शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

शिवस्वरोदय-32

शिवस्वरोदय-32

-आचार्य परशुराम राय

पृथ्वीजलाभ्यां सिद्धिः स्यान्मृत्युर्वह्नौ क्षयोSनिले।

नभसो निष्फलं सर्वं ज्ञातव्यं तत्त्ववादिभिः।।162।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ – पृथ्वी और जल तत्त्वों के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए कार्य सिद्धिदायक होते हैं, अग्नि तत्त्व में प्रारम्भ किए गए कार्य मृत्युकारक, अर्थात नुकसानदेह होते हैं, वायु तत्त्व में प्रारम्भ किए गए कार्य सर्वनाश करनेवाले होते हैं, जबकि आकाश तत्त्व के प्रवाह काल में शुरु किए गए कार्य कोई फल नहीं देते, ऐसा तत्त्ववादियों का मानना है।

English:- As per keen observation made by the wise men, the work started during the flow of earth and water in the breath gives positive result, whereas fire and air create miseries, but other gives no result.

चिरलाभः क्षितेर्ज्ञेयस्तत्क्षणे तोयतत्त्वतः।

हानिः स्यान्हि वाताभ्यां नभसो निष्फलं भवेत्।।163।।

अन्वय श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ:- पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में प्रारम्भ किये गये कार्य में स्थायी लाभ मिलता है, जल तत्व में दक्षिण लाभ मिलता है, अग्नि और वायु तत्व हानिकारक होते हैं और आकाश तत्व परिणामहीन होता है।

English:- In view of the above observation wiseman subject to start the work during flow of the earth in the breath if permanent result is desired; for temporary result, flow of water should selected. Flowing periods of the fire and air are always harmful and the work begin during the flow of other does not give any kind of result.

पीतः शनैर्मध्यवाही हनुर्यावद् गुरुध्वनिः।

कवोष्णः पार्थिवो वायुः स्थिरकार्यप्रसाधकः।।164।।

अन्वय श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ:- पृथ्वी तत्व का वर्ण पीला है। यह धीमी गति से मध्य में प्रवाहित होता है। इसकी प्रकृति हल्की और उष्ण है। ठोढ़ी तक इसकी ध्वनि होती है। इसके प्रवाह के दौरान किए गए कार्यों में भी स्थायी रूप से सफलता मिलती है।

English:- The earth tattva has yellow colour, it flows slow and in the middle of the air passage. It nature is light and hot. It sounds upto our chin. The flow of this tattva is auspicious for starting any work in which we need permanent result.

अधोवाही गुरुध्वानः शीघ्रगः शीतलःस्थितः।

यः षोडशाङ्गुलो वायुः स आपः शुभकर्मकृत।।165।।

अन्वय श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ:- जल तत्व श्वेत वर्ण का होता है। इसका प्रवाह तेज और नीचे की ओर होता है। इसके प्रवाह काल में साँस की आवाज अधिक होती है और इस समय साँस सोलह अंगुल (लगभग 12 इंच) लम्बी होती है। इसकी प्रकृति शीतल है। इसके प्रवाह काल में प्रारम्भ किये गये कार्य सफलता (क्षणिक) मिलती है।

English:- Water tattva has white colour. Its flow is fast and downwards. Sound is more prominent in the breath during its flow. The length of breath during the appearance of water tattva in it, is sixteen fingers, i.e. about 12 inches. Its nature is cool. Any work started during the period gives positive result, but of temporary nature.

आवर्तगश्चात्युष्णश्च शोणाभश्चतुरङ्गुलः।

उर्ध्ववाहि च यः क्रूरः कर्मकारी स तेजसः।।166।।

अन्वय श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ:- अग्नि तत्व रक्तवर्ण है। यह घुमावदार तरीके से प्रवाहित होता है। इसकी प्रकृति काफी उष्ण है। इसके प्रवाह काल में साँस की लम्बाई चार अंगुल और ऊपर की ओर होती है। इसे क्रूरतापूर्ण कार्यों के लिए उपयोगी बताया गया है।

English:- Fire tattva got its colour like blood. During its appearance the breath flows in whirl. Its nature is very hot. The length of breath during the appearance of this tattva, becomes four fingers, i.e. about three inches, but upwards. The period of flow of this tattva in breath is suitable for starting the work of a cruel nature.

उष्णः शीतः कृष्णवर्णस्तिर्यगान्यष्टकाङ्गुलः।

वायुः पवनसंज्ञस्तु चरकर्मप्रसाधकः।।167।।

अन्वय:- वायु: पवनसंज्ञस्तु कृष्णवर्ण: तिर्यग्गामी उष्ण: शीत: अष्टकाड्ग़ुल: चर-कर्मप्रसाधकरश्च।

भावार्थ:- वायु तत्व कृष्ण वर्ण (गहरा नीला रंग) है, इसके प्रवाह के समय साँस की लम्बाई आठ अंगुल और गति तिर्यक (तिरछी) होती है। इसकी प्रकृति शीतोष्ण हैं। इस अवधि में गति वाले कार्यों को प्रारम्भ करने पर निश्चित रूप से सफलता मिलती है। परमपूज्य परमहंस सत्यानन्द सरस्वती जी महाराज ने इसके विषय में लिखा है कि भीड़-भाड़वाले प्लेटफार्म पर ट्रेन छूट रही हो और उसे पकड़ने के लिए आप दौड़ लगा रहे हैं। ऐसे समय में यदि स्वर में वायु तत्त्व वर्तमान हो, निश्चित रूप से आप ट्रेन पकड़ने में सफल होंगे।

English:- Vayu tattva (air) has dark blue colour. During its flow the breath becomes eight fingers (six inches) long and angular. Its nature is lukewarm. This period is suitable for starting a work relating to movement. Parama Pujaya Paramahansa Satyananada Saraswati has indicated that if you are running to catch a train at a crowded platform and Vayu Tattva is active at the time, you shall get into the train without fail.

यः समीरः समरसः सर्वतत्त्वगुणावहः।

अम्बरं तं विजानीयात् योगिनां योगदायकम्।।168।।

अन्वय - श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय करने की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ जब स्वर में उक्त सभी तत्त्वों का संतुलन हो और उनके यथोक्त गुण उपस्थित हों तो उसे योगियों को मोक्ष प्रदान करनेवाला आकाश तत्त्व समझना चाहिए, अर्थात आकाश तत्त्व में अन्य चार तत्त्वों का संतुलन पाया जाता है और उनके गुण भी पाए जाते हैं तथा इसके प्रवाह काल किए गये योग-साधना में पूर्णरूप से सिद्धि मिलती है।

English During the flow of ether in the breath all other four Tattvas get balanced and their properties, as described above, are found present in it. This period is the most suitable period for getting perfection in yogic practices.

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16 टिप्‍पणियां:

  1. ऋषि परंपरा की उत्कृष्ट थाती यहाँ परोस कर आप बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। साधुवाद।

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  2. पृथ्वी और जल तत्त्वों के प्रवाह काल में प्रारम्भ किए कार्य सिद्धिदायक होते हैं, अग्नि तत्त्व में प्रारम्भ किए गए कार्य मृत्युकारक, अर्थात नुकसानदेह होते हैं, वायु तत्त्व में प्रारम्भ किए गए कार्य सर्वनाश करनेवाले होते हैं, जबकि आकाश तत्त्व के प्रवाह काल में शुरु किए गए कार्य कोई फल नहीं देते, ऐसा तत्त्ववादियों का मानना है।
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    उपयोगी और ज्ञानवर्धक पोस्ट!

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  3. स्वर विज्ञान का प्रसार कर आप समाज के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। क्योंकि इस विद्या के जानकार बहुत ही कम लोग मिलते हैं।

    आपको आभार,

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  4. शिव ही शव को शिव करते हैं..

    बहुत सुब्दर भाई..

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  5. महत्वपूर्ण जानकारियों के इस क्रम से लोगों को अवश्य ही लाभ उठाना चाहिए.

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  6. ज्ञानवर्धक और उपयोगी.... ! आचार्य के ज्ञानकोष और सद्प्रयास को नमन !!

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  7. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  8. आप सभी पाठकों को इस पोस्ट पढ़ने और अपने विचार देने के लिए हार्दिक आभार।

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  9. हमेशा की भांति ज्ञानवर्धक एवं संग्रहणीय लेख.

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  10. नमन!
    इस ज्ञान के खजाने को लूट-लूट कर हम धन्य हो रहे हैं।

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  11. नमन!
    इस ज्ञान के खजाने को लूट-लूट कर हम धन्य हो रहे हैं।

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  12. एक दुर्लभ विषय पर इतनी सरल व्याख्या पाकर हम धन्य हुये! आचार्य जी नमन!!

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  13. ज्ञानवर्धक लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद!

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  14. गहन चिन्तनयुक्त विचारणीय पोस्ट ...आभार.

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