गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

आँच-57- “तुम” में जीवन के रंग

समीक्षा

आँच-57- “तुम” में जीवन के रंग तुम एक नन्हा सा धूप का टुकड़ा / जो सीलन भरे घर में आए और / दीवारों के आंसू पोंछ जाये ! तुम हवा का एक झोंका / जो तपती दोपहर की धूप में / मन को राहत दिलाये ! तुम भोर का सूरज, / तुम्हारे साथ / ज़िंदगी की सुबह आई ! तुम एक नन्हा सा फ़रिश्ता / तम्हे गोद में ले कर, / जी किया मै मुस्कराऊँ ! तुम वक़्त के हाथों मिला तोहफा हसीन / ता-उम्र हम जिसको सहेजें / और सजाएँ !

हरीश प्रकाश गुप्त

आँच का उद्देश्य कवि की भावभूमि की गरमाहट को पाठकों तक पहुँचाना और पाठक (समीक्षक) की अनुभूति की गरमाहट को कवि तक पहुँचाना है।

मन के आवेग और संवेग जब सघन होकर शब्द रूप में प्रस्फुटित होते हैं तो काव्य की उत्पत्ति होती है। ये आवेग कृत्रिमताओं से नहीं बल्कि स्वाभाविक भावभूमि से ऊर्जस्वित होते हैं। हमारे आसपास घटित होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं इसके उद्दीपन का आधार बनती हैं। कभी-कभी जीवन के ये साधारण से लगने वाले चित्र जब मुखरित होते हैं तो अपनी साधारण शब्द-योजना के बावजूद नितांत भिन्न और व्यापक अर्थ की आभा से उस चित्र को आच्छादित कर लेते हैं। तब वे स्थूल चित्र बिम्ब के रूप में चमत्कृत करते हैं और अपने विकास से रचनाकार को भी चकित कर देते हैं। मंजू मिश्रा की कविता “तुम” कुछ इसी श्रेणी की कविता प्रतीत होती है। यह कविता उनके ब्लाग “अभिव्यक्ति” पर 21 जनवरी 2011 को प्रकाशित हुई थी। यह कविता आँच के इस अंक की विषय वस्तु है।

जीवन सुख दुख का समन्वय है। यदि जीवन में कठिनाइयाँ हैं, संघर्ष हैं तो दूसरी ओर जीवन में सुखद अहसास भी हैं, खुशियाँ भी हैं। पल-पल की संजोई गई छोटी-छोटी खुशियाँ मन को अधिक सुकून देती हैं। ये खुशियाँ स्थाई होती हैं। कभी कभी ये आवृत्त छोटी-छोटी खुशियाँ कठिनाइयों और दुर्गम परिस्थितियों को इस कदर ढक लेती हैं कि हमें उन कठिनाइयों का भान ही नहीं रहता। ये निस्सार सी प्रतीत होती जिन्दगी में रस घोल देती हैं –

एक नन्हा सा धूप का टुकड़ा

जो सीलन भरे घर में आए और

दीवारों के आंसू पोंछ जाये !

दिनानुदिन की एकसार जिन्दगी जब रसहीन बन जाती है और विभिन्न सामाजिक सम्बन्ध और रिश्ते-नाते ऊष्ण हो जाते हैं तब हवा के झोंके की तरह पनपा प्रेम उन्हें आर्द्र कर सुखद अनुभूति प्रदान करता है –

हवा का एक झोंका

जो तपती दोपहर की धूप में

मन को राहत दिलाये !

जब कभी प्रगति पथ अवरुद्ध जान पड़ते हैं तब भोर के सूरज” के रूप में नई आशाएं जीवन में उन्नति की राह दिखाती हैं –

भोर का सूरज,

तुम्हारे साथ

ज़िंदगी की सुबह आई

कभी अचानक हमें वह मिल जाता है जिसकी हमने चाहना तो की होती है, पर वह इतनी आसानी से मिल जाएगा इस कल्पना पर विश्वास नहीं रहता। लेकिन जब वह अकस्मात हासिल होता है तो वह प्रारब्ध रूपी ईश्वर की देन के स्वरूप में ही हमें दृष्टिगत होता है और तब खुशियाँ इतनी बढ़ जाती हैं कि वह हर पल हमारी हर गतिविधि में अभिव्यक्त होती हैं –

एक नन्हा सा फ़रिश्ता

तम्हे गोद में ले कर,

जी किया मै मुस्कराऊँ !

फिर जब खुशियों से ओतप्रोत मन अतीत में लौटता है तो ये सुखद स्मृतियाँ न केवल असीम आनन्द का कारक बनती हैं बल्कि इन्हें संजोकर भविष्य के लिए भी खुशियाँ सहेज ली जाती हैं। प्रस्तुत कविता “तुम” कुछ ऐसे ही भावों को अभिव्यक्त करती प्रतीत होती है –

वक़्त के हाथों मिला तोहफा हसीन

ता-उम्र हम जिसको सहेजें

और सजाएँ !

मंजू मिश्रा ने इस कविता की रचना भले ही किसी इतर अनुभूति के स्तर पर की हो लेकिन कविता में बिम्बों की सार्थकता कविता को एक अलग दृष्टि प्रदान करती है और भावभूमि को विस्तृत स्वरूप में प्रस्तुत करती है। कविता के कुछ बिम्ब बहुत ही आकर्षक हैं। यथा – धूप का टुकड़ा छोटी-छोटी खुशियों की उत्तम व्यंजना है। वहीं दीवारों के आँसू जीवन की दुष्कर परिस्थितियों से उपजी वेदना को अर्थ देने में समर्थ हुए हैं। कवयित्री जब जिन्दगी की सुबह आई व्यक्त करती है तो जिन्दगी यथार्थ न होकर वह खुशहाली के साथ अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करती हुई जान पड़ती है।

कविता का शब्द विधान बेहद आसान शब्दावली से सुसज्जित है। इसके बावजूद अर्थ अपनी गुरुता के साथ विद्यमान है। कविता में कवयित्री ने एक सर्वनामिक बिम्ब तुम के माध्यम से जीवन के विविध आयामों को जीवंत करने का प्रयास किया है और उसका यह प्रयास एक सीमा तक सफल भी है। कविता में तुम एक अवरोधक आवृत्ति है लेकिन कविता के वर्तमान शिल्प को देखते हुए इसको पृथक करके देखना सहज नहीं है। कविता की नाद योजना अनाकर्षक है। कविता के तीसरे और पाँचवे पद को छोड़कर, यहाँ प्रवाह अवरुद्ध नहीं होता, शेष प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ पदों में प्रांजलता बाधित हो रही है। जबकि, नाद और प्रांजलता, ये दोनो तत्व काव्य के अभिन्न अंग हैं जिनसे ही काव्य समसामयिक परिधि से परे अपना विस्तार बना पाता हैं।

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19 टिप्‍पणियां:

  1. समीक्षा से कविता निर्वैयक्तिक बन व्यापक अर्थवत्ता के साथ प्रस्तुत हूई है। शायद इससे रचनाकार भी सहमत हों। समीक्षक एवं रचनाकार, दोनों के प्रति आभार,

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  2. रचना में अन्तर्निहित भावों का प्रकाशन और अन्वेषण दोनों ही इस समीक्षा में देखने को मिले। साधुवाद।

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  3. आपकी समीक्षा पढ़कर थोडा बहुत मैं भी कविता सीख रही हूँ ।

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  4. बहुत सुन्दर रचना और उतनी ही सुन्दर समीक्षा…………आभार्।

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  5. समीक्षा से कविता के गहन भावों को नए आयाम मिले हैं. साधु-साधु !!!!!

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  6. चुनिन्दा खूबसुरत अंश, उत्तम समीक्षा. आभार सहित...

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  7. सुन्दर रचना की अच्छी समीक्षा .आभार.

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  8. मंजू मिश्र जी की कविता "तुम" उनके ब्लॉग पर जाकर पढ़ी और उसकी इस ब्लॉग पर प्रस्तुत समीक्षा भी पढ़ी.निष्पक्ष और बड़े सधे हुए शब्दों में उसकी समीक्षा पढ़कर अच्छा लगा.

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  9. आंच पर किसी कविता का आना आज ब्लॉगजगत में उत्त्क्रिष्ठ्म रचना के रूप में जाना जाना है.. मंजू जी कविता को समीक्षा के बाद नया आयाम मिल रहा है.. गुप्त जी को ब्लॉग जगत का नामवर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी...

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  10. वाह ! बेहद संतुलित समीक्षा। पढ़कर ऐसा लगा कि कविता को दूर से बिलकुल निरपेक्ष भाव से देखा जा रहा हो। यह समीक्षा धर्म के प्रति समीक्षक की ईमानदारी को दर्शाता है। साधुवाद।

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  11. यह समीक्षा कविता को पढने का एक नया नज़रिया प्रस्तुत करती है! गुप्त जी को बधाई!

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  12. मंजु जी की " तुम " पर लिखी क्षणिकाएं गहरे एहसास को लिए हुए हैं ...आंच पर इस कृति को ले कर जो नए आयाम मिले हैं इस रचना को बह अनुपम है ...सुन्दर समीक्षा

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  13. अरुण जी गम्भीर और उत्तम काव्य की रचना करते हैं, यह तो ज्ञात था। वह परिहास भी अच्छा कर लेते हैं, आज पता चला।

    उत्साहवर्धन हेतु अपने सभी पाठकों को धन्यवाद।

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