बुधवार, 25 नवंबर 2009

देसिल बयना - 7 : न कढी बना न बड़ी !

-- करण समस्तीपुरी
हा...हा..हा... ! न कढीए हुआ न बड़ीए ... अब आज के महमान को भोग का लगेगा? अरे.... अरे ! आप तो हजूर खा-म-खा डर गए आप के लिए तो देसिल बयना का ताजा खुराक हाज़िर है लेकिन ज़रा सा कष्ट करना पड़ेगा उ का है सो तो बुझते ही है गाँव की बात गाँव मे ही अच्छी लगाती है न

साहिब ई है हमरा गाँव रेवा-खंड। अब तो भैय्या न उ देवी रही न उ कराह। पहिले ई का बातहि कुछ और था। अरे मोगल आया रहा, अँगरेज़ आया रहा और फिर जमींदारी राज रहा ई गाँव में। ई देखे हो गौरी पोखर के भीर पर बड़का कोठी.... मोगलिया तहसीलदार बनाए रहा। फेर अँगरेज़ कब्ज़ा कर लिहिस। अब खादी भण्डार होय गया। सब कुछ केतना बदल गया है। नहीं बदला है तो कोठी के पिछुअवारे हमरे लोगों का टोला। आज भी लोग वही सादगी में जीते हैं। पहिले का तो बाते मत पूछिये।

हमको अभी तक याद है। आ..हा...हा... ! हसनपुर वाली काकी हंस-हंस के पुरे टोला में हकार दे रही थी। भगजोगनी की माय और लोहागिर वाली उका लम्बा चौरा अंगना को गोबर से लिप कर चम-चम कर दी थी । नरेश काका अपनी कलाकारी दीवाल पर दिखा रहे थे। ऊंह ! भखरा चून्ना से रंगे भित्ति पर गेरू से का ऐन्टिंग-पेंटिंग किये हैं ! 'देख परोसन जल मरे !!' संझका भोज के लिए झींगुर दास केला का पत्ता काट कर गत्ता लगा रहा है। सीताराम और नथुआ दुन्नु पानी का ड्राम भरे में लगा है। हमलोग तो बड़का टोकना में पक रहे नयका अरवा चावल के गमके से इधर-उधर चौकरी भर रहे थे। हसनपुर वाली काकी का बेटा था न बटेश्वर उ का लुगाई आयी थी गौना कर के। आज नायकी कनिया रसोई छूयेगी। उहे ख़ुशी में काकी ने पुरे टोला में न्योता दिया था।

बटिया तो पीरा धोती के उप्पर कोठारी गंजी आ हाथ में एच.एम.टी का घड़ी पहिने फुचाई झा के साथे भोज बनाए मे लगा हुआ था। तबहि हम बिशनपुर वाली से पूछे, 'अरे काकी कहिस कि आज बटिया के लुगाई रसोई पकायेगी फिर फुचाई झा काहे लगे हैं ?' छूटते ही बिशनपुर वाली बोली, "भाग दाढ़ीजरबा ! टोला को न्योतना कौनो हंसी मजाक है का...! अरे पंडिज्जी और सब बना देते हैं। कनिया बड़े घर से आयी है। उ ई सब का जाने ? अंगरेजी खाना बनाती है। उ केवल 'कढ़ी-बड़ी' बना देगी।' हम भी मने-मन कढ़ी-बड़ी का स्वाद लिए लगे।

रह रह के नजर खिड़की के पिछु चला जाता था। तभी छन-छन-खान-खान की आवाज हुई। देखे तो ललका साड़ी के अन्दर से अलता से रंग हुआ हाथ पतीला में तेजी से घूम रहा था। ओहो! तो नयकी कनिया लगा रही हैं कढ़ी-बड़ी का जोगार... ! बड़ी मुश्किल से मुंह का पानी रोके। कनिया ताली बजा कर काकी को बुलाई और दोनों में कुछ बाते हुई। फेर पतीला में एक लोटा पानी गिरा। ले बलैय्या के.... अब तक बतीसी दिखा रही काकी की त्योरियां चढ़ गयी। उ तो बड़की भौजी मोर्चा संभाल ली और कहा, 'पानी पड़ ही गया तो का हुआ काकी ? दुल्हिन समझदार है। कह रही है, बड़ी न सही कढ़ी तो बन जाएगा न!' तब जा के काकी की त्योरी ढीली पड़ीं।

लेकिन पांचे मिनट में फेर बडकी भौजी की आवाज़ आयी, "जा री दुल्हिन ! ई का कर दी ! ई तो एकदम लट्ठा होय गया... हलुआ... ! अब लो... अब का होगा...? तब तक काकी भी दौड़ी आ गयी। माजरा समझते उन्हें देर न लगी। बोली, "जाओ री दुल्हिन! हो गया सत्यानाश ! ई तो न 'कढ़ीए हुआ न बड़ीए !' जल्दी फेंको ! और दूसरा बेसन लो !!''

कनिया भी इधर देखी न उधर ! उठाया करहिया और खिड़की के अन्दर से ही मारा उड़ेल के बाहर !! लेकिन ई का.... उ सारा लट्ठा बेसन बाहर बैठे नरेश काका के ऊपर जा गिरा। अब तक तो अन्दर ही चख-चुख चल रहा था। अब बाहर भी भोज के बदले दूसरा ही तमाशा शुरू हो गया। नरेश काका भी खिसिया के बोले, "कहती थी सब गुण के आगर है। अंगरेजी खाना बनाती है। हुंह... ई से तो न कढ़ीए बना न बड़ीए ! और फेंका उ भी देहे पर पड़ गया।" अब हम लोग लगे काका के मुंह के बात दोहराने। "न कढ़ीए बना न बड़ीए ! और फेंका उ भी देहे पर पड़ गया।"

बाद में ई कहावत प्रचलित ही हो गया। जब लोग बात करें बड़ी-बड़ी और काम हो कुछ नहीं और कुछ हो भी तो गड़बड़ ही गड़बड़ !! तब सब के मुंह पर यही कहावत आती है। समझे! आप भी कभी ऐसा मत कीजियेगा कि "न कढ़ीए बने न बड़ीए ! और फेंकियेगा तो देख के न तो कहीं देहे पर न पड़ जाए

20 टिप्‍पणियां:

  1. करणजी ,एक बार फिर एक मनोरंजक देसिल बयना पेश किया है आपने ,बधाई ।

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  2. "न कढ़ीए बना न बड़ीए ! और फेंका उ भी देहे पर पड़ गया।" एक बात है, आप बड़ी-बड़ी बात न करके कहानी बना देते हैं।

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  3. लेकिन ई का.... उ सारा लट्ठा बेसन बाहर बैठे नरेश काका के ऊपर जा गिरा। अब तक तो अन्दर ही चख-चुख चल रहा था। अब बाहर भी भोज के बदले दूसरा ही तमाशा शुरू हो गया। नरेश काका भी खिसिया के बोले, "कहती थी सब गुण के अगर है। अंग्रेजी खाना बनाती है। हुंह... ई से तो न कढ़ीए बना न बड़ीए ! और फेंका उ भी देहे पर पड़ गया।" अब हम लोग लगे काका के मुंह के बात दोहराने। "न कढ़ीए बना न बड़ीए ! और फेंका उ भी देहे पर पड़ गया।"

    बहुत नीक लिखल बा ....!!

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  4. "hasua ke byah me khurpi ke lagan".... Navember me kadhi or badi samajh me nahi aaya... thandi me kadhi nahi khaya jata.... haan dusre mausam bani hogi uski yaad likh dali.... bat yehi ... par bhaiya padhkar mere muh me bhi pani aa gaya... haan mulli our dhania ke chatni jarur hona chahiye... lekin khidki ke pas mai nahi baithunga...
    bahut-bahut badhai karan ji or manoj ji ko... gaav ki yaad taza karane ke liye..

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  5. अच्छा है यह देसिल बयना भी। शुभकामनाएं। सिलसिला जारी रखें।

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  6. ha ha ha ha he he he he ho ho ho...ka karan g kitna hasaiyega ap..bahute badhaiya hai ye kadi badi ki kahani...padh kar man ekdume khus ho gaya bhore bhor...yu to humko b kadi badi banane ni ata ...lakn lagta hai ab sikhna he parega..ka pata hume b sunna pare NA KADI BANA NA BADI...aur apki sabe kahani me ego naya kahawat sunne ko milta hai .....

    Bahute badhiya raha e desil beyna...aur naresh kakka to aur b ache rahe......

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  7. Karan ji,kya kahu mai is kahani ke bare mein ,aisa pratit ho raha hai jaise sab kuch samne me ho raha ho..aur mujhe padhkar inna acha laga ki mere pass ish desil bayna ki tarif me jo sabse acha shabd hona cahiye wo samjh me he ni aa raha hai ..bahot he badhiya prastuti..

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  8. आपका लिखा त रोजे पढता हूँ... लेकिन आई कनी बेसी निक लागी गया... ताई स कहता हूँ कि आपने बड बढ़िया लिखा है... ऐसा ही लिखते रहिये.... हम रोज पढ़ेगा... subhash chandra, Delhi

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  9. एक मनोरंजक देसिल बयना पेश किया है आपने ,बधाई ।

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  10. bahut badhiyan huzoor...... aise hi nayi nayi ijaat karte rahiye.... sahitya ko bahut aage nikalna hai........

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  11. सभी पाठकों का आभार ! सच पूछिये तो आपकी प्रतिक्रया ही हमारी रचनात्मक ऊर्जा का इंधन है !!

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  12. बड़ नीक लागल अप्पन माटि-पानी से गमकैत ई कथा !

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