सोमवार, 6 जून 2011

नवगीत - धूप-किरणों के पखेरू

धूप-किरणों के पखेरू

श्यामनारायण मिश्रश्यामनारायण मिश्र

imagesसांझ हुई,

तुमने चित्र लिखे होंगे

हाथों में पांवों में

मेहदी-महावर से।

 

गांव के पीछे पहाड़ी पर

धूप किरणों के पखेरू

चुग रहे होंगे विजन के बीज।

लौटते होंगे तराई से

आदिवासी औरतों के भीड़-मेले

टोकरों में लिये कोई चीज़।

 

उड़ रहे होंगे

नहाकर श्वेत पाखी

नील पोखर से।

 

ताल के शैवाल में उलझी

सिंघारों से लदी होंगी

रैकवारों की कठौती-डोंगियां।

बेखबर बस खेल में

खोई हुई शिशु टोलियां

चुन रहीं होंगी किनारे

सीप-शंखी-घोंघियां।

 

डालती होगी

मछेरन रेत पर नन्हीं मछलियां

भरे आंचर से।

 

गीत की पगडंडियों पर

दौड़ती होंगी युवाओं के

उमंगों की कलोरें।

घाटियों में गूंजती

आदिम तरंगे

मारती होंगी हृदय के ताल के

तट तक हिलोरें।

 

पारदर्शी

हो रहा होगा तुम्हारा भींगकर आंचल

छलकती हुई गागर से।

 

शाम के इस वक्त

छायादार सड़कों पर गुलाबी रोशनी में

देखता हूं नये जोड़ों को।

याद करता हूं पहाड़ी कत्थई पगडंडियां

मुक्त हंसते खिलखिलाते

भील-गोडों को।

 

लग रहा है

टेरती हो तुम, पहाड़ी के

पुराने नील-निर्झर से।

28 टिप्‍पणियां:

  1. लग रहा है टेरती हो तुम, पहाड़ी के पुराने नील-निर्झर से।
    दिल से लिखी गयी रचना आभार ....

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  2. ताज़े विम्बो और चित्रों से भरा गीत....जैसे मछेरण का नन्ही मछलियों को रेत पर्दालना..आँचल का भीग कर पारदर्शी होना....सुन्दर गीत

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  3. सुंदर शब्दचित्र उभरा है यहाँ भाई जी ! शुभकामनायें !!

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  4. शब्दों का बेहद मनोरम चित्र .........

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  5. लग रहा है

    टेरती हो तुम, पहाड़ी के

    पुराने नील-निर्झर से।

    अत्यंत भाव प्रबल ...मुखरित ....भावनाओं का शब्द चित्र ...सुंदर अभिव्यक्ति ..!!

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  6. एक उम्दा रचना.. बधाई स्वीकार करें !
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - स्त्री अज्ञानी ?

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  7. यह जगह तो जानी पहचानी है बन्धु! टुकड़ों टुकड़ों में बहुत जगह देखी है यह जगह!

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  8. आज तो टिप्पणी मे यही कहूँगा कि बहुत उम्दा रचना है यह!

    एक मिसरा यह भी देख लें!

    दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
    खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  10. शब्दों ने न जाने कितने चित्र खींच दिये।

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  11. लग रहा है
    टेरती हो तुम, पहाड़ी के
    पुराने नील-निर्झर से।

    सुंदर शब्दचित्र
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  12. ताज़ी सुबह पर ओस की बूँद सा प्यारा गीत ...
    मधुरं मधुरं !

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  13. गीत पढ़ने के बाद
    रचनाकार के मन में उतर जाने का मन करता है!

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  14. श्याम नारायण जी को पढ़वाने का आभार...उम्दा रचना/

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  15. सुन्दर बिम्बों के साथ ह्रदय से निकला ....बहुत प्यारा नवगीत

    पढवाने का आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  16. सुन्दर बिम्बों के साथ ह्रदय से निकला ....बहुत प्यारा नवगीत

    पढवाने का आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  17. मन को छूने वाली सुन्दर अभिव्यक्ति्.... धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  18. पारदर्शी

    हो रहा होगा तुम्हारा भींगकर आंचल

    छलकती हुई गागर से।

    kya chitratmakta h...
    ek raspoorn navgeet..

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  19. बहुत सुन्दर भावपूर्ण चित्र उकेरा है..बहुत सुन्दर रचना..

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  20. गांव के पीछे पहाड़ी पर

    धूप किरणों के पखेरू

    चुग रहे होंगे विजन के बीज।

    लौटते होंगे तराई से

    अद्भुत तथा अछूते बिम्बों ने रचना की उत्कृष्टता का प्रमाण दे दिया.

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