मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

देसिल बयना - 66 : हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी

देसिल बयना – 65 : हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी


-- करण समस्तीपुरी

"आबत रहनी दिल्ली से भैय्या कर के कमाई ! सोचत रहनी खुश हो जैहैं देख के बाबू-माई !!

बांकी रहिये में खेला बरियार हो गईल.... ! माल ले के बगल वाली सारा पार हो गईल.... !!"

टेनजिस्टर पर गाना बजिये रहा था कि उधर से हकासा-प्यासा खुटेरिया सों-सों रोते हुए चला रहा था। आहो बाबू भैय्या.... ! सच्चे में खेला बरियार हो गया.... ! साल भर का कमाई लुट गाया हो बाबू ! मंगल पेठिया पर जमी तास मंडली के चार खिलारी और चालीस दर्शक हक्का-बक्का.... लगे खुटेरी लाल को देखने। आहि तोरी के तो कमाए खातिर दिल्ली गया रहा.... मगर रो तो ऐसे रहा है जैसे बेटी आती है ससुराल से..... !

असरफिया आगे बढ़ के बोला, "धुर्र... मर्दा.... ! अरे मरद का जात हो के जर-जनानी जैसे रो का रहा है ? कछु बताओ तो जाने.... किन्ना अच्छा तो दिल्ली गया रहा कमाए.... अब रुदन काहे पसारा है.... ? और का....? दिल्ली से साल भर पर खालिए हाथ आया है....? पेटी बक्सा... पाछे कौनो रिक्शा-टमटम (तांगा) पर रहा है का....?

इतना सुन के तो खुटेरिया और फफक पड़ा, "हो असरफी काका ! कछु नहीं बचा हो..... ! हमरे फूटी किस्मत रेडी का गाना में बज रही है हो काका.... !" असरफी उको कंधा पकर कर झकझोरते हुए बोला, "अहि मरदे ! का बुझौव्वल बुझा रहा है.... अरे कछु फरिया के तो कहो।"

फिर खुटेरी लाल फफक कर रो पड़ा। गर्दन पर के गमछी से आंख-मुंह पोछ कर बोला, काका...! जुलुम होय गया...! अब हम का लेके बाबू-माय के आगे जायें काका.....? बाबू-माय तो सोच रहे होंगे कि बेटा साल भर पर दिल्ली से कमा कर आ रहा है। बक्सा-पेटी भर कर तोहफ़ा-उपहार लायेगा...! ओ....हो....हो.....हो..... ला भी रहे थे काका.... दू गो बक्सा और एगो गदहबैग। मति मारी गयी काका....! कौनो पर विश्वास नहीं रहा काका। धरम-करम पर भी नहीं।

अभी तक बगल में चुपचाप खड़े झोंटा झा धरम-करम का नाम सुनते ही झटाक से बोल पड़े, मार पाजी ! कछु बात तो बतायेगा नहीं और खा-म-खा धरम-करम को घसीट रहा है। अरे धरमे-करम पर न ई पिरिथबी अभी तक कायम है।

बेचारा खुटेरी दम धर के बोला, हां, पंडीजी ! हम भी तो आज तक यही बूझते थे मगर जौन घटना हुआ.... कि आपका विश्वास भी हिल जायेगा.... ! अरे हुआ का.... ई तो बताबा... ! खीखर दास बोला था।

खुटेरिया बताये लगा, दिल्ली से चले। हमरा तो सलीपर में रजीवेसन था। मगर अभी लगन के भीड़-भार.... केतना पसिन्जर वेटिने लिस्ट में आ रहा था। बुझिये कि पूरा बोगिये कोंचाया हुआ था। खैर केहु तरह पहुंचे इलाहाबाद। टरेन के खिड़की से गंगा मैय्या को गोर लगे। गोर लग के जैसे ही मुरी उठाये, सामने साच्छात मैय्या खड़ी दिखी। यही कोई अधवयस औरत थी। गोर दक-दक.... चेहरा-मोहरा एकदम दिव्य। गोलका चश्मा पहिनी हुई और हाथ में सुमरनी लिये सतनाम....सहस्सर नाम का जाप कर रही थी। साथ में दु गो और कमसिन जनानी भी थी।

खुटेरी की व्यथा-कथा जारी थी, भीड़ ई बेतहासा.... सुमरनी वाली माई हमरे आगे खड़ी होकर बड़े सिनेह से बोली, बेटा ! तनिक पैर समेट लो तो हम भी जर बैठ जायें... बड़ी पुण्ण होगा बेटा.... गंगामैय्या के मास-परायण कर के आ रहे हैं।इत्ता कह के उ खुदे हमरा पैर सरकाने लगी तो हम झट-पट उठ के बैठ गये। बुढिया माय साइड में बैठ कर सुमरनी पर राम-राम सुमरने लगी। उ के साथ वाली दुन्नु जनानी अपनी छोटी से गठरी को बगल में दबाये नीचे ही बैठ गयी।

बतियाने में मोगल सराय तक पहुंचे। बुढिया माय बोली, बेटा ! तू बड़ा भला आदमी है रे.... बड़ा नेक। अपनी सीट पर हमें बैठाया.... गंगा मैय्या तोहरा भला करे। बहुत सारा अशीष दी थी मैय्या। फिर अपने ढक्कन वाला कमण्डल से एक डिबिया जल निकाल के दी। बोली, ले बेटा ! ई परयागराज का नीर है। चरनामृत समझ के मुख-सिर में लग लो। और ई डिबिया अपने घर में रखना। गंगा मैय्या तन-मन-धन-पूत में बरकत देगी।

खुटेरी आगे कह रहा था, हमरी आंखे भी उ बुढिया माई के लिये सरधा से झुक गयी थी। डिबिया से एक जरा सा नीर दहिना हाथ की चुल्लु में लेकर सिरिफ़ ठोर से सटाये और माथा में पोछ लिये। फिर कछु देर तक और बतियान चलता रहा। मगर सासाराम पहुंचते-पहुंचते हमको कुछ-कुछ नशा होने लगा। फिर पता नहीं कैसे आंख लग गयी।

बीच में कई टीसन पार हुआ कुछ खबर नहीं लगी। एकाध दफ़े लगा कि हमरे जांघ पर कुछ सुरसुरा रहा है मगर न आंख खुल रही थी न ही दिमाग जग रहा था। डेहरी के बदले कोडरमा पहुंच गये। हुआं भी रेलबी पुलिस जगाया तो होश हुआ। हम धरफारा के अपना समान खोजे.... अहि रे बल्लैय्या के..... दुन्नु बक्सा और गदहबैग कहां गया ? हमरे साथ-साथ उ डिब्बा का सारा पसिंजर का समान गोल... ! हम तो भोक्कार पार के रोने लगे।

पुलिसजी बहुत समझाये तब जा कर उठने का होश किये मगर जैसे ही टिकिट निकालने के लिये पाकिट में हाथ दिये कि फिर धम्म से बैठा गया। आहि हो दद्दा..... ! अरे बाप रे.... ! सगरे समान गया सो तो गया... हमरी तो जेबी भी कट गयी थी। हो असरफ़ी काका ! सारा शौख-मौज जला के पाई-पाई कर के जोरे थे... उ मौगिया एक्कहि बेर में हाथ साफ़ कर गयी ... !” मरा तो लगा कि हार्ट फैल हो जायेगा.... ! बांकिये और पसिंजर क भी वही हाल था। सारा आदमी रो-धो रहा था। समान के नाम पर उ डिब्बा में एगो सुमरनी था जौन हाथ में लेके उ सब को चकमा दे गई और एगो तनिक गो कतरनी जौन से उ सब का पाकिट को हलाल किये रही।

खुटेरिया फिर से गला फार-फार के रोने लगा, कंठी-माला सुमरनी देख के तो हम ओहको साधु-धरमतमा समझे.... उ हरजाई चोरनी निकली। हाथ में सुमरनी दिखा के जेबी पर कतरनी चला गयी हो काका... ! अब हम का मुंह लेके बाबू-माई के ओरे जायें....?

सब-लोग खुटेरीलाल को तोष-भरोस दिलाने लगे। असरफ़ी बोला, अब का करोगे खुटेरी... जौन तोरा भाग में नहीं था उ के लिये अब रोय-धोय के तबियत खराब मत करो। झोंटा झा बोले, हाय हो भगवान ! अब सच में कौन किस पर भरोसा करेगा... बताओ तो ! हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी। देखाये को साधु और करनी के चोर... !

सुंघनी साहु बोले, ठीक कहावत कहे पंडीजी। कहिये तो भला कैसन जमाना आय गया....? ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी चलता है। बेचारा तपेसवी (तपस्वी) अबला समझ के सीट दिया और उल्टे वही को लूट के चली गयी... हो राम ! सच में अब धरम-करम पर भी कोई विश्वास नहीं रहा। सच्चे बात है, “हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी।

खुटेरिया के साथ जौन हुआ उका दुख तो सब को था। हमको भी। मगर एक बात का संतोष था। चलो एगो नयी कहावत भी तो जाने। हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी। मतलब ’मुख में राम बगल में छुरी। मतलब कि आस्तिन के सांप। चेहरा से साधु और करम से शैतान। कहावत तो ठीके है मगर का किया जाय ? आज के जमाना में तो जादातर आपको ऐसा ही आदमी मिलेगा... ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी वाला। सावधान रहियेगा.... नहीं तो बोलो गंगिया माई की............ !!!

15 टिप्‍पणियां:

  1. देशिल बयना हाथ में सुमरनी बगल में कतरनी,आज के युग में ही नही बल्कि युग- युगांतर से प्रचलित है। कुछ लोगों के दो चेहरे होते हैं-काम निकालने के लिए नकली चेहरा सामने लाते हैं,जबकि उनका असली चेहरा छिपा रहता है।

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  2. कहावत को कहानी ने अच्छा समझाया !

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  3. बहुत सुन्दर। विसतार से कहानी के रूप मे बात जल्दी समझ आ जाती है। धन्यवाद।

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  4. पढने लिखने शब्दों को जानने समझने और उच्चारण के प्रति सजग रहने के बाद भी गदहबैग, रजीवेसन, वैटिंन लिस्ट जैसे शब्दों को याद रख पाना और कथा में प्रयोग कोई मामूली बात नहीं है...यह सिद्ध करता है कि लेखक माटी से कितने गहरे जुड़ा हुआ है..

    मन खुश हो गया...

    लाजवाब कथा और लाजवाब शैली ...

    वाह !!!!

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  5. दिलचस्प और अच्छी कहानी, भाषाई दिक्कत आड़े नहीं आ रही है। बधाई।

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  6. करन भाई.. देसिल बयना तीन मामलों में उत्कृष्ट है.. एक तो कि पृष्ठभूमि के प्रति भाषा और अर्थवत्ता के साथ सहज है... दूसरी यह पृष्ठभूमि को गंभीरता से लेता है.. उपहास नहीं करता गरिमा देता है.. तीसरी बात कि इसमें निरंतरता है...
    आज का अंक भी उत्कृष्ट है.. बधाई..

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  7. Lijiye kah diye Ganga Maiya ki Jai...
    Aur sath mai Apka likha Desil Bayna ka b Jai.. :)

    waise to e kahani bahute logan k muh se sune the lakn e kahawat pahile bar sune....humko to kahawat padh k hasi lag gaya tha..lakn jab desil bayna padhe to matlab bujhaya...
    kitna log abhiyo hai ki baten nai samjhte...inna prachar prasar hota hai train par anjan logon se bat na karen unko diya hua kucho khaye na...lakn ka kijiyega kono kono log hote hai na "apna mon k mauji aur boh k kahte hai bhauji" ...in sab baton par dhayne ni dete hai...aur bad mai rote pitte rahte hai...
    Bahute khub sabak mila KHUTERIYA ko..pata ni ap kaha kaha se naam chun kar late hai karan ji..Khuteriya,,ha ha ha
    Apka likha Desil Bayna ka Jai Ho.. :)

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  8. हमको तो बुध के दिन का इंतजारी अईसे रहता है जईसे कॉलेज के जमाना में गंगा किनारे उनका किया करते थे.. बुझएबे नहीं करता है कि हम दिल्ली में बईठ कर पढ़ रहे हैं अऊर करन बाबू बंगलोर में बईठ कर लोर बहा रहे हैं.. दुत्तेरे की.. कलम का सिआही बहा रहे हैं (इसको उपमा समझा जाए, माने बात का बात) अऊर मनोज बाबू बंगाल में बईठकर दनादन छापे जा रहे हैं.. सब मिलकर एक बरन हो जाता है तब बुझाता है कि ठेठ बिहार के कोनो गाँव के दलान पर उघारे देह बईठकर सब तमासा अपना आँख से देख रहे हैं!!
    एहाँ दिल्ली में देस का छँटा हुआ सुमरनी वाला लोग बईठकर देस्बासी का कतरनी से पाकिट काटने में लगा हुआ है!! बेजोड़ देसिल बयना है!!

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  9. भाष की दिक्कत के बाबजूद भी आप की कहानी समझ आ गई, पता नही इस गरीब ने कितने सपने संजोये थे एक साल की मेहनत कर के..... ओर कोई कमीना ऎश करने के लिये इसे लूट कर ही चला गया, यह वो टून टून ही लगती हे, तभी तो भोली भाली ओर मिट्ठी बोली बोलने वालो से भी बचना चाहिये, आप की भाषा बहुत अच्छी लगी

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  10. सभी पाठकों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूं।

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  11. कहावत को बड़े रोचक ढंग से चरितार्थ कर दिया -बढिया रहा!

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  12. मिश्री सी मीठी लगे देसिल बयना आज,
    गूढ़ कहावत गाँव की खोले जग का राज़

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  13. एक दम्मे से गांव का इयाद आ गया। ऐसन केतना करेक्टर उधर घूरते रहता है। और इहे सब बात कहता रहता है जो आप लिखे हैं।
    बहुत सही कहा कि आज कल जादातर ऐसने ही आदमी मिलेगा... ’हाथ में सुमरनी और बगल में कतरनी वाला।

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  14. भाषा का प्रवाह हमेशा की तरह बहुत सुन्दर ! कहानी की रोचकता अबाध है और कथोपकथन ... सब एकदम सजीव ही लगता है. एकदम रेखा चित्र जैसी रचना. सच कहूँ तो "देसियल बयना" इस ब्लॉग का श्रेष्ठ आकर्षण है.

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