गुरुवार, 3 मार्च 2011

आँच-58 :: प्रेम से तुमने देखा जो प्रिय

आँच-58

प्रेम से तुमने देखा जो प्रिय

आचार्य परशुराम राय प्रेम से तुमने देखा जो प्रिय, / मन मयूर उन्मत्त हो गया. / विदित हुआ मुझ में अनुपम सा, / सब कुछ प्रकृति प्रदत्त हो गया. / मन-चातक यूँ तृप्त हुआ ज्यों, / स्वाति का वह नीर पा गया. / जेठ की तपती दोपहरी में, / वसुधा ने बरसात पा लिया... / रख लो हे प्रिय उर में भरकर, / घुल सांसों संग बहूँ निरंतर. / चाहूँ भी तो ढूंढ न पाऊं, / स्वयं को खो दूँ तुममे रमकर. / न ही चाहना धन वैभव की, / न ही कामना स्वर्ग मोक्ष की. / हृदय तेरे बस ठौर मिले औ, / मुखाग्नि पाऊं तेरे कर...

आँच का उद्देश्य कवि की भावभूमि की गरमाहट को पाठकों तक पहुँचाना और पाठक (समीक्षक) की अनुभूति की गरमाहट को कवि तक पहुँचाना है।

My Photoआज आँच के इस अंक पर समीक्षा के लिए श्रीमती रंजना सिंह की कविता प्रेम से तुमने देखा जो प्रिय ली जा रही है। यह कविता उनके ब्लाग संवेदना संसार पर पिछले वर्ष 21-06-2010 को प्रकाशित हुई है। रंजना जी प्रसिद्ध औद्य़ोगिक नगर जमशेदपुर, झारखंड में एक आई.टी.संस्थान में प्रबन्ध निदेशिका पद पर कार्यरत हैं।

प्रेम से तुमने देखा जो प्रिय कविता में प्रसाद गुण आद्योपान्त बना हुआ है। अपने प्रियतम द्वारा प्रेमभरी दृष्टि का स्वकीया नायिका (पत्नी) पर जो प्रभाव पड़ता है या उसे जो उसकी अनुभूति होती है, आधी कविता में उसे विभिन्न प्राकृतिक बिम्बों के माध्यम से व्यक्त किया गया है और आधी कविता में नायिका की कामनाओं को। कामनाओं की पूर्णाहुति भारतीय परम्परा के अनुरूप अनन्त साधव्य की कामना के रूप में की गयी है, अर्थात पत्नी की मृत्यु के उपरान्त पति उसे मुखाग्नि दे, उसे वैधव्य का अभिशप्त जीवन न जीना पड़े। भारतीय नारी-जगत सदा अपने जीवन में ऐसी कामना करता रहा है। यह कामना आज भी सामान्यतया लगभग यथावत वर्तमान है। इसी एकांतिक भावभूमि पर कविता में भावाभिव्यक्ति को पल्लवित किया गया है। कविता में कुल चार बन्द हैं।

सभी को अपना जीवन अपने ढंग से देखने का प्रकृति ने वरदान दिया है। कवयित्री ने कविता में उस वरदान का सामान्यीकरण करने का सफल प्रयास किया है। प्रियतम की प्रेमपूरित दृष्टि नायिका पर पड़ने से उसका मन रूपी मयूर उन्मत्त हो उठा। मन को मयूर के रूप में, अर्थात रूपक अलंकार से बिम्बित व अलंकृत किया गया है। यह बिम्ब प्रयोग होते-होते इतना रूढ़ हो गया है कि इसमें अन्तर्निहित अर्थ गुम सा हो गया है। वास्तव में जब मोर उन्मत्त होता है तो वह इधर-उधर नहीं भागता, बल्कि मदमस्त होकर एक सीमित एक छोटे दायरे में वह नृत्य करने लगता है। उसी प्रकार प्रेमी और प्रेमिका जब परस्पर प्रेमाभिभूत होते हैं, तो उनका मन अटल विश्वास की निश्चित भूमि पर उन्मत्त होकर जीता है। मानसिक भटकाव पर विराम लग जाता है। पति-पत्नी का आपसी प्रेम एक अद्वितीय अनुभूति के रूप में उदित होता है और वह बिलकुल स्वाभाविक सा लगने लगता है, जिसे कवयित्री लिखती है- सब कुछ प्रकृति प्रदत्त हो गया। मन की इस अवस्था को पुनः चातक द्वारा स्वाति नक्षत्र का जल मिलने पर उसकी प्रफुल्लता के रूप में बिम्बित किया गया है। यहाँ ध्यातव्य है कि साहित्यिक मान्यता के अनुसार चातक केवल स्वाति नक्षत्र में बरसने वाला जल ही पीता है। यदि स्वाति नक्षत्र में वर्षा नहीं हुई, तो पूरे वर्ष वह प्यासा रह जाता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि स्वाति-जल का चातक के लिए क्या मूल्य है, शायद अमृत के समान। अर्थात प्रियतम की प्रेम भरी एक दृष्टि उसकी प्रियतमा के लिए अमृत के तुल्य होता है। स्वाति नक्षत्र को बहुत पावन नक्षत्र माना गया है, अतएव इससे प्रेम की पावनता भी अभिव्यंजित होती है। पुनः इस मानसिक अवस्था को कवयित्री ने जेठ माह की तप्त दोपहरी में सहसा होने वाली बरसात से आर्द्र और शीतल हुई पृथ्वी से तुलना की है, अर्थात प्रियतम की एक प्रेमभरी दृष्टि से मानसिक रूखापन और कुंठा-ग्रस्तता का पूर्णतया अभाव हो गया।

शेष आधी कविता में उपर्युक्त द्वन्द्व रहित मानसिक विश्राम की अवस्था में नायिका अपनी कामना को व्यक्त करती है कि उसका प्रियतम उसे सदा अपने हृदय के पास रखे और वह अपने प्रियतम की साँसों के साथ एक होकर बहे। हृदय हमारे भाव-प्रवाह का आश्रय होता है और साँस जीवन का, अर्थात दोनों की सोच एक हो, जीवन एक हो, उनमें द्वैत का अभाव हो जाए, एकत्व स्थापित हो। इसके बाद वह कामना करती है कि प्रयास करने पर भी अपने प्रियतम से अलग अपने अस्तित्व की अनुभूति उसे न हो। उसे न धन-वैभव चाहिए न स्वर्ग, न मोक्ष, बस प्रियतम के हृदय मे जगह चाहिए और चाहिए उसे मृत्यु के बाद उसका प्रियतम मुखाग्नि दे। यहाँ अप्रतिम प्रेम और उसमें समर्पण की पराकाष्ठा व्यंजित होती है, और व्यंजित होती है भारतीय नारियों की परम्परागत अंतिम इच्छा की पूर्णाहुति। इसी के साथ कविता का अंत होता है।

कविता में पुराने पारम्परिक बिम्ब प्रयोग किए गए हैं। इसलिए भाषा में ताजगी नहीं आ पाई है। कवयित्री ने इसमें छन्द और अन्त्यानुप्रास के अनुशासन को बनाए रखने का प्रयास किया है। पर हर पंक्ति में मात्राओं का अनुशासन एक जैसा नहीं हो पाया है। कविता में कुल सोलह पंक्तियाँ हैं, जिसमें नौ पंक्तियों में सोलह-सोलह मात्राएँ हैं (पंक्ति सं.2, 3, 4, 5, 8, 9, 11, 13 और 14), पाँच पंक्तियों में सत्रह-सत्रह मात्राएँ (पंक्ति सं. 1, 7, 10, 12 और 15), एक पंक्ति (छठवीं) में पन्द्रह मात्राएँ और अंतिम पंक्ति में चौदह मात्राएँ हैं। इनमें थोड़े से सुधार कर देने से ये कमियाँ दूर हो सकती हैं। आठवीं पंक्ति में च्युतसंस्कारत्व दोष अर्थात व्याकरण सम्बन्धी दोष आ गया है-

वसुधा ने बरसात पा लिया

कर्त्ता के साथ ने आने के कारण क्रिया कर्म के पुरुष, लिंग और वचन का अनुकरण करेगी (वैसे यहाँ कर्त्ता भी स्त्रीलिंग ही है) और यहाँ कर्म बरसात स्त्रीलिंग है। इस पंक्ति को यों कर दिया जाए- वसुधा ने बरसा को पाया- तो इस दोष से कविता मुक्त हो जाएगी तथा मात्राओं और अन्त्यानुप्रास का अनुशासन भी बना रहेगा। इसी प्रकार अंतिम दो पंक्तियों को यदि निम्नलिखित रूप से कर दिया जाए-

मिल जाए बस ठौर हृदय में

औ’ पाऊँ मुखाग्नि तेरे कर...

तो मात्राएँ ठीक हो जाएँगी, पर अंतिम पंक्ति में प्रांजलता का अभाव बना रहेगा। इसी प्रकार अन्य पंक्तियों में – प्रेम के स्थान पर मन, स्वाति के स्थान पर स्वाती, तपती के स्थान पर तप्त, संग के स्थान पर में और स्वयं के स्थान पर खुद कर देने से मात्राओं की समस्या का निदान हो जाएगा।

उपर्युक्त जो सुझाव दिए गए हैं, वे मेरे हैं। कवयित्री और पाठकों का उनसे सहमत होना आवश्यक नही है।

20 टिप्‍पणियां:

  1. यह कविता कैसे भूल सकता हूँ, बहुत ही सशक्त। यह पढ़कर कुछ लेखन बह चला था मुझसे भी।

    तेरी आँखों में अब अपने जग मुझको दिख जाते हैं,
    तेरे बिन सारे आकर्षण निष्प्रभ समय बिताते हैं ।
    तुम तब आयी, समझी जीवन और स्वयं को सिद्ध किया,
    विस्तृत नभ अब दीख रहा है, क्यों जीवन अवरुद्ध जिया ।
    प्रेम हृदय का तृप्त हो गया, वचन कर्म से व्यक्त हो गया,

    मन रखने को झूठ कहा था, किन्तु आज वह सत्य हो गया ।

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  2. बेहतरीन समीक्षा । बहुत कुछ सीखने को मिला।

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  3. उत्कृष्ट समीक्षा..आनन्द आ गया.

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  4. बहुत बढिया समी़क्षा। सुन्दर कविता के लिये रंजना जी को बधाई।

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  5. समीक्षा द्वारा काव्य लेखन की तकनीक से भी परिचय हो रहा है ..
    आभार !

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  6. वाह.... ! अद्भुत !! नीर-क्षीर विवेचन !!! अब मुझे समझ में आ रहा है कि रचनात्मक कुंठाओं को पिघलाने के लिए आंच की उष्मा कितनी आवश्यक है !!!! कवयित्री को धन्यवाद !!!!! आचार्य को नमन !!!!!!

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  7. सुन्दर समीक्षा!
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  8. हर बार की तरह प्रभावशाली और सटीक समीक्षा……………आभार्।

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  9. बहुत ही सुन्दर, उपयुक्त और निरपेक्ष व्याख्या की है आचार्य राय जी ने कविता की। समीक्षा से कविता के भावों को विस्तार मिला है। मन मयूर नृत्य को अभिनव अर्थ मिला है। अज्ञेय जी ने भी शब्दों को इसी प्रकार नए अर्थों से समृद्ध करने की बात उठाई थी। ऐसी गहन समीक्षाओं से निश्चय ही हिन्दी साहित्य सम्पन्न होगा। रचनाकार एवं समीक्षक, दोनों के प्रति आभार,

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  10. सशक्त कविता की अद्भुत समीक्षा..बेहतरीन .आभार आचार्य जी का.

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  11. कविता की बेहतरीन समीक्षा की गई है। आँच के माध्यम से यहाँ साहित्य के उत्कृष्ट स्वरूप से परिचय हो रहा है। ब्लाग जगत में यह स्तम्भ नवोदित रचनाकारों, विशेष रूप से कवियों/कवयित्रियों के लेखन में परिष्कार करने में बहुत सीमा तक समर्थ सिद्ध हुआ है। आशा है आँच अपनी तपिश को भविष्य में भी इसी प्रकार अक्षुण्ण रखने में सक्षम बनी रहेगी। शुभकामनाओं के साथ,

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  12. रंजना जी की रचनाओं का मैं नियमित पाठक हूँ.. गद्य हो या पद्य उनकी सभी रचनाएँ प्रभावित करती हैं... प्रस्तुत कविता को पढ़कर और बाद में आचार्य परश्रुराम राय जी की समीक्षा पढ़ कर कविता और अच्छी कविता के महत्व को समझने में सहायता मिली है.. राय जी ने कविता कर्म को धर्म का रूप दे दिया है.. राय जी को अच्छी समीक्षा और रंजना जी को उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई और शुभकामना !

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  13. आँच पर हमेशा की तरह आज भी एक उत्कृष्ट समीक्षा पढ़ने को मिली. आभा,

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  14. किसी भूखे भिक्षुक को राजभोग और राजप्रसाद मिल जाए ,तो उसकी मनोवस्था कैसी हो सकती है,अनुमानित कर पा रही हूँ....

    मैं तो क्या कहूँ...कुछ भी समझ नहीं पा रही....पूर्णतः निःशब्दता की स्थिति है...
    धन्य भाग मेरे...

    कोटि कोटि आभार...कोटि कोटि आभार...

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  15. कविता के व्याकरणिक ज्ञान से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ...

    मन में जब कभी भाव घनीभूत हो घुमड़ने लगते हैं तो उनसे एक प्रकार से मुक्ति पाने को उन्हें शब्दों में समेटने का प्रयास करती हूँ और इस काल में व्याकरण तो ध्यान में आ ही नहीं पाता....

    सच कहूँ तो इन्हें कविता कहने में बड़ा संकोच होता है...पर आप गुनी जनों ने इसे जैसे सराहा ...बस यही लगा की आचार्यवर यदि भविष्य में मार्गदर्शन दे दें तो संभव है कुछ वर्षों उपरांत कविता लिख पाऊं...

    आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ आचार्यवर जो आपने इस प्रकार मार्गदर्शन किया...भविष्य में भी कृपा बनाये रखें....

    मनोज भैया,जब कभी आंच पर आती थी ,मन में आता था कि अपने लिखे को भी इस पटल पर रखूं...पर जब पलटकर अपनी रचनाओं को देखती थी और सोचती थी कि किसे आपलोगों को भेजूं तो इस योग्य कोई नहीं लगता था.....लेकिन आपने स्वयं ही पोस्ट लेकर उसकी इतनी सुन्दर सार्थक समीक्षा की...कि अब क्या कहूँ...

    आभार...आभार...आभार...

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  16. एक क्रांतिकारी रचना पर आचार्य जी द्वारा जिस प्रकार की वैज्ञानिक व्याख्या की गई है, वह प्रश्न्सनीय है!! आँच वैसे भी उत्कृष्ट समीक्षा का मंच है. रंजना जी को बधाई और आचार्य जी को नमन!!

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  17. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें.

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  18. सभी पाठकों को उत्साह-वर्द्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

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  19. bahut acchi samiksha
    yaha se bahut kuch sikhne ko mill raha he
    aapka aabhar......

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