गुरुवार, 24 मार्च 2011

आँच-61 – आजी की बरसी

समीक्षा

आँच-61 – आजी की बरसी

हरीश प्रकाश गुप्त

My Photoआँच के इस स्तम्भ में प्रायः कविताओं पर ही अधिक चर्चा हुई है, कहानियों पर उतनी नहीं। कारण, आजकल कविताएं ही अधिक लिखी जा रही हैं, कथाएं कम। अच्छी कथाएं तो और भी कम देखने में आती हैं। अनु सिंह चौधरी का नाम इस ब्लाग के लिए नया नहीं है। पिछले माह इनकी एक कविता की समीक्षा इसी ब्लाग पर आँच पर आई थी। मैंने जब इनके ब्लाग मैं घुमन्तू” पर विजिट किया तो पिछले वर्ष मुझे तीन कथाएं पढ़ने को मिलीं। ये कथाएं मुझे बहुत सरस और आकर्षक लगीं। इन कथाओं को पढ़ने के बाद लगा कि इन पर आँच पर भी चर्चा होनी चाहिए। सो, विगत वर्ष मार्च माह में प्रकाशित हुई कहानी “आजी की बरसी” का आज की आँच के लिए चयन किया गया है।

संक्षेप में कहानी के कथानक का उल्लेख करें तो यह कि एक वृद्ध स्त्री पूर्णेश्वरी देवी की कहानी है जिन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च शिक्षित कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके पुत्र, पुत्रियाँ, नाती, पोते बड़े-बड़े पदों पर पहुँच गए हैं, उनमें से अधिकांश विदेश में जा बसे हैं। उन्होंने पढ़ लिखकर धन, पद और यश सब कुछ अर्जित कर लिया है। वे समाज के अतिविशिष्ट वर्ग का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। प्रतिष्ठा में अभिवृद्धि उनका अभिप्रेत है। सामाजिक संस्कार और पारिवारिक रिश्ते उनके उद्देश्यों की पूर्ति करने वाले उपकरण मात्र लगते हैं, अर्थात मैकेनिकल। लेकिन आजी हैं कि उनकी आत्मा आज भी उनके संचित संस्कारों के साथ जीती है। वह स्नेह और ममता की प्रतिमूर्ति हैं जिनकी दूसरों से अपेक्षाएं अधिक नहीं हैं। उन्हें माटी से जुड़ी स्मृतियाँ ही जीवन का आधार लगतीं हैं और उन्होंने उसी में अपार सुख खोज लिया है। वह आधुनिक पीढ़ी की डोर को एक हाथ से पकड़े रहने के बावजूद देशज संस्कारों को भी मजबूती से थामे रहती हैं। लेकिन आधुनिक और सम्भ्रांत बन चुके उनके पुत्र और पुत्रियाँ सामाजिक मर्यादा के दबाव में न्यूनतम प्रयासों से उनसे उतना ही जुड़े रहते हैं जितने भर से उनकी प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आती। तभी तो वे सब एक दूसरे से टेलीफोन द्वारा ही आजी का हालचाल लेते रहते हैं। पन्द्रह साल तक उनके पास कोई और नहीं आता, न नाती-पोते न बेटियाँ, सिवाय छोटे पुत्र के, जो उनके सबसे नजदीक अर्थात पटना में रहते हैं। वही यदाकदा समय मिलने पर हालचाल ले जाते हैं। वह डाक्टर हैं लेकिन जब लाचार आजी उनसे आसपास डाक्टर न होने का कारण बताते हुए कहती हैं कि तबियत ठीक न होने पर वह किसे दिखाएं, बहुत दिक्कत होती है। हालाकि इसके पीछे उनका उद्देश्य यह होता है कि उनका यह बेटा ही उन्हें हफ्ते दो हफ्ते में देख जाया करे, मिल जाया करे ताकि उन्हें कुछ सुकून मिले। उनका मन्तव्य वह समझ भी जाता है फिर भी वह अपनी असमर्थता को सबके समक्ष उपयुक्त ठहराता है, जबकि पटना में रहते हुए यह बहुत मुश्किल भी नहीं। बड़े पुत्र जो लखनऊ में रहते हैं वह साल दो साल में एक बार ही मुश्किल से समय निकाल पाते हैं और दोनों बहुएं एकान्तर वर्ष में आने का आपस में अनुबन्ध करके दायित्व की पूर्ति समझ लेती हैं। हाँ, अन्य सम्बन्धियों से मिलने विदेश जाना तथा किटी पार्टी और समाजसेवा के लिए समय निकालना उनकी दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है और वे इसके लिए समय निकालती भी हैं। यह पात्रों की मनोदशा को चित्रित करता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं। इसके अतिरिक्त आजी के जीते जी जो लोग पन्द्रह वर्ष तक न उन्हें देखने आए और न ही उनका हालचाल पूछने, आजी का देहान्त उन्हें एक गेट टुगेदर पार्टी और जश्न मनाने का अवसर उपलब्ध करा जाता है।

वह चरित्र जिसको केन्द्र में रखकर इस कहानी की रचना की गई है उस आजी की पीड़ा, व्यथा और एकाकीपन को यह कहानी बिना कहे ही व्यक्त करती है। कथा का सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आता है जब इस भरे पूरे और समृद्ध परिवार से सम्पन्न आजी का देहान्त होता है तो उनके समीप कोई नहीं होता। उनके घर आदि की देखभाल करने वाला मुंशी खबर पहुँचाने उनके छोटे पुत्र के पास जाता है तो पुत्र की प्राथमिकता मृतक के करीब शीघ्र पहुँचने की कम परिचितों की भीड़ अपने घर इकट्ठा करने के प्रति अधिक होती है। वह बिना अपने परिवार को लिए अपने दो मित्रों के साथ गाँव जाते हैं और अपने औपचारिक दायित्व का निर्वाह करते हुए अपनी सुविधानुसार आर्यसमाज रीति से अंतिम संस्कार करके शाम तक वापस पटना लौट जाते हैं। यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। सबको इंतजार रहता है इस उत्तरदायित्व से भी मुक्ति पाने का और जब वह समय आता है तो यह परिवार इसे भी अपनी प्रतिष्ठावृ्द्धि के अवसर के रूप में देखता है और हर वह जतन करता है जो उनके इस उद्देश्य को फलीभूत करता है, जैसे- बरसी का भव्य और शानदार आयोजन तथा अति विशिष्ट लोगों का आगमन आदि। आजी के मरने और श्राद्ध के समय तो कोई पहुँच नहीं पाता इसलिए बरसी पर सब इकट्ठे होते हैं। यहाँ प्रमुखता बरसी पर कम, भव्य तथा शानदार आयोजन और विशिष्ट आतिथ्य पर अधिक होती है। इस अवसर के लाभ से छोटी बहू को विधानसभा का टिकट मिल जाता है और बरसी का भव्य आयोजन करके तथा गाँव में माँ के नाम बड़ा अस्पताल चीफ मिनिस्टर से स्वीकृत करवाकर बड़े पुत्र अपने को मातृऋण से उऋण समझ लेते हैं। सब बेहद खुश होते हैं।

कहानी का प्रारम्भ आजी की बरसी के आयोजन की सूचना के साथ होता है जिसके विज्ञापन का आकार भी प्रतिष्ठा से जुड़ा है। बाल मन शाश्वती नहीं जानती कि बरसी क्या होती है लेकिन उसका उत्साह धूमधाम से आयोजन के प्रति तथा सबसे मिलने में है। चौथा पैरा जहाँ आजी के परिवार और उसके सदस्यों से पाठक का परिचय होता है, कहानी फ्लैश बैक में विकास की ओर अग्रसर होती है और क्रमबद्ध घटनाक्रम के माध्यम से सजीव सी अनुभूति कराती है। बरसी का आयोजन और उसके पश्चात आँगन में बैठक के समय कहानी उत्कर्ष को प्राप्त होती है जब परिवार के सभी सदस्य बरसी के भव्य एवं सफल आयोजन पर गौरवान्वित और हर्षित हैं। सबकी आकांक्षाएं भी अभीष्ट को प्राप्त हुई हैं। बड़े पुत्र का मातृऋण से उऋण होना, छोटी बहू को विधानसभा का टिकट मिलना तथा बाकी सबका हर्षोल्लास के साथ गेट टुगैदर। कहानी का एक पंक्ति का अंत “लेकिन दालान में टंगी आजी की मुस्कुराती तस्वीर के पीछे की सालों लंबी तन्हाई किसी को नज़र नहीं आई थी। ” बेहद चमत्कारिक है और अपनी व्यंजना से सम्पूर्ण कथा का केन्द्र बदल देता है। अब कथा का लक्ष्यार्थ आजी के सदा प्रसन्न से रहने वाले चेहरे के पीछे छिपी व्यथा और वेदना बन जाता है जो अपनों की महत्वाकांक्षा और प्रतिष्ठा की चाहत के कारण उनकी उपेक्षा और एकाकीपन से उपजी है। यह एक प्रश्न छोड़ जाता है कि क्या आजी ने इसी सुख के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

इस कहानी का कथानक असाधारण नहीं है लेकिन कहानी का विशिष्ट शिल्प और सौष्ठव इसे असाधारण बनाता है। अनु सिंह चौधरी ने बेहद सधे शब्दों में एक कुशल रचनाकार की भाँति इस कहानी को लिखा नहीं बल्कि गढ़ा है। कहानी अपनी इसी शिल्पगत विशिष्टता द्वारा प्रारम्भ से ही प्रभाव उत्पन्न करती चलती है। बहुतायत स्थानों पर वाक्यों की विशेष बनावट, जिसमें पूर्ण अथवा आंशिक कर्तापद क्रियापद के पश्चात आया है, अर्थ को वजन देती है, यथा – पहले पैरा में ही “.... विज्ञापन छपवा दिया गया था। पहले ही पन्ने पर - तीन कालम का।” या “शाश्वती स्कूल ले आई थी वो अखबार” या “बरसी करेंगे हम धूमधाम से अगले साल” आदि। ऐसे प्रयोग अधिकांश स्थानों पर हैं। यह कथाकार की अपनी खास शैली है। इस प्रयोग से कहानी न केवल स्वाभाविक बनी है बल्कि रोचक और सरस भी बनती गई है। रचनाकार की सूक्ष्म दृष्टि कहानी पर आद्योपांत रही है। चरित्रों का निर्माण और उनका निरूपण बहुत संतुलित ढंग से हुआ है। इसीलिए कोई भी चरित्र अपनी सीमा का उल्लंघन करता हुआ नहीं मिलता। संवाद अपरिहार्य होने पर ही आए हैं और वह भी बहुत सुगठित हैं। वे अर्थ के साथ-साथ पात्र की मनोदशा को भी प्रतिबिम्बित करते जाते हैं। जैसे “नो न्यूज इज गुड न्यूज जीजी .......।” यह संवाद महज दूसरे द्वारा हालचाल पूछने पर उसकी चिंता घटाने मात्र के लिए नहीं बोला गया है, बल्कि यह पात्र की आंतरिक इच्छा को भी अभिव्यक्त करता है और फिर धीरे धीरे यांत्रिक होते हुए मनोदशा पर से आवरण हटा देता है, वह भी संवेदना शून्य ढंग से। “आप बेवजह क्यों फिकर करती हैं अम्मा की। जब हफ्तों तक कोई खबर न मिले तो समझ लीजिएगा कि सब ठीक ही होगा।” यहाँ जिस खबर के लेने या देने की बात हो रही है, वह आजी के जीवित अवस्था के हालचाल की नहीं है। बल्कि उनके साथ खुदा न खास्ता कुछ हो जाने पर खबर बनने की है। आजी के स्वस्थ रहने में किसी की कोई खास दिलचस्पी नहीं है। इसी तरह “एक बार हमसे अम्मा ने कहा था .... बबुआ डाक्टर नइखे अगल-बगल कौनो। बड़ी दिक्कत होखेला। कबो-कबो मन ठीक ना लागेला त बुझाला ना केकरा से देखाईं, कहाँ जाईं। वो तो खैर अम्मा चाहती थीं मैं ही आ जाया करूँ हफ्ते दो हफ्ते में। ऐसा मुमकिन कैसे होता, आप ही बताइए भैया।” छोटे पुत्र का यह कथन अम्मा की अपने पुत्र से आकांक्षा को कम व्यक्त करता है बल्कि अम्मा की इच्छा को पूरा न कर पाने के समर्थन में तर्कसंगति प्रस्तुत करते हुए पात्र की मनोवृत्ति का परिचय अधिक देता है। इसी तरह आजी के मरने पर दुख अथवा शोक कहीं नहीं दिखता। कहानी में इसे गम्भीरता के आवरण से ढक दबे स्वर में हर्ष की अभिलाषा और सबसे मिल पाने के लिए गेट टुगेदर का उल्लास अधिक दिखता है।

कहानी में मुख्य चरित्र दो हैं। पहला आजी का जिसके बारे में काफी कुछ व्यक्त किया जा चुका है। दूसरा चरित्र है शाश्वती का। यह एक नासमझ और बाल सुलभ बालिका है जो बात की बारीकियाँ नहीं समझती है। उसे यह सब कुछ कौतूहल सा लगता है। वह अपने बालमन से घटित होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करती रहती है। उसे उत्साह है सबसे मिलने जुलने का। लेकिन ग्यारहवें पैरा की उक्ति – “बल्कि कभी कभी उसे लगता कि यह बात उसके ममा पापा की समझ के बाहर थी” – उसके बालमन के स्तर के विपरीत वक्रोक्ति सी प्रतीत होती है। तीसरा चरित्र वाचक का है जो परिपक्व है और जिसकी पूरे घटनाक्रम पर सजग व तटस्थ दृष्टि है। वह शायद शाश्वती का भाई या बहन हो सकता है। शेष चरित्र प्रसंग में आए हैं और अपनी उपयोगिता का निर्वाह करते हैं।

कथा में बहुत कुछ स्पष्ट है। लेकिन आजी का अपने गाँव में बसने का आग्रह और परिवार द्वारा उनकी इस प्रकार उपेक्षा करना कि पंद्रह वर्षों तक बेटियाँ और नाती पोते भी उनसे मिलने न आएँ, वह भी बिना किसी ठोस कारण के, कुछ सहज प्रतीत नहीं होता। भारतीय समाज में पुत्रों की अपने माता-पिता से मर्यादित दूरी बन जाना अस्वाभाविक नहीं लेकिन बेटियों का लगाव अपनी माँ के प्रति निरपवाद होता है। अतः सम्पन्न बेटियों का विदेश में रहना इतनी बड़ी लाचारी नहीं कि वे अपनी माँ से पंद्रह वर्ष तक मिलने का समय ही न निकाल पाएं और भाइयों से ही खबर लेती रहें। ऐसा नहीं कि वे इन पन्द्रह वर्षों में अपने देश में न आई हों। अतः माँ से मिलने न जाना नियोजित ही रहा होगा। यहाँ लेखिका की दृष्टि ईषत शिथिल रही है। हाँ, यह अवश्य सम्भव होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन को अपनाता है। जैसै यहाँ आजी का है अथवा बेटों का है या बहुओं का है। सबके अपने-अपने रास्ते बन जाते हैं। यह कहना कठिन होता है कि कौन सही है अथवा कौन गलत। क्योंकि अपने दर्शन के अनुसार सभी अपनी-अपनी जगह सही हैं। अस्तु यह कथा इस विन्दु पर आकर मौन हो जाती है या यों कहें कि एक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाती है। तथापि समेकित रूप में यह कथा बहुत ही संतुलित और परिपक्व कथा है जिसकी व्यंजना व्यापक और हृदय स्पर्शी है।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. समय तेजी से बदल रहा है.50-60 सालों में युग परिवर्तन की स्थिति बन जाती है.ऐसे में बुजुर्गों को थोड़ा व्यावहारिक होते हुए अपने बच्चों से अपेक्षा करनी चाहिए.50-60 साल पुराने आदर्शों में अहिस्ता अहिस्ता बदलाव आ जाना भी स्वाभाविक ही लगता है.
    विस्तृत समीक्षा अच्छी लगी.

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  2. अनु सिंह चौधरी की लेखन शैली का शुरु से प्रशंसक रहा हूँ. अच्छा लगा यहाँ पढ़्कर...

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  3. एक ज्वलंत सामाजिक समस्या पर लिखी एक अतिसंवेदनशील कथा और उसकी उतनी ही सुन्दर समीक्षा गुप्त जी द्वारा..

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  4. माइंड-ब्लोइंग ! यह आंच के उत्कृष्टतम अंकों में से एक है. कथा भी बहुत जानदार बन पड़ीं है. कथाकारा एवं समीक्षक दोनों को कोटिशः धन्यवाद !

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. अनुसिंह चौधरी की कहानी आजी की बरसी बहुत अच्छी कहानी है। सही कहा है आपने प्रायः ब्लाग पर इतनी अच्छी कहानियाँ कम ही देखने को मिलती हैं। समीक्षा हेतु उत्कष्ट रचना का चयन आँच को गरिमा प्रदान करता है। कथा के निहितार्थ की विशद व्याख्या करती अनुसिंह चौधरी की कहानी की समीक्षा बहुत ही उत्कृष्ट है। समीक्षा में पात्रों की मनोदशा को भी विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

    प्रभावशाली समीक्षा।

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  7. बेहद प्रभावशाली समीक्षा की है……………आजकल बेटियाँ भी बदलने लगी हैं शायद उसी मानसिकता का दर्शन कराया है और ये सच भी है ………कौन बेकार के बोझ को ढोये जब तक कि उससे कोई आर्थिक लाभ ना हो…………इस तरह की मानसिकता आजकल बेटियों मे भी दिखने लगी है।

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  8. एक अच्छी कहानी कि समीक्षा भी बहुत अच्छी ...यही आडम्बर रह गया है ...हर चीज़ में अपना स्वार्थ ही देखा जाता है ...

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  9. आंच की उत्कृष्टतम्‌ समीक्षा।

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  10. हरीश जी ने कहानी के सभी आयामों को बड़े ही तटस्थ ढंग से रेखांकित करते हुए समीक्षा की है। समीक्षक अपने धर्म के प्रति आद्योपान्त सजग है। मैं मनोज कुमार जी के विचार से शत-प्रतिशत सहमत हूँ।

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