गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आँच - 88 : रामेश्वर दयाल की ’चित्रकूट’

आदरणीय पाठक वृंद,

नमस्कार !

अब मैं आप से पहले ही माफ़ी मांग लेता हूँ, क्योंकि हो सकता है कि आज आपको "आँच" की उष्मा कम लगे। आज की आँच पर कोई समीक्षा नहीं वरन एक अनुभव है। पिछले दिनों बंगलोर के बिशप काटन वुमेन्स कालेज में बतौर अतिथि अध्यापक व्याख्यान देने का अवसर मिला। संयोग से यह कविवर रामेश्वर दयाल दूबे जी की कविता थी "चित्रकूट"। अब वहाँ क्या-क्या कहा, यह तो उसी रूप में याद नहीं लेकिन छात्राओं के आग्रह पर एक-पृष्ठिय टीका लिखवानी पड़ी। आज "आँच" पर आप-लोगों के नजर कर रहा हूँ, इस खेद के साथ की संबधित कविता को प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ। -- करण समस्तीपुरी

रामेश्वर दयाल दूबे का चित्रकूट

प्रकृति चित्रण प्रारम्भ से ही कवियों का प्रिय शगल रहा है ! आख़िर कुदरत की खूबसूरती का जादू स्वभावतः सौन्दर्य के उपासक कवियों के सर चढ़ कर तो बोलेगा ही. और कवि ही क्यों सौंदर्य का जादू तो हर किसी के सर चढ़ कर बोलता है. जॉन कीट्स कहते हैं, "अ थिंग ऑफ़ ब्यूटी इस जॉय फॉर एवर" तो शेक्सपियर लिखते हैं, "ब्यूटी प्रोवोकेथ थीव्स सूनर देन गोल्ड!" यहाँ भी प्रकृति की सुन्दरता कवि को प्रेरित करती है. और कवि भगवान राम के वन-गमन का आलंबन (जिसके सहारे भाव को प्रस्तुत करते हैं) लेकर वन-खंड चित्रकूट की प्राकृतिक सुन्दरता का वर्णन करता है.

वैसे तो तुलसी के राम और रामचरित मानस सदियों से साहित्य का श्रृंगार रहे हैं ! हिदी साहित्य में तो राम काव्य की एक अलग ही श्रृंखला है. रामचरित मानस में तुलसी दास और साकेत में मैथिलि शरण गुप्त ने भी चित्रकूट की छटा का बड़ा ही मनोरम चित्रण किया है. लेकिन तुलसी के प्रकृति चित्रण में जहाँ इष्ट और उपासक भाव की छाया है वहीं गुप्त प्रकृति के सहज सानिध्य में विषम सामजिक परिस्थिति के चित्रण को उद्धत प्रतीत होते हैं. किंतु रामेश्वर दयाल का चित्रकूट उन दोनों कवियों से अलग है. वन तो अमूमन सुंदर रहता ही है. लेकिन दूबेजी के वन की सुन्दरता आज तो मुखर हुआ चाहती है. इस में चार चाँद क्यूँ लगे हैं ? क्यूंकि वन के प्रांगण में सौन्दर्य के साक्षात अवतार श्री राम विहर रहे हैं.

राम को कवि, जीवन और ऊर्जा के अनंत स्रोत के रूप में प्रतिस्थापित कर रहे हैं, जिनके आगमन मात्र से वन्य जीव व वनस्पति अपूर्व उत्साह से अनुप्राणित हो उठे हैं. कवि ने राम के आगमन पर चित्रकूट की सुरभि को सजीव बनाने के लिए मानवीकरण अलंकार का बड़ा ही प्रभावशाली प्रयोग किया है. 'प्रकृति नटी' और 'दूर छितिज पर देख श्याम घन' जैसे उत्कृष्ट उपमा और उपमान तथा 'अनिल (हवा) चपल बालक सा' जैसे रूपक से कविता का शिल्प और कथ्य दोनों ही बेजोर बन रहा है.

किसी भी कविता की सफलता की कसौटी होता है "साधारणीकरण" अर्थात कवि ने जिस भाव के साथ कविता लिखा है, पाठक या स्रोता भी कविता के पाठ में उसी भावानंद का अनुभव करे ! और इस कविता को पढ़ते समय हमेशा ऐसा लगता है कि मंद मुस्कराहट लिए श्याम-सुंदर राम की मंगलमय मूर्ती वन में विहार कर रही है और उसके दिव्य आलोक से वन के लता-पुष्प, चर-अचर सब में नव-प्राण आ गए हों और वे उमंग से खिल उठे हों.

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत सुन्दर चित्रण किया है।

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  2. किसी भी कविता की सफलता की कसौटी होता है "साधारणीकरण" अर्थात कवि ने जिस भाव के साथ कविता लिखा है, पाठक या स्रोता भी कविता के पाठ में उसी भावानंद का अनुभव करे !
    बस एक यही सच है...
    सार समझा दिया.
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

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  3. चित्रकूट वह स्थली है, जहाँ महर्षि अत्रि का आश्रम था। वही उनके पुत्र दत्तात्रेय और महर्षि दुर्वासा की जन्म स्थली है। सुना जाता है कि आज भी वहाँ अहिंसा और निर्भयता जानवरों में भी पायी जाती है। आभार।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार

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  5. करन जी!
    आंच का यह अंक भी अच्छा लगा.. बिना समीक्षा के भी आपने जिस प्रकार व्याख्या की है वह प्रशंसनीय है.. चित्रकूट की महिमा सही कही आपने..रहीम भी याद आ गए:
    चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस,
    जा पर बिपदा परत है, सो आवत यह देस!

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  6. कविता की संक्षिप्त पर सुगठित सुन्दर समीक्षा...

    आभार.

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  7. मनोज जी!
    आपको तथा आपके समस्त सहलेखकों को हमारी हार्दिक बधाई.. दो सालों की यह यात्रा यूं ही चलाती रहे और हमारी प्रेरणा बने यही मंगल कामना है.
    सादरसलिल वर्मा
    चैतन्य आलोक

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  8. आंच की इस मध्यम उष्मा में जो सुस्वादु व्यंजन मिला वह वात्मा को तृप्त कर गया।

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