मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

देसिल बयना - ६७ : देव न मारे डांग से......

-- करण समस्तीपुरी


चलित्तर माझी का पूरा परिवार बड़ा ही मिलनसार और मेहनती था। चलित्तर अपने गांव गली में घूम-घूम कर बदाम-पापरी और चनाजोर गरम बेचता था। रामदेव और कामदेव दोनो बेटा खेती-पथारी और मेहनत मजूरी कर के गुजर करता था। लेकिन सब हंसी-खुशी से था।

चलित्तर माझी दुइये घंटा के फेरी में बक्सा भर चनाजोर गरम बेच लेते थे। चनाचूर से ज्यादा मजेदार तो उनका फकरा होता था......... “मेरा चना बना है ईर... खाये राम-लखन सा वीर.... चलाये गढ लंका पर तीर... रावण गया दौड़के कुंभकरण का डेरा.... भैय्या उठो, दुश्मन लंका घेरा... जब कोई काम न आया.... तब उसका निंद भगाया.... चनाजोर गरम.... !!"

चलित्तर माझी उतरवारी टोल में टाही (आवाज़) लगाते थे तो दखिनवारी टोल में रुपैय्या-पैसा-अनाज-उनाज लेके तैय्यार रहे, चनाजोर गरम खरीदने के लिये। चार आना-आठ आना में खोमचा भर-भर के खाते थे खोमचा भर-भर के चना जोर गरम। साथ में चलित्तर माझी का फकरा फ्री।

गेहुं का पौधा ठूंठ भर का हो गया था। कमौनी और पटवन का टाइम था। लालकक्का कहे रहे कि जाओ चलित्तर के दुन्नु बेटा को बुला लाओ। भिरिया खेत में दो दिन में कमौनी कर देगा तो फुलचनमा पम्पिंगसेट लगा रहा है। पटवन भी हो जायेगा।

यही चक्कर में गये रहे चलित्तर माझी कने। रमुआ गाय-बैल को सानी-पानी दे रहा था और कमुआ खद्दर का कुर्ता-टोपी पहन के पता नहीं कहां जाने की तैय्यारी में था। हमरे आने का मतलब तीनो बाप-पुत समझ रहे थे। फिर भी पूछा, “का बात है दिवानजी....?” मैने कहा, “लालकक्का बोले हैं भिरिया खेत में कमौनी के लिये...!” कमुआ बोला था, “कमौनी दू दिन बाद होगा... आज हमें पाटी के रैली में पटना जाना है।“

“अब कौन कमौनी और निकौनी करता है बबुआ.... देखते नहीं हैं.... इहां तो माथा पर नेतागिरी का भूत सवार है। ससुर का करम ही बाम है.... इहां अपना काम-धंधा छोड़ के जायेगा झूठे के हुले-हुले करने.... वही हुरेल-हुरेल से जिनगी चलने वाला है..... !” चलित्तर माझी के बोली में गुस्सा और दुख दोन्नो मिला हुआ था।
कमुआ चट से बोला, “वैसे भी जिनगी भर खुरपी ठेलने से का मिलने वाला है.... ? एक बार टिकस मिल जाये तो देखना बिडिओ-कलस्तर सभी आगे-पीछे डोलेंगे। तुम्हौ आराम से रहोगे... गली-गली में चनाजोर गरम का रेरी नहीं लगाना पड़ेगा.... !” कहते हुए कमुआ अपना झंडा-झंडी उठाया और चलित्तर के सामने से ’इनकिलाप-जिन्दाबात करते हुए निकल पड़ा।
चलित्तर माझी खिझ कर बोले थे, “जाओ ससुरे.... ! तुम्हरी बुद्धिये भिरस्ट हो गयी है.... ! कौनो नहीं बचा सकता है। ई नेतागिरी नहीं न... सर पे काल नाच रहा है.... उ कहते हैं नहीं कि ’देव न मारे डांग (डंडा) से, देत कुपंथ चढाय। चढ गये हो कुपंथ पे.... रामजी रच्छा करें।“
चलित्तर माझी तो और बोलते ही जाते मगर हम बीचे में टोक दिय, “देव न मारे डांग से....!” ई कौन नया फकरा गढे हैं चलित्तर काका.... ?” फिर चलित्तर माझी हमको समझाते भये, “नया.... ई तो बहुत पुरानी कहावत है। आपही के बाबा तो कहे रहे थे ’रमैन’ में से।“

हम अन्जाने बने रहे तो चलित्तर माझी फिर बोले, “औरत की जात समझ लीजिये कि जिद का घर। ई आज से नहीं.... सतजुगे से है। महादेव की पहली लुगाई थी न सती.... पहिले तो घर-द्वार सब छोड़ के शिवजी से ब्याहकर कैलाश आ गयी और फिर नैहर जाने की जिद। बाप-भाई कोई पूछे नहीं तैय्यो जायेंगे। एक बार उके बाप के घर में जग था। सब देवता-पित्तर को न्योता दिये रहे मगर बेटी-दमाद को कौनो खबर नहीं। मगर सतीजी तो कहें कि हाय नरायण.... हमरे नैहर में जग हो रहा है, हम तो जैबे करेंगे.... हो सकता है बाबूजी कौनो कारण से भूल गये होंगे न्योत भेजना।“

शिवजी पहिले तो बहुत समुझाये मगर नहीं मानी तो बोले जाओ मगर इयाद रखना, “बिना बुलाये जा रहे हो... कुछ उंच-नीच हो तो हमे मत कहना.... !” सती के नैहर में जग तो सच में बड़ा भारी हो रहा था। मगर उहां का हुआ... माई-बहिन कछु बोली कि केहु और से झगरा झंझट होय गया... सती फटाक से हवन-कुंड में कूद के जान दे दी।“

“फिर तो शिवजी के गण सब दच्छ परजापति के जग का ’त्र्यम्बकं यजामहे...’ कर दिये। उधर से महादेव भी आ गये..... “ढूंढे शिव नहीं मिलि भवानी.... पारवतीपति बने मशानी.... ! सब कुछ त्याग कर बैठ गये तपस्या में।“

“उधर एगो राछ्स पैदा ले लिया तारकासुर। ससुर ऐसन उतपाती कि सब देवता को नाक में दम। उको बरदाने मिला था कि उ को सिरिफ़ शिवजी के बेटा मार सकता है और कोई नहीं..... !”
चलित्तर माझी एकदम व्यासजी जैसे परवचन दिये जा रहे हैं,”बात तो ठीक है मगर शिवजी का बेटा हो कहां से... ? वैसे राजा हिमाचल के इहां वही सती पारवती बन के जनम ली थी और शिवजी से ब्याह करने के लिये ऐसन तपस्या की थी कि धरती हिलने लगी.... !”

“सब देवता चिंतित। ई सारा समस्या का तो एक्कहि उपाय था कि किसी तरह शिवजी को ध्यान से जगाया जाय। मगर ई काम करेगा कौन ? सब को डर था कि कहीं शिवजी का कोपभाजन न बनना पड़े। आखिर सब सोच-विचार कर कहे चलो काम-वासना के देवता कामदेव को ही सूली पर चढा देते हैं। वैसेभी उ तो कौनो काम करता नहीं है उलटे हम लोगों के सिर पर सवार होकर नचाते रहता है। एक पंथ दो काज हो जायेगा।“

“अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।.... सब देवता गये और कामदेव का इतना ’लल्लो-चप्पो’ किये कि उ ससुर चल पड़ा शिवजी से लोहा लेने। फूल के बाण, बसंती बयार.... मन में गुदगुदी और जाने का सब.... अपना सारा हथियार उ शिवजी पर तान दिया।“
शिवजी को क्रोध आ गया.... ! इधर-उधर देखे.... ! कामदेव एगो मजरल आम के पल्लव के पीछे नुकाये हुए थे। मगर शिवजी से कौन बच सकता है? जैसे ही तिसरा नेत्र खोले, कामदेव हो गये जल के राख!”

बहुत आया था देवता सब का बात मान के। देवता सब का तो काम होइये गया.... मगर जान से कौन गया... कामदेव। उ सब पर काम-वासना का खूब डंडा चलाया था मगर देवता लोग उसको डंडा से मारने नहीं गये। बस ऐसा कुपंथ चढाये कि उ शिवजी से ही दुश्मनी ले लिया और हो गया जल के ठ्न-ठ्न गोपाल... ! तभिये से ई कहावत बना कि ’देव न मारे डांग से देत कुपंथ चढाय!” हम भी मन में सोचे रे तोरी के... चलित्तर माझी सिरिफ़ चनाजोरगरम का फ़करा ही नहीं.... एकापरेक बात जानता है।


अगले दिन....... "आहि हो देवा.... ! ई उमिर में चलित्तर को ई दुःख भी देखना रह गाया था..... ! बेचारा.... आह भगवान... !" सारा गाँव जवार का लोग चलित्तर के दालान पर करामा लगाए हुए था। सब आये हुए थे कमुआ को देखने। सुसलिंग पाटी का नया-नया नेता जो था... कामदेव माझी! कुछ लोग कह रहे थे, "आज कल के लड़का बच्चा कौनो बात बुझता है.... ससुर केतना अच्छा कमा-खा रहा था.... पता नहीं कौन सा नेतागिरी का शौक चढ़ा.... आखिर का मिला... अब बूढ माय-बाप और बीवी बच्चा को गर्दन में हंसुआ लगाया..... !

कमुआ.... ससुर गया रहा पाटी के रैली में पटना.... । यहां से गया रहा अपने पैर पर हुजुम का नेता बन के। उधर से आया है खटिया पर लदा के। सारा हुजुम गायब। उ तो भला कहिये कि गांव का दो-चार लोग था जो लाद-पाद के लाया। रैली में ऐसन रैला मचा कि सब तितिर-बितिर। वही में कितना आदमी दबाया-पिचाया। कितना का हाथ-गोर टूटा। कमुआ के उपर से पता नहीं कौन गाड़ी गुजरा था......... आह... ठेहुना से उपर एकदम्मे थौआ हो गया था। लगता है इस्पाटे पर उका प्राण-पखेरु उड़ गया होगा।

जवान बेटा का ई हाल देख कर चलित्तर माझी का तो बकारे बंद हो गया था। उ की माई और लुगाई कलेजा पीट-पीट के रोये जा रही थी। चलित्तर माझी के जिगरी दोस्त हैं झिंगुर भगत। रमुआ-कमुआ दोनो भाई को अपने बाल-बच्चा के तरह ही मानते हैं। कमुआ का ई हाल देख के उनका भी गला भरा हुआ था मगर वही सब आने-जाने वाले से बतिया रहे थे और घरबैय्या सब को भी तोष-भरोस दिला रहे थे।


एक किनारे सुथनीराम और मसुरिया बतिया रहे थे। झिंगुर भगत को देखकर बोले, “आह... ई अनरथ कैसे हुआ हो, झिंगुर भाई....?” झिंगुर भगत माथा में बंधा हुआ गमछी को खोलकर पहले आंख और मुंह पोछे। फिर बोले, “अब का कहोगे भैय्या.... समझ लेओ कि देव न मारे डांग से देत कुपंथ चढाय...!” आह... हमरा दिमाग में एकदिन पहिले वाली बात चक्कर काटने लगी। कमुआ रैली में जा रहा था तो यही फ़करा तो कहे थे चलित्तर माझी, “देव न मारे डांग से, देत कुपंथ चढाय ! मतलब इश्वर का कोप प्रत्यक्ष नहीं होता है। विनाश काल में बुद्धि ही विपरीत हो जाती है।”

11 टिप्‍पणियां:

  1. यह देसिल बयना की विशिष्टता है कि इसकी प्रत्येक लोकोक्ति प्रसंगानुकूल कथानक में पिरोई हुई होती है। यह लोकोक्ति भी इस मानक पर खरी उतरी। खाँटी देशज पुट से कथानक जीवंत हो उठता है।

    शुभकामनाएं,

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  2. हमेशा की तरह ही शानदार प्रस्तुति। धन्यवाद।

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  3. बच्चे से सुनते आये हैं ई बयना... अलग अलग उदहारण के संग.. और आज का कथा चित्रण इतना सजीव है कि लग रहा है कि अपने गाँव के चौक पर 'झिल्ली-मुरही' खाते हुए कोई कह रहा हो... करन अदभुद है आपकी किस्सागोई...

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  4. माटी से खुशबू उठे,खिले गाँव का रूप ,
    देसिल बयना आज का,लगे गुनगुनी धूप !

    करन जी,
    आपकी लेखनी का जवाब नहीं

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  5. देसिल बयना का इस अँक में भी आद्योपान्त रोचकता बनी हुई है।

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  6. दिल को गुदगुदाने वाली बड़ी ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।
    खाटी देशी भाषा से गांव की याद आ गई ।
    शुभकामनाएं ।

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  7. करन बाबू! आज का देसिल बयना तो आंचलिक से लेकर पौरानिक,दुन्नो तरह का सुगंध लिये हुये है.. एण्ड तनी मार्मिक हो गया... अब अईसन कुपंथ पर चढ़ाने से का फायदा कि सीधा जान चला जाए.. मगर बहुत अच्छा प्रस्तुति रहा ई भी!!

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  8. आज की फुलपैण्ट पीढ़ी को अपने क्रीज की बड़ी चिंता है। कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था की बात कहीं किताबों में ही सिमट कर न रह जाए।

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  9. एक कहावत ने सारी पौराणिकता और (लोक)जीवन की अस्लियत समेट ली ,- बड़ा समयानुकूल कथ्य है .
    साधु!

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  10. Aj ka desil bayna ok ok hai...lakn jaha tak kahawat ki bat hai usko apne humesa ki tarah bakhubi samjhaya hai...
    Karan Ji..Jaha tak meko lagta hai ab apko desil bayna mai kuch badlao ki jarurat hai...ek he essstyle ka kahani padhte padhte pathakon ka interest dheere dheere kam hone lagta hai ..Umid karti hun ki desil bayna k agle bhag mai kuch naya hoga...Dhanyawad...

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  11. विनाश काले विपरीत बुद्धी वाला दृष्टान्त बताता है यह किस्सा.

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