सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

रखवाला

लघुकथा

--- मनोज कुमार


सात वर्ष हो गए, दोनों अब भी द्वारका के उसी छोटे से फ्लैट में रहते हैं। शादी के कुछ ही दिनों के बाद गांव से पल्लवी के साथ वह आ गया था यहां रहने। दो बेडरूम का डीडीए फ्लैट है। मां और पिताजी गांव में ही रहते थे। सुख-चैन से। पिताजी के गुज़रने के बाद मां अकेले रह गई थी, पर वह दिल्ली के वजाए दुधबा गांव में ही रहना पसंद करती है। वहां की ताजी हवा और अड़ोस-पड़ोस के लोगों के साथ मिलना-जुलना, ... समय अच्छी तरह से कट जाता है। दिल्ली के उस घर में तो जीवन पिंजरे में क़ैद पंछी की तरह लगता था।


दोनों, हसबैंड-वाइफ, दिल्‍ली में जॉब करते हैं। ... वर्किंग कपल। सौरभ मां को हर महीने तीन हज़ार का चेक तो भेज ही दिया करता है, हां साल-दो-साल में एक-आध बार जाकर भेंट मुलाक़ात भी कर लिया करता है। दिल्ली में उनका गुज़ारा किसी तरह चल रहा है, पर ठीक-ठाक।


आज समस्या विकट हो गई है। ढ़ाई साल की निक्की की देखभाल के लिए जिस आया को रखा था, उसने काम छोड़ दिया है। पल्लवी को दफ़्तर से अधिक एबसेंट रहने पर नौकरी जाने का ख़तरा दिख रहा है। सौरभ ने सब तरफ हाथ पैर मार लिए पर कोई ढ़ंग की आया मिलती ही नहीं है। जो मिल भी रही है वह काफी पैसे मांग रही है। अफोर्ड करना मुश्किल है। पल्लवी ने उसे सलाह दी, “मांजी तो गांव में अकेले ही हैं। उन्हें बुला लो। निक्की की देखभाल, ... परवरिश भी हो जाएगी, मां का यहां मन भी लगा रहेगा”।


सौरभ ने मां को एसएमएस कर दिया, “मैं आ रहा हूं। तुम्हें लेने। तुम यहीं दिल्ली में हमारे साथ रहना। सोम को पहुंचूंगा। वापसी मंगल का है। तैयार रहना”।


... और शाम की गाड़ी से सौरभ गांव के लिए प्रस्थान कर गया। रास्ते में वह सोच रहा था... ‘अब हर महीने मां को तीन हज़ार का चेक नहीं भेजना पड़ेगा, ... साथ ही आया के तीन हज़ार भी बचेंगे’ ... ! !

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढिया लिखा है।आजकल समाजिक सोच इसी तरह की नजर आ रही है....हर रिश्ते पैसों की नजर से ही देखे जा रहे हैं।बहुत बढिया कटाक्ष करती रचना है।बधाई।

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  2. Bohot achi lagi aapki yea rachna.Aaj k modern bachho ki soch bohot hi badal chuki hai...Log bhi kaise hote hain jab jarurat parti hai toh ma-baap yaad aate hain, nahi toh yaad tak nahi aate.Ek kone mein pade paper ki tarah haal ho jaati hain unki... Aaj ka manav rishton ki aehmiyat bhul gaya hai, woh toh har rishton ko paison mein tol raha hai...
    Aapki ant ki line 'o' mein ki gayi vyangya "अब हर महीने मां को तीन हज़ार का चेक नहीं भेजना पड़ेगा, ... साथ ही आया के तीन हज़ार भी बचेंगे’ ... ! !" darshata hai aaj k manav ki soch.

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  3. हर बात को पैसे से नहीं तौला जा सकता है .. पर मध्‍यम वर्ग के लिए पैसा मायने अवश्‍य रखता है .. और पोते पोती के देखभाल के लिए हर प्रकार से स्‍वस्‍थ मां को शहर आना ही पडे .. तो इसमें मुझे कोई बुराई नहीं दिखती .. आजकल पहले से ही मन में असुरक्षा की भावना बैठ जाने से वृद्धों की स्थिति अधिक चिंताजनक हो गयी है .. परिवार में छोटी छोटी बात का बतंगड भी नहीं बनने देना चाहिए !!

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  4. विचारोत्तेजक! संवेदनशील रचना। बधाई।

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  5. Ek parivaar k vridh sadasya ki awastha aur unki vidambana ko darshati aapki yeh rachna maano dil ko chuu gayi.

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  6. तार-तार होते मानवीय संबंधों पर पैना प्रहार ! शब्द साधु व्यंग्य तीक्ष्ण !! धन्यवाद !!!

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  7. आपको और आपके परिवार को दीपावली और भाई दूज की हार्दिक शुभकामनायें!
    बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! पढ़कर बहुत अच्छा लगा !

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  8. maa jise ishwar se upar darja diya gaya hai uske liye aesa sochana aur matlab ke liye use karna bahut hi nindajanak hai .aapki rachana band aankhe kholne ka aadhaar hai .umda .

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  9. आज के संदर्भ में एकदम सटीक है। कुछ ऐसा ही पढिए, क्यों रिश्तों से ठोकरे खा रहे है.... हम......http://swastikachunmun.blogspot.com

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  10. आज का सच ही है ...अपने स्वार्थ को पहले देखते हैं ...मार्मिक लगी कथा

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