शुक्रवार, 25 मार्च 2011

शिवस्वरोदय-36

शिवस्वरोदय-36

-आचार्य परशुराम राय

पार्थिवे मूलविज्ञानं शुभं कार्यं जले तथा।

आग्नेयं धातुविज्ञानं व्योम्नि शून्यं विनिर्दिशेत्।।187।।

अन्वय – श्लोक लगभग अन्वित क्रम में है। अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ – पृथ्वी तत्त्व के प्रवाह काल में दुनियादारी के कामों में पूरी सफलता मिलती है, जल तत्त्व का प्रवाह काल शुभ कार्यों में सफलता देता है, अग्नि तत्त्व धातु सम्बन्धी कार्यों के लिए उत्तम है और आकाश तत्त्व चिन्ता आदि परेशानियों से मुक्त करता है।

English Translation – Success in worldly affairs is achieved during the flow of Prithivi Tattva in the breath, During Jala Tattva flow we succeed in auspicious work, Agni Tattva is suitable for the work relating to metal and Akash Tattva gives freedom from psychic troubles.

तुष्टिपुष्टि रतिःक्रीडा जयहर्षौ धराजले।

तेजो वायुश्च सुप्ताक्षो ज्वरकम्पः प्रवासिनः।।188।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – अतएव जब पृथ्वी और जल तत्त्व के प्रवाह काल में किसी प्रवासी के विषय में प्रश्न पूछा जाय तो समझना चाहिए कि वह कुशल से है, स्वस्थ और खुश है। पर यदि प्रश्न के समय अग्नि तत्त्व और वायु तत्त्व प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि जिसके विषय में प्रश्न पूछा गया है उसे शारीरिक और मानसिक कष्ट है।

English Translation – Therefore, any question about a person away from the place is asked during the flow of Prithivi Tattva Jala Tattva, it should be understood that he is alright, healthy and happy. But if the question comes during the flow of Agni Tattva and Vayu Tattva, it indicates that the person about whom query has been made, is suffering from physical and mental troubles.

गतायुर्मृत्युराकाशे तत्त्वस्थाने प्रकीर्तितः।

द्वादशैताः प्रयत्नेन ज्ञातव्या देशिकै सदा।।189।।

अन्वय – आकाशे तत्त्वस्थाने गतायुः मृत्युश्(च) प्रकीर्तितः। (अनेन) देशिकैः एताः द्वादशाः (प्रश्नाः) प्रयत्नेन सदा ज्ञातव्याः।

भावार्थ – यदि प्रश्न काल में आकाश तत्त्व प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि जिसके विषय में प्रश्न पूछा गया वह अपने जीवन के अंतिम क्षण गिन रहा है। इस प्रकार तत्त्व-ज्ञाता इन बारह प्रश्नों के उत्तर जान लेता है।

English Translation – In case, query is made about a person during the flow of Akash Tattva, we should understand that he is counting last days of his life. In this way a wise person competent in the knowledge of Tattvas, answers above twelve questions easily.

पूर्वायां पश्चिमे याम्ये उत्तरस्यां तथाक्रमम्।

पृथीव्यादीनि भूतानि बलिष्ठानि विनिर्विशेत्।।190।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में पृथ्वी आदि तत्त्व अपने क्रम के अनुसार प्रबल होते हैं, ऐसा तत्त्वविदों का मानना है। श्लोक संख्या 175 में तत्त्वों की दिशओं का विवरण देखा जा सकता है।

English Translation – Tattvas according to their order in breath become powerful in their directions, i.e. east, west, north and south according to wise and competent persons. Directions of Tattvas have been given in the verse No. 175 of Shivaswarodaya.

पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च।

पञ्चभूतात्मको देहो ज्ञातव्यश्च वरानने।।191।।

अन्वय – हे वरानने, पृथिवी आपः तथा तेजो वायुः आकाशञ्च पञ्चभूतात्मकः देहः ज्ञातव्यः।

भावार्थ – हे वरानने, यह देह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँचों तत्त्वों से मिलकर बना है, ऐसा समझना चाहिए।

English Translation – Lord Shiva addresses to his consort, O Beautiful Goddess, This body is made of five tattvas, i.e. earth, water, fire, air and ether and nothing else. This fact we must realize.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जी!
    इस गूढ़ विषय को जितनी सहजता से आपने समझाया है, वह प्रशंसनीय है... बिलकुल नया विषय...

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  2. बहुत सरल शब्दों में इतना गंभीर विषय समझाने के लिये आभार..

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  3. शिवस्वरोदय अमूल्य ज्ञान का भण्डार है,इसे जन जन तक पहुंचाने के लिए आपका आभार !

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  4. गंभीर विषय को सहज शब्दों में वर्णित करने का आभार.

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  5. ज्ञान तो कोई भी अमूल्य ही होता है किन्तु यह तो विरलतम है. आने वाली नेट एंड स्पेस जेनेरेशन भी आचार्य जी के अवदानों को याद करेगी. आभार !

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  6. हे वरानने, यह देह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँचों तत्त्वों से मिलकर बना है, ऐसा समझना चाहिए...

    यही सच है...

    सभी श्लोकों के बहुत सहज अर्थ प्रस्तुत करने के लिए आभार.

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  7. इस ज्ञानवर्धक शृंखला को हम तक पहुंचाने के लिए आभार।
    सलिल भाई की बातों से सहमत।

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