सोमवार, 26 सितंबर 2011

नई किरणों के लिए


नई किरणों के लिए
श्यामनारायण मिश्र

दिन कटा,
ज्यों किसी सूमी महाजन का
         पुराना ऋण पटा।

कल सुबह की
नई किरणों के लिए,
पी रहे आदिम-अंधेरा
    आंख मूंदे, मुंह सिए।
करवटें लेते हुए
महसूस  करते  रहे   भीतर
      स्वर्ण केशों की घटा।

सीखना है,
हाथ बांधे हुए चलना
    इस कसाई वक़्त के पीछे।
भूलना है,
एक मीठी आग का बहना
    नसों  में रक्त  के नीचे।
भागना है,
जले जंगल से उठाकर कांवरों भर
      याद की स्वर्णिम छटा।

23 टिप्‍पणियां:

  1. दिन कटा,
    ज्यों किसी सूमी महाजन का
    पुराना ऋण पटा।

    वाह,शुरुआत में तबियत ख़ुश हो गई.पूरा नवगीत ख़ुश कर देने वाला.
    अच्छी प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  2. श्यामनारायण मिश्र जी का सुन्दर गीत पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर व सार्थक रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सीखना है,हाथ बांधे हुए चलना इस कसाई वक़्त के पीछे।

    कड़वा सच!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खूब ... यथार्थ की अभिव्यक्ति है ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मिश्र जी का गीत पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत भावपूर्ण और नए बिम्बों से सजी कविता!

    उत्तर देंहटाएं
  8. वर्ग-संघर्ष लगभग हर युग की दास्तान है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर प्रस्तुति पर
    बहुत बहुत बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  10. एक बार फिर आपके शब्द कौशल ने मन्त्र मुग्ध कर दिया...नमन है आपकी लेखनी को...अद्भुत

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  11. दिन कटा,
    ज्यों किसी सूमी महाजन का
    पुराना ऋण पटा।
    bahut satik abhivyakti...aabhar

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।