मंगलवार, 17 नवंबर 2009

झींगुर दास

जब मैंने इस ब्लॉग पर काम करती मां को पोस्ट किया था, तभी से मेरे जेहन में यह था कि लोग झींगुर दास से भी मिलना चाहेंगे। उस रचना में बार-बार झींगुर दास का जिक्र हो रहा था। उस रचना की जो भी प्रतिक्रियाएं मिलीं, श्री गिरिजेश राव जी ने झींगुर दास की वर्तमान स्थिति के बेरे में जानना चाहा था। तो लीजिए मैं आज हाजिर हूं आपके समक्ष आज के झींगुर दास के साथ।
--- मनोज कुमार

झींगुर दास ने देख लिए तीन पुश्त
उस मालिक की देहरी के
मालिक भी परलोक गए
बच्चे उनके परदेश में हैं
अब झींगुर करेगा क्या,
खाएगा क्या?

उन फौलादी अस्थि में
पुश्तों का नमक था दौड़ रहा
अबके टी.बी. ने तोड़ दिया
बल निकल गया सब रहा-सहा
मुखिया का बेटा मुखिया है
सरपंच वहां का सुखिया है
दोनों मिलकर बांट रहे
सरकारी रेवड़ी काट रहे !

झींगुर की किसको फ़िक्र यहां
वह काली थान में पड़ा-पड़ा
मालिक की राह है देख रहा।
अबकी पूजा में आएंगे
लल्ला-लल्ली भी लाएंगे
बरसों से बंद पड़ा था घर,
कैसै उसमें रहेंगे सब?
उनका कैसे काम चलेगा,
टहल-टिकोरा कौन करेगा ?
झींगुर को इसकी फिक्र बड़ी
झींगुर को इसकी फिक्र बड़ी !!
*** *** ***

26 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !! झींगुर दास - क्या कैरेक्टर है? बधाई!

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  2. मुखिया का बेटा मुखिया है
    सरपंच वहां का सुखिया है
    दोनों मिलकर बांट रहे
    सरकारी रेवड़ी काट रहे !
    वाह झींगुर तो मझे हुये नेता हैं । बधाई

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  3. झींगुर की फिक्र बडी है , झींगुर को फिक्र बडी है । बढिया प्रस्‍ुतति ।

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  4. वाह । । झींगुर दास आज भी अपने मालिक की राह देख रहा है। बहुत सुंदर प्रस्तुतिकरण ।

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  5. nice poem ! but what is jhingur n why did u select it for your poem ?

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  6. बढ़िया है मालिक आएँगे तो किस्मत जाग जाएगी झींगुर दास की फिर से मौज करेंगे..
    एल अलग अंदाज़े बयाँ ..बेहद मजेदार चरित्र चित्रण करके कविता में मज़ा आ दिए आप..बहुत बहुत धन्यवाद

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  7. उन फौलादी अस्थि में
    पुश्तों का नमक था दौड़ रहा
    अबके टी.बी. ने तोड़ दिया
    बल निकल गया सब रहा-सहा
    मुखिया का बेटा मुखिया है
    सरपंच वहां का सुखिया है
    दोनों मिलकर बांट रहे
    सरकारी रेवड़ी काट रहे !
    sahi chitran kiya hai jeevan ke paristhitiyon par .

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  8. मुखिया का बेटा मुखिया है
    सरपंच वहां का सुखिया है
    दोनों मिलकर बांट रहे
    सरकारी रेवड़ी काट रहे !
    झींगुर बाबा तो बडे चालाक लगते है.शायद नेता ही होगा कोई यह झींगुर

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  9. Jhingurdas ka sundar roop me charitra chitran kiya gaya hai.AAj bhi aise vyakti hai,accha laga. - Mohsin

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  10. झिंगुर एक साथ दो तरह के व्यक्तियों का प्रतिनिधि है:
    - वे जो जोंक की मानिन्द ज़िन्दगी गुजारते अपना स्व अपना व्यक्तित्त्व सब भूल जाते हैं। परिवर्तनों की कितनी ही आँधियाँ आएँ, इनका 'स्वामिभक्त' अस्तित्त्व एक ठहर गए काल में ही अटका रहता है। इनके लिए समय ही मायने नहीं रखता, उसकी गतिशीलता तो बाद की बात है।
    - वे जो तटस्थ हैं। सब कुछ देखते सुनते बस अपने मनोजगत में विचरते। खुद की दुरवस्था भी उन्हें बदलने लायक शॉक नहीं दे पाती।

    कविता का वातावरण बेचैन करता है। इतनी कम पंक्तियों में भी लम्बी कविताओं सी सिद्धि !
    अंत की फिक्र का दो दफा आना, अनूठे त्रास को जन्म देता है।
    बधाई महराज, anonymous जी पर ध्यान दीजिए। झिंगुर बताइए क्या होता है? ये सज्जन अनजान भोले नहीं लगते, जाते जाते पूछ जाते हैं why did u select it for your poem ?
    आप बताइए।

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  11. jingur par kavitha achcha laga.
    - thaygarajan

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  12. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com

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  13. बेहद रोचक और मार्मिक व्यंग्य है।

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  14. प्रतीकों का सफल प्रयोग किया गया है।

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  15. ये छींगुर जी तो बडे छंटे हुए दिखाई पडते हैं :)
    बहुत ही बढिया प्रस्तुति....
    आभार्!

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  16. झींगुर जी नामक पात्र को बहुत ही सुंदर रूप में उकेरा गया है। सुंदर व्यंग्यात्मक रचना। ऐसी रचनाएं लिखा करें।(मोहसिन)

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  17. सत्यम् शिवम् सुन्दरम् ! सनातन मूल्यों की विरासत, विखंडित वर्तमान की पीड़ा, और काली शासन पर व्यंग्य की त्रिवेणी ! रगों मे सात-पुश्तों की स्वामिभक्ति लिए, स्वार्थी शासकों की उपेक्षा का शिकार झींगुर समाज के दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधि है, जिसकी एक आँख में (परिवार के) विखंडन और पलायन की पीड़ा है तो दूसरी में एक क्षीण सी आशा और दिलो-दीमाग मे वही परम्परागत मूल्य !! सांकेतिक पात्र का बहुत ही साफगोई से इस्तेमाल किया है आपने !! धन्यवाद !!!

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  18. मैं करण जी की बातों से सहमत हूं। ये झींगुर दास जी मेरे गांव में हैं, और छठ में घर गया था तो उन्हें जीवित पाया था। कभी-कभी कुछ ऐसे पात्रों से जीवन में वास्ता पड़ जाता है कि मन करता है इसे अपने ढ़ंग से व्यक्त करूं। इस रचना में काव्य शिल्प की कोई कमी रह गई हो तो वह झींगुर जैसे लोगों के जीवन का अभाव समझकर स्वीकार कर लेंगे, पर मैंने जहां एक ओर "काम करती मां" के माध्यम से उस पीढ़ी का स्नेह दिखाने का प्रयास किया था तो वहीं दूसरी ओर गिरिजेश जी के द्वारा सुझाए गए संकेत को पकड़कर इस पात्र के प्रति हमारी पीढी की उपेक्षा दिखाने का प्रयास किया है साथ ही शासक वर्ग की अनदेखी भी। आप सबों ने इसे पढ़ा मेरा मनोबल काफी बढ़ा है। आप सभी का बहुत-बहुत आभार !

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  19. बहुत ही बढ़िया काव्य व्यंग...

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  20. परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण। बहुत अच्छी रचना।

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