गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

आँच-54 :: ‘शिकायतें, जो रहती नहीं’

आँच का उद्देश्य कवि की भावभूमि की गरमाहट को पाठकों तक पहुँचाना और पाठक (समीक्षक) की अनुभूति की गरमाहट को कवि तक पहुँचाना है।

आँच-54 तुमने झांककर कमरे में देखा है/ कहा कुछ भी नहीं। मेरा तपता माथा/ तुम्हारी उंगलियों की/ छांव ढूंढता है। मेरी गर्म हथेली पर/ क्यों नहीं उतरती /तुम्हारे पसीने की ठंडक? मैं घूमकर बिस्तर पर से /खिड़की को देखती हूं। दो हरे पर्दे हैं, और है नीम की हरियाली। आंखें तब क्यों लाल-सी लगती हैं? क्यों सब मुरझाया लगता है? तुम तेज़ चले जाते हो, मैं भी तो थमती, रुकती नहीं आजकल। ये पछुआ /हमको और बहाए जाता है। कुछ कोमल-सा /जो मन में था, वो खुश्क बनाए जाता है। मैं नींद में कुछ डूबती-उतराती हूं, आवाज़ों को कभी पास बुलाती हूं, कभी दूर भगाती हूं। इसी खुमारी में /मैंने तुम्हारी सधी आवाज़ सुनी है। उसमें घुलते/ सुना है दो तोतली बोलियों को। तीनों आवाज़ें/ अब खिलखिलाती हैं, कुछ गीत गाती हैं। कभी फुसफुसाती हैं। मेरे मन की रही-सही शिकायतें दो ठंडे मोती बनकर/ तकिए पर लुढ़क आती हैं।

‘शिकायतें, जो रहती नहीं’

- हरीश प्रकाश गुप्त

anuअपने और अपने ब्लॉग के बारे में लिखते हुए अनु सिंह चौधरी कहती हैं,मकसद वो सब कहना है जो सुनती, समझती, देखती, गुनती आई हूं। यहां मेरे दायरे के हर रंग मिलेंगे - गांव की मिट्टी की खुशबू, पर्व-त्यौहारों की रौनक, औरत के कई मूड्स, यहां तक कि राजनीतिक और वैचारिक टिप्पणियां भी। लेकिन सब मेरे अपने विचार होंगे, मेरी सीमित संभावनाओं का दर्पण।”  साहित्य की छात्रा रही, अनु को प्रशिक्षण पत्रकारिता का मिला। उन्होंने मुंबई में एक फिल्म प्रोडक्शन हाउस के साथ कैरियर शुरू किया, लेकिन वापस न्यूज़ चैनल पहुंच गईं। फितरत से घूमन्तू और सबसे बड़ी ख्वाहिश बच्चों के साथ अस्सी दिनों में दुनिया देखने की पालने वाली अनु के ब्लॉग का नम भी “मैं घुमन्तू” है।

यह मानवीय प्रकृति है कि शिकायतें उन्हीं के प्रति उपजती हैं जिनसे हमारी अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं। जिनसे हमारी अपेक्षाएं नहीं जुड़ी होतीं उनसे छोटी तो क्या बड़ी बात होने पर भी बात आई गई हो जाती है और कोई शिकायत शेष नहीं रह पाती। जितनी बड़ी अपेक्षाएं, उतने ही छोटे-छोटे विषयों की शिकायतें। वास्तव में, शिकायतें और अपेक्षाएं परस्पर अन्योन्याश्रित होती हैं। अनु सिंह चौधरी  की कविता ‘शिकायतें, जो रहती नहीं’ इन्हीं शिकायतों और अपेक्षाओं के मध्य तिरते प्रेम की अभिकथा है जो आवेग का प्रवाह लेकर विप्रलम्भ रूप में प्रकट हुई है।

जीवन का यथार्थ कल्पना लोक की उड़ान नहीं है। इसकी राह सुगम भी है और कंटकाकीर्ण भी। जीवन में सुख भी हैं और कष्ट भी। आसक्ति और अनुरक्ति जीवन को प्रसन्नता व प्रफुल्लता से भर देते हैं तो कभी-कभी ऐसे अवसर भी आते हैं जो रिश्तों के बीच दरार बनकर उभरते हैं, दूरियां बढ़ाते हैं। यह वियोग की अवस्था है। इस अवस्था में अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। मिलन का आवेग शब्द और स्पर्श से सामीप्य की अभिलाषा करता है। लेकिन आग्रहों की दीवारें आगे बढ़ने नहीं देतीं। संवेग प्रबल होने पर उद्विग्नता बढ़ती है और विकलता भी बढ़ती है। तब मिलन की उत्कट अभिलाषा स्मृति के उन पलों में विचरण करने पहुँचा देती है जो सुखद हैं, मन को सुकून देते हैं। जीवन में प्रेम, स्नेह और ममता ऐसी भावनाएं हैं जो कठिन से कठिन वेदना को भी आच्छादित कर लेती हैं। जब ये अनुभूतियाँ हृदय में गहरे तक प्रविष्ट होती हैं तो संतृप्त मन में विरह जनित शिकायतें स्थिर नहीं रह पातीं, विलुप्त हो जाती हैं। कुछ-कुछ इसी भावभूमि पर लिखी गई अनु सिंह चौधरी की कविता ‘शिकायतें, जो रहती नहीं’ बेहद मार्मिक और भाव प्रधान बन पड़ी है।

कविता में विप्रलम्भ की तीन अवस्थाओं - अभिलाषा, स्मरण और गुणकथन की अभिव्यक्ति हुई है। ‘तुमने झांककर / कमरे में देखा है .......... क्यों नहीं उतरती / तुम्हारे पसीने की ठंडक?’ में नायिका विरह से विकल होकर नायक के स्पर्श और उससे संवाद की अभिलाषा करती है। ‘मैं घूमकर बिस्तर पर से / खिड़की को देखती हूं ......... मैं भी तो / थमती, रुकती नहीं आजकल।’ में वह स्मरण तथा ‘ये पछुआ हमको / और बहाए जाता है ........... कभी फुसफुसाती हैं।’ में गुणकथन अभिव्यक्त करती है। सामान्य शिल्प में गुँथी हुई कविता सम्प्रेषण में सरल और सहज है तथा हृदय को स्पर्श करती है। यदि ‘नीम’ को पृथक कर दें तो समस्त बिम्ब हालॉकि परम्परागत हैं, किन्तु सार्थक हैं। ‘नीम’ बिम्ब का आभास कराता है और अर्थ तक सीधी पहुँच नहीं बनाता। यहाँ ‘मैं घूमकर बिस्तर पर से’ निरक्षपेक्ष दृष्टि से अवलोकन की ओर इंगित करता है। हालाकि इसमें ‘मैं’ और ‘पर’ अवरोधक हैं तथा अनावश्यक से प्रयोग हैं। ‘दो हरे परदे’ ‘दो तोतली बोलियों’ की तरह दो बच्चों की तरह प्रस्तुत हैं जो अपनी चहक से घर संसार को खुशियों से भर देते हैं। वहीं ‘नीम’ परिवार की खुशियों के बीच नायक के संदर्भ में उपजी कड़वाहट की प्रतीक है। खुशहाली के मध्य कटुता का स्मरण क्रोध के रूप में अभिव्यक्त होता है। ‘आँखें तब क्यों / लाल-लाल सी लगती हैं’ और ‘क्यों सब / मुरझाया लगता है’ में प्रश्नगत ‘क्यों’ का प्रयोग अस्पष्ट सा प्रतीत होता है जबकि सम्पूर्ण कविता में स्पष्टोक्ति मुखर है। ‘पछुआ’ बुद्धि तत्व की प्रधानता वाली आधुनिक विचारोत्तेजना है जो संवेदना से दूर कर देती है तथा जो सरस है उसे भी खुश्क अर्थात् नीरस बना देती है। यहाँ, भाव इतने सघन और आकर्षक हैं कि प्रसाद विरचित ‘आँसू’ की निम्न पंक्तियां बरबस स्मरण हो आती हैं –

‘नाविक इस सूने तट पर

किन लहरों में खे लाया

इस बीहड़ बेला में क्या

अब तक था कोई आया’

कविता की अंतिम पंक्तियां ‘मेरे मन की रही-सही / शिकायतें / दो ठंडे मोती बनकर / तकिए पर लुढ़क आती हैं।’ में शिकायतें भी स्मृतियों के माध्यम से भावनाओं के रूप में सघन हो उठती हैं और ‘दो ठण्डे मोती’ बनकर अन्तर्मन को शीतल कर जाती हैं। प्रसाद जी ने भी इन्हीं भावों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है –

‘छिल-छिल कर छाले फोड़े

मल-मल कर मृदुल चरण से

घुल-घुल कर बह रह जाते

आँसू करुणा के कण से’

कविता में दो सींगो वाली सहायक क्रिया ‘है’ तथा सर्वनाम ‘मैं’ का प्रयोग अधिक हुआ है। विशेष रूप से ‘कमरे में देखा है’, ‘मैं घूमकर बिस्तर पर से’, ‘दो हरे पर्दे हैं’ और ‘और है नीम की हरियाली’ आदि में अधोरेखा वाले पदों की अनुपस्थिति अर्थ को अधिक स्पष्ट बनाती है तथा प्रवाह में भी बाधक नहीं बनती। यहाँ यह उल्लेख करना सुसंगत प्रतीत होता है कि कविता में निरर्थक पदों का प्रयोग काव्यत्व को क्षीण करता है।

कविता में प्रयुक्त बिम्ब ‘आवाज़ों को / कभी पास बुलाती हूं / कभी दूर भगाती हूं।’ , ‘मेरा तपता माथा / तुम्हारी उंगलियों की / छांव ढूंढता है।’ और ‘मेरी गर्म हथेली पर / क्यों नहीं उतरती / तुम्हारे पसीने की ठंडक?’ आदि प्रयोग की विशिष्टता के कारण आकर्षक और प्रभावी बन जाते हैं। शिकायतों की भूमिका के संबन्ध में कविता नायिका का आत्मालाप नहीं बनती वरन् वह स्वयं को भी निर्दोष नहीं मानती। तभी तो वह कह जाती है कि ‘मैं भी तो / थमती, रुकती नहीं आजकल।’ यह उसकी तटस्थता है। बिम्बात्मक अभिव्यक्ति से कविता का वजन बढ़ा है। संक्षेप में अनु सिंह चौधरी की कविता ‘शिकायतें, जो रहती नहीं’ को सघन भावों की ईषत् विरल अभिव्यक्ति कहा जा सकता है।

***

23 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा अनुजी मिलकर ...... उनकी रचनाएँ उनके ब्लॉग पर भी पड़ी हैं...... उनके विषय में जानकारी के लिए आभार

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  2. .

    ‘छिल-छिल कर छाले फोड़े
    मल-मल कर मृदुल चरण से
    धुल-धुल कर वे रह जाते
    आँसू करुणा के जल से’

    @ कृपया फिर से पढ़ें, क्या उक्त पंक्तियाँ इसी प्रकार हैं :

    मुझे ध्यान है प्रसाद जी ने कुछ यूँ कहा है :
    छिल-छीलकर छाले फोड़े
    मल-मलकर मृदुल चरण से
    घुल-घुलकर रह वह जाते
    आँसू करुणा के कण से.

    और होना भी इसे यूँ ही चाहिए.... अन्यथा 'पीड़ा' पूरी तरह व्यंजित नहीं होगी.
    पूरे छंद में पीड़ा की ध्वनि वृत्य अनुप्रास वाली है.
    एक घायल व्यक्ति का बिम्ब मानस में बैठाइए फिर अर्थ करें तो पीड़ा महसूस होगी.
    "प्रिय के विछोह से हृत में विरह ज्वाला ने छाले कर दिए हैं.
    और प्रिय की सुखद स्मृति [अपने कोमल च्रोनों से] आ-आकर उसे और अधिक मसले दे रही है.
    मेरी कारुणिक दशा है. आँसू बह-बहकर मेरे हृत घावों की पीड़ा दूर नहीं कर पा रहे हैं. उनका घावों में मिल जाना व्यर्थ हो रहा है.

    .

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  3. कविता मोती सा खिले गुप्त जी तोलें साँच ,
    कुंदन सा चम् चम् करे चढ़े समीक्षा -आंच

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  4. .

    त्रुटि सुधार :

    [अपने कोमल चरणों से] से पढ़ें

    .

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  5. अनु सिंह चौधरी के विषय में जानकर अच्छा लगा...आभार.

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  6. आंच की मद्धम आंच पर आज अनु जी की कविता चढ़ कर और भी निखर गई.. जब गुप्त जी जैसे समीक्षक और आलोचक हो तो कविता की समीक्षा उत्कृष्ट बनेगी ही...

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  7. अनु जी से मिलकर अच्छा लगा………उनकी कविता की इतनी सुन्दर समीक्षा पढकर कविता का सौंदर्य दुगुना हो गया…………उनके ब्लोग को फ़ोलो भी कर लिया।

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  8. हरीश जी, आप पाठकों की ज़रूरत समझने वाले समीक्षाकार हैं। आप पाठक और रचनाकार के रिश्ते के लगाव को समझते हैं। इस हिसाब से आपने विवेच्य रचना की समीक्षा की है इसलिए आपकी समीक्षा काव्य के शिल्प के आस्वाद को पाठकों तक पहुंचा रही है और वह पाठक को रचना के प्रति आत्मीय बना देता है।

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  9. अनु जी कि रचनाएँ और निखर गईं इस समीक्षा से...
    अति सुन्दर रचनाओं की बेहतरीन समीक्षा.

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  10. आंच अपने उद्द्येश्य में पूर्णतः सफल है. जय हो.......... !

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  11. हरीश जी ने अनुजी की कविता में प्रयुक्त बिम्बों में अन्तर्निहित भावों का अनावरण बड़ी ही कुशलता पूर्वक किया है। साधुवाद।

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  12. बहुत सुंदर

    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

    "गौ माता की करूँ पुकार सुनिए और कम से ....." देखियेगा और अपने अनुपम विचारों से

    हमारा मार्गदर्शन करें.

    आप भी सादर आमंत्रित हैं,
    http://sawaisinghrajprohit.blogspot.com पर आकर हमारा हौसला बढाऐ और हमें भी धन्य करें...

    आपका अपना सवाई

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  13. कविता के गूढ़ अर्थ समझना और उसके शिल्प को व्याख्यायित करना ज्ञानी जनों के लिए ही संभव है। मैं तो बस आनंद लेकर चल देने वाला एक साधारण पाठक ठहरा।

    हाँ, अनुजी की कविताएँ आनंदित करती हैं। मेरे लिए इतना बहुत है।

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  14. अनु जी से आपने न केवल पकठकों को मिलवाया बल्कि उनकी रचनाओं की सुम्दर समीक्षा भी प्रस्तुत की है!

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  15. अनु सिंह चौधरी जी को पढना अच्छा लगा धन्यवाद

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  16. कविता बहुत अच्छी है। दाम्पत्य जीवन में प्रवेश अनेक सामूहिकताओं और उत्तरदायित्वों की मांग करता है जिसकी ओर समीक्षा में भी समुचित ध्यानाकर्षण किया गया है।

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  17. इनकी समीक्षा किसी और ब्लॉग पर पढ़ी थी कहीं.. ख़ैर इस आँच की तपिश भी अच्छी लगी!!हरीश जी एवम् अनु जी का आभार!!

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  18. @ प्रतुल वशिष्ठ जी,

    त्रुटि पर ध्यान दिलाने के लिए आपका आभारी हूँ। वास्तव में मैंने काफी पहले, अस्सी के दशक में, इसे पढ़ा था। तब से यही शब्द स्मृति में थे। शायद मैंने जो प्रकाशन पढ़ा हो वह ही त्रुटि पूर्ण रहा हो या फिर अनायास ही इन शब्दों ने पैठ बना ली हो। जो भी हो, आप द्वारा इंगित किए जाने पर मैंने पुनः पुस्तक लेकर भ्रम दूर किया। आलेख में पद के मूल पाठ के अनुसार संशोधन कर दिया है।

    आपको एक बार पुनः आभार।

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  19. आंच पर आप सबने आपनी तटस्थ एवं बेबाक टिप्पणियों द्वारा मेरा मनोबल बढ़ाया है इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूँ।

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