सोमवार, 7 मार्च 2011

आज फिर मन उदास

कविकुल कोकिल विद्यापतिजी ने गाया, 'आओल ऋतुपति राज बसंत.... !' लेकिन दूसरे ही पद में लिख डाला, 'चानन भेल बिषम सर रे.... भूषन भेल भारी!' परम शीतल चन्दन विषम सर और आभूषण भार कब और क्यों लगने लगते हैं...? फागुन आते ही हर मन में भर जाता है प्रकृति का हुलास... बसंती बयार जहां आनंददायक खुमार लता है वहीं कोयल की कूक कभी-कभी हिये में हूक भी मचाने लगती है। ऋतुराज के आगमन की कुछ मिश्रित अनुभूति है आपकी सेवा में ! -- करण समस्तीपुरी


आज फिर मन उदास

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आज फिर मन उदास !
आँख में अतीत, हृदय में प्यास !
आज फिर मन उदास !!
आज फिर मन उदास !!

pond

दिवाली के दीये, होली के रंग !
बचपन के साथी, गंवई हुरदंग !!
वही लुका-छुपी, झगड़ा-लड़ाई !
पोखर से सटकर पसरी अमराई !!
बहुरेंगे दिन, लगी हुई आस !
आज फिर मन उदास !!

mango tree

महुआ का मद फैला, बौराए आम !
अंगड़ाई धरती की नयनाभिराम !!
कोयल-पपीहा गायें धमार !
भौरों का गुंजन, बसंती बयार !!
विरहिन का बैरी कैसा मधुमास !
आज फिर मन उदास !!
आज फिर मन उदास !!
*******

33 टिप्‍पणियां:

  1. वसन्त के परिप्रेक्ष्य में विरही मन की अभिव्यक्ति से परिपूरित रचना काफी आकर्षक लगी, करण जी। आभार।
    कुछ टंकणगत त्रुटियाँ रह गयी हैं। उन्हें ठीक कर दें तो अच्छा रहेगा।

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  2. भौरों का गुंजन, बसंती बयार !!

    विरहिन का बैरी कैसा मधुमास !

    आज फिर मन उदास !!
    --

    बहुत सुन्दर!
    एक-एक शब्द सच्चाई प्रकट कर रहा है!

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  3. प्रथम पाठक आचार्य रायजी को नमन। डा.शास्त्री जी का आभार।

    @ आचर्यजी,
    त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने के लिये धन्यवाद। वो टंकनगत नहीं बल्कि तकनिकी त्रुटियां थी। दूर करने का प्रयास किया है ! धन्यवाद !!!

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  4. भौरों का गुंजन, बसंती बयार !!
    विरहिन का बैरी कैसा मधुमास !
    आज फिर मन उदास !!
    आज फिर मन उदास !!

    बसंती बयार कुछ ऐसे ही बहती और ऐसे ही भ्रमर गुंजन कविता के माध्यम से चलता रहे. सुंदर रचना के लिए करन जी को बधाई.

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  5. एक पुराना गीत याद आ गयाः
    ये किस रुत में तुम आए हमारे आँगन में!
    किंतु मधुमास में विरह की चर्चा क्यों!

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  6. मन तो आनन्द के गीत गुनने का था। इस वसंत में मन की उदासी छट जानी चाहिए भई करण जी।

    बात गीत के तकनीकी पक्ष की नहीं है। गीत बहुत ही आकर्षक है। आभार,

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  7. दिवाली के दीये, होली के रंग !
    बचपन के साथी, गंवई हुरदंग !!
    वही लुका-छुपी, झगड़ा-लड़ाई !
    पोखर से सटकर पसरी अमराई !!
    बहुरेंगे दिन, लगी हुई आस !
    आज फिर मन उदास !!
    करन जी,
    मन की व्यथा उड़ेल कर रख दी !
    "पोखर से सटकर पसरी अमराई" का जवाब नहीं !

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  8. लगता है बसंत बहार में अपनो से दूर हैं ...इसीलिए मन उदास है ...मन के भावों को बखूबी सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है ...सुन्दर रचना

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  9. अशुद्धियों को ठीक कर देने से अब अच्छा लग रहा है और मल्हार का धमार कर देने से विसंगति भी अब दूर हो गयी है। अनुरोध को सम्मान देने के लिए हार्दक आभार।

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  10. करन जी शनिवार को खट्टर पुराण पढ़ तो लिया था... जो आनंद मैथिलि में आया था पढ़ कर उतना ही आनंद हिंदी में भी आया.. और आज वसंत पर इतनी प्रिय कविता.... आपके रचनात्मक विविधता को देख अचंभित हूँ... प्रसाद, निराला, पन्त, केदारनाथ के कविता सरीखा लग रही है यह कविता... बहुत बढ़िया प्रकृति और प्रेम गीत..

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  11. उदासी से भरा...मर्मस्पर्शी सुन्दर गीत...

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  12. कविता और उनके अनुकूल सभी चित्र ,सभी बढ़िया हैं.करण जी को बधाई.

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  13. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  14. मन को उदास करने के लिए यह अवसर ... हां, कुछ लोग स्वादिष्ट खाने के साथ मिर्च भी कचरते रहते हैं।
    कविता उत्कृष्ट लगी।
    आंच पर चढेगी!

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  15. अजी कही आंख मटका तो नही हो गया.... वेसे भी इस उम्र मे मन तभी उदास होता हे, जब बीबी मायके गई हो या फ़िर कही आंख मटका हो जाये:)
    बहुत सुंदर रचना, चित्र मे तो बहुत ही उदास लगा चेहरा

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  16. Priya bandhu,bahut hi manohari ,bhav poorna rachna ,sukhad shabd sanchalan,gahan anubhootiyan,swagat bhi,abhar bhi.
    aapka bhai
    dr.bhoopendra
    mp

    rewa mp

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  17. प्रकृति की सुख-सुषमा के बीच मानव-मन में अभाव की चुभन- कंट्रास्ट दोनों को और मुखर,और तीव्र कर गया ऍ

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  18. दिवाली के दीये, होली के रंग !
    बचपन के साथी, गंवई हुरदंग !!
    वही लुका-छुपी, झगड़ा-लड़ाई !
    पोखर से सटकर पसरी अमराई !!

    वाह क्या बात है, कितना ख़ूबसूरत वर्णन है मन के कोने में सदा छिपी रहने वाली बचपन की यादों का. जीवन के किसी भी पड़ाव पर हों या दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ लेकिन बचपन के साथी, वो परिवेश वो खट्टी मीठी यादें उनकी अपनी अलग ही जगह है, सदा ही उमड़-घुमड़ छलछलाती रहती है और शायद जीने का संबल भी वही बनती हैं. मन को भली सी लगने वाली सुन्दर रचना !

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  19. मैं सभी पाठकों का हृदय से आभारी हूँ। आपका प्रोत्साहन ही हमारी रचनात्मक ऊर्जा का इंधन है। आशा है भविष्य में भी आपका स्नेह यथावत रहेगा। एक बार पुन: कोटि-कोटि धन्यवाद।

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  20. वसंत पर छोटा सा पर बहुत सुन्दर गीत पढ़ने को मिला। बिम्ब यद्यपि पारम्परिक रहे हैं लेकिन गीत के भाव हृदय में उतरते हैं। आभार,

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  21. वसंत है ही ऐसा। वसंत में जब प्रकृति चारो ओर अठखेलियां करती है तब मन के भाव हिलोरें लेने लगते हैं। आसक्ति बढती है तो स्मृति में जाकर विरह की वेदना भी आसन जमा लेती है। विरही मन के ऐसे ही भावों को बहुत सुन्दरता से अभिव्यक्त करता गीत मनभावन लगा।

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  22. वसंत पर बहुत सुन्दर गीत पढ़ने को मिला। एक-एक शब्द सच्चाई प्रकट कर रहा है धन्यवाद|

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  23. शुक्रिया...शुक्रिया...शुक्रिया मेरी मुगालत तोड़ने का...काफी अच्छी रचना...

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  24. बेहद सशक्त चित्रण किया है उदासी का …………मौसम का साथ है फिर भी मन उदास है………प्रिय के संग न होने पर्…………बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  25. दिवाली के दीये, होली के रंग !
    बचपन के साथी, गंवई हुरदंग !!
    वही लुका-छुपी, झगड़ा-लड़ाई !
    पोखर से सटकर पसरी अमराई !!
    बहुरेंगे दिन, लगी हुई आस !
    आज फिर मन उदास ...


    बहुत खूब ... अतीत के कुछ ऐसे लम्हों को याद कर के सच में मन उदास हो जाता है .... यही तो जीवन है....

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  26. बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना..

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  27. uuuuuuuuuuuuhhhhm.....karan ji maja nahi aaya is padh kar...
    arey bhai apke chehre se ye udasi match nahi kar rahi na kisi bhi angle se. pls. change. (ha.ha.ha.)

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  28. Karan ji Man to kabi kabi udas ho jata hai par aap is tarah udas mat hoiye..ap haste hue hasate hue zada ache lagte hai..waise bahot he achi kavita likhi hai apne mera man to kavita padhkar khus ho gaya.

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