सोमवार, 12 सितंबर 2011

थिरक-थिरक उठते संबोधन

थिरक-थिरक उठते संबोधन

श्यामनारायण मिश्र

ठहरा हुआ पानीढोल बजाते बादल देखे,

घुंघरू बांधे बिजली।

चौमासे के संग बावरी धरती गाती कजली।

 

गाय चराते अलगोजे

मड़वा चढ़ी पपिहरी।

खेत निराते बिरहा देखे,

दही बिलोती ठुमरी।

थिरक-थिरक उठते संबोधन, छुटकी-बड़की-मझली।

 

ससुर सवैया जेठ अल्हैती,

देवर जैसे रसिया।

सास-जेठानी जैसी सोहर,

ननदी बात-बतसिया।

ठनगन करते आंगन देखे सेज सुहागिन मचली।

 

सुआ पढ़ाते महाकाव्य,

खैनी मलते दर्शन।

मचिया बुनते अर्थशास्त्र,

इतिहास उतरते मसलन।

जिल्दें ही दिखती हैं मैली हर किताब है उजली।

28 टिप्‍पणियां:

  1. श्याम नारायण निश्र जी की कविता जब भी पढ़ता हूँ उसमें मन के भावों का गुंफन अपने चरमोत्कर्ष पर होता है । कविता के हर शब्द समवेत बोल पड़ते हैं । "थिरक थिरक उठते संबोधन" उसी क्रम में अच्छी लगी । धन्यवाद ।

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  2. जिल्दें ही दिखती हैं मैली हर किताब है उजली।

    गाँव के जीवन का यथार्थ विवरण चित्रित करती हुई कविता ...वैसी ही सहज ...सुंदर ...भावपूर्ण अभिव्यक्ति....!!
    श्याम नारायण मिश्र जी का अद्भुत ....सजीव लेखन ....!!abhar...

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  3. ध्वनी ,नाद ,अर्थ छटा को नए आयाम शब्दों को नै परवाज़ देती रचना .

    ठहरा हुआ पानीढोल बजाते बादल देखे,

    घुंघरू बांधे बिजली।

    चौमासे के संग बावरी धरती गाती कजली।

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  4. प्रकृति,मानव-जीवन और कविता को एक-रस कर दिया !
    आभार !

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  5. सुआ पढ़ाते महाकाव्य, खैनी मलते दर्शन। मचिया बुनते अर्थशास्त्र, इतिहास उतरते मसलन

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    आपको बहुत बहुत बधाई ||

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  6. लोक-जीवन दर्शन,लोक संस्कृति,छंद, गति , यति, लय , ताल ,ग्राम्य परिवेश ,माटी की महक सभी कुछ समाया है आपकी कविता में.कालांतर में निश्चय ही लोक गीत कहायेगी.हम तो पढ़ कर धन्य हो गये.वर्तमान साहित्य में ऐसी रचनाओं का अभाव है.अत: मैं तो इसे दुर्लभ ही कहूंगा.

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  7. 'धरती गाती कजली' वाह वाह वाह, माटी की इस सौंधास पर कौन न्यौछावर न हो जाये, बहुत खूब

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  8. श्याम मिश्र जी की पूरी कविता में बिम्बों का भरपूर और प्रभावशाली प्रयोग मन को मोह लेता है.आपकी पसंद की दाद देता हूँ,मनोज जी.

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  9. प्रकृति से लेकर रिश्तों तक का सफर इस रचना में अद्भुत है ..

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  10. आह.... ! यह नवगीत मेरे ऊपर ऋण है। इस कविता के साथ मैं खुद शीघ्र ही आँच पर आउंगा।

    अभी धन्यवाद !

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  11. जिल्दें ही दिखती हैं मैली हर किताब है उजली।
    behad sahaj , saral aur dil me utarti abhivyakti.

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  12. मिश्र जी के नवगीत समय से कहीं आगे के गीत हैं... इनको पढते हुए इनके रचना काल का अनुमान लगाना कठिन प्रतीत होता है... रचनाओं की भाषा अपने आप में सौंदर्य का प्रतिमान हैं और कविता के भाव को जीवंत कर देती हैं.जैसे इसी नवगीत को ले लें. जिन्होंने वह परिवेश देखा है वे आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि यह गीत ढोलक की थाप पर आँगन में बैठकर गाया जा रहा है.
    अद्भुत!! नमन उस महाकवि को!!

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  13. स्व. श्री मिश्रजी की कविता की सबसे खासियत है भाषा की ताजगी।

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  14. is sunder abhivyakti ko hamare saath baantne ke liye aabhar.

    is prakar ki abhivyaktiyan shabd kosh gyan me vriddhi karti hain.

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  15. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  16. वाह, इसका आनंद तो ऊँची आवाज में सस्वर पाठ करने में है। रात की इस बेला में भी मैंने यह आनंद उठाया।

    वाकई अनुपम रचना है। गाँव की बरसात याद आ गयी।

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  17. जिल्दें ही दिखती हैं मैली हर किताब है उजली।

    वारि जाऊं !!!!

    शब्द भाव ले...ह्रदय तक पहुँच इसे हिलोर गए...

    क्या कहूँ,निःशब्द हूँ....

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  18. अत्यंत मधुर और मनोहारी।
    मुग्ध हूँ!

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  19. ग्रामीण परिवेश का सहज वर्णन करती सुंदर नवगीत ....... श्याम नारायण मिश्र जी को पढना हमेशा अच्छा लगा है. सुंदर प्रस्तुति.
    .
    पुरवईया : आपन देश के बयार

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  20. श्याम नारायण मिश्र जी को पढ़वाने का आभार...

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  21. श्याम नारायण निश्र जी की प्रस्तुत कविता.. गाँव के जीवन का यथार्थ विवरण को चित्रित करती एक अद्भुत और सजीव रचना है.......मेरा शत शत. नमन !!

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  22. इतनी उत्कृष्ट रचना को पढ़ने का अवसर देने के लिए धन्यवाद ......

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