मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

एक गहरी श्‍वांस लेकर

मित्रों !
आपका प्यार और आपकी प्रतिक्रया ही हमारी रचनात्मक ऊर्जा का संबल है। 'एक गहरी श्वांस ले कर' ब्लॉग जगत में आगे बढ़ने के लिए एक बार फिर हम तैयार हैं। प्रतीक्षा है आपके सहयोग और सुझाव की !

--- मनोज कुमार


एक गहरी श्वांस लेकर !

मैं अंधेरे में खड़ा था,
रोशनी की आस लेकर !

मिट गया गहन-तिमिर,
जल गया जब दीप कोई।
दे गया मोती धवल,

पड़ा तट पर सीप कोई।
उतर आए लो! सितारे झील में आकाश लेकर।
एक गहरी श्वांस लेकर !!


मन कहीं उलझा हुआ था,
मकड़ियों सा जाल बुनकर।
झँझड़ियों की राह आती,
स्वर्ण किरण एकाध चुनकर।
उठा गहरी नींद से मैं, इक नया विश्वास लेकर।
एक गहरी श्वांस लेकर !!


छोड़ दी बैसाखियाँ जब,
चरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे।
भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।
एक गहरी श्वांस लेकर !!

*** ***

14 टिप्‍पणियां:

  1. उत्प्रेरक रचना ! एक-एक शब्द अनुपम शिल्पगत सौंदर्य एवं अद्वितीय भाव लिए !! छंद व्यवस्था अनुशासित एवं पद्य सुगेय !!!

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  2. ऐसी सुथरी भाषा और इतनी गेयता ! गुनगुनाने को जी चाहता है।
    इन पंक्तियों के स्टेंसिल काट मैंने मन आकाश में उड़ा दिया है।

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  3. सुंदर भावमय , गीतमय, संगीतमय कविता । दिल को छू गई ।

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  4. यह कविता निराशावादिता के विरुद्ध आशावादिता के साथ आदमी को जिन्दा रखने की ताकत में बढ़ोत्तरी करती है।

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  5. पहली बार आपकी कविता पढ़ी मनोज जी, क्या बताऊं बहुत बढ़िया लिखते है..धन्यवाद जी..यह कविता तो बहुत ही अच्छी लगी.

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  6. पहली बार आपकी कविता पढ़ी मनोज जी, क्या बताऊं बहुत बढ़िया लिखते है..धन्यवाद जी..यह कविता तो बहुत ही अच्छी लगी.

    उत्तर देंहटाएं
  7. मन कहीं उलझा हुआ था,
    मकड़ियों सा जाल बुनकर।
    झँझड़ियों की राह आती,
    स्वर्ण किरण एकाध चुनकर।
    उठा गहरी नींद से मैं, इक नया विश्वास लेकर।
    एक गहरी श्वांस लेकर ....

    bahut hi gahre bhaav ke saath ek behtareen kavita.. bahut achchi lagi yeh kavita...

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  8. छोड़ दी बैसाखियाँ जब,
    चरण ख़ुद चलने लगे।
    हृदय में नव सृजन के
    भाव फिर पलने लगे।
    भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
    समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।
    एक गहरी श्वांस लेकर !!
    आज सुबह आते ही सब से पहले आपकी रचना पढी तो मन एक नई सकारात्मक ऊर्जा से भर गया। लाजवाब प्रेरणा देती रचना के लिये धन्यवाद्

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  9. Aapki kavitayein maano mann mein ek umang si bhar deti hai....Ek sfurti ka ehsaas sa hota hai....Aap se ek request karunga ki aap kuch kavitayein students k upar v likhe....Aasha hai aap meri yea request sweekar karenge.

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  10. Yeh mithi si rachna dil ko chuti hai.Jindagi k eham panno ko darshati aapki yeh kavita mujhe bahut achii lagi.

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  11. छोड़ दी बैसाखियाँ जब,
    चरण ख़ुद चलने लगे।
    हृदय में नव सृजन के
    भाव फिर पलने लगे।
    भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
    समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।
    एक गहरी श्वांस लेकर !!
    bahut sundar...
    aage badhne ki prerna deti aapki kavita bahut manoram lagi..

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  12. मनोजजी एक उत्प्रेरक और भावपूर्ण कविता के लिए बधाई |

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  13. छोड़ दी बैसाखियाँ जब,
    चरण ख़ुद चलने लगे।
    हृदय में नव सृजन के
    भाव फिर पलने लगे।
    भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
    समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।
    एक गहरी श्वांस लेकर !!
    bahut hi badhiya ....

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  14. छोड़ दी बैसाखियाँ जब,
    चरण ख़ुद चलने लगे।
    हृदय में नव सृजन के
    भाव फिर पलने लगे।

    आशा का संचार करती सुन्दर भावाभिव्यक्ति ..

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