शुक्रवार, 11 मार्च 2011

शिवस्वरोदय-34

शिवस्वरोदय-34

आचार्य परशुराम राय

पृथ्वीजले शुभे तत्त्वतेजो मिश्रफलोदयम्।

हानिमृत्युकरौ पुंसामशुभौ व्योममारुतौ।।174।।

अन्वय - पृथ्वीजले शुभे तत्त्वतेजो मिश्रफलोदयं पुंसां व्योममारुतौ हानिमृत्युकरौ अशुभौ (च)।

भावार्थ – पृथ्वी तत्त्व और जल तत्त्व कार्य आरम्भ करने के लिए शुभ होते हैं, अर्थात उनके परिणाम अच्छे होते हैं। अग्नि तत्त्व के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए गए कार्य का परिणाम मिला-जुला होता है। जबकि वायु तत्त्व और आकाश तत्त्व के प्रवाह काल में कार्य के आरम्भ के परिणाम हानि और सर्वनाश से भरे बताए गए हैं।

English Translation – Any work started during the flow of Prithvi Tattva and Jala Tattva in the breath, gives good results and when the same is started during the flow of Agni Tattva, it gives mixed results. But start of work during the flow of Vayu and Akash Tattvas gives harmful and miserable results.

आपूर्वपश्चिमे पृथ्वीतेजश्च दक्षिणे तथा।

वायुश्चोत्तरदिग्ज्ञेयो मध्ये कोणगतं नभः।।175।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – इस श्लोक में तत्त्वों की दिशाओं के संकेत किए गए हैं। पृथ्वी तत्त्व पूर्व और पश्चिम दिशा में, अग्नि तत्त्व दक्षिण में, वायु तत्त्व उत्तर में और आकाश तत्त्व मध्य में कोणगत होता है।

English Translation – Here in this verse, relations of Tattvas to the directions have been indicated, i.e. Prithvi Tattva is related to the east and west, Agni Tattva to the south, Vayu Tattva to the north and Akasha Tattva to the meeting points of the directions.

चन्द्रे पृथ्वीजलैयातांसूर्येSग्निर्वा यदा भवेत्।

तदा सिद्धिर्न सन्देहः सौम्यासौम्येषु कर्मसु।।176।।

अन्वय - चन्द्रे पृथ्वीजले याते सूर्येSग्निर्वा यदा भवेत् सौम्यासौम्येषु कर्मसु तदा सिद्धिः, न (अत्र) सन्देहः।

भावार्थ – जब चन्द्र स्वर में पृथ्वी अथवा जल तत्त्व अथवा सूर्य स्वर में अग्नि तत्त्व के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए गए सभी प्रकार के कार्यों में सिद्धि मिलती है, इसमें कोई सन्देह नहीं, अर्थात् इस अवधि में प्रारम्भ किए गए शुभ, अशुभ, स्थायी या अस्थायी सभी कार्य सफल होते हैं।

English Translation - When Prithvi Tattva or Jala Tattva appears in the left nostril or flow of Agni Tattva in the right nostril, it is good to start any kind of work auspicious, inauspicious, permanent or temporary, as it always gives good results beyond doubts.

लाभः पृथ्वीकृतोSह्नि स्यान्निशायां लाभकृज्जलम्।

वह्नौ मृत्युः क्षयो वायुर्नभस्थानं दहेत्क्वचित्।।177।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – जब दिन में पृथ्वी तत्त्व और रात मे जल तत्त्व प्रवाहित हो तो निश्चित रूप से लाभ होता है। अग्नि तत्त्व का प्रवाह काल किसी कार्य के लिए मृत्युकारक कहा गया है और वायु तत्त्व का प्रवाह काल सर्वनाश का कारक। आकाश तत्त्व का प्रवाह काल कोई परिणाम नहीं देता।

English Translation – Flow of Prithvi Tattva during the day and Jala Tattva during the night is always auspicious and beneficial. Flow of Agni Tattva is stated to be death causing and Vayu Tattva gives miseries. Akash Tattva is always without any result.

जीवितव्ये जये लाभे कृष्यां च धनकर्मणि।

मन्त्रार्थे युद्धप्रश्ने च गमनागमने तथा।।178।।

अन्वय – दोनों श्लोक अन्वित क्रम में हैं, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ - समझने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए यहाँ दोनों श्लोकों को एक साथ लिया जा रहा है।

जीवन, जय, लाभ, खेती, मंत्र, युद्ध एवं यात्रा के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे जाने पर उस समय प्रवाहित होने वाले तत्त्व को समझना चाहिए और तदनुरूप उत्तर देना चाहिए। जल तत्त्व के समय शत्रु का आने की संभावना होती है। पृथ्वी तत्त्व का काल शुभ होता है, अर्थात शत्रु पर विजय का संकेतक है। वायु तत्त्व के प्रवाह काल को शत्रु का पलायन समझना चाहिए। लेकिन वायु तत्त्व और आकाश तत्त्व के समय हानि तथा मृत्यु की अधिक संभावना रहती है।

English Translation – Here both the verses have been taken together for better comprehension.

In case questions pertaining to life, victory, farming, mantra, war and journey are asked, we must be aware of presence of the Tattva in the breath at the time before giving answers. Presence of Jala Tattva indicates arrival of the enemy, Prithivi Tattva indicates auspiciousness or victory over enemy or opposite party and Vayu Tattva indicates running away by enemies. But presence of Agni and Akasha Tattvas always indicate loss and death.

पृथीव्यां मूलचिन्ता स्याज्जीवनस्य जलवातयोः।

तेजसा धातुचिन्ता स्याच्छून्याकाशतो वदेत्।।180।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – इस श्लोक में मन में उदित होने वाले विचारों के द्वारा तत्त्वों को पहचानने की विधि का संकेत किया गया है। जब मन में भौतिकता से संबंधित विचार उठ रहे हों, तो समझना चाहिए कि उस समय पृथ्वी तत्त्व प्रवाहित हो रहा है, अर्थात स्वर में पृथ्वी तत्त्व की प्रधानता है। जब खुद के विषय में विचार उठें, तो जल तत्त्व अथवा वायु तत्त्व की प्रधानता समझनी चाहिए। अग्नि तत्त्व की प्रधानता होने पर मन में धातुजनित धन सम्बन्धी विचार उठते हैं। पर आकाश तत्त्व की प्रधानता के समय व्यक्ति का मन लगभग विचार-शून्य होता है।

English Translation – How to recognize presence of Tattvas in breath by observing appearance of thoughts has been described in this verse. If thoughts regarding physical property arise in the mind, we should understand that Prithvi Tattva is active in the breath. Thought of self indicates presence of Jala Tattva or Vayu Tattva. Thought of metallic property or treasure suggests presence Agni Tattva. Thoughtless state of mind indicates presence of Akasha Tattva.

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10 टिप्‍पणियां:

  1. विभिन्न तत्वों पर इतना गहन अध्ययन आचार्य जी का बहुत ज्ञानवर्धक है.

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  2. मैं तो आचार्य जी को नमन ही कर सकती हूँ।

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  3. 'शिवस्वरोदय', आचार्य परशुराम जी का हिंदी ब्लॉग जगत को दिया गया एक नायाब तोहफा है ! यह वह शिलालेख है जिसे पढ़कर हमें हमारी संस्कृति और ज्ञान पर गर्व होता है !

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  4. मैं ज़रूरी काम में व्यस्त थी इसलिए पिछले कुछ महीनों से ब्लॉग पर नियमित रूप से नहीं आ सकी!
    बहुत बढ़िया और ज्ञानवर्धक पोस्ट! उम्दा प्रस्तुती!

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  5. ज्ञानवर्धक एवं बहुत ही उपयोगी आलेख।

    साधुवाद,

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