बुधवार, 30 मार्च 2011

देसिल बयना – 74 : जैसी है नहीं छोरी वैसी सजती बहुत

देसिल बयना – 74 : जैसी है नहीं छोरी वैसी सजती बहुत


-- करण समस्तीपुरी

फ़ागुन खेलो होरी और चैत खेलो बलजोरी। फ़गुआ का रंग तो उतर गया था मगर भांग उतरने में तो थोड़ा टाइम लगता ही है। उ दफ़े तो और दमसगर फ़गुआ हुआ था। आधा टोला तो भर फ़ागुन लगने होता रहा था। लगन बीतते होरी और होरी बीतते बलजोरी।


बटेरीलाल के मझिला बेटा सुखरिया का ब्याह तो पछिले लगन में हो गया था मगर गौना ई साल हुआ था। गौना में उकी लुगाई के साथे साली भी आयी थी। आह... बुझिये कि फ़ागुन तो गुलजार और चैत भी चकाचक हो गया।

घंटोलिया, झमेली, चंपई लाल और मघुआ तो चौकरिये जमाये रहता था, बूटन बबाजी के दलान पर, सुखरिया के घर के ठीक सामने। फ़ागुन भले चला गया मगर चौपाल पर ढोल-हरमुनिया रोज फेराता था। आखिर चैता में चैतीगांव से सुखरिया की साली जो आयी हुई थी। एक बात और हमरे रगेदन भाई भी ई रास में खूब रस लेते थे। उ तो दिन में भी खाते थे अपने घर में और हाथ सुखाते थे बूटने बबाजी कने।

शनिचर के सांझ में आयोजन वैसे भी गरमा जाता था। पुरबारी और पछियारी टोल से भी गबैय्या-बजबैय्या रसिक समाज का समागम हो जाता था। वैसे तो ई गाने-बजाने का कार्य-क्रम घुमन्तु था मगर उन दिनों यह बूटन बबाजी के दलान के लिये परमामिंट (पर्मानेन्ट) हो गया था।

गदरु ठाकुर ढोल पर दोबर हाथ गनगनाये हुए था तो झुम्मक सिंघ की अंगुलियां हरमुनिया पर बिजली की तरह थिड़क रही थी। बैठकी झमझमा गया था। मरद-मानुस का तो पैर रुके नहीं रुका... मगर मेहरिया को तो खिड़की-दलान, ओसारा तक का ही परमिट था। सुखरिया के झरोखा से भी हिहियाने-खिखियाने की आवाज़ आ रही थी।

अचानक गदरु ठाकुर बोले, “अरे भैय्या ! कनिक पावडर मंगवाओ कहीं से... ई बकरिया चाम पर हाथ चल नहीं रहा है। बूटन बबाजी तो ठहरे 'ठन-ठन-गोपाल' इहां पावडर का... चुल्हे के राख पर भी आफ़त था। समय की नजाकत देखते हुए सुखरिया अपनेही घर के तरफ़ मुंह कर के हांक लगाया, “ए बेला ! दीदी से मांग के कनिक पावडर ले आइहऽ... ।”

'ओह्हो... ई सुखरिया के साली का नाम तो बड़ा गमकौआ है – बेला !’ कई जोड़ी आंखें चमक उठी थी। बेला छमकती हुई आई और सुखरिये के हाथ में पावडर का डब्बा थमा के लचकती हुई चली गयी। लगा अटेरना लहर मारके हरमुनिया टेरने, “दर्दे-दिल के जगा के गइल... आउर कुछ ना भइल... चार दिन में बाकी हल्फ़ा मचा के गइल...!” एंह... अटेरना के ई तान पर जुआन तो जुआन बूढ़ी जुबान भी वाह-वाह कर उठी। अटेरना भी जोश से भरकर लगा अलापने, “गांव के सुखरिया के रहे उ साली... देखइ में भोला, बाकी बड़की खेलाड़ी ! रस उ ऐसन चुआके गइल... रस उ ऐसन चुआके ओकरा चक्कर में जे कोई परल... सबके चूना लगाके गइल...!” रगेदन भाई से रहा नहीं गया...। बोल उठे, “वाह खिलाड़ी ! महफ़िल लूट लिया रे...!”


उन दिनों रगेदन भाई बेला की महक से बौराये हुए थे। वैसे बेला भी अपने जीजा सुखरिये जैसे सुखरी थी। सांवला रंग और नैन-नक्श भी साधारणे था मगर उ रहती थी बड़ी छम्मकछल्लो बन के। जिधर उ चले उधरे सुखरिया के भैय्यारी का छौरा सब छेड़ देता था, “ए कजरावाली गजरावाली उड़नपरी...!” उ कभी-कभी तो अपने रस्ते चली जाती रहती। कभी-कभी मुंह ऐंठ देती थी तो किसी-किसी खुशकिस्मत के हिस्से थप्प्ड़ और मुक्के का इशारा भी आ जाता था।

रगेदन भाई पूरे सबा महिना से विध-विधान में थे मगर उनके सौभाग्य में बेलादेवी की प्रतिक्रिया नहीं आई थी। उ दिन सुखरिया के पड़ोसी मनोरीलाल के घर सत्यनारायण कथा थी। आंगन में जननी-जात और बैठक में मरद-मानुस। सबलोग पूजा-कथा में लगे थे और बेला सुखरिया के डेढ़ साल के भतीजा को लेकर अन्दर बाहर कर रही थी। वैसे तो बच्चा भी चंचल था मगर हमको लगता है कि उको खुद भी अन्दर-बाहर छ्म-छ्म-छ्म-छ्म करने में मन लग रहा था।

अन्दर में पंडीजी अध्याय समाप्त होने पर शंख बजाते थे इधर जैसे ही बेला खिले कि सीटी और ताली दे दनादन। भगवान की कथा का सुफल...। आहा ! आज रगेदन भाई का मनोरथ भी पूरा हो गया। आज उनके तरफ़ भी मुक्का का इशारा हुआ। बेचारे अपना मुक्का खुद अपने कलेजे में मार लिये। बेलादेवी की आँखें तो आड़ी-तिरछी भगवाने घर से थी होंठों को भी दो बार दांये-बांये घुमाकर चोटी झटककर मटकते हुए चली गयी।


बेला तो गयी अन्दर और इधर झमेला बन गया रगेदन भाई का। सब लड़िका लगा चुटकी उड़ाये। बेचारे रगेदन भाई पहिले तो बगली झांके मगर लुक्कर मंडली भी कम नहीं...! लगे बेचारे भाई-साहब को मक्खन लगा-लगाके चाटे। टपकू मामू एक अलगे उकाठी। रगेदन भाई के पीठ पर चपत जमाते हुए बोले, “तब रगेदन... रगेद दो... ! तोहरे तो किस्मत लहलहाई है। 'अरे जौन के पाछे सारा जवार, उ गयी है तोहे निहार’। मगर एक बात हमरे समझ में नहीं आयी। उ तोहरे जैसे गबरु जवान पर आँख मटकाई सो तो ठीक मगर होंठ काहे घुमाके गयी?”

रगेदन भाई का सोया हुआ स्वाभिमान जाग उठा। गर्दन उठाके आंगन की तरफ़ झांकते हुए बोले, “धुर्र.... ई सबको कौन पूछता है? “जैसी है नहीं छोरी, वैसी सजती बहुत है।” देखे तो लुकिंग लंदन... टाकिंग टोकियो। इपिस्टिक-लिपिस्टिक और कजरा, गजरा, झुमका, पायल छमका के हिरोइनी बनती है। कहते हैं नहीं कि 'मुँह काला और नाम बैजंती माला।’ उ तो हंसी-मजाक का रिश्ता है इसीलिये दूम खिंच देते हैं।"

पहिले तो एक राउंड जम के ठहाका पड़ा फिर सबा महिना से श्रमरत साधक समुदाय 'अंगुर नहीं मिले तो खट्टे हैं’ के तर्ज पर रगेदन भाई के हां-में-हां मिलाये, “सच कहते हैं रगेदन भाई ! 'जैसी है नहीं छोरी वैसी सजती बहुत है।'

इधर रगेदन भाई के कहावत पर हंसी-ठहाका और विश्लेषन चल ही रहा था कि पंडीजी आरती का शंख फूंक दिये। सबलोग अपना-अपना लोटा-गिलास संभाल के लपके मनोरीलाल के आंगन के तरफ़। हम भी कम दूध और ज्यादे मेवा वाला परसाद लोटा भरकर पीये तब जाकर रगेदन भाई के फ़करा का अरथ बुझाया, “जैसी है नहीं छोरी, वसी सजती बहुत है। मतलब वास्तविकता से अधिक प्रदर्शन।” बोल सत्यनाराय़ण भगवान की जय !

15 टिप्‍पणियां:

  1. बोल सत्यनारायण भगवान की जय.... बहुते गजब रागेदे जी :)

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  2. फगुआ क रंग त एस कदर चढ़ल बाय कि उतरै क नंउऐं ना लेत हौ।

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  3. साली तो आधी घरवाली होती है.... बेचारा बतेरिलाल की साली तो पूरे गाँव की साली हो गई... चैत में साली हो पास तो बरजोरी होगी ही.. मस्त है आज का बयना....

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  4. देसिल बयना के रंग में होली का रंग घुल जाने से फागुन का आनंद कई गुना बढ़ गया !
    करन जी अपने पूरे तेवर के साथ हर रंग में दिख रहें हैं !
    आभार !

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  5. यहाँ तो फागुनी बयार अब भी चल रही है. क्या बात है.

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  6. ab dekhiye angoor chaahe mile n mile, khattaa to hoiye nahin saktaa hai, agar u angoor kaa naam SAALI hai.. jab faagun men budhawaa dewar lagtaa hai, jawaanee men gadahee bhee haseen lagatee hai to bechaaree saali kaa kaa kasoor..
    baaki karan jee, kahaan ee umar men ee sab khissaa chhed diye hain. kasam se "hamare karejwaa men teer, haaye raam kaase se kahin"... saali naamak teer badaa ghaatak hota hai!!

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  7. देखे तो लुकिंग लंदन... टाकिंग टोकियो। इपिस्टिक-लिपिस्टिक और कजरा, गजरा, झुमका, पायल छमका के हिरोइनी बनती है। कहते हैं नहीं कि 'मुँह काला और नाम बैजंती माला।’ .....


    बहुत दिलचस्प .... बहुत रोचक ....
    मन आनंदित करने वाले इस लेख के लिए हार्दिक बधाई।

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  8. अरे भाई करन जी, थोड़ा मेवादार पंचामृत लोटा में हमलोगों को बाँटने के लिए धन्यवाद।

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  9. बहुत नीक लागल, ठीक कहली के "देशील बयाना सब जन मिट्ठा," बोलिए सत्य नारायन भगवान् की जय.

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  10. प्रेम से बोलिए सत्यानयन भगवान की जाय....और साथ में करण बाबू की भी जय...
    जम के रगेद दिए हैं.... अहि रचना में त आप सबको फरका के रख दिए हैं....

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  11. 'मुँह काला और नाम बैजंती माला।’ .....

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