बुधवार, 4 नवंबर 2009

देसिल बयना - 4 : छोड़ झार मुझे डूबन दे !

-- करण समस्तीपुरी

"छोड़ झार मुझे डूबन दे !" ई कहावत हमने बचपन में सुना था, बडगामा वाली भौजी के मुंह से. अब का बताएं... बडगामा वाली भौजी जब इस्टाइल में हाथ झटक-झटक के ई कहावत कह रही थीं तो हमरे तो हंसी का ठिकाना नहीं रहा ! हंसते-हंसते दोबर होय गए हम। लगता है आप भी गुदगुदा गए हैं... तो 'देसिल बयना' में आज चलिए हमरे गाँव। आपको ई कहावत का जड़ वहीं मिलेगा।

गाँव में हमरी पड़ोसी हैं, बडगामा वाली भौजी। अरे ऊ बुद्धन भैय्या हैं न... सात भाइयों मे सबसे छोटे... उनकी तीसरी लुगाई है। अब वृद्धस्य तरुनी भार्या... तो प्राणों से भी प्रिय होती हैं। ऊपर से तीसरी लुगाई.... भूल गए हैं तो रामायण याद कीजिये। एकदम वैसी ही थी बडगामा वाली भौजी। घर भर की दुलारू ! समझ लीजिये कि मान न मान ! मैं तेरा महमान !! बुद्धन भैय्या तो भौजी को तलहत्थी पर ही रखते थे। रखेंगे कैसे नहीं ? अगर ईहो चली गयीं तो इस उम्र में का होगा ??

भौजी को घर भर का ई कमजोर नब्ज मालूम था सो वो बात बात पर 'ब्लैक-मेल' करती थीं। बुलकी ला दो नहीं तो... बोलूंगी नहीं! झुमका ला दो नहीं तो.... नैहर चली जाउंगी!! और डांट-डपट किस चिडियां का नाम है, भौजी तो एक कड़क आवाज पर कुँआ-पोखर दौड़ पड़ती थी और लोग-वाग पीछे-पीछे मनाने दौड़ते थे। लेकिन धीरे-धीरे बात सबको समझ में आ गयी कि भौजी करेंगी-वरेंगी कुछ नहीं खा-म-खा धमकी देती हैं।

एक दिन सांझ में बुद्धन भैय्या का पारा चढा हुआ था। कुछ बात हुई और भौजी फिर आँखों से गंगा-यमुना और मुंह से आशीर्वाद की झड़ी लगाए दौड़ पड़ीं तालाब की ओर। लोग रोकें तो बोली, "नहीं..... अब जहां अपना मरद ही दुःख-दर्द समझे वाला नहीं रहा वहाँ जी के का करना... अब तो बस कमला माई के शरण लग जाएँ। यही पोखर मे डूब के ई पापी दुनिया को छोड़ दें !"

उधर से तमतमाए भैय्या भी बोले, " हाँ ! जाओ ! जाओ !! डूब ही जाना !!! रोज-रोज के काईं-कट-कट से छुटकारा तो मिले !" "हाँ..हाँ... जा रही हूँ... ! मैं खुद इस खिच-खिच में जीना नहीं चाहती...!!" बोलती हुई भौजी चल रही हैं आगे और देख रही हैं पीछे.. ! अबहुँ कोई बचाए खातिर आ रहा है कि नहीं.. !!!

अरे ई का... ई बुद्धन भैय्या तो आज दलाने पर जमे रहे... ! अच्छा बुद्धन भैय्या नहीं तो कोई अरोसी-पड़ोसी भी नहीं दौड़ रहा है....! हमको लगा कि कुछ गड़बड़ न हो जाए... सो भौजी तो आगे साबरमती एक्सप्रेस के तरह भाग रही थीं मगर हम पसिंजर के तरह पीछे-पीछे आये। जब तक हम तालाब के भीड़ पर पहुंचे भौजी तो एकदम पनिया के करीबे पहुचंह गयी थी। हम देखे लगे कि भौजी अब छलाँग लगाएं और हम दौड़-दौड़ के सब को ताजा समाचार बता दें। लेकिन ई का... भौजी तो डूबने के बजाए बार बार पीछे मुड़ कर देख रही हैं और पता नहीं किस से लड़ रही हैं ? हम ने कुछ देर तमाशा देखा और फिर पूछा, " का हुआ भौजी... ? अरे वहाँ किस से बतियाय रही हो ?"
भौजी रोते-धोते बोली, "अब हम से कुछ न पूछो बबुआ ! ई सारा जहान हमरा दुश्मन होय गया ! अब डूब कर प्राण देने आये तो इहाँ भी... ई झार साड़ी पकड़ लिहिस ! पता नहीं हमरे भाग में और कितना दुःख बदा है !" इतना कह भौजी फिर से उलझ गयी झार से ! कह रही हैं,"छोर झार मुझे डूबन दे.... छोर हमरी साड़ी... अब हम डूब के ही रहेंगे... जिसके साथ सात फेरे लिए, जीए-मरे के कसम खाई, वही अपना न रहा तो तुम अब काहे रोक रहे हो... !! छोड़ झार... छोड़ झार मुझे डूबन दे!" भौजी एक घंटा तक ऐसे ही झार से उलझी रही तब बात हमरे समझ आ गया!

हम करीब गए। हाथ पकड़ा भौजी के और प्यार से बुझाया, " का भौजी ! समझदार होय के तुम भी बुरबक वाली बात करती हो। अरे खट-पट कहाँ नहीं होता... इस से अपना परिवार छूट जाता है, का ... ? चलो-चलो !!" भौजी दू-चार बार तो देखाबटी आना-कानी की और फिर चल दी हमरे साथ। देखिये, डूबने जा रही थी तो ऊ झार भी पकड़ लिहिस था लेकिन लौटे में एकदम फ्री हो गयी। खैर भौजी तो लौट आई लेकिन एगो कहावत जरूर बना दी ! उस दिन से धमकी दिखा कर बहाना बनाने वाले के लिए भौजी की कहावत अमर हो गयी, "छोर झाड़ मुझे डूबन दे !" जब भी कोई औकात से ज्यादा बात कर जाता है और पूरा न होने के पीछे बहानेबाजी करता है, तब हमरे मुंह से अनायास निकल जाता है, "छोड़ झार मुझे डूबन दे!"

17 टिप्‍पणियां:

  1. हाहा! बहुत बढ़िया!यदि कोई झा न मिलता तो भौजी तो जातीं काम से!
    घुघूती बासूती

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  2. हाहा! बहुत बढ़िया!यदि कोई झाड़* न मिलता तो भौजी तो जातीं काम से!
    घुघूती बासूती

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  3. पढ़े हुए पांच मिनिट हो गया है। मुंह बंदे नहीं हो रहा है। आ इ घुघूती बासूती का कमेंट चार चांद लगा रहा है। बड़ा बढ़िया लिखते हैं। हर बुधवार को इहे का तो इंतज़ार रहता है। कलकत्ता में रह कर भी गांव-दुआर घुर आते हैं आपके देसिल बयना के साथ।

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  4. हा हा हा ! बड़ा ही मज़ेदार ! बहुत खूब!

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  5. Keshav ji

    e to ap bahute badhiya kahani likhe hain ..bada maja aa gaya padh ke...hansi ta rukiye na he raha hai..aur e apki bhoji to badi he dilchasp nikli...jaise ki apki kahani..hume hasane ke liye bahute dhanyavaad..

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  6. samajne ko thoda mushkil tha but interesting laga.
    - thyagarajan

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  7. ek bar phir behtarin kahaani. Kahaawat bujhaane ka is se achchha andaz aur kya ho sakta hai. main har hafte wednesday ka itnijar karti rahti hoon !

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  8. bahut badhiyan malik..... aisan kahani sab se to nata rishta jaise tut hi gaya tha.... ab ek baar phir se jinda ho raha hai..... bahut badhiyan GABBARWA KHUSH HO GAYA........

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  9. सो भौजी तो आगे साबरमती एक्सप्रेस के तरह भाग रही थीं मगर हम पसिंजर के तरह पीछे-पीछे आये। जब तक हम तालाब के भीड़ पर पहुंचे भौजी तो एकदम पनिया के करीबे पहुचंह गयी थी। हम देखे लगे कि भौजी अब छलाँग लगाएं और हम दौड़-दौड़ के सब को ताजा समाचार बता दें..........
    arey waah samastipuri ji,
    bhauji ko bachane ke badle aap modern days media man ki tarah samachar phailane ka intijaar karte rahe. still, telling straight from my heart... aapkee yah harkat bhi hame hansa gayee....
    Thanks ! Keep the good spirit up !!!

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  10. The story reflects the depth and diversity of writing of the author !

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  11. storiya to kamaal hai hee bhauji ka ee photo us se bhi kamal ka .

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