रविवार, 18 सितंबर 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 84

भारतीय काव्यशास्त्र – 84

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में पददोषों के अन्तर्गत श्रुतिकटु, च्युतसंस्कृति, अप्रयुक्त और असमर्थ दोषों पर चर्चा हुई थी। इस अंक में निहतार्थ, अनुचितार्थ और निरर्थक दोषों पर चर्चा करेंगे।

जिन शब्दों के दो या अधिक अर्थ हों, पर उसे यदि अप्रसिद्ध अर्थ में प्रयोग किया जाय तो वहाँ निहतार्थ दोष माना जाता है। इसके लिए निम्नलिखित श्लोक उदाहरण स्वरूप लेते हैं-

यावकरसार्द्रपादप्रहारशोणितकचेन दयितेन।

मुग्धा साध्वसतरला विलोक्य परिचुम्बिता सहसा।।

अर्थात् महावर से रंगे गीले चरण के प्रहार से कुछ लाल से हुए बाल को देखकर पत्नी ने यह समझा कि पद-प्रहार से प्रियतम के सिर में चोट आ गयी, जिससे होनेवाले रक्त-स्राव से उसके बाल लाल हो गए हैं और वह भय से विह्वल हो उठी। इसपर प्रियतम ने नायिका को भय से विह्वल देखकर सहसा उसे चूम लिया।

यहाँ शोणित शब्द लाल रंग के लिए प्रयोग किया गया है, जबकि यह शब्द रक्त या खून के अर्थ में प्रसिद्ध है। अतएव यहाँ निहतार्थ दोष है। हिन्दी के निम्नलिखत दोहे में भी चपला को लक्ष्मी के अर्थ में और मकरध्वज को समुद्र के अर्थ में प्रयोग किया गया है, जबकि ये क्रमशः बिजली (आकाश में चमकनेवाली) और कामदेव के अर्थ में प्रसिद्ध हैं-

चपला यह रहिहै नहीं, देखु हरिहिं चित लाय।

यहि मकरध्वज तरन कों नाहिन और उपाय।।

यहाँ एक बात पर ध्यान दिलाया जा रहा है कि अप्रयुक्त दोष, असमर्थ दोष और निहतार्थ दोष एक से होने का भ्रम पैदा करते हैं। अतएव इनकी भेदक रेखा स्पष्ट करना आवश्यक है। अप्रयुक्त दोष एकार्थी शब्दों में होता है, जबकि निहतार्थ दोष अनेकार्थी शब्दों में। यमक और श्लेष आदि में अप्रयुक्त दोष का निवारण हो जाता है, लेकिन अन्यत्र नहीं। जबकि निहतार्थ दोष में शब्द के अर्थ इन स्थितियों के अतिरिक्त भी सार्थक हो सकते हैं। निहतार्थ और असमर्थ दोष में अन्तर यह है कि निहतार्थ में अर्थ की प्रतीति देर से होती है और असमर्थ में शब्द से अर्थ की प्रतीति नहीं होती, जबरदस्ती अर्थ लिया जाता है।

जहाँ ऐसा शब्द प्रयोग किया गया हो जिसका अर्थ अभीष्ट अर्थ को तिरस्कृत करे, वहाँ अनुचितार्थ दोष होता है-

तपस्विभिर्या सुचिरेण लभ्यते प्रयत्नतः सत्रिभिरिष्यते च या।

प्रयान्ति कामाशुगतिं यशस्विनो रणाश्वमेधे पशुतामुपागताः।।

अर्थात् तपस्वी लोग जिस मुक्ति को लम्बी अवधि तक तपस्या करने के बाद प्राप्त कर पाते हैं तथा याज्ञिक जिसे प्रयत्न पूर्वक यज्ञ करके प्राप्त करना चाहते हैं, उसे युद्धरूपी अश्वमेध यज्ञ में पशु के समान मारे गए यशस्वी वीर तुरन्त प्राप्त कर लेते हैं।

इस श्लोक में पशु पद का प्रयोग युद्ध में वीरगति प्राप्त करनेवाले वीरों के लिए किया गया है, जो अनुचित है। क्योंकि पशु के मारे जाने पर, चाहे यज्ञ हो कहीं और उसमें कातरता होती है, लेकिन युद्ध में लड़नेवाले वीर कातर या मृत्य़ु से भयग्रस्त नहीं होते। अतएव उनकी पशु से तुलना करना अनुचित है। ऐसे स्थानों पर अनुचितार्थ दोष माना जाता है। हिन्दी के निम्नलिखित दोहे में बालक कृष्ण द्वारा इधर-उधर झाँकने की गतिविधि के कारण उनकी तुलना बन्दर से की है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि बालक कृष्ण का इधर-उधर झाँकना कौतूहल के कारण है, न कि बन्दर के समान प्रकृतिगत दुर्गुण के कारण। अतएव इसमें भी बानर पद के कारण अनुचितार्थ दोष है-

कदम-डार बिहरत बिहँसि, बाल निरखि नँदलाल।

उझकि आज इत-उत झकत, बानर सम ततकाल।।

जब काव्य में कुछ अनावश्यक पदों का प्रयोग केवल छन्द की मात्रा पूरी करने के लिए या छन्द-भंग से बचने के लिए किया जाय, वहाँ निरर्थक दोष होता है-

उत्फुल्लकमलकेसरपरागगौरद्युते मम हि गौरि।

अभिवाञ्छितं प्रसिद्ध्यतु भगवति युष्मत्प्रसादेन।।

अर्थात् विकसित कमल के केसर के पराग के समान गौर-कान्तिवाली हे माँ पार्वति, आपके प्रसाद (कृपा) से मेरा मनोरथ सिद्ध हो, पूरा हो।

यहाँ हि पद निरर्थक रूप में आया है। इसके अर्थ में इस पद का कोई योगदान नहीं है। अतएव हि पद के कारण यहाँ निरर्थक दोष है।

हिन्दी की निम्नलिखित कविता में अहो पद अनावश्यक रूप से प्रयोग हुआ है। कविता के अर्थ को रूप देने में इस पद का कोई योगदान नहीं है। इसलिए यह पद निरर्थकत्व दोष पैदा करता है-

दास बनने का बहाना किस लिए?

क्या मुझे दासी कहाना, इसलिए?

देव होकर तुम सदा मेरे रहो-

और देवी ही मुझे रखो, अहो!

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार यमक और श्लेष आदि अलंकारों में इन्हें दोष नहीं माना जाता है।

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14 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर आलेख. ज्ञानवर्धन के लिए आचार्य जी को नमन.

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  2. इतिहास की थाती बनता जा रहा है यह ब्लॉग

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  3. बहुत सुन्दर --
    प्रस्तुति ||
    बधाई |

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  4. सुंदर ज्ञानवर्धक आलेख ....आचार्य जी को नमन.

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  5. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 19-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. काव्यशास्त्र की इस श्रृंखला में हर बार ऐसा लगता है कि कविता पाठन के क्रम में अथवा सृजन के क्रम में यह सारी बातें हम कहीं न कहीं महसूस अवश्य होती हैं. किन्तु उन सारी शंकाओं और प्रश्नों के समाधान यहाँ आकर मिलते हैं और तब पता चलता है कि हमारे शास्त्रों में यह सब वर्णित है.
    आचार्य जी! आपका आभार कि हमें यह आपने उपलब्ध कराया!

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  7. बहुत ही जानकारी बढ़ाने वाली पोस्ट। आप हिंदी की बहुत अच्छी सेवा कर रहे हैं। बधाई।

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  8. आज के इस अंक से कविता लिखते समय बरतने वली सावधानियों का पता चला। निरर्थक शब्द के बारे में तो आप हमेशा टोकते रहते हैं। अन्य बातें भी ध्यान में रखने लायक हैं।

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  9. वे निरर्थक शब्द अवश्य हैं किन्तु उपयोगी भी.. कविता की पूर्णता के लिए आवश्यक. आचार्य जी! बहुत कुछ सीखने को मिला!! आभार!

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  10. सुंदर ज्ञानवर्धक आलेख ....
    बहुत सुंदर प्रस्तुति!
    बधाई |

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  11. atyant mahatwapurna jaankari..hindi kavya ko aaj phir se sthapit karne me aapka yah prayas sarvatha yaad kiya jayega..gyani sarvatra pujyate..aaki yah sewa hindi ke punrotthan ki sewa hai, samaj ki sewa hai, mool tatawa ke chintan ko jagrat karne ki disha me sewa hai..main aapko aaur aapke is prayas ko sadar pranam karta hoon..

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