सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

नवगीत :: गीत कालातीत पर्वत के

नवगीत

गीत कालातीत पर्वत के

Sn Mishraश्यामनारायण मिश्र

घाटियों में,

लाल-पीली माटियों में,

ढल रहे हैं नील-निर्झर-गीत पर्वत के।

 

पीकर बूंद पखेरू पागल

        जंगल-जंगल चहके।

चुल्लू भर पीकर वनवासी

        घाटी-घाटी बहके।

मादलों से,

होड़ करते बादलों से,

जब बरसते हैं सुधा-संगीत पर्वत के।

 

सुबह पहाड़ों के माथों पर

      मलती जब रोली।

माला हो जाती वनवासी

      कन्यायों की टोली।

अर्गलाएं,

तोड़ सारे द्वन्द्व सीमाएं,

तौलते हैं बाजुओं को मीत पर्वत के।

 

दुपहर छापक पेड़

      ढूंढकर बैठी काटे घाम।

संध्या की रंगीन छटाएं

             बंजारों के नाम।

यामिनी में,

दूध धोई चांदनी में,

तैर जाते गीत कालातीत पर्वत के।

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदरता से वर्णन किया है |चित्र भी अच्छा लगा |बधाई |
    आशा

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  2. सुन्दर गीत.. प्रकृति गीत ... सौंदर्य गीत...

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  3. सहज शब्दावली में पिरोया बहुत ही सुन्दर नवगीत है, भावों से ओतप्रोत है और मन में संगीत की तरह बजता है, हृदय को झंकृत करता है।

    मिश्र जी नवगीत विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके गीत इसका प्रमाण हैं। मिश्र जी के गीतों के सामने आजकल के अधिकांश गीत फीके जान पड़ते हैं। यह दुर्भाग्य है कि हिन्दी साहित्य में मिश्र जी के कृतित्व का मूल्यांकन नहीं हो सका।

    मिश्र जी के गीत पढ़वाने के लिए आपका आभार,

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  4. प्राकृ्ति की सुन्दर छठा के रंग बिखेरती सुन्दर रचना। बधाई।

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  5. प्रकृति की सुन्दर छटा बिखेर दीहै……………बहुत बढिया।

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  6. प्रकृति का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आप ने इस कविता मे ..... बधाई

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  7. श्याम नारायण मिश्र द्वारा विरचित नवगीत- गीत कालातीत पर्वत के अंतर्गत प्रकृति वर्णन अत्यधिक मनमोहक लगा। काश!इन्हे हिंदी साहित्य जगत में प्रकृति प्रेमी कवियों की श्रेणी में थोड़ी सी जगह मिली होती। धन्यवाद।

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  8. शब्दों से समस्त दृश्य आँखों के सम्मुख साकार कर दिया आपने...

    नयनाभिराम ...सुन्दर...बहुत सुन्दर !!!!

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  9. बहुत सुंदर ढंग से कुदरत को कविता के रंगो मे ढाला , बहुत सुंदर धन्यवाद

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  10. बहुत सुन्दर भावों से सजा नवगीत ...अच्छी प्रस्तुति

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  11. जैसी सुंदर है ये प्रकृति, वैसी ही सुंदर ये प्रस्तुति !

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  12. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 22- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  13. यामिनी में, दूध धोई चांदनी में, तैर जाते गीत कालातीत पर्वत के.
    बढ़िया प्रस्तुती. मिश्र जी को बधाइयाँ सुंदर रचना के लिए.

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  14. गीत में प्रकृति की अनुपम छटा बिखरी हुई है। गीत बहुत ही आकर्षक और मोह्क है।
    आभार,

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  15. बहुत ही खुबसुरत प्रस्तुति......

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