मंगलवार, 14 जून 2011

भारत और सहिष्णुता-6

अंक-6

भारत और सहिष्णुता

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

    जितेन्द्र त्रिवेदी

लिंक पहले के

१. भारत में सहिष्णुता  २. भारत और सहिष्णुता –2  ३. भारत और सहिष्णुता-3 :: भारत-निर्माणभारत और सहिष्णुता-4 :: भारत निर्माण 5. अंक-5

पिछले अध्याय में हमने सजातीयता और विजातीयता दो शब्दों के साथ बात समाप्त की थी और इस अध्याय की शुरूआत महात्मा गांधी की पंक्तियों के साथ करना समीचीन रहेगा -

महात्मा गांधी ''सजातीयता और विजातीयता की भावनाएं हमारे मन की तंरगें हैं। मेरे जीवन में ऐसी घटनायें घटती ही रही हैं जिनके कारण मैं अनेक मतावलंबियों के और अनेक जातियों के गाढ परिचय में सका हूँ। इन सबके अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मैंने अपने और पराये, देशी और विदेशी, गोरे और काले, हिन्दू और मुसलमान अथवा ईसाई, पारसी या यहूदी के बीच कोई भेद नही किया। मैं कह सकता हूँ कि मेरा हृदय ऐसे भेद को पहचान ही सका .........'' (सत्य के प्रयोग चौथा भाग अध्याय 10 एवं 22)

महात्मा गांधी का उक्त कथन भारत को समग्रता से समझने में जितना आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रांसगिक है उतना ही प्राचीन भारत के परिप्रेक्ष्य में भी सहायक रहेगा विशेषकर उत्तर वैदिक समाज के कर्मकांडों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पैदा हुई धार्मिक और दार्शनिक क्रांति के मद्देनजर। प्रारंभिक वैदिक काल में समुदाय को पूर्ण लाभ पहुंचाने के उद्देश्‍य से ही सारे मानव व्यवहार संचालित होते थे और "सर्वे भवंतु सुखिनः" की व्यापक सोच समाज को एक कुटुम्ब के रूप में व्याख्यायित करती थी। यह बात सिर्फ राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में ही नहीं थी अपितु प्रारंभिक वैदिक काल के धार्मिक क्रियाकलाप भी इसी सोच के विस्तार थे। इस तरह यह प्रक्रिया वाइसि-वर्स थी और प्रांरभिक वैदिक काल में पूर्ण समुदाय को लाभ पहुंचाने के लिये ही धार्मिक अनुष्ठान किये जाते थे।

ये अनुष्ठान और पूजा ऐसे अवसर होते थे जब मुखिया या समुदाय के प्रमुख धन का वितरण सुनिश्‍चित करते थे जिसमें उपहार, पशु और अन्न के साथ-साथ क्षेत्र भी सम्मिलित होता था किन्तु 1000 से 600 ई.पू. तक आते-आते उत्तर वैदिक काल में अनुष्ठानों का उद्देश्‍य बिल्कुल ही बदल गया और सामूहिकता की भावना में कमी आ गई और वितरण के पीछे प्रमुख उद्देश्‍य समुदाय पर नियंत्रण प्राप्त करना हो गया और अनुष्ठान औपचारिकता बनने लगे और जटिल होते गये जो कई सालों तक चलते रहते थे। इसलिये केवल दिखावे की प्रवृति प्रधानता लेने लगी फलस्वरूप केवल धनी लोग ही इन्हे संपन्न करने में सक्षम रह गये और शेष जन द्वारा यज्ञ संपन्न करना उनके बूते से बाहर हो गया। इनमें भाग लेने वाले लोग इन्हे संपन्न कराने लगे, जिनका इन अनुष्ठानों में हिस्सा लेना द्रव्य की प्राप्ति की लालसा भर रह गया और उनकी हैसियत ''मंगते'' मे तब्दील हो गयी और जैसे-जैसे समय व्यतीत हुआ तो पूरे समुदाय को उपहार नही दिये जाते थे अपितु केवल ब्राह्मणों को ही भेंट देने का प्रचलन हो गया और वह भी इसलिये कि वे मुखिया के लिये हवन और बलि का अनुष्ठान करते थे।

इस तरह अब यह वितरण उपहार की अपेक्षा पारिश्रमिक अधिक था और इसी ने पुरोहित व्यवस्था को जन्म दे दिया। पुरोहित अपने लिये अधिक द्रव्य प्राप्त करने की लालसा में अधिकाधिक बलि को प्रोत्साहन देने लगे और बलि की इस बढ़ती प्रवृत्ति के कारण उस निमित्त अधिकाधिक जानवरों की उपलब्धता की समस्या को जन्म दे दिया और यहीं से पशुपालन और कृषि के बीच का संतुलन टूटने लग गया। खेती के लिये अब उतने पशु नहीं निकल पाते थे और जो कुछ निकलते वे यज्ञों में लग जाते थे। उत्तर वैदिक काल में लाखों पशु बलि हेतु और पुरोहितों को दान में देने के उल्लेख खूब मिलते हैं।

प्रारंभिक वैदिक काल में समाजिक ढांचा कबीलाई सम्बन्धों पर आधारित समानतावादी था जो काफी जटिल हो गया और नया समाज असमानता पर आधारित हो गया। एक कबीला कई समूहों में बंट गया जिनमें कुछ समूह उच्च समझे जाते थे और कुछ निम्न और धीरे-धीरे ग्रामों के बीच संघर्ष होने लगे जिन्हे ''संग्राम'' कहा जाने लगा और यहीं से पुस्तैनी लड़ाई-झगड़ों की शुरूआत हो गयी और इन लड़ाई-झगड़ों को देख-देख कर उस समाज के कुछ लोग तंग आ गये और वे उन सबसे उकताकर जीवन जीने का पुनः सरल तरीका खोजने लगे और इसी के फलस्वरूप उत्तरवर्ती काल में दर्जनों खोजें सामने आईं जो जटिलता के दुष्चक्र से निकलने को छटपटा रही थीं। जिनमें प्रमुखता से इनका नाम लिया जा सकता हैः-

पूरण कस्सप, मक्खलिगोसाल, अजित केसकम्ब्ल, पकुध कच्चायन, संजय वेलिटट्ठपुत्त, निगण्ठ नाथपुत्त, चार्वाक, आलार कालाम, महावीर जैन, बुद्ध, इत्यादि।

पूरण कस्सप अक्रियवादी थे। वे कहा करते थे, ''अगर कोई कुछ करे या कराये, काटे या कटवाये, कष्ट दे या दिलाये, शोक करे या कराये, किसी को कुछ दुःख हो या कोई दे, डर लगे या डराये, प्राणियो को मार डाले, चोरी करे, घर में सेंध लगाये, डाका डाले, एक ही मकान पर धावा बोल दे, बटमारी करे, परदारागमन करे या असत्य बोले, तो भी उसे पाप नहीं लगता। तीक्ष्ण धार वाले चक्र से यदि कोई इस संसार के पशुओं के मांस का बड़ा ढेर लगा दे, तो भी उसमें बिलकुल पाप नही है, उनमें कोई दोष नहीं है।

मक्खलिगोसाल नियतिवादी थे। वे कहा करते थे कि, ''प्राणी की अपवित्रता के लिये कोई हेतु नहीं होता, कोई कारण नहीं होता। हेतु के बिना, कारण के बिना प्राणी अपवित्र होते हैं। प्राणी की शुद्धि के लिये कोई हेतु नहीं होता, कोई कारण नही होता। हेतु के बिना, कारण के बिना प्राणी शुद्ध होते हैं। अपनी सामर्थ्य से कुछ नहीं होता। दूसरे की सामर्थ्य से कुछ नहीं होता। पुरुष की सामर्थ्य से कुछ नही होता।''

अजित केसकम्ब्ल उच्छेदवादी थे। वे कहा करते थे, ''दान, यज्ञ और होम में कुछ तथ्य नहीं है, अच्छे या बुरे कर्मो का फल और परिणाम नहीं होता, इहलोक, परलोक, माता-पिता अथवा औपपातिक (देवता या नरकवासी) प्राणी नहीं है, इहलोक और परलोक का अच्छा ज्ञान प्राप्त करके दूसरों को देने वाले दाशर्निक और योग्य मार्ग पर चलने वाले श्रमण-ब्राह्मण इस संसार में नहीं है।''

11 टिप्‍पणियां:

  1. भारत में सहिष्णुता है , और यही हमारी पहचान भी है । और गर्व का विषय भी ।
    आभार इस बेहतरीन आलेख के लिए।

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  2. सार्थक आलेख। पिछली कडियाँ भी पढती हूँ। धन्यवाद।

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  3. जितेन्द्र त्रिवेदी का विचारपूर्ण लेख बहुत अच्छा लगा.

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  4. वैदिक कल से अब तक का आपका अध्यन काफ़ी सारगर्भित है|
    पोस्ट पढ़ कर काफ़ी ज्ञान-वर्धन हुआ, उत्तरवर्ती काल की खोजों का संक्षेप तो बिल्कुल नया है मेरे लिए|

    आभार!

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  5. समय-समय पर वैचारिक विकास की यात्रा का सहिष्णुता के सन्दर्भ में बहुत ही सारगर्भित लेख। साधुवाद।

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  6. सार्थक अवदान के लिये कोटिशः आभार !

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  7. इस बेहतरीन आलेख के लिए आभार ।

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