शुक्रवार, 17 जून 2011

शिवस्वरोदय-47

 

- आचार्य परशुराम राय

पाठकों को यह बताना आवश्यक है कि अधिकांश बातों की शिवस्वरोदय में पुनरावृत्तियाँ देखने को मिलती हैं। पाठक भी सोचते होंगे कि एक ही बात रोज-रोज बताने का मतलब क्या है। पर शास्त्र है, एक बार प्रारम्भ हो गया तो समाप्त करना उचित है। लगता है कि विभिन्न साधकों की अनुभूतियों और उपलब्धियों को एक ग्रंथ में संकलित कर दिया गया है, जिसे शिवस्वरोदय नाम दिया गया। उन साधकों ने इसे अपनी व्य़क्तिगत उपलब्धि न मानकर शिव रूपी गुरु की उपलब्धि मानकर भगवान शिव द्वारा प्रदत्त ज्ञान के रूप में ही इसे स्वीकार किया और कहीं भी अपना नाम नहीं आने दिया। इसीलिए शायद इस ग्रंथ में काफी पुनरावृत्तियाँ देखने को मिलती हैं। अतएव इस अंक में भी आपलोगों को युद्ध सम्बन्धी प्रश्न और उनके उत्तर का किया गया विधान पढ़ने को मिलेगा है।

यस्यां नाड्यां भवेच्चारस्तां दिशं युधि संश्रयेत्।

तदाSसौ जयमाप्नोति नात्रकार्या विचारणा।।256।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यदि कोई योद्धा युद्ध के मैदान में अपने क्रियाशील स्वर की ओर से दुश्मन से लड़े तो उसमें उसकी विजय होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।

English Translation – In case a fighter fights from the side of the active nostril with breath, he gets victory undoubtedly.

यदि सङ्ग्रामकाले तु वामनाडी सदा वहेत्।

स्थायिनो विजयं विद्याद्रिपुवश्यादयोSपि च।।257।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यदि युद्ध के समय बायीं नाक से स्वर प्रवाहित हो रहा हो, तो जहाँ युद्ध हो रहा है, उस स्थान के राजा की विजय होती है, अर्थात् जिस पर आक्रमण किया गया है, उसकी विजय होती है और शत्रु पर काबू पा लिया जाता है।

English Translation – If breath flows through left nostril at the time of war, the king, at whose place the war is on, will be victorious and the enemy will be captured.

यदि सङ्ग्रामकाले च सूर्यस्तु व्यावृतो वहेत्।

तदा यायी जयं विद्यात् सदेवासुरमानवे।।258।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – पर यदि युद्ध के समय लगातार सूर्य स्वर प्रवाहित होता रहे, तो समझना चाहिए कि आक्रमणकारी राजा की विजय होती है, चाहे देवता और दानवों का युद्ध हो या मनुष्यों का।

English Translation – But when at the time of war the breath flows continuously from the right nostril, the attacking side will get the victory, whether the war is between gods and demons or between the two sides of human beings.

रणे हरति शत्रुस्तं वामायां प्रविशेन्नरः।

स्थानं विषुवचारेण जयः सूर्येण धावता।।259।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – जो योद्धा बाएँ स्वर के प्रवाहकाल में युद्ध भूमि में प्रवेश करता है, तो उसका शत्रु द्वारा अपहरण हो जाता है। सुषुम्ना के प्रवाहकाल में वह युद्ध में स्थिर रहता है, अर्थात् टिकता है। पर सूर्य स्वर के प्रवाहकाल में वह निश्चित रूप से विजयी होता है।

English Translation – If a warrior enters the war-field during the time of flow of breath through left nostril, he is kidnapped by his enemy. In case of flow of breath through both the nostrils simultaneously, he will stay in war. But the flow of right nostril with breath will give him victory.

युद्धे द्वये कृते प्रश्न पूर्णस्य प्रथमे जयः।

रिक्ते चैव द्वितीयस्तु जयी भवति नान्यथा।।260।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यदि कोई सक्रिय स्वर की ओर से युद्ध के परिणाम के विषय में प्रश्न पूछे, तो जिस पक्ष का नाम पहले लेगा उसकी विजय होगी। परन्तु यदि निष्क्रिय स्वर की ओर से प्रश्न पूछता है, तो दूसरे नम्बर पर जिस पक्ष का नाम लेता है उसकी विजय होगी।

English Translation – In case someone puts query about the result of the war from the side of active breath, the side which name comes first will be victorious. But when question is put from the breathless side, the side will get victory which name comes in second place.

7 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक जानकारी...
    सचमुच हमारे आदिग्रंथों में ज्ञान का भंडार है.
    नूतन जानकारी देने के लिए आपका आभार.

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  2. आभार आपका आचार्य जी, इस अमूल्य निधि को हमसे बांटने के लिए!!

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  3. आपकी यह ज्ञानवर्धक और उत्कृष्ट प्रविष्टी कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी है!

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  4. बिलकुल नूतन जानकारी है मेरे लिए। आभार इस प्रस्तुति के लिए।

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  5. बेहद दिलचस्प विवरण...स्वरों का प्रभाव अवश्य पड़ता होगा...आज भी तो युद्ध चल रहा है...हर कहीं...

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  6. आखिर अनुलोम-विलोम वाले रामदेव जी से कहां चूक हो गई?

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  7. इस ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए आभार।

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