गुरुवार, 23 जून 2011

आलोचना और आलोचना-धर्मिता

आँच – 74

आलोचना और आलोचना-धर्मिता

अर्थान्वेषण-2

आचार्य परशुराम राय

आँच के पिछले अंक में अर्थान्वेषण पर एक परिचयात्मक चर्चा हुई थी। इस अंक में इसी विषय पर थोड़ी और विस्तार से चर्चा करना अभीष्ट है। वैसे भारतीय काव्यशास्त्र शृंखला के अन्तर्गत काफी विस्तृत रूप से इसपर चर्चा की जा रही है, लेकिन वहाँ संस्कृत-मूलक चर्चा होने के कारण उन लोगों के लिए वह शृंखला थोड़ी जटिल हो जाती है, जिनका काव्यशास्त्र से परिचय नहीं है। अतएव यहाँ अर्थवैज्ञानिक (भाषाविज्ञान की एक शाखा) दृष्टि से विचार करते हैं। वैसे भारतीय परम्परा में शब्द-बोध का विवेचन व्याकरण, न्याय और मीमांसा में विशेष रूप से किया गया है। व्याकरण में शब्द या पद का विवेचन किया गया है। इसलिए इसे पदशास्त्र या शब्दशास्त्र कहा जाता है। न्याय में प्रमाणों का विशेषरूप से विवेचन किया गया है। यही कारण है कि इसे प्रमाणशास्त्र भी कहा जाता है। वाक्यार्थ शैली का विवेचन मीमांसा में किया गया है और इसीलिए इसे वाक्य-शास्त्र भी कहा जाता है।

अर्थ की प्रतीति के दो मार्ग माने जाते हैं- आत्मानुभव (अपने अनुभव) से और पर-अनुभव अर्थात् दूसरों के अनुभव से। जैसे हम जिस स्थान, देश या समाज में रहते हैं, उसके अनेक सरोकारों को हम स्वयं अनुभव करते हैं। इसमें निश्चित रूप से हमारे अपने दृष्टिकोण का प्रभाव रहता है। मिठाई के मिठास को हम अपने अनुभव से ही हृदयंगम करते हैं। या कोई कहता है- आम खट्टा है, तो खट्टा का अर्थ हम अपने अनुभव से ही होता है। इसी प्रकार किसी ऐसे देश के रीति-रिवाज, खान-पान आदि के विषय में, जहाँ हमने जाकर नहीं देखा है, दूसरों के अनुभव से समझते हैं। ऐसे ही मिसाइल सभी ने नहीं देखा है, अतएव इस शब्द का अर्थ हम दूसरों के अनुभव से प्राप्त करते हैं।

अर्थ-बोध के कई साधन हैं। यहाँ प्रमुख साधनों को लेकर चर्चा की जा रही है- व्यवहार, कोश, व्याकरण, प्रकरण या वाक्य-शेष, विवृति या व्याख्या, उपमान, आप्तवाक्य, ज्ञात का सान्निध्य, बलाघात, सुरलहर, अनुवाद आदि। इसे संकेतग्रह या शक्तिग्रह कहा जाता है। इसका तात्पर्य शब्द के अर्थ का ग्रहण करना है-

शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च।

वाक्यस्य शेषाद् विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः।।

इस कारिका में उल्लिखित अर्थ-ग्रहण के साधन उपर्युक्त अनुच्छेद (पैराग्राफ) में बताए प्रथम आठ हैं। आधुनिक भाषाविज्ञान आज के बदलते सन्दर्भों में इन आठ के अतिरिक्त अर्थ ग्रहण के कुछ अन्य साधन भी मानते हैं, जिनका उल्लेख किया जा चुका है, यथा- बलाघात, सुरलहर, अनुवाद आदि।

व्यवहार निस्सन्देह अर्थबोध का प्रमुख साधन है। समाज में प्रयुक्त भाषा के शब्दों का अर्थ-बोध हमें व्यवहार से ही होता है। यहाँ तक कि अनपढ़ व्यक्ति भी भाषा का प्रयोग व्यवहार से ही सीखता है। अर्थ-बोध का दूसरा साधन शब्दकोश (Dictionary) है। कोश से हम अज्ञात शब्द का अर्थबोध उसमें दिए ज्ञात शब्दों से होता है। इसके बाद तीसरा अर्थबोध का साधन व्याकरण है। व्याकरण अर्थबोध में किस प्रकार सहायक होता है, यह विचारणीय प्रश्न है। किसी भी भाषा में वर्णों, शब्दों आदि के वर्गीकरण विभिन्न शब्दों का रूप निर्धारण, उनके प्रयोग का विधान आदि व्याकरण के क्षेत्र में आते हैं। एक ही शब्द विभिन्न प्रत्ययों, उपसर्गों आदि के लगने के बाद उसके अर्थ की दिशा में परिवर्तन हो जाता है। जैसे- वह् धातु (मूल क्रिया) से कई शब्द निष्पन्न होते हैं- वहन, वाहन, वाहक, वाहिका, प्रवाह, प्रवाहित, विवाह आदि। इस प्रकार व्याकरण अर्थबोध में हमारा सहायक होता है।

अगला साधन प्रकरण या वाक्य-शेष है। हम सभी इस बात से सहमत हैं कि एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। लेकिन जब वाक्य में उसका प्रयोग होता है, तो उसके केवल एक अर्थ का ही ग्रहण होता है और वह एक वाक्य में प्रयोग होने के कारण सन्दर्भ से आता है। जैसे- धातु शब्द के कई अर्थ हैं- आयुर्वेद में शरीर के नियामक तत्त्व वात, पित्त और कफ; इसके अतिरिक्त रस, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा आदि; सोना, चाँदी, लोहा आदि खनिज; व्याकरण में मूल क्रिया शब्द आदि। लेकिन जब इनका प्रयोग होता है, तो सन्दर्भ से इस शब्द का अर्थ किसी एक अर्थ में नियत हो जाता है। यह साधन हमें इस प्रकार शब्द के अर्थ-बोध में सहायक होता है।

इसके बाद व्याख्या या विवृति भी शब्दार्थ-बोध का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। जैसे व्याकरण के अन्तर्गत वर्णों के वर्गीकरण करने वाले शब्द- स्वर, व्यंजन, प्राण, महाप्राण, घोष, अघोष आदि, दर्शन में प्रयुक्त- द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि, काव्यशास्त्र मे ध्वनि आदि। इसी प्रकार विज्ञान के विभिन्न पारिभाषिक शब्दों को भी समझने के लिए व्याख्या अपेक्षित है।

उपमान को भी शब्दार्थ-बोध का साधन बताया गया है। जैसे यदि हम कहें कि भेड़िया कुत्ते के समान होता है, तो यहाँ उपमान कुत्ते के द्वारा भेड़िया शब्द का अर्थबोध होता है कि भेड़िया कुत्ते की तरह कोई जानवर है। इसी प्रकार घोड़े और गधे से खच्चर आदि का अर्थबोध कराया जा सकता है।

ऋषियों, महात्माओं, सिद्धों, विद्वानों, महापुरुषों आदि के वाक्यों या वचन से भी अर्थबोध होता है, जिसे आधुनिक अर्थविज्ञान या प्राचीन भारतीय परम्परा में आप्तवाक्य के नाम से जाना जाता हैं। इस परम्परा में धार्मिक, दार्शनिक, यौगिक आदि ग्रन्थ मुख्य स्रोत माने जाते हैं। वैसे आप्तवाक्य या आप्तवचन का अर्थ विश्वसनीय वचन भी होता है और आस्थावान लोगों के लिए इस प्रकार के ग्रंथ प्रमाण के रूप हैं। स्वर्ग, नरक, धर्म, अधर्म, आत्मा, पुनर्जन्म आदि शब्दों का ज्ञान हमें ऐसे ही ग्रंथों से होता है।

ज्ञात शब्दों के साथ अज्ञात शब्दों के प्रयोग होने पर ज्ञात शब्दों सन्निधि के कारण भी कभी-कभी हमें अज्ञात शब्दों के अर्थ का बोध होता है। जैसे कहा जाय बगुले की गरदन से हंस की गरदन लम्बी होती है। बगुला को जानने वाला समझ जाता है कि हंस बगुला की तरह ही कोई पक्षी है। ज्ञात के सान्निध्य से भी अर्थ का बोध होता है।

इसी प्रकार बलाघात और स्वराघात से भी अर्थबोध होता है। बलाघात और स्वराघात में बहुत ही सूक्ष्म अन्तर है। अंग्रेजी में इन्हें क्रमशः stress और accent कहते हैं। बलाघात के द्वारा अर्थ-बोध के लिए एक उदाहरण लेते हैं- तुम कोलकाता जा रहे हो। तुम कोलकाता जा रहे हो। पहले में तुम पर बलाघात होने के कारण इसका अर्थ हुआ कि केवल तुम कोलकाता जा रहे हो, दूसरा नहीं। जबकि दूसरे में कोलकाता पर बलाघात होने के कारण इसका अर्थ हुआ कि तुम कोलकाता जा रहे हो, कहीं और नहीं। आप कानपुर आ गए? आप कानपुर आ गए! इन दोनों वाक्यों स्वराघात के कारण एक प्रश्न-सूचक वाक्य बन गया, तो दूसरा विस्मय-सूचक।

कुछ भाषावैज्ञानिक अनुवाद को अर्थबोध का साधन मानते हैं। यह केवल भाषान्तर के कारण तो कहा जा सकता है। लेकिन जब हम एक स्वतन्त्र भाषा की बात करते हैं, तो इसे स्वीकार करना अनुचित लगता है।

आज इसे यहीं समाप्त किया जा रहा है। यदि अवसर मिला तो भविष्य में इस विषय पर और चर्चा की जाएगी।

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13 टिप्‍पणियां:

  1. उदाहरण सहित बहुत सरल शब्दों में समझाते हैं ,आचार्य जी.आभार.

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  2. बहुत अच्छी और ज्ञानवर्द्धक प्रस्तुति

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  3. अच्छी, सारगर्भित जानकारी....

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  4. गहन एवं ज्ञानपूर्ण !
    आद. आचार्य जी, काव्य शास्त्र और उससे जुड़े विभिन्न आयामों के सूक्ष्मतम ज्ञान से ब्लाग जगत को समृद्ध करने के लिए में आपको नमन करता हूँ !
    आभार !

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  5. आलोचना और काव्य शाश्त्र पर अच्छी चर्चा.... आगामी कड़ियों का इंतजार रहेगा....

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  6. चर्चा बहुत गहन है। ज़ारी रहे।

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  7. अच्छी और ज्ञानवर्द्धक प्रस्तुति

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  8. गहन चिंतन और विस्तृत ज्ञान.बहुत आभार.

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  9. आलोचना विषय पर गहन चर्चा हो रही है और हम सबके लिए बहुत ही लाभदायक है।
    आभार,

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  10. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!

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