रविवार, 2 अक्टूबर 2011

बापू, एक मंत्र दो

बापू, एक मंत्र दो

आचार्य परशुराम राय

gandhi (10)वर्षों की फाइल से

निकला फिर आज

बापू का जन्म-दिन।

 

सद्ग्रंथों से

प्रार्थना की बूँद ले

राजनीति के

हाथों आचमन कर

दुकान से लाए गए-

मातहत के हाथ,

बुके चढ़ाकर

बापू की समाधि पर

सन्तुष्ट मैं।

 

जो कुछ कहा-सुना बापू ने

वह

आप समझें,

मेरे लिए बस, इतना ही।

 

वैसे भी,

आफिस में टाँगी गई

सदा मुस्कराती

बापू की प्रतिमा से

आशीर्वचनों की वर्षा

रोज सहते हम।

 

भ्रष्ट भूत का उपचार

अभी शेष था

कि सत्य और अहिंसा

की लाश लिए

धरने पर आ बैठा कोई

रामलीला मैदान में,

जनलोकपाल बिल के तर्पण से

जाग गए प्रेत दोनों,

गायब थी - आँखों से नींद,

मन में बेचैनी थी

रात-दिन एक से,

टोटके भी बहुत किए,

पर काम न आए।

 

इन भूतों से पिंड छूटे,

बापू !

आज अपने जन्मदिन पर

एक मंत्र ऐसा दो।

*****

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

फ़ुरसत में ... जहां देखा उफान, लगा ली वहीं दुकान

फ़ुरसत में ...

जहां देखा उफान, लगा ली वहीं दुकान

IMG_0568मनोज कुमार

images (62)जब कभी फ़ुरसत में होता हूँ तो सोचता हूँ मट्ठाधीश बनना है … और मट्ठाधीश बनना है तो कुछ पंगे ले ही लूँ। जी हाँ मट्ठाधीश, मठाधीश नहीं। मठ से तो एक व्यक्ति के होने का आभास होता है, मट्ठाधीश से सब-कुछ घोर-मट्ठा हो गया हो कुछ ऐसा स्वाद आता है। फिर भी, यह मठाधीश से कुछ वजनदार तो प्रतीत होता ही है। इस बार जब मैंने अपने परम मित्र छदामी को यह बताया तो उसने कहा ‘थोड़ी मिर्ची तीखी कर देना, मट्ठा बहुत स्वादिष्ट हो जाएगा।’ मैंने भी सहमति की मुहर लगाते हुए कहा, ‘सही कह रहे हो दोस्त, अब वक़्त आ ही गया है जब लोगों को कुछ न कुछ मट्ठाधीशी दिखानी ही होगी। कतार भले ही लंबी क्यों न हो, मट्ठाधीशी की लाइन में हम भी हैं यहाँ।’

छदामी ने भी अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी – ‘अब आप जैसे महान लेखक यह सब अपने हाथ में ले ही लें। फिर तो उससे हम जैसे छदमियों का भी वारा-न्यारा हो जाएगा।’

मैंने ठहाका लगाया, वह भी अंतरजाल के ठहाके स्टाइल में ‘हाहहहहहहहहहाऽऽआह ..।’

इस तरह का ठहाका जब कभी चैट बॉक्स में लिखता हूँ तो यह ठहाका सदैव एक ‘आह..’ संबोधन के साथ ही समाप्त होता है। कितनी भी सतर्कता क्यों न बरतूँ, ये मेरा हिन्दी टाइपिंग टूल भी गाहे-बगाहे कुछ का कुछ अर्थ दे जाता है। अब तो मुझे खुद पर भी शक होने लगा है कि जो मैं लिखना चाहता हूँ, वही प्रकट हो रहा है या जो मेरे भीतर होता है और जिसे मैं प्रकट नहीं करना चाहता हूँ वह प्रकट हो जाता है।

छदामी को तो जैसे मेरे इन ख़्यालातों से कोई मतलब ही न हो। बोलता है, “इस बार कोलकाता आऊँगा, तो आपका औटोग्राफ भी ले लूँगा! आपके मट्ठाधीश बन जाने के बाद बड़ा काम आएगा।” और उधर से ठहाके के थोड़े ही नीचे वाले स्तर की हँसी का संकेत आया, ‘हे-हे-हे- ए ए।’

उसने इतनी सतर्कता बरती कि ‘आह’ शब्द न निकले, पर जो अंत का ‘ए-ए-ए...’ था, मुझे चिढ़ाता-सा प्रतीत हुआ। छदामी ने उस गीतात्मक ‘ए-ए-ए’ के बाद जोड़ा, ‘और उस औटोग्राफ की एक पोस्ट बनाकर अपने ब्लॉग पर लगा दूँगा, हाँ पोस्ट में केवल औटोग्राफ ही होगा और कुछ नहीं।’

मैंने कहा, ‘क्या छदामी? अभी से ही तुम मुझे चढ़ा रहे हो चने के पेड़ पर! अभी तो कोई प्रगति ही नहीं हुई है।”

छदामी बड़ा समझदार है, कभी-कभी तो मुझे उससे भी थोड़ा ज़्यादा लगता है। उसने तपाक से कहा, ‘सर जी, जब आग लगी होती है तभी धुआँ उठता है।’ मुझे उसके इस पुराने बिम्ब का जुमला बड़ा ताजगी भरा लगा। मैंने भी जड़ ही दिया - ‘कुछ लोग आग लगाते भी हैं , हाथ सेंकने के लिए ..! कहीं तुम भी …!’ छदामी ने कुछ कहने के बजाए फिर से वही, ठहाके के थोड़ा सा नीचे वाले स्तर की हँसी का संकेत दिया, ‘हे-हे-हे- ए ए!! सर जी, आजकल मेरे ब्लॉग पर बड़ी सरदी छाई हुई है। हाथ सेक लूँ, तभी तो गरमी आएगी।’ मैंने उसे समझाया, ‘ऐसे नहीं छदामी, ऐसे नहीं। तुम्हें आग लगानी होगी। खाली हाथ सेकने से काम नहीं चलेगा अब। मट्ठाधीशी की खिचड़ी पकानी है तो पहले तो आग जलानी ही पड़ेगी।’ इतना कह कर अपने बुद्धि-चातुर्य के ऊपर मुहर लगाने के लिए मैंने ज़ोरदार ठहाका लगाया ‘हाहहहहहहहह्हहहहाह्हहहहह्हऽऽअआह ....!’

मेरी हँसी इतनी ज़ोर की थी कि किचन से निकल कर श्रीमतीजी बोलीं, ‘पगला तो नहीं गए हैं ऽऽ ?’ जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो, मैंने तुरन्त सामान्य होने का नाटक करते हुए सफाई दी- ‘नहीं, छदामी ने एक चुटकुला सुनाया था, उसी पर हँसी आ गई।’

मै बहुत सक्रिय ब्लॉगर तो नहीं हूँ लेकिन कुछ चुनिन्दा लोगों के ब्लॉग पढता रहता हूँ। उसमें भी कुछ चुनिंदा लोगों के ब्लॉग पर ही कमेंट करता हूँ और उनसे अपने रिश्ते भी बनाता चलता हूँ। यह काम करते-करते इन दिनों हमारा भी एक गुट बनकर तैयार हो गया है। मेरी भी आदत है की जिससे मन मिलता है या जिसके लेखन से प्रभावित होता हूँ , जब भी उसके शहर में होता हूँ, मेरे हाथ में हो न हो फिर भी किसी तरह मौका निकाल कर उससे मिलता जरूर हूँ। बड़े सिस्टमैटिक तरीक़े से हमने भी अपना एक दल तो बना ही लिया है। यह सब सोचते-सोचते मेरे मन के सामने मट्ठाधीश बनने की रूपरेखा घूम गई। लेकिन इस बार श्रीमतीजी के भय से मुँह दबाकर मन-ही-मन हँसा ‘हाहहहहहहह्हहहह...’ और इस बार ‘आह’ भी न निकली।

मट्ठाधीश बनने की रूपरेखा मन में घूमते ही जो हँसी निकल आई थी, बड़ी मुश्किल उसे ‘उन’ तक पहुँचने से रोक पाया इस बार! अन्यथा घर से बाहर कर दिया जाता। यह न भी होता तो कम से कम लैपटॉप बंद कर दिए जाने या ब्रॉड-बैंड का स्विच ऑफ कर दिए जाने का खतरा तो अवश्यम्भावी था ही। इन दिनों घर में मेरा अधिकांश टाइम तो अपने लैपटॉप के साथ खेलते ही बीतता है। उनका भी टाइम पास हो और मेरी मट्ठाधीशी में दखल न हो इसलिए हमने उनको भी एक लैपटॉप अलग से ले दिया है। पर, डर तो छदामी जैसे लोगों से है, जिनका अपना तो कोई दल नहीं है। बस, डालने कि फिराक में रहते हैं राजनीति का मट्ठा किसी की भी मट्ठाधीशी में। या कुछ नहीं तो किसी को मट्ठाधीश बनवाने के लिए उसे झाड़ पर ही चढ़ाने की जुगत ही करते फिरते हैं। जो दल देखा, उसी में घुस गए या जहाँ देखा उफान, लगा ली वहीं दुकान।

अरे! यह तो करण वाला देसिल बयना हो गया। जहाँ देखा उफान, लगा ली वहीं दुकान। ... ... हहहहहहहह्हहहह ... हाहह्हहहहह्ह ... । घर पर हूँ। किसी तरह ‘आह’ तो रोक लूँ, भाई। मुँह बन्द करके हँसना पड़ रहा है।

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