गुरुवार, 9 जून 2011

आँच – 72 : आशीष जी द्वारा रचित कविता प्लावन

आँच – 72 :

आशीष जी द्वारा रचित कविता प्लावन

आचार्य परशुराम राय

My Photoआज की आँच के लिए श्री आशीष जी द्वारा रचित कविता प्लावन लिया जा रहा है। यह रचना इन्हीं के ब्लॉग युगदृष्टि पर अप्रैल 24, 2011 को प्रकाशित हुई थी। लगता है प्रारम्भिक प्रकाशन में काफी टंकणगत अशुद्धियाँ रहीं होंगी, जैसा कि कविता पर की गयीं टिप्पणियों से ज्ञात होता है। एक-दो टिप्पणीकारों द्वारा कतिपय शुद्ध पदों को भी अशुद्ध बताने का प्रयास किया गया है। इसके अतिरिक्त इस रचना में प्रयुक्त कुछ पदों को लेकर भी कुछ टिप्पणीकारों/ब्लॉगरों ने अपनी तीखी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। अतएव ऐसा लगा कि क्यों न इस कविता पर समीक्षा के रूप में एक विचार प्रस्तुत किया जाय। अतएव परिणाम स्वरूप आँच के इस अंक में प्लावन कविता की सीधी-सादी समीक्षा प्रस्तुत है। वैसे कविता पर इस अंक में लिपिबद्ध विचारों से पाठकों या कवि का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

श्री आशीष जी वैसे तो प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कार्यरत हैं। उनकी साहित्यिक अभिरुचि शायद उन्हें काव्य रचना की ओर खींच लाई है। सम्भवतः उनका सम्बन्ध एक साहित्यिक परिवार से भी है। वैसे भी साहित्य, संगीत आदि कलाएँ मानव जगत को एक नैसर्गिक देन है। अर्थात् एक व्यक्ति पेशे से या अध्ययन द्वारा इंजीनियर, चिकित्सक, व्यापारी या अन्य कुछ भले ही क्यों न हो उसका इन विषयों के प्रति स्वाभाविक आकर्षण देखने में आता है। शायद इसीलिए महान नीतिज्ञ, वैय्याकरण एवं दार्शनिक आचार्य (महाराज) भर्तृहरि ने लिखा है-

साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुपुच्छविषाणहीनः।

तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद्भागधेयं परमं पशूनाम्।।

अर्थात् साहित्य, संगीत और कला से विहीन व्यक्ति बिना सींग और पूँछ साक्षात् पशु है। बस वह केवल घास नहीं खाता और यही परम पशुओं (वास्तविक जानवरों) का सौभाग्य है (अन्यथा उन्हें खाने के लिए घास भी नहीं मिलती)।

मतलब यह कि प्रायः पूरी मानव जाति में इन विषयों के प्रति स्वाभाविक रूप से झुकाव दिखायी पड़ता है और इतिहास साक्षी है कि विभिन्न ज्ञान-विज्ञान के विद्वान काव्य प्रणयन करते हैं। इसी प्रकार आशीष जी का प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद उनमें काव्य लेखन की प्रवृत्ति है। अतएव आज की आँच के इस अंक में इनकी कविता पर चर्चा प्रस्तुत है।

कविता की भाव-भूमि काफी स्पष्ट है। कहीं कुछ पदों की अधिकता है, कहीं पदों के अभाव में कविता में अस्पष्टता सी दिखती है। इसमें केवल पाँच बन्द हैं। कवि का प्रयास कविता में छंद का अनुशासन रखने का है, पर इसमें वह पूरी तरह सफल नहीं दिखता। प्रांजलता का अभाव भी देखने में आता है। कुछ अच्छी अभिव्यक्तियों या बिम्बों के प्रयोग का प्रयास किया गया है और भाषा में थोड़ी ताजगी पैदा करने का प्रयत्न भी है। इन सब बातों पर संक्षेप में चर्चा की जाएगी।

इस कविता में तप्त दोपहरी के व्यतीत होने के बाद संध्या काल और अचानक आकाश के मेघाच्छन्न होने तथा बूँदों फुहारों के बीच कवि के मानस में प्रकृति के उभरते चित्र और उसकी अनुभूति को विभिन्न बिम्बों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। लेकिन कविता में प्रयुक्त कुछ पदों से व्यंग्य निकलकर आता है कि जीवन में विभिन्न कष्टों से पीड़ित व्यक्ति के हृदय रूपी मरुस्थल में बूँदों के रूप में थोड़ी सी सहानुभूति भी कितनी सुखद होती है। इसी भाव-भूमि पर प्लावन की रचना हुई है। हाँ, एक बात यहाँ अवश्य है कि कवि को कविता की भावभूमि की जो अनुभूति है, वह कविता में पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं हो पायी है।

दिन के अवसान काल में हम मानसिक थकान के साथ सामान्यतया दिनभर की अपनी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं से दो-चार होते हैं। यह हमारे अन्दर के तनाव को सन्तुलित करने में काफी हद तक सहायक होता है और जब व्यक्ति अकेले होता है तो वह अपने से बात करता है, जिसमें उसकी स्मृतियाँ एक-एक कर कभी उसे कुरेदती हैं, तो कभी सहलाती हैं, तो कभी गुदगुदाती हैं। जब हमारा दिन या समय कष्टातिरेक से भरा हो तो प्रदोष (संध्या) काल में कभी कोई तीव्र सुखद स्मृति या विचार उसे दुख से निकलने का मार्ग देता है। जहाँ वह अपने से बाहर आकर अपने आसपास की बाह्य प्रकृति की ओर आकृष्ट होता है, वह पक्षियों का सायंकालीन चहचहाने का उच्च स्वर सुनने लगता है, वृक्ष के पत्तों पर गायों के खुर से उड़ी धूल रजत-भस्म की तरह सुशोभित दिखने लगती है और फिर वह अपनी नयी अनभूति में उतरता है। अकेलेपन में अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुरूप एक व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके खालीपन का दबाव उसे एक अलग अनुभव से परिचय कराते हैं, जिसे हम इस कविता में देखते हैं-

एकाकी मन में स्मृतियाँ

जग जग उठती हैं पल प्रतिपल

मेघों के तम को चीर रही

मधुरतम स्मृति एक उज्ज्वल।

गोरज रजत भस्म सी दिखती

बैठी तरुवर के दल पर,

नीरव प्रदोष में क्लांत मन

सुनता विहगों के सप्तम स्वर।

ऐसे में यदि आकाश से बूँदों की फुहारों की सहानुभूति मिल जाय, तो हृदय में तरावट आ जाती है। घनीभूत चिन्ता रूपी अवसाद के बादलों का गर्जन-तर्जन का डर तिरोहित हो जाता है। तपन भरी हवा बूँदों का स्पर्श पाकर शीतल हो जाती है और मलयागिरि से चलनेवाली हवा की भाँति शरीर के ताप का शमन करती है, जिससे मन की घनीभूत तपन भी शीतलता में घुल-घुलकर मिट जाती है-

चपला दिखलाती मेघवर्ण,

संग में गुरुतर गर्जन, तर्जन,

घनीभूत अवसाद मिटाते

नीलाम्बर में मुक्तावलि बन।

नभ गंगा की धवल फुहारें

सिंचित करती हैं उर स्थल,

स्पर्श मलय का आमोदित करता

प्लावित होता हृदय मरुस्थल।

उक्त भावों को समेटे कविता प्लावन में कुछ ऐसे पद प्रयुक्त हुए हैं जो अनावश्यक रूप से इसके शब्द-संयम को भंग करते हैं, साथ ही प्रांजलता और मात्राओं के संतुलन को भी। यथा- तीसरी पंक्ति में मेरा, छठी पंक्ति में है और प्रति उपसर्ग (यहाँ या तो पल-पल होना चाहिए या केवल प्रतिपल), आठवीं पंक्ति में एक, चौदहवीं पंक्ति में में और उन्नीसवीं पंक्ति में का

एक मुख्य अभाव दिखता है कि कवि तप्त दोपहर के बाद सायंकालीन आकाश का लोहित होना बताता है और बिना किसी सूचना के अचानक फुहारों की बात करने लगता है। यह पाठक के मन में एक भ्रम पैदा करता है। इसके लिए तभी, सहसा, अचानक आदि जैसे शब्दों में से किसी एक का चौथे बन्द के प्रारम्भ में प्रयोग करना चाहिए था। अल्प विराम और पूर्ण विराम के उचित प्रयोग का भी अभाव है। हो सकता है कि यह टंकणगत त्रुटि हो।

इस कविता पर की गयी चर्चा मेरी अपनी काव्य समझ के अनुसार की है। कवि या पाठक इसे अन्यथा न लेकर यदि इसपर अपना सुझाव देते हैं तो यह उनकी उदारता होगी और वे शिरोधार्य होंगे।

*****

22 टिप्‍पणियां:

  1. एकाकी मन में स्मृतियाँ
    जग जग उठती हैं पल प्रतिपल
    मेघों के तम को चीर रही
    मधुरतम स्मृति एक उज्ज्वल।
    बहुत सुन्दर लगी ये पंक्तियाँ! प्रशंग्सनीय प्रस्तुती!

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  2. सुंदर विश्लेषण ....आशीष जी की रचनाएँ उत्कृष्ट और प्रभावित करने वाली होती हैं......

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  3. --सही व्याख्या...पूरी कविता दोषपूर्ण है...
    ---जग जग उठती ..में भी एक जग अनावश्यक है ..एक जग से ही अर्थवत्ता पूर्ण होजाती है...
    ---क्लांत मन को विहगों के या कोइ भी स्वर सप्तम कब लगते हैं....

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  4. प्रवाह को सहेजे हुए सुंदर कविता

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  5. बढ़िया समीक्षा .आशीष जी को समीक्षा की बधाई.

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  6. सुन्दर रचना की उतनी ही सुन्दर समीक्षा ...

    पल- प्रतिपल ... इस शब्द पर तब ध्यान नहीं गया जब कविता पढ़ी थी ... लेकिन आज समीक्षा के बाद फिर से कविता पढ़ कर आ रही हूँ ...
    पल के साथ प्रतिपल नहीं आना चाहिए था ..क्योंकि प्रतिपल का ही अर्थ है पल पल .. साधुवाद

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  7. जहाँ तक जग जग की बात है तो स्मृतियों के जगाने की तीव्रता को बताने के लिए इस शब्द का दो बार प्रयोग किया है ..शायद भाषा की दृष्टि से अशुद्ध नहीं है ..जैसा कि अपनी टिप्पणी में डा० श्याम गुप्ता जी ने कहा .

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  8. आचार्य जी का आभार की उन्होंने मेरी कविता को अपनी समीक्षा के लायक समझा . मै कविता के व्याकरण और तकनीकी पक्षों से अनभिग्य सा ही हूँ . आपकी ये समीक्षा मेरे लिए पथ प्रदर्शक होगी . टंकड़गत त्रुटिया दूर करने की पूरी कोशिश करूँगा .

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  9. एक सुन्दर कविता की अच्छी समीक्षा ...
    आशीष जी कि कविताओं में प्रयुक्त शब्द और भाव प्रभावित करने वाले होते हैं और मेरे जैसों को तो शब्दकोष खोलना पढता है:).
    आभार इस सुन्दर विश्लेषण का.

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  10. समीक्षा पढ़ने से पहले कविता पढ़ी !
    कविता नदी की तरह स्वयं प्रवाहित होनी चाहिए !
    पाठक को पढ़ते समय कही भी शब्द या भाव के कारण रुकावट का अनुभव नहीं होना चाहिय और कवि की अभिव्यक्ति का सम्प्रेषण सरल और प्रभावपूर्ण होना चाहिय !
    आपका विश्लेषण तथ्यपूर्ण है !
    आभार !

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  11. बहुत सुंदर और निष्पक्ष समीक्षा। मैं आशीष जी काविताओं को हमेशा भावनाओं से गुंथा पाता हूं।

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  12. डॉ.गुप्ता, जग पद का दो बार प्रयोग अनुचित नहीं है। दूसरी बात यह है कि प्रातःकाल और सायंकाल में पक्षियों के कलरव की तीव्रता में अन्तर होता है। देखा जाता है कि सायंकाल का कलरव प्रातःकाल के कलरव से उच्च और तीक्ष्ण होता है और क्लांत होने पर वह और तीक्ष्ण प्रतीत होता है। सप्तम स्वर निषाद शेष छः स्वरों से उच्च होता है। अतएव यह प्रयोग उचित है। आभार।

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  13. आंच पर कविता/कहानी की जिस प्रकार समीक्षा की जारही है वह नए रचनाकारों के लिए कार्यशाला जैसा है.. आज की कविता में आचार्य राय जी ने जिस तरह कवि के मन को काव्य के सूत्रों पर कसा है... वह विलक्षण है.. बहुत संतुलित समीक्षा है जहाँ भाव के स्तर पर कवि की सराहना की गई है वहीँ जहाँ शब्द संयम में कमी हुई है.. उसकी ओर भी ध्यान दिलाया गया है... आपकी कसौटी पर खरी उतारती आंच.... मैं अरसे से आंच पर पकने केलिए तैयार बैठा हूँ लेकिन कविता आंच पर चढ़ने के स्तर की बन नहीं पा रही... यह भी एक चुनौती है...

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  14. आचार्य जी आपने बहुत ही संयमित शब्दों में संतुलित समीक्षा प्रस्तुत की है। आपके संकेत निश्चय ही रचनाकार के लिए लाभप्रद साबित होंगे।

    आभार,

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  15. आशीष जी द्वारा रचित कविता 'प्लावन' पर की गयी समीक्षा अच्छी लगी। टिप्पणीकार अपनी टिप्पणी देते समय मन में उठे भावों को ही रूपायित करता है,समीक्षा की दृष्टि से नही। सुझाव है-समीक्षा करते समय किसी भी टिप्पणीकार के विचारों का आदर करते हुए भविष्य में इस प्रकार का उल्लेख न करें। इसका परोक्ष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अनुरोध है इस कविता का परिमार्जित रूप प्रस्तुत करें ।धन्यवाद।

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  16. --मेरे विचार से 'जग' शब्द ही अशुद्ध है.....'जाग' होना चाहिए ...जग का अर्थ विश्व होता है ..जाग जागना... जागरण ..जागो..जागिये आदि
    --जग जग तो कुछ भी नहीं हुआ....

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  17. डॉ.गुप्ता, जगना और जागना दोनों निजवाचक क्रियाएँ(refexive verb) हैं तथा दोनों ही सही हैं। इन दोनों का प्रेरणार्थक रूप जगाना बनता है। कृपया शब्द-कोश देखें। आभार।

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  18. डॉ.गुप्ता, पुनश्च। प्रसाद जी का बड़ा सुन्दर गीत- बीती विभावरी जाग री- में जगना क्रिया का प्रयोग किया गया है- जगकर रजनीभर तारा। अतएव इसमें सन्देह नहीं होना चाहिए कि "जगना" शुद्ध है या अशुद्ध। एक बार पुनः आभार।

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