंकार, अलंकार से वस्तु और अलंकार से अलंकार ध्वनि पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में प्रबन्धगत (Context) अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि पर एक छोटी सी चर्चा की जाएगी।

आगे चर्चा करने के पहले पुनः एक बार ध्वनि के भेदों का यहाँ उल्लेख करना आवश्यक लग रहा है। अबतक ध्वनि के निम्नलिखित भेदों की चर्चा कर चुके हैं-

सर्वप्रथम ध्वनि के दो भेद- 1. अविवक्षितवाच्य ध्वनि (लक्षणामूलध्वनि) और 2. विवक्षितवाच्य ध्वनि (अभिधामूलध्वनि)।

अविवक्षितवाच्य ध्वनि (लक्षणामूलध्वनि) के दो भेद- 1. अर्थान्तर-संक्रमित-वाच्य ध्वनि और 2. अत्यन्त-तिरस्कृत-वाच्य ध्वनि।

विवक्षितवाच्य ध्वनि (अभिधामूलध्वनि) के दो भेद- 1. असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि और 2. संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि।

असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि को रसध्वनि के नाम से भी जाना जाता है और इसे केवल एक ही माना गया है। परन्तु इसके अन्तर्गत 1. रस, 2. रसाभास, 3. भाव, 4. भावाभास, 5. भावोदय, 6. भावशान्ति, 7. भावसंधि और 8. भावशबलता माने जाते हैं।

संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि के तीन भेद किए गए हैं- 1. शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि, 2. अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि और 3. उभयशक्त्युत्थ ध्वनि।

शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि के दो भेद- 1. वस्तुध्वनि और 2. अलंकारध्वनि।

अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के तीन भेद- 1. स्वतःसम्भवी ध्वनि, 2. कविप्रौढोक्तिसिद्ध ध्वनि और 3. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध ध्वनि। इन तीनों के चार-चार भेद- 1. वस्तु से वस्तु व्यंग्य, 2. वस्तु से अलंकार व्यंग्य, 3. अलंकार से वस्तु व्यंग्य और 4. अलंकार से अलंकार व्यंग्य। इस प्रकार इसके 12 भेद हुए। पुनः इन 12 भेदों के तीन-तीन भेद- 1. वाक्यगत, 2. पदगत और 3. प्रबन्धगत (with reference to the context) होते हैं। इस प्रकार अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के कुल 36 भेद होते हैं। उभयशक्त्युत्थ ध्वनि का कोई अन्य भेद नहीं होता।

अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के 36 भेदों में से 24 भेदों, वाक्यगत और पदगत भेदों पर चर्चा की जा चुकी है। यहाँ प्रबन्धगत 12 भेदों को दिया जायगा-

1. प्रबन्धगत स्वतःसम्भवी ध्वनि, 2. प्रबन्धगत कविप्रौढोक्तिसिद्ध ध्वनि और 3. प्रबन्धगत कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध ध्वनि।

इन तीनों के चार-चार भेद- 1. वस्तु से वस्तु ध्वनि, 2. वस्तु से अलंकार ध्वनि, 3. अलंकार से वस्तु ध्वनि और 4. अलंकार से अलंकार ध्वनि।

वैसे आचार्य मम्मट और आचार्य विश्वनाथ कविराज दोनों ने ही अपने-अपने ग्रंथ क्रमशः काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण में महाभारत के शान्तिपर्व के 153वें अध्याय में पितामह भीष्म और महाराज युधिष्ठिर के बीच वार्तालाप के दौरान महाराज युधिष्ठिर के एक प्रश्न का उत्तर देने के लिए पितामह भीष्म द्वारा सुनायी गयी कथा का उल्लेख किया है और प्रबन्धगत अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के लिए वहीं से चार श्लोक उदाहरण के रूप में लिए हैं। दो उदाहरणों पर चर्चाकर दोनों ही आचार्यों ने यह कहकर कि अन्य भेदों का इसी प्रकार निर्णय कर लेना चाहिए, इन बारह भेदों का अलग-अलग उदाहरण देकर विवेचना नहीं की है। उन उदाहरणों को लेने के पहले उक्त उल्लिखित कथा को यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ पहले ले लेते हैं।

कहानी इस प्रकार है कि महाराज युधिष्ठिर ने पितामह भीष्म से पूछा कि क्या कोई मरकर भी जीवित हुआ है। इस पर पितामह भीष्म ने एक प्राचीन कथा सुनाई कि नैमिषारण्य में एक ब्राह्मण का दुखी पुत्र मर गया। परिवार के लोग उसका शव लेकर रोते-विलखते श्मशान पहुंचे। उनकी आवाज सुनकर एक गीध वहाँ पहुँचा और उनलोगों को अनेक उपदेश देते हुए कहा कि इस लोक में जो व्यक्ति मर जाता है, वह पुनः जीवित नहीं हो सकता। अतएव आपलोगों को यहाँ श्मशाम में व्यर्थ का समय न गवाँकर वापस घर लौट जाना चाहिए। उसकी बात मानकर जब वे उस बच्चे के शव को छोड़कर लौट रहे थे, उसी समय जम्बूक नामक एक सियार अपनी माँद से बाहर आकर उन्हें समझाया कि आप मनुष्य लोग बड़े निर्दयी हो, आपलोगों में जरा भी स्नेह नाम की चीज नहीं है आदि आदि। सियार की बात मानकर वे पुनः श्मशान की ओर चल पड़े। फिर गीध ने उन्हे लौटते देखकर वेदान्त के सारे ज्ञान उनलोगों के सामने उड़ेलकर रख दिया और उसकी बातों से प्रभावित होकर वे पुनः घर की ओर उन्मुख हुए। फिर सियार ने उनलोगों की निर्दयता पर उन्हें खूब लताड़ा और वे पुनः श्मशान की ओर हो लिए। इस प्रकार गीध और सियार की परस्पर विरोधी बातों को मानकर वो लोग कई बार श्मशान से घर की ओर और बीच रास्ते से श्मशान की ओर आते-जाते रहे। गीध चाहता था कि अभी थोड़ा दिन है। ये लोग जल्दी यहाँ से निकलें, ताकि दिन में ही वह अपनी दावत कर ले। सियार चाहता था कि वे लोग अँधेरा होने तक रुके रहें, ताकि गीध की दाल न गल सके, क्य़ोंकि रात में गीध को दिखेगा नहीं और अकेले उसे पूरा शव खाने को मिल जाएगा। इसी बीच भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए और उस बच्चे को जीवित कर दिए तथा उस गीध और गोमायु (सियार का नाम) दोनों को क्षुधा की शान्ति का वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गए।

इसी कथा से चार श्लोक प्रबन्धगत शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि को स्पष्ट करने के लिए उदाहरण के रूप में लिए गए हैं। पहले दो उदाहरण गीध की उक्ति है और दो सियार की।

गीध कहता है-

अलं स्थित्वा श्मशानेSस्मिन्गृध्रगोमायसङ्कुले।

कङ्कालबहले घोरे सर्वप्राणिभयङ्करे।।

न चेह जीवितः कश्चित्कालधर्ममुपागतः।

प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी।।

अर्थात् गिद्धों और सियारों से भरे, चारों ओर बिखरे कंकाल, ऐसे बीभत्स और सभी प्रकार के प्राणियों के लिए भयंकर श्मशान में ठहरना बेकार है। मरा हुआ व्यक्ति चाहे किसी का प्रिय हो अथवा शत्रु, वह पुनः जीवित नहीं होता। सभी प्राणियों की यही गति है।

यहाँ दिन में आहार ढूढ़ने में समर्थ गिद्ध का मृत बालक के सगे-सम्बन्धियों को विदा करने का उद्देश्य व्यंग्य है।

सियार की उक्ति-

आदित्योSयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत साम्प्रतम्।

बहुविघ्नो मुहूर्त्तोSयं जीवेदपि कदाचन।।

अमुं कनकवर्णाभं बालमप्राप्तयौवनम्।

गृध्रवाक्यात् कथं मूढास्त्यजध्वमविशङ्किताः।।

अर्थात् अरे मूर्खों देखो, अभी सूर्य वर्तमान है। अभी इस बालक को स्नेह करो। यह मुहूर्त अनेक विघ्नों से भरा हुआ है। हो सकता है विघ्नों वाला मुहूर्त टल जाने के बाद यह पुनः जीवित हो जाए। गिद्ध के कहने से निशंक होकर स्वर्ण के समान आभावाले और युवावस्था से वंचित इस बालक को छोड़कर, अरे मूर्खों, कैसे चले जा रहे हो।

यहाँ रात में अधिक समर्थ होने के कारण सियार द्वारा लोगों को रोकने का उद्देश्य व्यंग्य है। इस प्रकार का अर्थशक्त्युत्थ व्यंग्य प्रबंध में ही दिखायी पड़ता है।

*****

7 टिप्‍पणियां:

  1. कृपया क्षमा करेंगे। कथानक में गलती से सियार का नाम जम्बुक टाइप हो गया है। वास्तव में महाभारत में कथानक के अनुसार सियार का नाम गोमायु है। जम्बुक सियार या गीदड़ का पर्याय है।

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  2. आचार्य जी बहुत धन्यबाद और आभार निरंतर ज्ञानवर्धन के लिए.

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  3. ज्ञानवर्धक लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद!

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  4. बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक आलेख!
    इस खजाने को सुधि पाठकों को बाँटने के लिए आभार!

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  5. ज्ञान से परिपूर्ण पोस्ट...

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  6. आदरणीय मनोज जी सियार और गीध के कथन और उपदेश को लेकर बहुत ही सुन्दर विचार प्रस्तुत किये गए जो ज्ञान वर्धक और आँखें खोल देने वाला है
    इस प्रकार गीध और सियार की परस्पर विरोधी बातों को मानकर वो लोग कई बार श्मशान से घर की ओर और बीच रास्ते से श्मशान की ओर आते-जाते रहे। ..ऐसा बहुधा भ्रम में पड़ लोग परेशां हो भटकते रहते हैं ..
    धन्यवाद आप का इसे पाठकों तक पहुँचाने हेतु -

    सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

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