गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आँच-56 :: कल रात ख्वाब में

आँच-56

कल रात ख्वाब में

मनोज कुमार कल रात ख्वाब में मैं तुम्हारे घर के कितने पास पहुँच गयी थी ! तुम्हारी नींद ना टूटे इसलिये मैंने दूर से ही तुम्हारे घर के बंद दरवाज़े को अपनी नज़रों से सहलाया था और चुपके से अपनी भीगी पलकों की नोक से उस पर अपना नाम उकेर दिया था ! सुबह को जब तुमने दरवाजा खोला होगा तो उसे पढ़ तो लिया था ना ? तुम्हारे घर की बंद खिड़की के नीचे मैंने अपने आँचल में बंधे खूबसूरत यादों के सारे के सारे पुष्पहार बहुत आहिस्ता से नीचे रख दिये थे ! सुबह उठ कर ताज़ी हवा के लिये जब तुमने खिड़की खोली होगी तो उनकी खुशबू से तुम्हारे आस पास की फिजां महक तो उठी थी ना ? तुम्हारे घर के सामने के दरख़्त की सबसे ऊँची शाख पर अपने मन में सालों से घुटती एक लंबी सी सुबकी को मैं चुपके से टाँग आई थी इस उम्मीद से कि कभी पतझड़ के मौसम में तेज़ हवा के साथ उस दरख़्त के पत्ते उड़ कर तुम्हारे आँगन में आकर गिरें तो उनके साथ वह सुबकी भी तुम्हारी झोली में जा गिरे ! तुम अपने बगीचे की क्यारी में पौधे रोपने के लिये जब मिट्टी तैयार करोगे तो तुम वहाँ मेरे आँसुओं की नमी ज़रूर महसूस कर पाओगे शायद मेरे आँसुओं से सींचे जाने से तुम्हारे बाग के फूल और स्वस्थ, और सुरभित, और सुन्दर हो जायें ! अपने मन में उठती भावनाओं को गीतों में ढाल कर मैंने खामोशी के स्वरों में मन ही मन दोहरा लिया था ! कहीं मेरी आवाज़ से, मेरी आहट से तुम्हारी नींद ना टूट जाये मैं चुपचाप दबे पाँव वापिस लौट आई थी ! मेरे वो सारे गीत सितारे बन के आसमान में चमक रहे हैं तुम जब आसमान में देखोगे तो हर तारा रुँधे स्वर में तुमसे मेरी ही बात करेगा तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना?

आँच का उद्देश्य कवि की भावभूमि की गरमाहट को पाठकों तक पहुँचाना और पाठक (समीक्षक) की अनुभूति की गरमाहट को कवि तक पहुँचाना है।

मेरा फोटोआज आँच पर समीक्षा के लिए साधना वैद जी की कविता कल रात ख्वाब में ली जा रही है। यह रचना उनके ब्लाग सुधीनामा पर 15-02-2011 को प्रकाशित हुई है। साधना जी अपने बारे में लिखती हैं, ‘एक संवेदनशील, भावुक और न्यायप्रिय महिला हूँ ’। यह रचना इस बात की जीती जागती मिसाल है। साधना जी अपनी पूरी बनावट, बुनावट ... और भंगिमा में कवयित्री हैं। विरासत में मिले इस गुण को न सिर्फ़ जिया है उन्होंने बल्कि उनकी रचनाएं अपनी गंध में बिल्‍कुल निजी हैं, जिसमें जीवन की विविधता की अंतरवस्‍तु सांस लेती रहती है।

आलोच्य कविता में केवल चार स्टैंजा हैं। यह रचना आद्योपान्त प्रसाद गुण से पाठक को इसकी भावभूमि तलाशने में कोई कठिनाई नहीं होती। इस कविता का काव्य-शिल्प पाठक को सहज ही कवयित्री की भाव-भूमि के साथ जोड़ लेता है। वह जैसे-जैसे इन पंक्तियों को पढ़ता जाता है, भावभूमि अनावृत होने लगती है।

एक प्रेमिका का उद्देश्य अपने प्रियतम के आस-पास अपनी उपस्थिति का सुखद आभास दिलाना होता है, वह भी बिना किसी अपेक्षा के, बिना उसे तंग किए। प्रेम की प्राथमिकता त्याग है और यही उसका उपहार भी। ऐसा नहीं कि यहाँ वर्णित प्रेम अपेक्षारहित है, बल्कि कवयित्री ने उन्हे एक सात्त्विक रूप प्रदान किया है, उनमें किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं है, वेलेन्टाइन्स डे मनाने की कोई विकृत मानसिकता नहीं है, बल्कि ऊपर से नीचे तक सराबोर करने वाले कोमल और सरस भाव हैं, त्याग का उपहार है, कोई हंगामा नहीं है, कोई शरारत नहीं है। प्रेम की बड़ी मोहक अभिव्यक्ति है। दूसरी एक और बात यहाँ महत्त्वपूर्ण है कि यह सारी अभिव्यक्ति का चलचित्र स्वप्न में चल रहा है। कविता का चित्रात्मक वर्णन कई जगह बांधता है। स्वप्न एक अवचेतन मन का क्रिया-कलाप है, जो बहुत ही शक्तिप्रद और अनभिव्यक्त विचारों की अभिव्क्ति का साधन है। अतएव इससे यह अभिव्यंजित होता है कि नायिका से नायक का मिलना और संवाद कभी-कभार ही हो पाते हैं। पर इतना तय है कि इस विरल संयोग के बावजूद नायिका में उग्रता का अभाव है। यह प्रेमाभिव्यक्ति शायद आज के प्रेमियों के पल्ले न पड़े। यही कविता की भावभूमि है।

कवियित्री की प्रेमिका बहुत सचेत है। उसे डर है कि उसके प्रेम के उद्गार के कारण कहीं प्रियतम की नींद न खुल जाय। यहाँ नींद कोई सम्मोहन नहीं है, बल्कि सार्थक श्रम को दूर करने का एक आवश्यक साधन है। प्रेमिका को श्रम का अर्थ ज्ञात है। इसलिए वह अपने प्रियतम को बिना परेशान किए अपना संदेश बन्द दरवाजे को अपनी नजर से सहलाती है और भींगी पलकों से अपना नाम उसपर अंकित नहीं करती है, उत्कीर्ण करती है। सहलाने और उत्कीर्ण करने के यहाँ अभिप्राय हैं- कुछ देर तक रुककर पूर्ण मनोयोग से अश्रु-पूरित नेत्रों से बन्द दरवाजे को ऊपर से नीचे तक देखना! साधना जी की इस कविता में काव्यनिष्ठ प्रेम की दुनिया का अंकन मिलता है, मिलता है एक अतीत राग। इससे हम खुद को जोड़ लेते हैं।

मैंने दूर से ही तुम्हारे घर के

बन्द दरवाजे को

अपनी नजरों से सहलाया था

और चुपके से

अपनी भींगी पलकों की नोक से

उस पर अपना नाम उकेर दिया था।

सुबह को जब तुमने खोला होगा

तो उसे पढ़ तो लिया था ना?

मन को भिंगो देने वाली इस प्रेम कविता के दूसरे स्टैंजा में नायिका आँचल में बँधे अपने प्रथम मिलन से लेकर स्वपन की अभिव्यक्ति तक की सम्पूर्ण सुखद यादों की माला बनाकर बन्द खिड़की के पास छोड़ आयी है, अर्थात उन सभी यादों का चलचित्र एकबार अपनी स्मृतिपट आद्योपान्त चलाया है, इस आशा के साथ कि जब नायक उठेगा तो उन यादों की सुगंध से नायिका के आने की अनुभूति उसे भी होगी-

तुम्हारे घर की बन्द खिड़की के नीचे

मैंने अपने आँचल में बँधे

खूबसूरत यादों के सारे के सारे पुष्पहार

बहुत आहिस्ता से नीचे रख दिए थे।

सुबह उठकर ताजी हवा के लिए

जब तुमने खोली होगी

तो उनकी खुशबू से तुम्हारे

आसपास की फिजाँ

महक तो उठी थी ना?

जब स्मृति-पटल पर ऐसे चलचित्र उभरते हैं तो सिसकियों का उठना स्वाभाविक है और यह तो अनुमान लगाना आसान है कि एक सिसकी नायक के घर के सामने के पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर टाँग दी ताकि वह पतझड़ में नायक के आँगन में पत्तों के साथ जाकर उसकी याद दिला दे। क्योंकि पतझड़ के वाद पुनः वृक्ष पल्लवित होते हैं, आशा भी निराशा से ही पल्लवित होती है। यहाँ नायिका की अभिलाषा व्यंजित होती है, जो उम्मीद शब्द से कही गयी है-

तुम्हारे घर के सामने के दरख्त की

सबसे उँची शाख पर

अपने मन में सालों से घुटती एक

लम्बी सुबकी को

मैं चुपके से टाँग आई थी

इस उम्मीद से कि कभी

पतझड़ के मौसम में

तेज हवा के साथ

उस दरख्त के पत्ते उड़ कर

तुम्हारे आँगन में आकर गिरें तो

उनके साथ वह सुबकी भी

तुम्हारी झोली में जा गिरे।

इस कविता में लोकगीत जैसी उदासी है। इसमें उन यादों के सहारे उठती भावनाओं की गीत को तारों के साथ सम्पृक्त करना उन्हें अर्थात अपने प्रेम को अमरत्व प्रदान करने का भाव दिया गया है। ताकि नायिका की उस मौन आवाज से या पदचाप से यदि कहीं नायक की नींद खुदा न खास्ता खुल जाय और उसकी नज़र समय का अंदाज लगाने के लिए आकाश की ओर उठे, तो सभी तारें अवरुद्ध कंठ से, अर्थात हवा में वर्तमान नमी उसकी याद दिला सके।

अपने मन में उठती भावनाओं को

गीतों में ढालकर मैंने

खामोशी के स्वरों में

मन ही मन दोहरा लिया था।

कहीं मेरी आवाज से, मेरी आहट से

तुम्हारी नींद न टूट जाए

मैं चुपचाप दबे पाँव वापिस लौट आयी थी

मेरे वो सारे गीत सितारे बन के

आसमान में चमक रहे हैं

तुम जब आसमान में देखोगे

तो हर तारा रुँधे स्वर में

तुमसे मेरी ही बात करेगा

तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना?

अंत में किया गया प्रश्न ‘तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना ?’ हमारे संवेदन को छूकर आंखों के कोर को गीला कर जाता है? यह प्रश्न-चिह्न अन्तर्मन में प्रियतम की सहमति की अपेक्षा को इंगित करता है, विश्वास को संकेतित करता है, संदेह को नहीं।

इतनी कोमल पदावलि और भावों से परिपूर्ण होने के बाद भी लगता है कि कविता में शब्द-संयम (economy of words) का अभाव है। विशेषकर अधिकांश स्थानों पर प्रयुक्त मैं, मैंने, तो, तुम शब्द अनावश्यक आ गए हैं। यदि उन्हें एकबार हटाकर कविता देखा जाय तो इसका शिल्प और निखर जाएगा। चौथी पंक्ति के अंत में आए इसलिए शब्द को यदि पाँचवीं पंक्ति के रूप में रखा जाता तो ठीक रहता। ग्यारहवीं पंक्ति में सुबह के बाद प्रयुक्त को अनावश्यक सा लगता है। तीसरे स्टैंजा की दसवीं पंक्ति में प्रयुक्त आकर पद भी अनावश्य है और यदि रखना भी हो तो उसके स्थान पर जाकर आना चाहिए। इसी प्रकार इसी स्टैंजा की तीसरी पंक्ति के अंत में आया एक शब्द चौथी पंक्ति के प्रारम्भ में रखना चाहिए या उसे हटा देना चाहिए।

इस कविता में लोकगीत जैसी उदासी और शोकांतिका है। इसमें शांत बुनावट है, कहीं कोई हड़बड़ी या अतिरिक्त आवेश नहीं है। इस कविता की भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं, जीवन की तहों में झांकने वाली आंख है। इस कविता के भीतर की तरलता और उदासी बहुत देर तक हमारा पीछा करती है।

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26 टिप्‍पणियां:

  1. कविता का पग-पग नापती सुन्दर समीक्षा। कविता भी काफी मुग्ध करनेवाली है।

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  2. तुम जब आसमान में देखोगे
    तो हर तारा रुँधे स्वर में
    तुमसे मेरी ही बात करेगा
    तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना?
    ..... Antarman se nikli prem kee gahree uchhahas dil mein gahre utar jaane ko betab hai...
    bahut hi saargarbhit sameeksha... Saarthak prastuti ke liye aabhar

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  3. आंच पर एक और उम्दा समीक्षा ... रचना और रचनाकार दोनों का मान बढ़ जाता है... समीक्षित कविता को पढने और समझने में सहायता कर रही है आपकी कविता... आपकी समीक्षा कविता की तकनीक और कसावट के बारे में अच्छी जानकारी दे रही है जो आम तौर पर कवि नज़रंदाज़ कर देते हैं... अपनी कविता को फिर से आंच पर देखने के इन्तजार में...

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  4. बधाई इस सुन्दर समीक्षा के लिए !

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  6. समीक्षा नितांत निष्पक्ष है। समीक्षक की दृष्टि से आद्योपांत सहमत हूँ। कविता में भाव बहुत कोमल हैं और सघन भी, इसीलिए हृदय में गहरे तक उतरते हैं। कविता में सर्वनाम और अव्ययों का प्रयोग अधिकांश अनावश्यक हुआ है जबकि इनकी अधिकता काव्यत्व को क्षीण करती है। शिल्प के प्रति कवयित्री की शिथिलता से कविता वह उत्कर्ष नहीं पा रही है जिसकी यह पात्र होनी चाहिए।

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  7. .

    मनोज जी आपने एक अच्छी कविता की बेहतरीन समीक्षा की. बधाई.

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  8. यह भावाभिव्यक्ति मन को कहीं गहरे छूती है ....जितनी खूबसूरत रचना है उतनी ही अच्छी समीक्षा ...आपकी समीक्षा ने भावों को गहन अर्थ दिए हैं ...

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  9. समीक्षा अच्छी लगी.साधना जी की कविता slide के ज़रिये आपने जो पढवाई वो और भी अच्छा लगा.

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  10. बहुत सुंदर कविता और उतनी ही अच्छी समीक्षा -
    कविता की सुन्दरता को चार चाँद लगाती हुई समीक्षा .
    कवियित्री और समीक्षक दोनों ही बधाई के पात्र हैं .--

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  11. आपकी लिखी समीक्षा से इच्छुक व्यक्ति कविता बनाना भी सीख सकते हैं.वस्तुतः यह प्रेरणास्पद कार्य है.

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  12. आपकी समीक्षा की आँच में तप कर मेरी रचना और निखर कर सामने आई है ! आपकी हृदय से आभारी हूँ ! आपने जिन कमियों की ओर संकेत किया है उनका अवश्य ध्यान रखूँगी ! सधन्यवाद !

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  13. जितनी गहन कविता है उतनी ही सशक्त समीक्षा……………आँच की कसौटी पर कसकर कविता के शिल्प मे चार चाँद लग गये हैं…………बेहतरीन्।

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  14. सश्क्त कविता के लिये सश्क्त समीक्षा। साधना जी को बधाई।

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  15. मनोज जी,
    साधना वैद जी की कविता की समीक्षा इतनी सूक्ष्मता से आपने किया है कि कविता तप कर और निखर गयी है !
    सुन्दर कविता और सटीक समीक्षा के लिए साधना जी और आप दोनों बधाई के पात्र हैं !

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  16. इस सुन्दर समीक्षा के लिए आप का धन्यवाद

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  17. कोमल भाव पूर्ण कविता की निष्पक्ष और खूबसूरत समीक्षा ने कविता का सौंदर्य और अर्थ और गहन कर दिया.

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  18. साधना जी की कविताएँ बहुत ही भावनाप्रधान..मर्मस्पर्शी और ख़ूबसूरत हुआ करती हैं.

    आपकी इस बेहतरीन समीक्षा ने कविता को और भी अच्छी तरह समझने के नए आयाम प्रस्तुत कर दिए.

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  19. जितनी मोहक कविता है,उतनी ही उत्कृष्ट समीक्षा है...

    बड़ा अच्छा लगा पढ़कर...

    बहुत बहुत आभार..

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  20. तुम उन बातों को समझ तो पाओगे ना....?

    आह... ! इस एक पंक्ति में कितनी गहन वेदना है.... ! समीक्षा कविता की विराटता की प्रतिरूप है. सत्यम ! शिवम !! सुंदरम !!!

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  21. आंच की समीक्षा हर बार कुछ सीखने का अवसर भी प्रदान करती है. सुंदर कविता की सुंदर समीक्षा के लिए बधाई.

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  22. कविता और समीक्षा दोनों बहुत अच्छी लगीं। आप दोनों को आभार,

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  23. hamesha se hi sameekshaayen mujhe apni or aakarshit karti hain aur barbas hi me waqt nikal kar inhe padhne aa jati hun...kyuki ye sameekshayaen hoti hi itni acchhi hain ki hame ek sudrad /spasht soch milti hai sameeksha ko padhne ke baad us kavita ko dubara padhne ke liye.

    aapne sach me is kavita ki bahut acchhi sameeksha ki hai. ant me beshak aapne kuch shabd anavashyak bata kar apne aalochna paksh ki beshak khana purti ki ho, lekin sach maniye ye shabd kavita ki kasavat me koi kami nahi laa rahe hain.

    maafi chahungi agar meri baat buri lage to mujhe apka alochna paksh sirf jabardasti ki khana purti hi laga. aur is baat ke liye koi shak nahi ki me galat bhi ho sakti hun, lekin sameeksha vastav me bahut acchhi rahi.aapko aur saadhna ji ko bahut bahut badhayi.

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  24. jaisi sundar kavita hai vaisi hi achchi samikcha hai,ekdam sone men suhaga.

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  25. बहुत सटीक समीक्षा की है |बहुत सुन्दर मनको छूती कविता |कवियत्री और समीक्षक दौनों को बहुत बहुत बधाई |
    आशा

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