महात्मा
गांधी हत्या केस-46
31 जनवरी,
1948
अंतिम संस्कार
गांधीजी की शवयात्रा की इस ऐतिहासिक घटना
को कवर करने के लिए दिल्ली में दुनिया भर के नामी विदेशी पत्रकार और फोटोग्राफर्स
मौजूद थे। उन विदेशी पत्रकारों में सबसे प्रमुख नाम लाइफ मैगजीन की प्रसिद्ध अमेरिकी
फोटोग्राफर मार्गरेट बोर्के-व्हाइट और फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी
कार्टियर-ब्रेसों का
था। गांधीजी की मौत के बाद बर्क-व्हाइट और कार्टियर-ब्रेसन ने जो तस्वीरें लीं, वे इस घटना का एक अनोखा विज़ुअल रिकॉर्ड
पेश करती हैं। इन पत्रकारों ने न केवल इस दुखद पल की ऐतिहासिक
तस्वीरें खींचीं, बल्कि भारतीय जनता के इस गहरे शोक को करीब से महसूस भी
किया। उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर भीड़ की बड़ी संख्या को उतनी ही कामयाबी से
कैप्चर किया, जितनी उन्होंने शोक मनाने वालों के दुख को
किया। उनकी तस्वीरों में सड़कें पुरुषों, महिलाओं और बच्चों से भरी हुई हैं, जिनमें से कुछ के हाथ में राष्ट्रीय ध्वज
है, पेड़ और बिजली के खंभे ऐसे लोगों से भरे
हुए हैं जो बेहतर नज़ारे के लिए भीड़ से ऊपर चढ़ गए हैं।
गांधीजी की अंतिम यात्रा देखने के लिए शोक मनाने वाले लोग टेलीफोन के खंभे पर चढ़ रहे हैं। मार्गरेट बर्क-व्हाइट/द लाइफ पिक्चर कलेक्शन
अमेरिकी फोटोग्राफर मार्गरेट बोर्के-व्हाइट
के लिए गांधीजी की हत्या का सदमा बेहद व्यक्तिगत था, क्योंकि उन्होंने हत्या से ठीक कुछ घंटे
पहले बिड़ला हाउस में गांधीजी का इंटरव्यू लिया था। मार्गरेट ने गांधीजी से पूछा
था कि क्या वे परमाणु बम के इस दौर में भी अहिंसा की प्रासंगिकता देखते हैं? गांधीजी ने जवाब दिया था, "अगर दुनिया अहिंसा को नहीं अपनाएगी, तो यह खुद को नष्ट कर लेगी।" मार्गरेट जब यह इंटरव्यू लेकर अपने होटल
पहुंची ही थीं कि उन्हें गांधीजी पर गोली चलने की खबर मिली। मार्गरेट ने अपनी
किताब में लिखा कि गांधीजी के अंतिम संस्कार के दिन दिल्ली की सड़कों पर जो दृश्य
था, वैसा उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी
नहीं देखा था। उन्होंने लाखों लोगों के चेहरों पर असीम दुख और खालीपन देखा।
उन्होंने बिड़ला हाउस की छत से लेकर राजघाट की चिता तक की ऐसी तस्वीरें खींचीं, जो आज भी इतिहास के पन्नों में अमर हैं
(जैसे रोते हुए नेहरू और पटेल की तस्वीरें)। बर्क-व्हाइट ने बिरला हाउस के कंपाउंड
में उस जगह पर शोक मनाने वालों को पवित्र निशान के तौर पर मिट्टी उठाते हुए दिखाया
है, जहां गांधी हत्यारे की गोली लगने से गिरे
थे।
हत्यारे की गोली लगने के बाद गांधी जिस जगह गिरे थे, वहां से शोक मनाने वाले लोग पवित्र अवशेष के तौर पर मिट्टी उठा रहे हैं। © मार्गरेट बर्क-व्हाइट/द लाइफ पिक्चर कलेक्शन
आधुनिक फोटो पत्रकारिता के जनक माने जाने
वाले प्रसिद्ध फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी
कार्टियर-ब्रेसों भी उस समय भारत में ही थे। वे गांधीजी से मिलने के बाद
दिल्ली से निकलने वाले थे, लेकिन इस घटना ने उन्हें वहीं रोक दिया। कार्टियर-ब्रेसों
बिड़ला हाउस में मौजूद थे जब जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर अपना प्रसिद्ध भाषण दिया
था। नेहरू के शब्दों—"हमारे जीवन से रोशनी चली गई है"—से प्रेरित होकर ब्रेसों ने गांधीजी की
शवयात्रा की तस्वीरों की पूरी सीरीज को 'एक रोशनी का बुझना' (The Fading of a Light) के रूप में कैप्चर किया। ब्रेसों ने अपने
संस्मरणों में लिखा कि इतने बड़े जनसैलाब के बावजूद वहां कोई अराजकता नहीं थी, बल्कि एक अजीब और भारी खामोशी पसरी हुई थी।
लोग केवल रो रहे थे या मौन खड़े थे। उनकी खींची गई तस्वीरें आज भी उस ऐतिहासिक दुख
की सबसे जीवंत गवाह हैं।
गांधी
के अंतिम संस्कार के दौरान बिरला हाउस और यमुना नदी पर बने श्मशान घाट के बीच भीड़
जमा हो गई। © हेनरी
कार्टियर-ब्रेसन
अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स
के दिल्ली संवाददाता ने लिखा कि गांधीजी की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ ने यह
साबित कर दिया कि वे बिना किसी ताज या सेना के भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली
इंसानों में से एक थे। लंदन टाइम्स ने लिखा कि भले ही ब्रिटेन ने भारत पर
लंबे समय तक राज किया हो, लेकिन गांधीजी की विदाई के समय दिल्ली में मौजूद हर
ब्रिटिश अधिकारी और नागरिक भी उस शोक में भारतीयों के साथ बराबर का भागीदार महसूस
कर रहा था। इन विदेशी पत्रकारों ने दुनिया को यह दिखाया कि गांधीजी की मृत्यु से
केवल भारत ने अपना 'बापू' नहीं खोया था, बल्कि पूरी दुनिया ने शांति और अहिंसा का अपना सबसे
बड़ा मसीहा खो दिया था।
इस शवयात्रा की जुलूस के सबसे आगे चार
बख्तरबंद गाड़ियाँ चल रही थीं। उनके पीछे गवर्नर जनरल के अंगरक्षक दल के घुड़सवार
सैनिक थे, जिनके हाथों में सफेद झंडे थे। इसके बाद
अन्य सैनिक टुकड़ियाँ थीं, फिर पुलिस की एक रेजीमेंट और गांधीजी के वे सहयोगी थे
जो उनके साथ तब से जुड़े थे जब उन्होंने अपना पहला आश्रम स्थापित किया था। इन
सहयोगियों के पीछे वह सैन्य वाहन था जिस पर गांधीजी का पार्थिव शरीर रखा था। शरीर
को नए भारत के सफेद, हरे और केसरिया रंग के झंडे से ढका गया था। लॉर्ड
माउंटबेटन और राज्य के अन्य वरिष्ठ अधिकारी, जो उस सैन्य वाहन पर नहीं थे, पैदल ही साथ चल रहे थे। चूँकि वहाँ कई
महत्वपूर्ण अधिकारी मौजूद थे, इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए विशेष इंतज़ाम किए गए थे।
हथियारों से लैस पुलिस भीड़ के बीच तैनात थी; अलग-अलग रणनीतिक जगहों पर और भी बख्तरबंद
गाड़ियाँ खड़ी की गई थीं। जुलूस का नेतृत्व करने का सम्मान सेना को सौंपा गया था।
सड़कों के किनारे जमा हुई भारी भीड़ सेना
के प्रति कोई सम्मान दिखाने के मूड में नहीं थी। वे विदाई देने और दर्शन करने आए
थे, दिवंगत महात्मा को एक नज़र देखने के लिए
बेताब थे; वे हथियारों वाली गाड़ी के चारों ओर जमा हो
गए, जिससे जुलूस की गति धीमी हो गई। बीच-बीच
में, परेशान और गुस्से में नेहरू उस गाड़ी से
नीचे उतरते और लोगों को समझाते कि गाड़ी को रोककर वे गांधीजी का अनादर कर रहे हैं।
लोग बस उन्हें खाली नज़रों से देखते और थोड़ा पीछे हट जाते। जब पुलिस अधिकारी
नेहरू के पास आए और उन्हें याद दिलाया कि भीड़ के बीच जाकर वे खुद को खतरे में डाल
रहे हैं, तो वे गुस्से में उन पर बरस पड़े:
"तुम लोग बापू को नहीं बचा सके, है ना?" नींद न आने और गहरे दुख के कारण उनकी आँखें
सूज गई थीं, गाल पीले पड़ गए थे, और उनके हाथ घबराहट में कांप रहे थे।
एक अजीब बात यह थी कि जुलूस में एक चीनी
बैनर भी लहरा रहा था, जिस पर रेशम के धागों से बहुत ही नज़ाकत से लिखा था:
"महात्मा गांधी अमर रहें।" यह बैनर चीन के राजदूत ने दिया था, जो राजनयिकों के समूह में सबसे वरिष्ठ थे।
उन्होंने दिल्ली में रहने वाले सभी चीनी नागरिकों से इस जुलूस में शामिल होने के
लिए कहा था।
बिड़ला हाउस से यमुना के किनारे राजघाट तक
की लगभग 8 किलोमीटर (5.5 मील) लंबी थी। भीड़ इतनी घनी और विशाल थी कि 4,000 सैनिकों के कड़े पहरे के बावजूद फूलों से सजी तोप गाड़ी
को एक-एक इंच आगे बढ़ने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही थी। बिरला हाउस से गांधीजी
की शव यात्रा पहले बांए मुड़ी और फिर दाहिने मुड़ते हुए इंडिया गेट की तरफ़ बढ़
चली। लोगों को इंडिया गेट की दीवार पर चढ़ कर
महात्मा गांधी की शवयात्रा को देखते हुए देखा गया। दिल्ली की सड़कों पर पैर रखने
तक की जगह नहीं थी। लाखों लोग सड़कों पर पैदल चल रहे थे, तो लाखों लोग रास्तों के दोनों ओर फुटपाथों, इमारतों की छतों, छज्जों, पेड़ों और बिजली के खंभों पर बापू के आखिरी
दर्शन के लिए चढ़े हुए थे। शरणार्थी, राजनेता, आम नागरिक, महिलाएं और बच्चे—हर वर्ग के लोग धूल से सने पैर मीलों
पैदल चलकर वहां पहुंचे थे। शवयात्रा का माहौल गहरा और गमगीन था। भीड़ में से
लगातार रोने और सिसकने की आवाजें आ रही थीं। लाखों लोग एक सुर में गांधीजी का
पसंदीदा भजन "रघुपति राघव राजा राम" और धार्मिक मंत्रों का जाप कर रहे थे।
लोगों का यह हुजूम अपने प्रिय 'बापू' को खोने के गहरे सदमे और दुख में डूबा हुआ था।
एक घंटे बाद, यह जुलूस 'वॉर मेमोरियल' (युद्ध स्मारक) के मेहराब तक पहुँचा। लोग
आसपास के तालाब से होकर किंग जॉर्ज पंचम की मूर्ति के आधार तक पहुँच गए थे। वे
पत्थर की छतरी को थामे खंभों से लटके हुए थे, 150 फुट ऊँचे वॉर मेमोरियल के ऊपर बैठे थे, लैंप और टेलीफोन के खंभों पर चढ़े हुए थे, और रास्ते के दोनों ओर लगे पेड़ों की
शाखाओं पर भी बैठे थे—ताकि वे नीचे से गुजरती शव यात्रा को बेहतर ढंग से देख सकें।
पूरा 'सेंट्रल विस्टा' मानो इंसानों की एक विशाल भीड़ से भरा हुआ
था, जो दूर से देखने पर लगभग स्थिर लग रही थी।
जब गांधीजी की शवयात्रा दिल्ली गेट के पास
पहुंची तो तीन डकोटा विमानों ने नीचे उड़ान भरते हुए राष्ट्रपिता को सलामी दी। शव यात्रा की यात्रा बिड़ला हाउस से जनपथ, कनाट प्लेस, आईटीओ होते हुए, इस 8 किलोमीटर के सफर को पूरा करने में पूरे 5 घंटे का समय लगा और शाम करीब सवा चार बजे यह काफिला राजघाट
पहुंचा। जब यह विशाल जनसमूह आगे बढ़ रहा था, तब भारतीय वायुसेना के तीन विमान शवयात्रा
के ऊपर लगातार चक्कर लगा रहे थे। वे सलामी देने के लिए बार-बार नीचे आते और आसमान से पूरी शवयात्रा पर गुलाब और
केसरिया रंग की पंखुड़ियों की बारिश कर देते थे, जिससे पूरा माहौल और भी अलौकिक हो गया था। अंत्येष्ठि
स्थल से 250 मीटर पहले डॉज गाड़ी का इंजन बंद कर दिया
गया और भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के 250 जवान चार रस्सों की मदद से गाड़ी को खींच
कर उस स्थान पर ले गए जहां गांधीजी का दाह-संस्कार किया जाना था।
अंतिम संस्कार के लिए सड़कों पर शोक मनाने वाले लोग। © मार्गरेट बर्क-व्हाइट/द लाइफ पिक्चर कलेक्शन
जैसे ही शवयात्रा
राजघाट पर चंदन की चिता के पास पहुंची, लोगों का सब्र टूट गया। बापू को आखिरी बार छूने और देखने के लिए लाखों की भीड़
सुरक्षा घेरों (बैरिकेड्स) को तोड़ती हुई चिता की तरफ उमड़ पड़ी, जिसे संभालना पुलिस और सेना के लिए भी बेहद मुश्किल हो गया
था। इस शवयात्रा ने दिखा दिया था कि महात्मा गांधी बिना किसी आधिकारिक सत्ता के भी
देश के करोड़ों दिलों के वास्तविक शासक थे। इस आपाधापी में कई बच्चे बेहोश हो गए।
सरदार पटेल, पंडित नेहरू और लेडी माउंटबेटन को कुछ बच्चों को सुरक्षित स्थान पर ले जाते
हुए देखा गया।
ईंटों का एक छोटा
चबूतरा बनाया गया था, जो बारह फुट लंबा और बारह फुट चौड़ा था। इस पर नदी की बारीक
रेत की एक परत बिछाई गई थी और पास ही चंदन की खुशबूदार लकड़ियाँ रखी थीं। एक जस्ते
की बाल्टी में यमुना नदी का पवित्र जल था, और घी का एक बड़ा
डिब्बा भी रखा था, जिसे बाद में एक टिन-ओपनर से खोला जाना था। पाँच तरह के
पत्ते और फूल, धूप-बत्ती, नारियल और कपूर—सब कुछ तैयार रखा गया था। ईंटों के चबूतरे से सौ गज की दूरी पर
एक मज़बूत घेरा (बैरिकेड) बनाया गया था। पंद्रह मन चंदन की लकड़ी, चार मन घी, दो मन
हवन की सामग्री और धूप और अगरबत्ती, एक मन नारियल और पन्द्रह किलो कपूर चिता-स्थल
पर एकत्रित था।
शाम 4:20 बजे शव
ले जाने वाला वाहन श्मशान घाट पहुँचा और पार्थिव शरीर को ईंटों से बने चबूतरे पर
रखा गया। वहाँ उस पर पवित्र जल छिड़का गया, उसके ऊपर सावधानी
से लकड़ियाँ सजाई गईं और एक पुजारी ने पवित्र मंत्रों का पाठ किया। भारत सरकार के
अधिकांश सदस्य तथा लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन घास पर बैठे, चुपचाप सब देख
रहे थे। शव के चरणों में फूलों की मालाएं और पुष्प-चक्र रखे गए; इस क्रम में राजधानी के राजनयिक कोर के प्रमुख, चीन के राजदूत से शुरू कर सभी राजदूतों ने मृत देह पर फूल
चढ़ाए। देवदास गांधी ने अपने पिता के पार्थिव शरीर पर चंदन की लकड़ियां रखीं, जिस पर पवित्र गंगाजल छिड़का गया था। चिता सज गई।
अंतिम संस्कार में ज़मीन पर बैठे गणमान्य लोग। © मार्गरेट बर्क-व्हाइट/द लाइफ़ पिक्चर कलेक्शन
वैदिक
मंत्रोच्चार से गांधीजी के दूसरे पुत्र रामदास ने अपने बड़े भाई हरिलाल की
अनुपस्थिति में उनका अग्निदाह किया। जैसे ही लपटें उठीं, एक ज़ोरदार धमाके जैसी आवाज़ हुई;
हवा के झोंके से लपटें और ऊँची उठ गईं
और चारों तरफ़ चिंगारियाँ बिखर गईं। शव को चबूतरे पर रखे जाने के आधे घंटे से भी
कम समय बाद, शाम 4:45 बजे चिता में आग लगाई गई। जैसे ही शाम के धुंधलके में गांधीजी की
चिता से लाल लपटें उठी वहां मौजूद लाखों लोग एक स्वर में कह उठे 'महात्मा गांधी अमर रहें।' जैसे ही गांधीजी
की चिता को आग दी जा रही थी मनु ने अपने चेहरे को सरदार पटेल की गोद में रख कर
फूट-फूट कर रोना शुरू कर दिया। कुछ क्षणों बाद जब उन्होंने अपनी निगाहें ऊपर उठाई
तो उन्हें महसूस हुआ जैसे पटेल अचानक दस साल और बूढ़े दिखने लगे हों।
अंतिम संस्कार के
समय लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन अपनी दो बेटियों के साथ बाकी लोगों के बीच ज़मीन पर
बैठे थे। 'पुराने साथियों' (ओल्ड गार्ड) में से कई लोग फूट-फूटकर रो रहे थे। सरदार पटेल
किसी मूर्ति की तरह बैठे थे, और उनका हाथ रोती हुई एक बच्ची के सिर पर रखा था।
जब गांधी के बेटे
देवदास गांधी ने उनकी चिता को अग्नि दी तो उसका आंखों देखा हाल सुना रहे मेलविल
डिमैलो का गला रुंध गया। आकाशवाणी के कमेंटेटर मेलविल डिमैलो ने लगातार सात घंटे
तक माहात्मा गांधी की शवयात्रा का आंखों देखा हाल सुनाया था। बिना किसी विज्ञापन या व्यावसायिक ब्रेक के किया गया यह सात घंटे का मैराथन लाइव प्रसारण न केवल
तकनीकी रूप से अभूतपूर्व था, बल्कि इसने पूरे देश के सामूहिक शोक को शब्दों में पिरो दिया था। मेलविले डी
मेलो ने यह लाइव कमेंट्री किसी स्टूडियो में बैठकर नहीं, बल्कि बिड़ला हाउस से राजघाट जा रही शवयात्रा के साथ चल रही ऑल इंडिया रेडियो की एक खुली वैन (ओपन वैन) से दी थी। वह लगातार 7 घंटे तक भीड़, शोर और बेहद भावुक माहौल के बीच खड़े रहे और पल-पल का आंखों
देखा हाल देश तक पहुँचाया। डी मेलो की पहचान उनकी गहरी और दमदार 'बैरीटोन' आवाज के लिए थी। उस दिन उनकी आवाज में एक खास तरह की गंभीरता और गरिमा थी।
उन्होंने बिना किसी नाटकीयता के, बेहद सादगी और मार्मिकता के साथ दृश्यों का वर्णन किया। उनकी आवाज को सुनकर
रेडियो सेट से चिपके लाखों भारतीयों की आंखें नम हो गई थीं। शवयात्रा शुरू होने से
पहले बिड़ला हाउस के अंदर बापू के पार्थिव शरीर का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा
था— "कमरे का दृश्य हृदयविदारक था... दीवारें सफेद थीं, कमरा सादा था... लेकिन वहां बिछा गहरा नीला कालीन उस सफेद
गद्दे से बिल्कुल विपरीत लग रहा था जिस पर महात्माजी लेटे हुए थे। वे अपने पैरों
से लेकर पेट तक बेदाग सफेद खादी में लिपटे हुए थे, उनका सीना खुला था और उनके कमजोर शरीर पर हत्यारे की गोलियों के काले निशान
साफ दिख रहे थे..."
बापू के शांत
चेहरे को देखकर मेलविले डी मेलो इतने भावुक हो गए कि उन्होंने लाइव कमेंट्री में
कहा कि बापू का चेहरा देखकर उन्हें बचपन में सीखी ईसा मसीह की एक प्रार्थना याद आ
रही है— "हे पिता! इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।" इस कमेंट्री ने भारतीय रेडियो को एक नई दिशा दी। उस समय
केवल 17 वर्ष के एक लड़के ने रेडियो पर इस प्रसारण को सुना और वह
इससे इतना प्रभावित हुआ कि उसने कमेंट्री को ही अपना करियर बनाने की ठान ली। वह
लड़का कोई और नहीं, बल्कि आगे चलकर
भारत के महानतम हिंदी कमेंटेटर बने जसदेव सिंह थे, जिन्हें बाद में पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इस ऐतिहासिक
प्रसारण के बाद मेलविले डी मेलो की प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में फैल गई। इसी प्रतिभा
के कारण 1952 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें महारानी एलिजाबेथ के राज्याभिषेक की लाइव कमेंट्री करने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया था। भारत सरकार ने
भी उन्हें 1963 में पद्म श्री से नवाजा।
बाद में उन्होंने
लिखा, ''मैं कमेंट्री समाप्त हो जाने के बाद भी उस वैन की छत पर
बैठा रहा जहाँ से मैं कमेंट्री कर रहा था। अचानक मुझे नीचे से वैन के हुड को
पकड़ने की कोशिश करते दो हाथ दिखाई दिए। मैंने ग़ौर से देखा तो वो पंडित नेहरू थे।
मैंने उनके हाथों को पकड़कर वैन की छत पर खींच लिया। उन्होंने छूटते ही पूछा, ''तुमने गवर्नर जनरल को देखा है?'' मैंने जवाब दिया वो तो आधे घंटे पहले गए। उनका दूसरा सवाल था, सरदार पटेल दिखाई दिए? मैंने कहा वो भी कुछ मिनटों पहले जा चुके हैं। मैंने महसूस किया कि दुख की इस
घड़ी में दोस्त, दोस्तों से बिछड़ गए थे।''
***
अब शाम के 4:45
बज चुके थे। जैसे ही चिता की लकड़ियों के बीच आग की लपटें धीरे-धीरे ऊपर उठने लगीं, चिता के चारों ओर मौजूद भीड़ राष्ट्रपिता को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए
खड़ी हो गई और एक मिनट का मौन रखा। डूबते सूरज के सामने आग की लाल लपटें और ऊँची
उठने लगीं। वहाँ मौजूद विशाल जनसमूह से एक जोरदार उद्घोष गूँज उठा, "महात्मा गांधी अमर हो गए।" इस अंतिम संस्कार के दौरान, जब आग की लपटों ने महात्मा के पार्थिव शरीर को अपनी आगोश में ले लिया, तो यह वैदिक प्रार्थना के पूर्ण होने का प्रतीक बन गया:
"मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलें,
अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें,
मृत्यु से अमरता की ओर ले चलें।"
ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा
ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं
गमय ॥
ॐ शान्तिः
शान्तिः शान्तिः ॥
अगरबत्ती की मीठी
सुगंध पूरे वातावरण में फैल गई। जल्द ही आग इतनी तेज हो गई कि आगे की कतारों में
बैठे लोगों के लिए वहां टिके रहना मुश्किल हो गया। शाम 6 बजे तक महात्मा के अवशेष
पूरी तरह से राख में बदल गए।
महात्मा गांधी पंचमहाभूत में विलीन हो गए!
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर





कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।