गुरुवार, 10 मार्च 2011

आंच – 59 : खुशबू बसंत की

-- करण समस्तीपुरी

"शायरी तो खुशबुओं के बांटने का नाम है !
फूल सब मुरझा गए अब शायरी कैसे करूँ ??"

सोचा शायरी नहीं तो शायरी की चर्चा ही कर लें। फिर गुरुवर से आज्ञा लेकर गुरूवार की आंच सुलगा दिया। अब फागुन का महीना, प्रकृति का गदराया यौवन, बसंती बयार, होली का त्यौहार.... ऐसे में आंच भला कैसे बचा रहता ? सो आज आंच पर भी है खुशबू बसंत की। एक तो खुशबू और वो भी बसंत की... उसको आंच पर चढ़ाना...... मुझे ये हिमाकत का मौक़ा दिया है बाबू कुंवर कुसुमेशजी ने।

ग़ज़ल के कायिक विवेचन पर आंच के 52वें अंक में संक्षिप्त चर्चा[kunwar.jpg] हो चुकी है। कुसुमेशजी ग़ज़ल के सिद्धहस्त कलाकार हैं। जनाब की ग़ज़लों में रूमानियत फूट कर बोलती है। अलफ़ाज़ में मासूमियत ऐसी कि पहली नजर में कोई भी कायल हो जाए। लेकिन जनाब ग़ज़ल की तकनीकी बारीकियों से खूब खेलते हैं। मौजूदा ग़ज़ल को ही लीजिये, देखने में ग़ज़ल का मध्यम बहर बहुत ही आसान लगता है। लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा कि यह किसी एक परिभाषित बहर में नहीं है। कुसुमेशजी ने एकाधिक बहर को मिला कर इस ग़ज़ल को स्केल किया है, 'मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन'। चारों तरफ से आएगी खुशबू बसंत की! इसे 'बहरे मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़' कहते हैं।

ग़ज़ल शुरू से अंत तक उपर्युक्त बहर के अनुशासन में बंधी हुई है। एक शे'र है, "अच्छा है दोस्तों के तसव्वर में डूबना ! यादों में सिमट जायेगी खुशबू बसंत की !!" इसमें मुझे कुछ कसक लग रही है। इस से पहले दूसरे शे'र के मिसरा-ए-उला में 'ज़रा' को पहले और 'संभल' को बाद में कर देने से रवानगी बढ़ रही है, "रंगीनिये-हयात की खुशबू ज़रा संभल !"

ग़ज़ल का रदीफ़ 'खुशबू बसंत की' बहुत ही खूबसूरती से हरेक शे'र के साथ तारतम्य बिठा रहा है। हर शे'र में एक नए ख्यालात से जुड़कर 'खुशबू बसंत की' चमत्कारिक प्रभाव छोड़ रही है। काफिया 'आयेगी' सानी में अपने धर्म का बखूबी निर्वाह कर रहा है।

शिल्प के बाद अब भाव पक्ष पर। ग़ज़ल का रदीफ़ प्राकृतिक उपादान ’खुशबू बसंत की’ प्रतीक है अच्छे दिनों का, खुशियों का, सफ़लता का। ग़ज़लकार का दृष्टिकोण निहायत ही आशावादी है। दौरे हाज़िर की इतनी दुश्वारियों के बावजूद कवि को भरोसा है कि “चारों तरफ़ से आयेगी खुशबू बसंत की”। मुश्किलों की रात जितनी भी लम्बी हो, ढलेगी तो जरूर। बादे-सबा (सुबह की हवा) लायेगी खुशबू बसंत की। “जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर”। मुश्किलों की रात को चीर कर खुशियों का प्रभात आयेगा। आशा वह जिससे आपको कठिन समय में संघर्ष की शक्ति मिलती है।

हमें सफ़लता और सम्पन्नता पर इतराना नहीं चाहिये। क्योंकि कोई भी खुशी, कोई भी सफ़लता आखिरी नहीं होती। ग़ज़लकार सम्पन्नता में संयम की शिफ़ारिश कर रहा है। “रंगिनिये-हयात की खुशबू संभल जरा, तुझको भी आजमायेगी खुशबू बसंत की !” संयम और शील की परीक्षा सम्पन्नता में ही होती है। यहाँ 'रंगीनिये-हयात की महफ़िल' कर के खुशबू शब्द की आवृति से बचा जा सकता था।

अगले शे’र में शायर कहता है कि भौतिक सुख तो आनी-जानी है किन्तु प्रियजनों का साथ छूट जाये तो वह अपूरणीय होता है। अपनों की कमी को कोई भी खुशी नही भर सकती। “जिसका चला गया कहीं महबूब छोड़कर, उसको न रास आयेगी खुशबू बसंत की !”

“अच्छा है दोस्तों के तसव्वर में डूबना...”। अतीत की स्मृति हमेशा सुखद होती है लेकिन यहां शायर दोस्तों के ख्याल में ही डूबने को कह रहा है। ’सोचिये वही जो सोचन जोगू।’ हमें अच्छाइयों का ही चिंतन करना चाहिये। क्या पता दुश्मनों को, दुर्दिनों को याद करने से मन कसैला हो जाये.... ? सतचिंतन से आनंद ही आयेगा। यादों में सिमट जायेगी खुशबू बसंत की।

कवि आगे बसंत की खुशबू के रिटेंशन का फ़ार्मुला भी बता रहे हैं। “राहे-वफ़ा में प्यार-मुहब्बत के तर्ज़ पर, रह-रह के गुनगुनायेगी खुशबू बसंत की !” इस शे'र को मैं 'बैत-उल-ग़ज़ल' (ग़ज़ल का सबसे अच्छा शे'र ) कहना चाहूँगा। अगर चाहते हैं कि खुशियों की दस्तक बीती बात न हो जाये, तो जिंदगी को दीजिये, इमानो-वफ़ा की राह और प्रेम-सद्भाव की धुन।

जीवन में आशाओं का शेष होना ही मृत्यु है। शायर हमेशा बेहतर कल की उम्मीद करता है। वह किसी भी खुशी को आखिरी नहीं मानता है। वह भविष्य के प्रति आशावान है, “गुजरे हुए बरस से अधिक इस बरस ’कुँवर’, खुशियाँ लुटा के जायेगी खुशबू बसंत की !”

कुँवरजी ने बहुत ही आमफ़हम भाषा में इस खूबसूरत ग़ज़ल की रचना की है। “बादे-सबा” (सुबह की हवा) को छोड़ कर एक भी शब्द ऐसा नहीं है, जिसका बोल-चाल की भाषा में उपयोग न होता हो। यह इस ग़ज़ल की सबसे बड़ी खासियत है। इसके शाब्दिक अर्थ भी दिल को गुदगुदाने सक्षम हैं वहीं अशआर में इन्होने फ़िक्र की ऐसी गहराई भरी है कि डूब कर ही पार आ सकते हैं। यह ग़ज़ल ’मास’ और ’क्लास’ दोनों के लिए “खुशबू बसंत की” है।

22 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी ठेठ साहित्य में जो स्थान पत्रिका "आलोचना" को मिली है वही स्थान हिंदी ब्लॉग्गिंग में "आंच" को मिलनी चाहिए... उत्कृष्ट रचना का चयन और फिर उसकी साहित्य के पैरामीटरों पर विवेचना... साहित्य मूल्याङ्कन की नई दिशा तय कर रहा है आंच.. आज की ग़ज़ल "खुशबू' बसंत को जब कोई एक माह पहले पढ़ा था तभी लगा था कि यह आंच पर जरुर आएगी... करन को हम देसिल बयना के लेखक के रूप में जानते हैं लेकिन हिंदी साहित्य को जो उन्होंने अध्यनन किया है उसे इस उत्कृष्ट विवेचना में उतार दिया है.. आंच के लौ पर वसंत की खुशबू और भी फ़ैल रही है...

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  2. आंच के इस अंक के प्रथम पाठक भाई अरुणजी को नमस्कार एवं हार्दिक धन्यवाद। मैं आप लोगों के सानिध्य में अभी साहित्य का ककहरा ही सीख रहा हूँ। फिर भी आप हमेशा अग्रज की तरह हौसला-अफ़जाई करते हैं। मैं आपका आभारी हूँ।

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  3. बहुत सुंदर बिवेचना की है कारन जी आपने. कुशुमेश जी तो सिद्धहस्त लेखक है. उनकी रचनाओं कि वेवेचना ऐसे भी दुरूह कार्य है. बहुत अच्छी लगी वासंती बयार. लेखक और आलोचक दोनों को अनेकानेक बधाईयाँ.

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  4. वाह!
    करण भाई वाह!!

    क्या समेटा है, यह ‘मास’ और ‘क्लास’ दोनों के लिए है यह ग़ज़ल!

    मैंने आपको पहले भी कहा था कि कुंवर जी ब्लॉग जगत में ग़ज़लों के बादशाह हैं। उनकी ग़ज़ले मुझे बेहद प्रिय हैं।

    ‘आंच’ आज गर्वान्वित है उनकी ग़ज़ल को पाकर।

    ... और आपकी समीक्षा ... इसी का तो मैं कायल हूं कि इसके बहाने बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

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  5. कुँवर कुसुमेश जी की गजलों का मैं कायल हूँ। वो बात अलग है कि नेट के सम्पर्क में अधिक न रहने के कारण कमेन्ट नहीं कर पाता। लेकिन कोशिश रहती है कि अच्छी रचनाओं को अधिक से अधिक पढ़ सकूँ। उनकी गजलों का प्रवाह, जिसे इस विधा में रवानगी कहते हैं, यदा कदा स्थानों को छोड़कर पानी की तरह बहता है। वैसे इस गजल में भी 'जरा संभल' में शब्द क्रम परिवर्तन हेतु करण जी से सहमत हूँ। शायद कुँवर जी भी सहमत हों। गजल पढ़ने के अलावा इसमें अधिक दखल नहीं रहा। ब्लाग पर करण जी से ही अधिक बारीकियाँ सीखी हैं सो समीक्षा पर अभी टिप्पणी करना उपयुक्त नहीं होगा।

    करण जी एवं कुशुमेश जी बधाई।

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  6. "आंच" पर आपने मेरी ग़ज़ल "खुशबू बसंत की" को स्थान दिया. आभारी हूँ कुशल समीक्षक,करण जी का और मेरी ग़ज़ल को आंच पर रखने के लिए मनोज जी आपका भी.

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  7. very healthy post. it also shows the healthy relation between kunwar jee and manoj jee ..

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  8. गज़ल के बारे में अधिक जानकारी न होते हुए भी आपकी समीक्षा को समझने का प्रयास किया है ...और यह गज़ल तो वैसे ही बहुत खूबसूरत है ...

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  9. पढ़कर जिनके गीत ग़ज़ल,रहें न मन में क्लेश !
    कुंदन भी धुंधला लगे ,चमकें जब ' कुसुमेश' !

    करन जी,
    आपकी सूक्ष्म समीक्षा की पैनी नज़र की तारीफ़ करनी पड़ेगी ! ग़ज़ल के हर मिसरे को हर आयाम से आपने टटोला और तोला है !
    कुसुमेश जी मेरी पसंद के शायर हैं और एक अच्छे दिल के इंसान भी !
    उनकी ग़ज़ल की इतनी सटीक और संतुलित समीक्षा पढ़कर बहुत अच्छा लगा !
    आपके साथ साथ मनोज जी और कुसुमेश जी का भी आभार जिनके कारण आज की पोस्ट पढ़ने को उपलब्ध हुई

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  10. गत माह कुँवर कुसुमेश जी की गजल "खुशबू बसंत की" को पढ़कर ही मौसम वासंती हो गया था.लेकिन करण जी की समीक्षा ने उसमें सितारे जड़ दिए हैं. गजलकार और समीक्षाकार-दो-दो फनकारों ने मिलकर गजल को जो ऊँचाई दी है, वह बेजोड़ है.बेहतरीन गजल की बेहतरीन समीक्षा के लिए करण जी को ढेरों बधाइयाँ.

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  11. आपकी स्नेहिल टिप्पणी के लिए मैं आपसब का हृदय से आभारी हूँ. मैं प्रोफेशनल समीक्षक नहीं हूँ. बस हर तरह का साहित्य पढने का शौक है और उसपर यदा कदा अपने विचार भी व्यक्त कर देता हूँ. कृपया इस आलेख को भी इसी श्रेणी में रखा जाय. यहाँ मैं कुछ नामो का उल्लेख करना चाहूँगा, श्री मनोज कुमार -- आपने मुझे यह उन्मुक्त मंच दिया है. आचार्य परशुराम रायजी -- आपने आंच सुलगाने के लिए प्रोत्साहित किया. श्री हरीश प्रकाश गुप्तजी -- आपसे आंच की लौ को बढाने-घटाने की कला सीख रहा हूँ. श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञजी -- भले ही अनौपचारिक मगर यह आपका ही सानिध्य है कि ग़ज़ल की थोड़ी-बहुत बादिकियों से रु-ब-रु हुआ. और लास्ट बट नाट द लीस्ट... श्री कुँवर कुसुमेशजी - आपकी ग़ज़ल के कारण बहुत सारी भूली-बिसरी बातें याद आयी और किसी तरह से आपका व्यक्तिगत स्नेह भी मिला. अब बस एक ही आरजू है कि आपका शिष्यत्व मिल जाए.

    एक बार फिर मैं आंच के तमाम पाठकों को हृदय से धन्यवाद देता हूँ.

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  12. कुसुमेश जी की कवितायें बहुत अच्छी होती हैं । इस बेहतरीन समीक्षा के लिए समीक्षक तथा रचयिता , दोनों को बधाई ।

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  13. वाह गज़ल के बारे मे भी समीक्षा बहुत अच्छी लगी……………कुसुमेश जी की गज़लें सच मे दिल को छू जाती हैं।

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  14. कुंवर कुसुमेश जी की ग़ज़ल ‘ख़ुशबू बसंत की‘ की बहुत सुंदर विवेचना और समीक्षा की गई है।
    कुसुमेश जी और करण जी को बधाई।

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  15. आदरणीय कुसुमेश जी की गज़लें , ग़ज़ल के मानकों पर खरी उतरती हैं तो आपकी समीक्षा , समीक्षा के मानकों पर ...आज तो बहुत कुछ सीखने को मिला ....काफी हद तक अरुण जी का कहना सही है

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  16. कुशुमेश जी की सुन्दर ग़ज़ल की 'आंच' पर परख बहुत अच्छी लगी | छंदशास्त्र के आधार पर रचनाओं का विश्लेषण साहित्य को और अधिक समृद्ध करता है |

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  17. कुंवर कुसुमेश जी एक स्थापित ग़ज़लकार हें.... उनकी ग़ज़ल....
    “रंगिनिये-हयात की खुशबू संभल जरा, तुझको भी आजमायेगी खुशबू बसंत की !”... की सुंदर विवेचना पढ़ कर आनन्द आ गया।

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  18. ग़ज़ल का असली आनन्द इस समीक्षा के बाद उसे दुबारा पढ़ने से मिला।

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  19. सुखद सरप्राइज....बहुत ही सुखद....

    करण लाजवाब अंदाज में देसी बयना लिखते हैं,अद्वितीय कविता लिखते हैं...इतना तक तो पता चल गया था..पर यही भी....

    बस ...वाह वाह वाह...

    सच कहूँ .. बहुत ही शर्मिन्दगी महसूस कर रही हूँ कि कैसे मैंने आपकी लिखी कविता पर इतने सारे सुझाव ठोंक डाले थे और कितनी विनयशीलता से आपने जवाब दिया था...फल से भरे वृक्ष ऐसे ही नत रहा करते हैं...आपके गुण ने अभिभूत कर दिया...

    कुंवर जी बहुत ही सुन्दर लिखते हैं...इनका लिखा पढना अपने आप में एक ट्रीट हुआ करता है...

    इन्हें आभार इस सुन्दर रचना के लिए...और आपको आभार इस लाजवाब समीक्षा के लिए...

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  20. होली की अपार शुभ कामनाएं...बहुत ही सुन्दर ब्लॉग है आपका....मनभावन रंगों से सजा...

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